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आतंकी घटनाओं में अपनी संलिप्तता को क्लीन चिट दे रही हिन्दुत्व ब्रिगेड

मोदासा – महज शुरूआत है
हिन्दुत्व ब्रिगेड के अग्रणी आतंकी घटनाओं में अपनी संलिप्तता को लेकर खुद को ही क्लीन चिट दे रहे हैं !
क्या हिन्दुत्व आतंक के मामलों की जांच अब अपना रूख बदल रही है ? दरअसल पिछले दिनों एक के बाद एक सामने आए घटनाक्रम – जिनका उपरी तौर पर एक दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं दिख रहा था – उसे देख कर यही प्रतीत हो रहा है।
मुंबई की जानीमानी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर सुश्री रोहिणी सालियान द्वारा मीडिया में किए गए इस उद्घाटन के बाद कि मालेगांव बम धमाके /2008/ के मामलों में – जिनमें वह पिछले सात साल से अभियोजक की भूमिका में हैं – उन पर राष्ट्रीय जांच एजेन्सी/एनआईए – नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी/ की तरफ से दबाव पड़ रहा है कि वह मामले में सुस्ती बरते या अजमेर बम धमाके /2007/ में एक के एक कई गवाहों के अपने बयानों से पलट जाने या एनआईए द्वारा मध्यप्रदेश के संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले को अचानक फिर मध्यप्रदेश पुलिस को लौटा देने की ख़बरों के बीच यह समाचार भी आया है कि वर्ष 2008 के आतंकी हमले के बाद बनी इस जांच एजेंसी ने ‘अधूरे सबूतों’ की बात करते हुए मोदासा बम धमाका मामले में अपनी फाइल बन्द करने का निर्णय लिया है।
ठीक ही कहा जा रहा है कि भाजपा के केन्द्र में सत्तारोहण के बाद यह पहला साफ संकेत है कि कांग्रेस के नेत्रत्ववाले संप्रग गठबन्धन की सरकार के दिनों में उजागर हुई हिन्दुत्व आतंक की परिघटना एवं उससे जुड़े मामलों में अब ढिलाई बरती जाएगी। इस बदली हुई परिस्थिति को लेकर  संकेत एक केन्द्रीय काबिना मंत्री के हालिया बयान से भी मिलता है जिसमें उन्होंने ‘हिन्दू आतंक की किसी सम्भावना को सिरेसे खारिज किया था’ और यह इस हकीकत के बावजूद कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कमसे कम 16 ऐसे उच्च स्तरीय मामलों की जांच में मुब्तिला रही है, जिसमें हिन्दुत्व आतंकवादियों की स्पष्ट संलिप्तता दिखती है और हिन्दुत्व संगठनों के आकाओं पर से सन्देह की सुई हटी नहीं है।
मोदासा, जो उन दिनों गुजरात के सांबरकांठा जिले का हिस्सा था और अब उसे अलग जिला बनाया गया है, वहां सितम्बर 2009 में रमज़ान के महिने में मुस्लिम बहुल सुका बाज़ार इलाके में बम विस्फोट हुआ था, जिसमें ……………जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

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एक किशोर की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे। गौरतलब है कि यह ऐसा बम विस्फोट रहा है, जिसकी बहुत कम छानबीन की गयी है। अब जबकि आधिकारिक तौर पर उसकी फाईल बन्द करने का निर्णय लिया जा चुका है, तब यह देखना समीचीन होगा कि किस तरह वह ऐसा दौर था कि देश में अलग अलग स्थानों पर बम विस्फोट हो रहे थे या जिन्दा बम बरामद हो रहे थे या राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अपनी अंतरिम जांच में क्या पाया था और किस तरह तत्कालीन ग्रहमंत्री जनाब पी चिदम्बरम ने यह ऐलान किया था कि उन्होंने 2008 के बम विस्फोट के मामले में अहम सुराग हासिल किए हैं।
वे सभी जिन्होंने करीबी से इस मामले को देखा है, बता सकते हैं कि किस तरह एनआईए का यह निर्णय न समझ में आने लायक और अनाकलनीय है।
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रमज़ान का महिना, जब मुसलमान माह भर के लिए उपवास रखते हैं, दरअसल मोदासा के आबिदा घोरी और उनके पति पर भारी गुजरता है। ऐसा नहीं कि वह उस समय के सख्त रूटीन से परेशान होते हैं, दरअसल यही वह समय था जब सात साल पहले गुजरे उन्होंने अपने इकलौते बेटे जमाल आब्दीन घोरी, जो बमुश्किल 15 साल का था, खोया था और उसकी याद उन्हें फिर बेजार करती है। मोदासा के सुका बाज़ार इलाके में हुए बम विस्फोट में, ईद के महज दो दिन पहले वह गुजर गया था, जब रात के वक्त की नमाज़ शुरू होने वाली थी/29 सितम्बर 2008/
आबिदा उस दिन का हर लमहा याद है जब जमाल शाम के वक्त़ अपने घर से निकला था कुछ सामान खरीदने के लिए, दूसरे दिन की सेहरी के लिए, जब हीरो होण्डा मोटरसाइकिल/जीजे 9 आर 2896/ में रखा कम तीव्रता वाला बम फूटा था। मस्जिद के बाहर रखे इस मोटर साइकिल के विस्फोट में जमाल की ठौर मौत हुई थी और सोलह लोग घायल हुए थे। बाद में उसे पता चला कि मोटर साइकिल पर नकली नम्बर प्लेट लगी है। जमाल, जो पढ़ाई में तेज था और मोहल्ले के परिवार का भी प्यारा था, उसने ईद के लिए कई कार्यक्रम बनाए थे, उसे इस बात का गुमान कैसे हो सकता था कि वह खुद नहीं रहेगा और उसकी लाश इलाके के कब्रिस्तान में दफन हुई रहेगी।
कुछ दिन पहले आबिदा ने स्थानीय रिपोर्टर से सुना है कि मामले की जांच पुलिस ने बन्द की है और वह कभी नहीं जान सकेगी कि उसके बेटे को किसने मारा। दरअसल यह सुन कर उसे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ था, क्योंकि उसने पुलिस एवं प्रशासन का व्यवहार देखा है, जिन्होंने इतने सालों के अन्तराल में एक बार भी आकर उसका हाल जानने या केस के बारे में बताने की केाशिश की थी।
दरअसल, पहले से ही वह पुलिस के बारे में आश्वस्त नहीं रही है क्योंकि 2002 के दिनों में उन्होंने जिस तरह पक्षपाती रूख अख्तियार किया, उससे वह वाकिफ है और वह यह भी जानती है कि वह शख्स जो मोदासा बम धमाके की जांच के लिए जिम्मेदार रहा है, वह ऐसे मामलों में कुख्यात रहा है।
अहमदाबाद के अपने एक रिश्तेदार से उसने यह भी जाना है कि इस पुलिस अफसर ने 2002 के दंगों के दिनों में उसके पास शरण लेने पहुंचे दंगापीडि़तों को यह कहा था ‘‘अब आप का वक्त़ पूरा हो चुका है। हमें बताया गया है कि आप की मदद न की जाए। इसके लिए ऊपर से आदेश हैं।’’ उसे यह भी बताया गया कि ……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

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यही वह शख्स है जो नरोदा पाटिया इलाके के लिए जिम्मेदार था, /2002/जब वहां अल्पसंख्यकों के कतलेआम को अंजाम दिया गया था।
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बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि मोदासा और एक अन्य शहर मालेगांव में एक साथ, एक ही दिन, लगभग एक ही वक्त़  बम धमाके हुए थे। दोनों मुस्लिम बहुल इलाके थे और दोनों जगहों पर विस्फोटकों के लिए दुपहिया वाहनों का इस्तेमाल किया गया।
दोनों में फरक इतना ही था कि मालेगांव, सूबा महाराष्ट्र का हिस्सा था जहां उन दिनों कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का शासन था, जबकि मोदासा, गुजरात में पड़ता था, जहां कई सालों से भाजपा सत्ता पर काबिज थी। मालेगांव में आठ मौतें हुई थीं और अस्सी के करीब लोग घायल हुए थे। यहां विस्फोटकों से लदी मोटरसाइकिल बन्द पड़े ‘सिमी’ के कार्यालय के सामने पार्क की गयी थी, जबकि मोदासा में सुका बाज़ार की मस्जिद के सामने हीरो होण्डा मोटरसाइकिल खड़ी की गयी थी।
एक साधारण व्यक्ति भी बता सकता है कि दोनों में साफ सम्बन्ध है और वह यह भी कहेगा कि एक ही आतंकी समूह ने दोनों घटनाओं को अंजाम दिया है। यह अलग बात है कि मालेगांव बम विस्फोट धमाके की जांच – जिसे जांबाजा पुलिस अफसर हेमन्त करकरे ने अंजाम दिया – के अन्तर्गत देश भर फैले हिन्दुत्व आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसमें शीर्षस्थ नेताओं से लेकर प्रचारक सभी संलिप्त दिखे, जबकि मोदासा बम विस्फोट का आलम यह है कि उसकी फाइल तक बन्द की जा रही है।
एक क्षेपक के तौर पर यह बताया जा सकता है कि एनआईए ने जो लैपटोप मालेगांव बम विस्फोट में शामिल आतंकी शंकराचार्य दयानन्द पांडे से बरामद किया, उसमें इस आतंकी समूह की हर मीटिंग का रेकार्ड रखा गया है, जिसके अनुसार अगर कार्रवाई हुई तो संघ परिवार ही नहीं अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कई नेता ताउम्र सलाखों के पीछे पहुंचाये जा सकते हैं। इस लैपटोप में वह विस्फोटक जानकारी भी उपलब्ध है कि किस तरह इस आतंकी समूह ने वित्तीय सहायता एवं अपने लोगों को हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए इस्त्राएल एवं नेपाल सरकारों से बात चलायी थी। अपने देश के अन्दर तोडफोड मचाने के लिए की गयी यह कार्रवाई खुल्लमखुल्ला देशद्रोह की कार्रवाई थी। इस जांच से कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं:
– एक यह पता चला कि हिन्दुत्व आतंक, भारत के धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र के लिए उसके खतरे को हमेशा ही कम करके आंका गया है, उसकी अखिल भारतीय स्तर पर उपस्थिति है और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ियां जोड़ने में लगा है।
– दूसरे, हिन्दुत्व आतंक के मामले में कुछ भी स्वतःस्फूर्त नहीं है, जिसमें योजनाकार, मास्टरमाइंड, वित्तीय प्रबंधन करने में या विचारक के तौर पर ऐसे संगठनों का शीर्षस्थ नेतृत्व शामिल है।
दिलचस्प है कि गुजरात पुलिस, जो ‘जिहादी आतंकवादी’ घटनाओं के खुलासे में फुर्ती को लेकर हमेशा अपनी पीठ थपथपाती रही है, वह न उसी किस्म की कार्यक्षमता मोडासा मामले में दिखा सकी और न ही वह कोई सुराग़ उपलब्ध करा सकी। इस मामले की जांच में अपनी विफलता के बावजूद, उसने महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते से सहायता लेना भी जरूरी नहीं समझा, जिसने ……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

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मालेगांव मामले को उजागर किया था। शायद उसके इस रूख में मीडिया के रूख ने भी मदद पहुंचायी हो, जो आतंक की हर घटना के पीछे ‘जिहादी’ कोण ढूंढ लेता था। हम याद कर सकते हैं कि मीडिया की एकांगी भूमिका ने भी जांच के एकांगीपन में सहूलियत प्रदान की होगी और किस तरह मामले को आसान ब रहनाया होगा।
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इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महाराष्ट्र एटीएस टीम पर कोई दबाव नही था। 2008 के आतंकी हमले में हेमन्त करकरे की रहस्यमयी मौत के बाद रिबेरो जैसे पूर्व पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि करकरे ने उन्हें बताया था कि वह कितने दबाव में काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं हिन्दुत्ववादी संगठनों और बहुसंख्यकवादी रूझान वाले मीडिया ने यही माहौल बनाने की कोशिश की थी कि इस घटना के लिए ‘जिहादी आतंकी’ जिम्मेदार हैं। इतनाही नहीं जब करकरे की जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी और कई शीर्षस्थ हिन्दुत्ववादियों तक या उनके कारिन्दों तक आग पहुंचती दिख रही थी, तब इन्हीं संगठनों ने बाकायदा महाराष्ट्र बन्द का आवाहन कर करकरे को ‘हिन्दू विरोधी’ प्रचारित करने की योजना बनायी थी।
यह वही लोग थे जिन्होंने मालेगांव बाम्बर्स को – पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा, शंकराचार्य दयानन्द पांडे – जब नाशिक एवं पुणे की अदालत में पेश किया जा रहा था, तब उन पर गुलाब की पंखुडिया बरसा कर उनका खैरमकदम किया था। सभी जानते हैं कि यह कोई पहला मौका नहीं था जब मालेगांव को इस किस्म की त्रसदी को झेलना पड़ा था। दो साल पहले सितम्बर 2006 में शब ए बारात के मौके पर इसी तरह बम विस्फोट किए गए थे, जिसमें मुसलमानों को निशाना बनाया गया था। उस मामले में भी जबकि हिन्दुत्व आतंकवादियों की संलिप्तता के तमाम सबूत मौजूद थे, जांच एजेंसियों ने उनकी उपेक्षा की थी और मीडिया ने भी उसका खुल कर साथ दिया था और उसके लिए निरपराध अल्पसंख्यकों को कई साल जेल में ठंूसा गया था।
निश्चित ही यह करकरे जैसे अधिकारियों की पेशागत ईमानदारी और जज्बे का ही कमाल था कि उन्होंने तमाम दबावों, प्रचारों, प्रलोभनों को न मानते हुए अपनी जांच जारी रखी और दूर तक फैले हिन्दुत्व आतंकी नेटवर्क का खुलासा किया। और इस तरह जहां महाराष्ट्र की पुलिस ने 29 सितम्बर 2008 के मालेगांव धमाके को अंजाम देने वाले कातिलों को ढूंढ निकाला और उन्हें सलाखों के पीछे भेजा, वहीं गुजरात पुलिस अकर्मण्य बनी रही। वह मामूली कामों को भी आगे बढ़ाने में, सुराग ढूंढने में असफल रही। उसने महज दो बातें की: एक ……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

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उसने उपरोक्त दुपहिया वाहन की चेसिस अहमदाबाद स्थित फोरेन्सिक साइंस लैब को भेज दी ताकि वह मोटरसाइकिल का नम्बर बता सके और उसने विभिन्न समुदायों के सक्रिय सदस्यों को बुला कर उनसे बयान लिए। इस हक़ीकत के बावजूद कि महाराष्ट्र का आतंकवाद विरोधी दस्ता, उनके साथ मामले की जांच में सहयोग करना चाहता था, मगर उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी।
उन दिनों सांबरकांठा से कांग्रेस सांसद मधुसूदन मिस्त्री ने जांच के दौरान ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मिल कर तीन संदिग्ध लोगों के नाम भी पुलिस को सौंपे थे, मगर उसने कोई कार्रवाई नहीं की। हिन्दुत्व आतंक के मामले में पुलिस की विश्वसनीयता को प्रश्नांकित करते हुए उन्होंने पूछा कि आखिर मोडासा मामले में पुलिस इतनी सुस्ती क्यों बरत रही है जबकि अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में उसने बहुत फुर्ती का परिचय दिया।
मोडासा का मामला वहीं दफन हो जाता, मगर इत्तेफाक से उन्हीं दिनों अजमेर तथा मक्का मस्जिद बम धमाके में /2007/नए खुलासे के बाद, जिसमें संघ के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता दिखी थी और उनसे जुड़ा नेटवर्क सन्देह के घेरे में आया था, और फिर राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने केन्द्र सरकार की पहल पर मोडासा मामले की जांच हाथ में ली। संप्रग सरकार के दिनों में उसके चलते इस मामले में नए खुलासे की उम्मीद बनी।
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इसके पहले कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अन्तरिम निष्कर्षों पर गौर करें, उस वातावरण को जानना समीचीन होगा जब देश में अलग अलग स्थानों पर बम विस्फोट हो रहे थे और कौन विस्फोट करवा रहा है, यह स्पष्ट नहीं हो रहा था। बीबीसी ने 29 सितम्बर 2008 को ख़बर दी कि
‘अहमदाबाद की पुलिस ने यह दावा किया कि उसने गुजरात में एक महत्वपूर्ण त्यौहार शुरू होने के पहले बमों का एक जखीरा बरामद किया। उसका कहना था कि उसने जो बम बरामद किए वह उच्च स्तर के नहीं थे, जिन्हें बाद में बेअसर कर दिया गया। यह घटना दिल्ली के एक मार्केट में हुए बम विस्फोट के दो दिन बाद हुई, जिसमें दो लोगों की मौत हुई थी।
पिछले साल जुलाई में बमों के चलते अहमदाबाद में 50 लोग मारे गए। हाल के महिनों में कई अन्य शहरों में बम विस्फोट हुए हैं।
/पुलिस ‘फाइंड 17 बाम्बस इन गुजरात www.bbc Page last updated at 17-23 GMT Monday 29th September 2008 18.23 UK @
फरीदाबाद में, एक मंदिर के बाहर बम मिला था, जो एक जागरूक नागरिक के चलते तत्काल निष्प्रभावी कर दिया गया।
नई दिल्ली: फरीदाबाद जिले के फरीदाबाद में सोमवार की सुबह एक जिन्दा बम बांके बिहारी मंदिर के बाहर मिला। हालांकि बम निरोधक दस्ता वहां तत्काल पहुंचा, मगर एक जागरूक नागरिक ने उसके पहले ही बम को निष्प्रभावी कर दिया था। पुलिस अभी तक यह तय नहीं कर सकी है कि मंदिर के बाहर……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

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बम किस ने रखा था और क्या अब तक आतंक की घटनाओं से अछूते हरियाणा को निशाना बनाने की यह कोशिश तो नहीं।/ टाईम्स नाउ, 29 सितम्बर 2008,  The Times of India http://timesofindia.indiatimes.Com//Cities/Civilian defuses bomb in Faridabad/articleshow ‘3548338 जिस तरह नई दिल्ली के मेहरौली में मालेगांव-मोदासा बम धमाके के पहले आतंकी हमला हुआ था, उसने भी पुलिस को दिग्भ्रमित किया था।
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने सीएनएन आईबीएन को बताया कि वह शनिवार के बम धमाके और इसके पहले दक्षिण दिल्ली के इलाके में साल की शुरूआत में हुए तीन छोटे बम धमाकों के बीच सम्बन्ध देखने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी रिपोर्ट भी अधिक सूर्खियां नहीं बनी थीं। .. पुलिस के मुताबिक मेहरौली के बम धमाके के कुछ ऐसे पहलू थे जिसके चलते उन्हें यह सोचने के लिए मजबूर किया कि दिल्ली में इसके पहले हुए बम धमाकों से उन्हें जोड़ा नहीं जा सकता था।…. बम धमाका सूनी गलियों में हुआ..इसकी प्रणाली पुरानी किस्म की थी। बम के साथ कोई टाईमर नहीं लगा था..यहां तक कि बम धमाके का टाईम भी दोपहर दो बजे थे, जो उस वक्त़ सबसे कम भीड़ का वक्त़ होता है।
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