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इसलिए प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक हैं ओम थानवी

लीक से हटकर ओम थानवी
कल हमने पहली बार एनडीटीवी पर अपने संपादक ओम थानवी को गौर से सुना। आज पहली बार अखबार बांचते हुए पहले पेज पर उनका विशेष संपादकीय पढ़ा, क्योंकि कल मेरा अवकाश रहा है और छपने से पहले रोज की तरह मैंने अखबार देखा नहीं है।

इस संपादकीय में जो खास बात मुझे नजर आयीं वह कांग्रेस और संघ परिवार के तिलिस्म टूटने का मुद्दा है, जो धर्म राष्ट्रीयता के सबसे बड़े सौदागर है। लीक से हटकर, ओम थानवी का लिखा यह संपादकीय जरुर पढ़ें जनसत्ता के पहले पेज पर।

हमने जब लिखा कि हम प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक मानते हैं ओम थानवी को। लोगों को लगा होगा कि हम चमचई पर उतारु हैं। हमने प्रभाष जी के प्रधान संपादक होते हुए उनके ब्राह्मणत्व पर हंस में लिखा है। प्रभाष जी से इंडियन एक्सप्रेस समूह के हर व्यक्ति का निजी संबंध रहा है। वैसे संबंध शायद किसी और संपादक के हों।

हम लोग जनसत्ता में आये तो उनके अत्यंत अंतरंग संवाद की वजह से ही। आगे पीछे कुछ नहीं देखा। वे हर किसी का ख्याल रखते थे। हालांकि वे आखिरी दिनों में मुझे मंडल जी मंडल जी कहते रहे हैं, तब दिलीप मंडल हमारे साथ न थे।

यकीनन ओम थानवी के साथ हम लोगों का वैसा कोई संबंध नहीं रहा है। न वे जनसत्ता कोलकाता में प्रभाषजी की तरह जब तब आते रहे हैं। न वे हममें से किसी की खोज खबर रखते हैं और न वे हमारा लिखा कुछ भी पढ़ते हैं।

थानवी लेकिन केसरिया सुनामी से जनसत्ता को बाकी अखबारों की तरह रंगे नहीं हैं। हम समझ सकते हैं कि कितना मुश्किल है यह करिश्मा। देश भर में बाहैसियत पत्रकार सिर हमारा ऊंचा रखने के लिए उनका आभार।

थानवी ने लेकिन किसा आपरेशन ब्लू स्टार का समर्थन नहीं किया है।

न सती प्रथा के समर्थन में या श्राद्ध के महत्व पर कोई संपादकीय आया है।

कांग्रेस और संघ परिवार समान रुप से देश के दुश्मन हैं और दोनों शिविर धर्म कर्म के गढ़ हैं और दोनों को ध्वस्त करने की शुरुआत दिल्ली में युवाशक्ति का शंखनाद है। उनका संपादकीय पढ़कर मुझे ऐसा लगा है और इसलिए उनका आभार।

हमने पहले भी लिखा है कि ओम थानवी से हमारी कोई खास मुहब्बत नहीं है। लेकिन लगता है कि थोड़ी-थोड़ी मुहब्बत भी होने लगी है। इनने और क्यों खूब नहीं लिखा, प्रभाष जोशी की तरह इसका मुझे अफसोस रहेगा।

मुझे अफसोस रहेगा अगर मेरे मित्र शैलेंद्र कोलकाता में और हमारे न मित्र न दुश्मन, हमारे बॉस ओम थानवी अगर हमसे पहले ही शिड्यूल के मुताबिक रिटायर हो गये। इन्हें मैं खूब जानता हूं और इनके साथ काम करते हुए मुझे कमसकम लिखने पढ़ने और बोलने में कभी कोई अड़चन न हुई। ये हमसे पहले रिटायर हो गये तो पता नहीं किस किसके मातहत दो चार महाने और बिताने होंगे, फिक्र इसकी होती है। डर के बिना मुहब्बत दरअसल होती नहीं है।

बाकी हमारा स्टेटस यह है कि हमें प्रभाष जी नें बैकडेटेड इंडियन एक्सप्रेस के सबएडीटर का नियुक्ति पत्र जारी किया था कोलकाता आने के छह महीने बाद, जब मेरे वापसी के सारे रास्ते बंद हो गये थे।मजीठिया की कृपा से हम जो तेइस साल से जनसत्ता में सेवा कर रहे हैं, उन सबको इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य उपसंपादक ओहदे तक कमसकम दो दो प्रमोशन के प्रावधान के तहत मिल रहा है। लेकिन नये सिरे से न नियुक्ति पत्र मिला है और न परिचयपत्र बदला है और न बदलने के आसार हैं।

वेतनमान चाहे जो हो, मजीठिया का फतवा चाहे जो हो, हम बाहैसियत उपसंपादक ही रिटायर करने वाले हैं।

हमें इसकी शिकायत होती तो हम य़शवंत बाबू के कहे मुताबिक अब तक कबके सुप्रीम कोर्ट के दरवज्जे खटखटा दिये होते। हमारे प्रेरणा स्रोत तो बेचारे मुक्तिबोध हैं जो द्रोणवीर कोहली के संपादकत्व में प्रूफ रीडर काम करते रहे।

हमने सरकारी नौकरी का रास्ता इसीलिए नहीं चुना कि हम अपनी आजादी पर गुलामी चस्पां नहीं करना चाहते थे।

हम पत्रकार भी इसी वजह से बने हुए हैं।

प्रभाष जोशी से लेकर ओम थानवी ने हमारे फैसले को उचित ठहराया है।

सविता बाबू की ओपन हर्ट सर्जरी देवी शेट्टी ने 1995 में की थी जबकि उनके दिल के भीतर कैंसर का ट्यूमर बन गया था।वहीं एकमात्र आपरेशन कोलकाता में इस रोग का सफल रहा है।ऐसा हमारे तबके स्थानीय संपादक श्याम आचार्य की पहल पर प्रधान संपादक प्रभाष जोशी के सौजन्य से हुआ है।जिन अमित प्रकाश सिंह से हमारी कभी बनी नहीं,वे बाकायदा इस काम के मैनेजर से जैसे रहे।

तब चूंकि एक्सप्रेस समूह के एक एक कर्मचारी ने पैसे जोड़कर वह खर्चीला आपरेशन कराया, सविता बाबू ने हमें जनसत्ता छोड़ने के बारे में सपने में भी सोचने की इजाजत नहीं दी है।जैसे अपने मोहल्ले के लोगों ने आंधी पानी में कोलकाता आधीरात के वक्त दौढ़कर देवी सेट्टी के तत्काल आपरेशन के लिए ताजा खून देने को दौड़े बिना किसी रिश्ते के, वे रिश्ते अब इतने मजबूत हो गये हैं पिछले तेइस साल में कि हमारे लिए यह बंधन तोड़कर निकलना बेहद मुश्किल हो रहा है।

हमने बसंतीपुर वालों को कानोंकान खबर नहीं होने दी। पिताजी जब देशाटन के मध्य महीनों बाद अचनाक आ धमके तो हमारे घर वालों को पता चला कि क्या विपदा आन पड़ी थी। हम एक्सप्रेस समूह का यह कर्ज उतार नहीं सकते।

जिन महिलाओं के साथ टीम बनाकर सविता काम कर रही हैं वे न केवल धमकी दे रही हैं कि सोदपुर छोड़ने की सोची तो मार देंगे,वे जोर शोर से जुट गयी हैं हमारे लिए सस्ता मकान की खोज में।हमें तो यह कहने की इजाजत भी नहीं है कि सस्ते से सस्ते मकान में बसने की भी हमारी हैसियत नहीं है।

यह जो अनिश्चयता का तिलिस्म है,इसमें असुरक्षा बोध इतना प्रबल है कि तजिंदगी धर्म कर्म से अलहदा रही हमसे ज्यादा भौतिक वादी,हमसे ज्यादा धर्म निरपेक्ष सविता बाबू विशुद्ध हिंदुत्व की भाषा बोलने लगी है।

बाकी जनता के हिंदुत्व का राज भी कुछ कुछ सविताबाबू का  जैसा हाल है।

मेरा निजी अनुभव है कि मुक्त बाजार अर्थ व्यवस्था से महान कोई हिंदुत्व या कोई और धर्म मत नहीं है।

असुरक्षा और भय ही धर्म की सबसे बड़ी पूंजी है और उसी की नींव पर तमाम तंत्र मंत्र यंत्र कारोबार है। धर्म ससुरा भय और असुरक्षा से निपटने का हनुमान चालीसा है।

इस मुक्तबाजारी कारपोरेट केसरिया अर्थव्यवस्था में पल छिन पल छिन भारतीय नागरिक हनुमान चालीसा का पाठ करने को मजबूर है।

आखेर में एक अदद आम आदमी की चेतावनी है, गौर कर कि कांठालेर आठा लागले परे छाड़े ना कि

मुहब्बत का हर मसीहा दगाबाज है!

तू दगाबाजों पर मुहब्बत जाया न कर!
पलाश विश्वास

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