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Rajendra Mathur राजेंद्र माथुर,

एक ख़ास तरह के अंधराष्ट्रवाद के शिकार थे राजेन्द्र माथुर

राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता (Rajendra Mathur’s journalism) पर वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद स्वरूप वर्मा जी (senior journalist Mr. Anand Swaroop Verma) का यह लेख 1987 में ‘हंस’ में छपा था. वर्मा जी का राजेंद्र माथुर के संदर्भ में राय है, “उनकी भाषा बहुत शानदार थी लेकिन एक ख़ास तरह के अंधराष्ट्रवाद से वह ग्रस्त थे यद्यपि माथुर साहब का राष्ट्रवाद प्रभाष जोशी के ‘उग्र’ राष्ट्रवाद से कम आक्रामक था.

बहरहाल, हिंदी का यह दुर्भाग्य (misfortune of Hindi) ही कहेंगे इन दोनों ‘महान’ संपादकों ने हिंदी पत्रकारिता (Hindi journalism) को प्रतिगामी बनाने में ज़बर्दस्त योगदान किया.” लेख लंबा है, धैर्य से पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से भी अवगत कराएं। इस बहस में यदि आपको भी कुछ कहना है तो हमें अपने विचार भेजें।

सितम्बर 1987 के ‘हंस’ में प्रकाशित  हिंदी पत्रकारिता संदर्भ राजेन्द्र माथुर

आनंद स्वरूप वर्मा

अब से कुछ वर्ष पूर्व तक 25 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी में ऐसा एक भी दैनिक पत्र नहीं था जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलता रहा हो, जो राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर व्यापक जनमत तैयार करने की सामर्थ्य रखता हो तथा आम जनता के जीवन को निर्धारित करने वाली नीतियों के निर्माताओं को प्रभावित करता हो.

….. अगले पेज पर जारी …..

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