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Home / इस देश के अग्नाशय में लाइलाज कैंसर

August 1,2014 05:04

पलाश विश्वास

इस देश के अग्नाशय में लाइलाज कैंसर है। देश का दिलोदिमाग कैंसर से संक्रमित हो रहा है। कोशिकाओं में रक्तबीज की तरह जड़ें जमा चुका है कैंसर। इस कैंसर का नाम है मुक्त बाजार। जिसने इस देश को सही मायने में मृत्यु उपत्यका में तब्दील कर दिया।

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने मालदह में कहा है कि देश में 67 करोड़ लोग बेरोजगार हैं जो रोजगार की तलाश में है।उनकी शिकायत है कि रोजगार के मौके बन नहीं रहे हैं। ऐसा उन्होंने न राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है और न संसद के अभिभाषण में। इसलिए यह मान लेना चाहिए कि देश के अव्वल नंबर नागरिक भारत सरकार के अनुमोदित वक्तव्य के बजाय कुछ और कह रहे हैं और उनका कहा हुआ पिछले तेईस साल के विकास कामसूत्र को झुठला रहा है।

टीवी समाचार देखता कम हूँ। इसलिए दफ्तर जाने से पहले मालूम ही न था कि नवारुण दा नहीं रहे। अनुराधा मंडल की कैंसर से मृत्यु के बाद यह दूसरी दुर्घटना है। हम जानते थे परिणति। मानसिक तैयारी भी थी। लेकिन हाथों में संवादादता की खबर आते ही सन्न रह गया। बहुत दिनों बाद इतनी थकान महसूस हुई कि आंखें बोझिल हो गयीं। संस्करण निकालने के बाद बैठना मुश्किल हो गया। घर लौटकर अपनी पीसी के सामने बैठ नहीं सके। सविता को दफ्तर से ही हादसे की खबर दे दी थी। उस परिवार में सविता का भी आना जाना रहा है। वह तब से टीवी चैनलों में नवारुणदा को खंगाल रही हैं।

सुबह पता चला कि कोई अखबार नहीं आया। नींद से जागकर एजेंट के पास गया तो उसने हॉकर को फोन लगाया, जिसने कहा कि सारे अखबार हमारी खिड़की पर ठूंस गया वह। उन लोगों ने कहा कि अब लोग ताजा अखबार भी चुराने लगे हैं। रोजगार सृजन का यही हाल है।

सविता ने पूछा भी, इतने स्तब्ध क्यों हो, तो कहने से रोक नहीं पाया कि आज मेरे लिए सातवें दशक का अवसान हो गया। इस मृत्यु उपत्यका में फिर सातवें दशक की वापसी न होगी।

इस पर सविता फिर बोली कि सातवां दशक तो कब बीत गया, रीत गया। जो है ही नहीं, उसका क्या शोक।

नवारुणदा को अग्नाशय में कैंसर था। लाइलाज।

1994 में इसी कोलकाता में मेरी चाची जो बचपन में मेरी मां और मेरी ताई से ज्यादा प्रिय थीं और बाकायदा साहित्य की हिस्सेदारी भी जिनके साथ थी, उनका निधन भी अग्नाशय के कैंसर से हुआ। सविता के अलावा किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनके असहनीय दर्द को शेयर करते हुए उनकी तीमारदारी करना। उतना दर्द किसी दूसरे को मरते हुए सहते नहीं देखा। तभी से हम जानते रहे हैं कि अग्नाशय का कैंसर लाइलाज है।

जिस ठाकुर पुकुर कैंसर अस्पताल में नवारुण दा ने आखिरी सांसें लीं, वहां भी चाची का इलाज करा पाना संभव नहीं हुआ। नवारुण दा का दिल लेकिन लड़ता रहा शारीरिक अस्वस्थता के विरुद्ध। बेकल होते अंग प्रत्यंग के बावजूद आखिरी वक्त तक उनका दिल काम करता रहा। वैसे ही जैसे मेरे पिता के साथ हुआ। पिता की रीढ़ में कैंसर था। नई दिल्ली के आयुर्वज्ञान संस्थान के मेडिकल बोर्ड ने कह दिया कि अब अंतिम घड़ी का ही इंतजार करना है। हमने उनके एक-एक अंग को मरते हुए देखा। लेकिन आखिरी वक्त तक उनका दिलोदिमाग दुरुस्त था। इसीलिए मरणासण्ण पिता ने दिनेशपुर में कैंसर रोगियों के इलाज के लिए अस्पताल बनाने का आग्रह किया था बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने वाले अपने मित्र नारायण दत्त तिवारी से पूरे होशोहवास में। एनडी ने उनसे आखिरी इच्छा पूछी थी। बोलना बंद हो गया था। दर्द का अहसास तक खत्म हो चला था। आजीवन जुनून का अंत दिल के फेल हो जाने की वजह से ही हुआ। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक हाकिंस ने साबित कर दिया कि शारीरिक सीमाबद्धता ज्ञान के लिए बाधक नहीं है, वैज्ञानिक अति सक्रियता के रास्ते में भी बाधक नहीं।

मेरे पिता और नवारुण दा दोनों ने एक बेहद अबूझ पहेली खड़ी कर दी है मेरे लिए कि क्या दिल का हाल सही सलामत रखने के लिए गैर समझौतावादी प्रखर जनप्रतिबद्धता की कोई भूमिका है ही नहीं।

मैंने अपने पिता का अंतिम दर्शन नहीं किया। मैं उनके अंतिम संस्कार में शामिल न हुआ। मैंने पिता को मुखाग्नि नहीं दी। लेकिन उनके संघर्ष की विरासत मेरे कंधे पर वेताल की तरह सवार है। अशरीरी पिता मेरे साथ हैं और मेरी चेतना को निर्देशित भी वे ही करते हैं। हो सकता है कि हमारे वंशधारा में अमिट हो यह चेतनाधारा, हो सकता है कि नहीं भी हो, जैसा कि पतनशील सांढ़ संस्कृति में चेतना के विलोप की दशा है।

नवारुण दा से हमारे रिश्ते अजीबोगरीब रहे हैं। उनकी माता महाश्वेता दी को 1980 से जानता रहा हूँ। लेकिन नवारुण दा से संवाद का सिलसिला शरु हुआ भाषा बंधन से।

महाश्वेतादी ने हम जैसे लोगों को भाषाबंधन संपादकीय में रखा था और इस नाते बार-बार गोल्फ ग्रीन में नवारुण दा और महाश्वेतादी के घर जाना हुआ। सविता भी जाती रही है। उस परिवार के तमाम लोगों से परिचय हुआ। नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण में हम सब साथ-साथ थे। फिर अचानक महाश्वेतादी परिवर्तनपंथी हो गयीं। नवारुण दा परिवर्तनपंथी या सत्ता समर्थक हो ही नहीं सकते थे। वे अपनी कविता के अवस्थान से एक चूल इधर उधर ने थे।

महाश्वेता दी और नवारुण अलग-अलग थे। इसी बीच हमने कोलकाता के राजनीतिसर्वस्व साहित्यिक सांस्कृतिक परिदृश्य से भी खुद को अलग कर लिया। नवारुण दा से छिटपुट मुलाकाते होतीं रहीं। लेकिन वह परिवार कहीं टूट गया जिसमें नवारुण दा के साथ हम भी थे।

नवारुण दा का अंतिम दर्शन करने लायक ऊर्जा मुझमें नहीं है। उनकी मां और हमारी महाश्वेता दी या उनकी पत्नी, उनके बेटे, बहू से अब बात करने की हालत में नहीं हूँ। औपचारिक रस्म अदायगी मेरी आदत नहीं रही है। लेकिन जैसे मैं अपने पिता के संघर्ष को जी रहा हूँ, नवारुणदा की प्रखर जनचेतना का अंशीदार बना रहना चाहूँगा आजीवन।

नवारुण दा का अवसान मेरे लिए सत्तर दशक का अवसान है क्योंकि कम से कम साहित्य में सत्तर के दशक के सही प्रतिनिधि वे ही थे जो सत्तर के दशक के अवसान के बावजूद भी सत्तर के दशक की निरंतरता बनाये हुए थे।

मैं कह नहीं सकता कि मैं नवारुण दा की मृत्यु से ज्यादा दुःखी हूँ कि उस सत्तर के दशक के अवसना से हतप्रभ ज्यादा।

नवारुण का का दिल काम कर रहा था जबकि अंग-अंग उनका बेकल हो रहा था। हम यह दावा फिर भी नहीं कर सकते कि अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित इस देश का दिल किस हालत में है।

अब आपको तय करने का है कि इस देश के राष्ट्रपति झूठ बोल रहे हैं या प्रधानमंत्री।

67 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का मतलब है कि इस देश की आधी से ज्यादा आबादी आजीविका वंचित है। जिनकी आजीविका है ही नहीं, उनकी गरीबी दूर करने का दावा कितना सही है, कितना गलत इसका फैसला भी अब आप ही करें।

इंदिरा समय के वित्तमंत्री और यूपीए समय के भी वित्तमंत्री जो कह रहे हैं, ऐसा कभी बजट पेश करते हुए उन्होंने लेकिन कहा ही नहीं है। खासकर 1991 से अब तक के सारे वित्तमंत्री जो कुछ कहते रहे हैं, उसके उलट है पूर्व वित्तमंत्री का यह हैरतअंगेज बयान।

अगर भारत के राष्ट्रपति सच बोल रहे हैं तो भारत सरकार के तमाम तथ्य, आंकड़े, परिभाषाएं, नीतियां और रोजमर्रे के राजकाज सरासर झूठ के अलावा कुछ भी नहीं हैं। विकास की कलई पुणे से लेकर पहाड़ों में हो रही आपदाओं की निरंतरता जिस बारंबारता के साथ खलल रही है, उससे भी हम होश में नहीं हैं, तो सच और झूठ को अपने अपने पक्ष-विपक्ष, हित-अहित में जांचना परखना तो मुक्त बाजार का दस्तूर है ही। मसलन यह सरकार कह रही है और मीडिया भी जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है कि आर्थिक सुधारों के बिना, विनिवेश के बिना, प्रत्यक्ष विनिवेश के बिना,पीपीपी माडल के बिना रोजगार सृजन होगा नहीं और इसके लिए तमाम कानून बदले जाने जरूरी हैं। हो इसका उलट रहा है। लोग रोज रोजगार और आजीविका से बेदखल हो रहे हैं। हो इसका उलट रहा है। लोग रोज जल जंगल जमीन नागरिकता नागरिक मानवअधिकारों से बेदखल हो रहे हैं।

हमने बगुला भगतों की कथा पहले ही सुना दी है। भारत के संविधान के मुताबिक भारत की सरकार संसद के जरिये जनता के प्रति जवाबदेह है। संसदीय विधि के मुताबिक किसी भी कानून में संशोधन के लिए विधेयक पेश करना जरूरी होता है। उस विधेयक का मसविदा सार्वजनिक करना जरूरी होता है। उस सार्वजनिक हुए विधेयक पर आम जनता से राय मांगना जरूरी होता है। विभिन्न पक्षों की राय पर जनसुनवाई भी जरूरी होती है। सुनवाई के लिए संसदीय समिति बनायी जाती है। संसदीय समिति जब सरकार को वह मसविदा विधेयक लौटा दें तब मंत्रिमंडल में बिल पास करने की नौबत आती है। बिल को दोनों सदनों में बहुमत से पास कराना जरूरी होता है। किसी भी कानून को संविधान के मूल दायरे से बाहर या मौजूदा संवैधानिक प्रवधानों के प्रतिकूल नहीं होने चाहिए। हुए तो ऐसा कानून पास करने से पहले दो तिहाई बहुमत से दोनों सदनों में संविधान संशोधन कानून बनाने से पहले जरूरी होता है। श्रम कानूनों में जो एक नहीं, दो नहीं, पूरे 54 संशोधन प्रस्तावित हैं, बगुला समिति की सिफारिशों के मुताबिक। क्या मीडिया या सरकार ने उन प्रस्तावित संशोधनों का खुलासा किया है, सवाल यह है। सवाल यह है, वे 54 संशोधन क्या-क्या होंगे और उनका ब्यौरा कहाँ है। सवाल यह है, संसदीय राजनीति में शामिल राजनीतिक दलों ने, चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने या ट्रेड यूनियनों ने उन संशोधनों का ब्यौरा हासिल किया है। किया है तो वे जनता के साथ उस जानकारी को शेयर क्यों नहीं कर रहे हैं।

सवाल यह है कि मसौदा विधयेक के बिना कैबिनेट सीधे बगुला समिति की रपट पर सारे कानूनी संशोधनों को हरी झंडी कैसे दे सकती है, बगुला समितियों के जरिये विनिवेश, एफडीआई, पीपीपी, पर्यावरण हरी झंडियों की तरह। अगर मसविदा विधेयक पर बगुला समिति की सिफारिशें है तो उन सिफारिशों का खुलासा क्यों नहीं कर रही है सरकार और उन सिफारिशों के बाद मसविदा विधेयक का इतिहास भूगोल क्यों छुपाने लगी है सरकार। बिना सार्वजनिक सुनवाई, बिना संसदीय समिति के अनुमोदन के कैसे केबिनेट किसी कानून को बदलने का फैसला कर सकती है, यह भी विचारणीय है।

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

इस देश के अग्नाशय में लाइलाज कैंसर

August 1,2014 05:04

पलाश विश्वास

इस देश के अग्नाशय में लाइलाज कैंसर है। देश का दिलोदिमाग कैंसर से संक्रमित हो रहा है। कोशिकाओं में रक्तबीज की तरह जड़ें जमा चुका है कैंसर। इस कैंसर का नाम है मुक्त बाजार। जिसने इस देश को सही मायने में मृत्यु उपत्यका में तब्दील कर दिया।

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने मालदह में कहा है कि देश में 67 करोड़ लोग बेरोजगार हैं जो रोजगार की तलाश में है।उनकी शिकायत है कि रोजगार के मौके बन नहीं रहे हैं। ऐसा उन्होंने न राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है और न संसद के अभिभाषण में। इसलिए यह मान लेना चाहिए कि देश के अव्वल नंबर नागरिक भारत सरकार के अनुमोदित वक्तव्य के बजाय कुछ और कह रहे हैं और उनका कहा हुआ पिछले तेईस साल के विकास कामसूत्र को झुठला रहा है।

टीवी समाचार देखता कम हूँ। इसलिए दफ्तर जाने से पहले मालूम ही न था कि नवारुण दा नहीं रहे। अनुराधा मंडल की कैंसर से मृत्यु के बाद यह दूसरी दुर्घटना है। हम जानते थे परिणति। मानसिक तैयारी भी थी। लेकिन हाथों में संवादादता की खबर आते ही सन्न रह गया। बहुत दिनों बाद इतनी थकान महसूस हुई कि आंखें बोझिल हो गयीं। संस्करण निकालने के बाद बैठना मुश्किल हो गया। घर लौटकर अपनी पीसी के सामने बैठ नहीं सके। सविता को दफ्तर से ही हादसे की खबर दे दी थी। उस परिवार में सविता का भी आना जाना रहा है। वह तब से टीवी चैनलों में नवारुणदा को खंगाल रही हैं।

सुबह पता चला कि कोई अखबार नहीं आया। नींद से जागकर एजेंट के पास गया तो उसने हॉकर को फोन लगाया, जिसने कहा कि सारे अखबार हमारी खिड़की पर ठूंस गया वह। उन लोगों ने कहा कि अब लोग ताजा अखबार भी चुराने लगे हैं। रोजगार सृजन का यही हाल है।

सविता ने पूछा भी, इतने स्तब्ध क्यों हो, तो कहने से रोक नहीं पाया कि आज मेरे लिए सातवें दशक का अवसान हो गया। इस मृत्यु उपत्यका में फिर सातवें दशक की वापसी न होगी।

इस पर सविता फिर बोली कि सातवां दशक तो कब बीत गया, रीत गया। जो है ही नहीं, उसका क्या शोक।

नवारुणदा को अग्नाशय में कैंसर था। लाइलाज।

1994 में इसी कोलकाता में मेरी चाची जो बचपन में मेरी मां और मेरी ताई से ज्यादा प्रिय थीं और बाकायदा साहित्य की हिस्सेदारी भी जिनके साथ थी, उनका निधन भी अग्नाशय के कैंसर से हुआ। सविता के अलावा किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनके असहनीय दर्द को शेयर करते हुए उनकी तीमारदारी करना। उतना दर्द किसी दूसरे को मरते हुए सहते नहीं देखा। तभी से हम जानते रहे हैं कि अग्नाशय का कैंसर लाइलाज है।

जिस ठाकुर पुकुर कैंसर अस्पताल में नवारुण दा ने आखिरी सांसें लीं, वहां भी चाची का इलाज करा पाना संभव नहीं हुआ। नवारुण दा का दिल लेकिन लड़ता रहा शारीरिक अस्वस्थता के विरुद्ध। बेकल होते अंग प्रत्यंग के बावजूद आखिरी वक्त तक उनका दिल काम करता रहा। वैसे ही जैसे मेरे पिता के साथ हुआ। पिता की रीढ़ में कैंसर था। नई दिल्ली के आयुर्वज्ञान संस्थान के मेडिकल बोर्ड ने कह दिया कि अब अंतिम घड़ी का ही इंतजार करना है। हमने उनके एक-एक अंग को मरते हुए देखा। लेकिन आखिरी वक्त तक उनका दिलोदिमाग दुरुस्त था। इसीलिए मरणासण्ण पिता ने दिनेशपुर में कैंसर रोगियों के इलाज के लिए अस्पताल बनाने का आग्रह किया था बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने वाले अपने मित्र नारायण दत्त तिवारी से पूरे होशोहवास में। एनडी ने उनसे आखिरी इच्छा पूछी थी। बोलना बंद हो गया था। दर्द का अहसास तक खत्म हो चला था। आजीवन जुनून का अंत दिल के फेल हो जाने की वजह से ही हुआ। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक हाकिंस ने साबित कर दिया कि शारीरिक सीमाबद्धता ज्ञान के लिए बाधक नहीं है, वैज्ञानिक अति सक्रियता के रास्ते में भी बाधक नहीं।

मेरे पिता और नवारुण दा दोनों ने एक बेहद अबूझ पहेली खड़ी कर दी है मेरे लिए कि क्या दिल का हाल सही सलामत रखने के लिए गैर समझौतावादी प्रखर जनप्रतिबद्धता की कोई भूमिका है ही नहीं।

मैंने अपने पिता का अंतिम दर्शन नहीं किया। मैं उनके अंतिम संस्कार में शामिल न हुआ। मैंने पिता को मुखाग्नि नहीं दी। लेकिन उनके संघर्ष की विरासत मेरे कंधे पर वेताल की तरह सवार है। अशरीरी पिता मेरे साथ हैं और मेरी चेतना को निर्देशित भी वे ही करते हैं। हो सकता है कि हमारे वंशधारा में अमिट हो यह चेतनाधारा, हो सकता है कि नहीं भी हो, जैसा कि पतनशील सांढ़ संस्कृति में चेतना के विलोप की दशा है।

नवारुण दा से हमारे रिश्ते अजीबोगरीब रहे हैं। उनकी माता महाश्वेता दी को 1980 से जानता रहा हूँ। लेकिन नवारुण दा से संवाद का सिलसिला शरु हुआ भाषा बंधन से।

महाश्वेतादी ने हम जैसे लोगों को भाषाबंधन संपादकीय में रखा था और इस नाते बार-बार गोल्फ ग्रीन में नवारुण दा और महाश्वेतादी के घर जाना हुआ। सविता भी जाती रही है। उस परिवार के तमाम लोगों से परिचय हुआ। नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण में हम सब साथ-साथ थे। फिर अचानक महाश्वेतादी परिवर्तनपंथी हो गयीं। नवारुण दा परिवर्तनपंथी या सत्ता समर्थक हो ही नहीं सकते थे। वे अपनी कविता के अवस्थान से एक चूल इधर उधर ने थे।

महाश्वेता दी और नवारुण अलग-अलग थे। इसी बीच हमने कोलकाता के राजनीतिसर्वस्व साहित्यिक सांस्कृतिक परिदृश्य से भी खुद को अलग कर लिया। नवारुण दा से छिटपुट मुलाकाते होतीं रहीं। लेकिन वह परिवार कहीं टूट गया जिसमें नवारुण दा के साथ हम भी थे।

नवारुण दा का अंतिम दर्शन करने लायक ऊर्जा मुझमें नहीं है। उनकी मां और हमारी महाश्वेता दी या उनकी पत्नी, उनके बेटे, बहू से अब बात करने की हालत में नहीं हूँ। औपचारिक रस्म अदायगी मेरी आदत नहीं रही है। लेकिन जैसे मैं अपने पिता के संघर्ष को जी रहा हूँ, नवारुणदा की प्रखर जनचेतना का अंशीदार बना रहना चाहूँगा आजीवन।

नवारुण दा का अवसान मेरे लिए सत्तर दशक का अवसान है क्योंकि कम से कम साहित्य में सत्तर के दशक के सही प्रतिनिधि वे ही थे जो सत्तर के दशक के अवसान के बावजूद भी सत्तर के दशक की निरंतरता बनाये हुए थे।

मैं कह नहीं सकता कि मैं नवारुण दा की मृत्यु से ज्यादा दुःखी हूँ कि उस सत्तर के दशक के अवसना से हतप्रभ ज्यादा।

नवारुण का का दिल काम कर रहा था जबकि अंग-अंग उनका बेकल हो रहा था। हम यह दावा फिर भी नहीं कर सकते कि अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित इस देश का दिल किस हालत में है।

अब आपको तय करने का है कि इस देश के राष्ट्रपति झूठ बोल रहे हैं या प्रधानमंत्री।

67 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का मतलब है कि इस देश की आधी से ज्यादा आबादी आजीविका वंचित है। जिनकी आजीविका है ही नहीं, उनकी गरीबी दूर करने का दावा कितना सही है, कितना गलत इसका फैसला भी अब आप ही करें।

इंदिरा समय के वित्तमंत्री और यूपीए समय के भी वित्तमंत्री जो कह रहे हैं, ऐसा कभी बजट पेश करते हुए उन्होंने लेकिन कहा ही नहीं है। खासकर 1991 से अब तक के सारे वित्तमंत्री जो कुछ कहते रहे हैं, उसके उलट है पूर्व वित्तमंत्री का यह हैरतअंगेज बयान।

अगर भारत के राष्ट्रपति सच बोल रहे हैं तो भारत सरकार के तमाम तथ्य, आंकड़े, परिभाषाएं, नीतियां और रोजमर्रे के राजकाज सरासर झूठ के अलावा कुछ भी नहीं हैं। विकास की कलई पुणे से लेकर पहाड़ों में हो रही आपदाओं की निरंतरता जिस बारंबारता के साथ खलल रही है, उससे भी हम होश में नहीं हैं, तो सच और झूठ को अपने अपने पक्ष-विपक्ष, हित-अहित में जांचना परखना तो मुक्त बाजार का दस्तूर है ही। मसलन यह सरकार कह रही है और मीडिया भी जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है कि आर्थिक सुधारों के बिना, विनिवेश के बिना, प्रत्यक्ष विनिवेश के बिना,पीपीपी माडल के बिना रोजगार सृजन होगा नहीं और इसके लिए तमाम कानून बदले जाने जरूरी हैं। हो इसका उलट रहा है। लोग रोज रोजगार और आजीविका से बेदखल हो रहे हैं। हो इसका उलट रहा है। लोग रोज जल जंगल जमीन नागरिकता नागरिक मानवअधिकारों से बेदखल हो रहे हैं।

हमने बगुला भगतों की कथा पहले ही सुना दी है। भारत के संविधान के मुताबिक भारत की सरकार संसद के जरिये जनता के प्रति जवाबदेह है। संसदीय विधि के मुताबिक किसी भी कानून में संशोधन के लिए विधेयक पेश करना जरूरी होता है। उस विधेयक का मसविदा सार्वजनिक करना जरूरी होता है। उस सार्वजनिक हुए विधेयक पर आम जनता से राय मांगना जरूरी होता है। विभिन्न पक्षों की राय पर जनसुनवाई भी जरूरी होती है। सुनवाई के लिए संसदीय समिति बनायी जाती है। संसदीय समिति जब सरकार को वह मसविदा विधेयक लौटा दें तब मंत्रिमंडल में बिल पास करने की नौबत आती है। बिल को दोनों सदनों में बहुमत से पास कराना जरूरी होता है। किसी भी कानून को संविधान के मूल दायरे से बाहर या मौजूदा संवैधानिक प्रवधानों के प्रतिकूल नहीं होने चाहिए। हुए तो ऐसा कानून पास करने से पहले दो तिहाई बहुमत से दोनों सदनों में संविधान संशोधन कानून बनाने से पहले जरूरी होता है। श्रम कानूनों में जो एक नहीं, दो नहीं, पूरे 54 संशोधन प्रस्तावित हैं, बगुला समिति की सिफारिशों के मुताबिक। क्या मीडिया या सरकार ने उन प्रस्तावित संशोधनों का खुलासा किया है, सवाल यह है। सवाल यह है, वे 54 संशोधन क्या-क्या होंगे और उनका ब्यौरा कहाँ है। सवाल यह है, संसदीय राजनीति में शामिल राजनीतिक दलों ने, चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने या ट्रेड यूनियनों ने उन संशोधनों का ब्यौरा हासिल किया है। किया है तो वे जनता के साथ उस जानकारी को शेयर क्यों नहीं कर रहे हैं।

सवाल यह है कि मसौदा विधयेक के बिना कैबिनेट सीधे बगुला समिति की रपट पर सारे कानूनी संशोधनों को हरी झंडी कैसे दे सकती है, बगुला समितियों के जरिये विनिवेश, एफडीआई, पीपीपी, पर्यावरण हरी झंडियों की तरह। अगर मसविदा विधेयक पर बगुला समिति की सिफारिशें है तो उन सिफारिशों का खुलासा क्यों नहीं कर रही है सरकार और उन सिफारिशों के बाद मसविदा विधेयक का इतिहास भूगोल क्यों छुपाने लगी है सरकार। बिना सार्वजनिक सुनवाई, बिना संसदीय समिति के अनुमोदन के कैसे केबिनेट किसी कानून को बदलने का फैसला कर सकती है, यह भी विचारणीय है।

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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