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एक अदने ‘मन की बात’

किसान भ्रम में न रहें
बिहार चुनाव के बाद नए सिरे से जोर आजमाईश की जायेगी।
कल तो मोदीजी ने खुश कर दिया। इसे कहते हैं ‘ सबका साथ, सबका विकास ‘। देश के विकास की बात है जी, इसमें किसानों का साथ चाहिए और कारपोरेटों का भी।
देश के विकास में किसानों का विकास छुपा है, कार्पोरेटों का विकास खुला है। लेकिन विपक्ष ने दोनों के विकास का रास्ता अलग कर दिया था। ‘भूमि अधिग्रहण’ के बारे में इतना भ्रम फैला दिया था कि किसान भी नाराज़ था और कार्पोरेट भी।
किसान जमीन देने के लिए तैयार नहीं था और कार्पोरेट जमीन छोड़ने के लिए। किसान कह रहा था, जमीन के बिना खेती कैसे करूं? कार्पोरेट पूछ रहा था, इतनी कम जमीन में कारखाना कैसे लगाऊं?
दोनों सही थे और समस्या विकट। विपक्ष 56 इंच के सीने को चुनौती दे रहा था, बता रहा था कि यह तो 26 इंच का भी नहीं है। 56 का आंकड़ा यदि 26 का बना दिया जाएं, तो भ्रम तो फैलता ही है और 16 इंच के टुच्चे भी ताल ठोंकने लगते हैं।
लेकिन मोदीजी भी कम खेले-खाए नहीं हैं। जिंदगी-भर संघी कसरत की है, आज भी कर रहे हैं। देश बने चाहे बिगड़े, लेकिन इस कसरत से शरीर तो जरूर बना है। एक झटके में बता दिया कि सवा साल पहले तो वे 56 इंची रहे होंगे, लेकिन आज तो 65 इंची है। वर्ना किस्में इतना मजाल कि तराजू के एक पलड़े में 75 करोड़ किसानों को रख दें और दूसरे पलड़े में कुछ  कार्पोरेट घरानों को — और फिर भी तराजू का काँटा सीधा खड़ा रहे और पलड़ा किसी ओर न झुके। किसान खुश कि अब वे कार्पोरेटों के बराबर है और कार्पोरेट भी खुश कि 75 करोड़ भूखे-नंगे मिलकर भी उनका बाल न बांका कर सकें।
जिसके खून में व्यापार होता है जी, उसी को सबको खुश रखने की कला आती है। मोदीजी के खून में व्यापार है, खालिस व्यापार। जिसको भ्रम हो, उसका भ्रम भी दूर हो जाना चाहिए अब।  है कोई व्यापारी, जो एक साथ अमेरिका को भी साध ले और अरब को भी। ईसाई खुश और मुस्लिम भी खुश। इन दोनों की ख़ुशी देखकर संघी भी खुश। इतने सारे देशों से खुशियों का सैलाब मोदीजी ही ला सकते थे। जब खुशियों का सैलाब इस देश में बहेगा, तो ‘ अच्छे दिन, अच्छे दिन ‘  चिढाने वाला पूरा विपक्ष बहकर कहां किनारे लग जाएगा, पता नहीं चलेगा। 2002 के खून-खून के खेल को खेलते-खेलते 2015 में व्यापार-व्यापार के खेल में बदलना किसी 65 इंची सीने का ही कारनामा हो सकता है। यह तो मोदीजी के बस की ही बात है कि इस व्यापार-व्यापार के खेल में हो रहा खून किसी को न दिखे। वरना नासपीटे कम्युनिस्ट तो गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि तीन लाख किसानों ने पिछले बीस सालों में आत्महत्या कर ली।भाई साहब, खेल तो ऐसा ही होना चाहिए कि खून भी हो और खून दिखे भी नहीं। जब खून नहीं दिखेगा तो देखने के लिए केवल ‘ विकास ‘ बचा रह जायेगा। सो विकास दिखेगा, शुद्ध विकास, लहलहाता हरा-हरा — छप्पर फाड़ जीडीपी के साथ बढ़ता हुआ।
मीन-मेख निकलने वाले तो जीडीपी में भी मीन-मेख निकाल लेते हैं। ऐसे लोग परमानेंट विघ्नसंतोषी होते हैं। मीन-मेख न निकाले, तो रात का खाना न पचे। कुछ नहीं मिला तो यही कहने लगते हैं, जीडीपी बढ़ी तो बढ़ी, लेकिन इससे गरीबी तो दूर नहीं होती। ये लो, हमने कब कहा कि विकास का गरीबी से कोई संबंध है? यदि गरीबी ही दूर हो जाएगी, तो विकास किसका करेंगे?? यदि गरीब ही न रहेंगे, तो विकास के पप्पा-मम्मा को कौन पूछेगा???
तो प्रिय देशवासियों, मोदीजी 2013 का भूमि अधिग्रहण क़ानून बदल रहे थे, तो विकास के लिए। अध्यादेश जारी कर रहे थे, तो विकास के लिए। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जारी नहीं कर रहे हैं, तो भी विकास के लिए। संसदीय समिति पर भरोसा जता रहे हैं, तो विकास के लिए। बिहार चुनाव तक खामोश बैठे हैं, तो विकास के लिए। मोदीजी जी रहे हैं, तो विकास के लिए। मरेंगे, तो भी विकास के लिए। दाभोलकर, पानसारे, कलबुर्जी जैसे न जीयेंगे, न मरेंगे — जिन्होंने विकास की जगह केवल भ्रम ही भ्रम फैलाया। प्रगतिशीलों के फैलाए भ्रम के खिलाफ लड़ना ही ‘ विकास की चुनौती ‘ है।
तो जिस तरह मोदीजी ने बचपन में मगरमच्छ से कुश्ती लड़ी थी, उसी तरह आज वे बुढापे में विकासविरोधियों से लड़ रहे हैं — पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर भी। उन्होंने अडवानीजी के भ्रम को तोड़ा है, तो कम्युनिस्टों के गुमान को भी तोड़ेंगे। जिसे तोड़ना है, तोड़ेंगे ;  जिसे फोड़ना है, फोड़ेंगे ; तोड़-फोड़कर विकास की राह आसान करेंगे।
मोदीजी ने अपने ‘मन की बात’ कह दी कि फैला लो कितना भी भ्रम, लेकिन न वे भ्रमित होंगे, न किसान और न कार्पोरेट। विकास के लिए मोदीजी को सबका साथ चाहिए। यदि किसान को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश नहीं चाहिए, तो मत लो,  लेकिन साथ दो, बिहार चुनाव तक तो जरूर दो। यदि कारपोरेटों को जल, जंगल, जमीन चाहिए, तो ये लो, जमीन हड़पने के 13 कानून अधिसूचना और नियमावली के रूप में लागू कर दिए। जमीन लो और साथ दो, बिहार चुनाव के लिए तो चंदा दो। आगे से न सही, पीछे से लो, लेकिन विकास करो। इस देश को मनमोहन सिंह ने अमेरिका का पिछवाड़ा बनाया है, तो मैं कारपोरेटों का पिछवाड़ा हूं। देश के पिछवाड़े और कारपोरेटों के पिछवाड़े में गणितीय संबंध स्थापित करना ही विकास को स्थापित करना है। यही नीतियों का गठबंधन है — जमीन दो, विकास लो। विकास के लिए बलिदान लो — लेकिन कारपोरेटों का नहीं, किसानों का। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश न सही, अधिसूचना के लिए नियमावली ही सही।
किसान भ्रम में न रहें कि उनकी जमीन मोदी के कार्पोरेट राज में सुरक्षित है। बिहार चुनाव के बाद नए सिरे से जोर आजमाईश की जायेगी।
-संजय पराते

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संजय पराते, लेखक माकपा की छत्तीसगढ़ इकाई के सचिव हैं।

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