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Arvind Kejriwal

कक्षाओं में टीचर होंगे लेंस की नजर में ! केजरीवाल सरकार का फरमान

शिक्षा मंत्री दिल्ली सरकार की नजर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता (Quality of school education,) पर है। कैसे स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारा जाए (How to improve the level of school education) यह चिंता दिल्ली के आप बजट में भी दिखाई देती है। इस बजट में 10,690 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसमें भी 102 करोड़ रुपए सिर्फ शिक्षकों और प्रधानाचार्यों की अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण पर खर्च किया जाएगा। पूरी दिल्ली के सरकारी स्कूलों के 1100 सौ शिक्षकों में से 200 शिक्षकों को चयन विशेष प्रशिक्षण और मेंटर के लिए किया गया है। चुने हुए शिक्षकों और प्रधानाचार्य को हॉर्वड और कैंब्रिज भेजा जाएगा। जहां उन्हें प्रशिक्षण और लीडरशिप में दक्षता प्रदान की जाएगी। नब्बे ऐसे शिक्षकों को दस-दस दिन के लिए इन विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण देने के बाद इन्हे दिल्ली में पांच-पांच स्कूल दिए जाएंगे जहां शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। इसके साथ ही एक और दिलचस्प खबर यह भी है कि इन दिनों त्यागराज स्टेडियम में 24,000 शिक्षकों को हिन्दी,गणित विज्ञान आदि पढ़ाने की कार्यशाला चली रही है।

ध्यान देने की बात यह भी है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षण कार्यशाला संभव है?

क्या इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षण के उद्देश्यों के साथ खिलवाड़ नहीं हो रहा है? आदि। लेकिन एक बार मन करता है कि शिक्षामंत्री को बधाई दी जाए क्योंकि उन्होंने कम से कम शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए न केवल बजट का प्रावधान किया बल्कि उसे अमलीजामा पहनाने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर प्रशिक्षण को दुरुस्त करने की ठानी।

दिल्ली सरकार बड़ी तेजी और गंभीरता से स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने में लगी है। कई बार मान लेने का मन करता है कि यह शायद महज राजनीतिक घोषण भर नहीं है, बल्कि शिक्षा मंत्री वास्तव में शिक्षा में बदलाव को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। बजट अभिभाषण में उन्होंने कहा था कि सरकारी शिक्षकों और प्रधानाचार्य को कैंब्रिज, हॉवर्ड आदि विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाएगा। इस घोषणा को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। दस दिन प्रशिक्षण कार्यशाला और वहां के स्थानीय सरकारी स्कूलों में विजिट करेंगे। वहां कैसे शिक्षण होता इसका अवलोकन करेंगे। तीस-तीस की संख्या में इन्हें भेजा जाएगा। वे वापस आकर अपने स्कूलों में कार्य करेंगे। इसमें मैनेजमेंट और लीडरशीप कौशलों पर भी जोर दिया जाएगा।

स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए 9,623 शिक्षकों की नियुक्ति की घोषणा भी की गई है। यह भी मौजू है कि दिल्ली में स्कूली स्तर पर वोकेशनल यानी व्यावसायिक प्रशिक्षण शिक्षण को ध्यान में रखते हुए रोहिणी और धीरपुर में संस्थान खोले जाएंगे। यह कार्य अंबेडकर विश्वविद्यालय के परिसरों का विस्तार देकर भी किया जाएगा। पिछले साल भी दिल्ली सरकार ने शिक्षा को ख़ासा महत्व देते हुए बजट में काफी उत्साहजनक बढ़ोत्तरी की थी। संकेत अच्छे हैं।

इस बजट में शिक्षा की हालत सुधारने के लिए 10,690 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। अब हमें विस्तार इस बजट के धागों,बुनावटों को, खोलने-समझने की जरूरत हैं। सरकार शिक्षा मंत्रालय दिल्ली सरकार की घोषणा है कि दिल्ली के तमाम सरकारी स्कूली कक्षाओं में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। इस काम के लिए बजट में अलग से सौ करोड़ रुपए का प्रावधान है।

स्कूली कक्षाओं में सीसीटीवी कैमरे (CCTV cameras in school classrooms) लगाए जाने को लेकर प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो अनिता रामपाल ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि क्या आपकों शिक्षकों की प्रतिबद्धता पर विश्वास नहीं है? क्या आप मान कर चलते हैं कि शिक्षक नहीं पढ़ाते,नकारे हैं आदि। इस परिघटना को प्रकारांतर से देखने और शैक्षिक विमर्श को समझने की आवश्यकता है।

क्या शिक्षा विमर्श और शिक्षण एक तकनीकी प्रक्रिया है? क्या शिक्षा किसी बनी बनाई इनपुट आउट सिद्धांत पर चला करती है? क्या शिक्षकों के श्रम को आंकड़ों और चंद छवियों में कैद कर समझा जाए सकता है। वैसे भी पहले क्या कम शिक्षकों की छवि को ख़राब करने और गैर जिम्मदार, नकारा आदि साबित करने की कोशिश होती रही है जो अब कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने की कवायद की जा रही है।

शिक्षण एक सृजनात्मक और कौशलों भरा कार्य है। इसमें पल पल की ख़बर लेते तर्ज पर जब शिक्षकों की हर गतिविधि को बतौर फुटेज तैयार किया जाएगा तब संभव है वह शिक्षक बाहर नहीं आ पाएगा जिसका सपना गिजू भाई, गांधी जी, टैगोर आदि ने देखी थी। कक्षा में कई बार पूर्व निर्धारित, पूर्व नियोजित तय पाठ्यचर्याओं से बाहर भी निकलना पड़ता है। कई बार अपनी पूरी तैयारी भी एक सिरे से ख़रिज कर नई चुनौतियों और उत्सुकता को लेकर आगे बढ़ना होता है। वो शिक्षक जो अपनी पूर्व निर्धारित पाठ्ययोजनाओं पर शिक्षण करते हैं और वे जो पूर्व निर्धारित में भी समयानुसार एवं संदर्भानुसार रद्दो बदल के लिए तैयार होते हैं वह कक्षा-कक्षा ज्यादा जीवंत और प्रभावकारी मानी गई है।

तर्क तो यह भी दिया जा सकता है कि यदि शिक्षक अपने कर्म के प्रति ईमानदार है तो उसे डरने की क्या आवश्यकता है। जैसे वो अभी पढ़ाता है वैसे ही तब भी पढ़ाए। लेकिन इस तर्क में वह शैक्षिक विमर्श और दर्शन शामिल है जहां स्वीकारा गया है कि कक्षा में बच्चा और शिक्षक सहज और स्वीकार्य स्वभाव से हों।

क्या जब हर वक्त एक लेंस आपको घूरती रहेगी तब एक बच्चा या शिक्षक सहज तरीके से शिक्षण व बातचीत कर पाएंगे। अपने शिक्षण के तजर्बे के आधार पर कह सकता हूं कि दसवीं व 11 वीं में पढ़ने वाले बच्चे/बच्चियों के पास काफी उत्सुकताएं और सवाल होते हैं जिसका जवाब उन्हें घर में नहीं मिलता। समाज उसके उत्तर देने में दिलचस्पी नहीं दिखाता। यदि दिखाता भी है तो वहां एक बाजार है। बाजार की अपनी प्रकृति होती है। वो पीले जिल्दों वाली किताबों से ज्ञान बढ़ाता है। ऐसे में बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करने वाला यदि कोई साधन है तो वह शिक्षक है।

मेरे पास कई बार बच्चे अपनी निजी बेचैनीयत को लेकर बात करने और राय लेने आया करते थे, जब उनकी उत्सुकता शांत हो जाती वे मन लगा कर पढ़ते थे, लेकिन क्या वह अनौपचारिक बताचीत की संभावना लेंस की मौजूदगी में बचती है? शिक्षा मंत्रायल की मंशा भी साफ है कि इंटरनेट के जरिए अधिकारियों, शिक्षामंत्री और अभिभावकों को उपलब्ध कराया जाएगा। इन फुटेज का भविष्य में किस किस कोणों से विश्लेषण और रिपोर्ट तैयार की जाएंगी इसका अनुमान मात्र लगाया जा सकता है।

यह तो ठीक है कि शिक्षकों को एक बार सेवापूर्व प्रशिक्षण प्रदान कर लगभग उन्हें छोड़ ही दिया जाता है। जबकि शिक्षा में कुछ न कुछ नए नए शोध,विधियों, प्रविधियों पर होते रहते हैं जिनसे शिक्षक अपने शिक्षण कौशल को मांज सकते हैं। लेकिन इसकी उम्मीद बहुत क्षीण नजर आती है। यूं तो अंतःसेवाकालीन शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान भी हैं जहां विभिन्न बैनरों के तहत प्रशिक्षण कार्यशालाएं होती रहती हैं। मसलन सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि। यदि गौर से देखें और कार्यशाला की योजना बनाने वालों और इनमें हिस्सा लेने वालों से पूछें तो बेहद निराशा होती है। क्योंकि मार्च से पहले कई सारे सेमिनार करा लेने हैं। आंकड़े दुरुस्त रखने हैं तो कार्यशालाएं मई जून और दिसंबर, जनवरी की छुट्टियों में आयोजित होती हैं। वहां प्रशिक्षण देने वाले को एक दिन पूर्व तक नही मालूम होता कि किस विषय पर उसे बोलना है। कहने को तो इसकी पूरी योजना तैयार होती है लेकिन समुचित तरीके से उसका संप्रेषण नहीं हो पाता। उस कार्यशाला से विभाग और शिक्षकों की क्या अपेक्षा है इसपर गौर नहीं होता बल्कि कार्यशालाएं हुईं यह दिखाने की जल्दबाजी ज्यादा होती है।

स्वयं का अनुभव भी यही बताता है कि जब ऐसे कार्यशालाओं में जाने का अवसर मिला तो एक मोटेतौर पर विषय बता दिया जाता है। प्रतिभागी भी तैयार होकर आते हैं कि सिर्फ समय काटना है। आदेश का पालन होना चाहिए। कई प्रतिभागियों ने तो स्वीकारा भी कि आप ही हो जो खून पसीना बहा कर पढ़ा रहे हैं वरना तो लोग अपनी कथा कहानी सुना कर चले जाते हैं। हमें भी कोई उम्मीद नहीं रहती। लेकिन अनुभव बताते हैं कि यदि आपका कंटेंट रोचक और उनकी अपेक्षाओं के अनुकूल हैं तो वे रूचि लेकर सहभागी भी बनते हैं। उनकी आंखों में आंसू भी होते हैं कि हमें ऐसे शिक्षक नहीं मिले जो इतनी बारीक और रूचिपूर्ण तरीके से पढ़ाए। ऐसे शिक्षकों की संख्या बेशक कम हो लेकिन अभी है ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है जो पूरे मनोयोग से पढ़ते और पढ़ाने में विश्वास रखते हैं। जिला मंडलीय प्रशिक्षण संस्थानों में शिक्षण प्रशिक्षण कार्य हो रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि उन्हें और कैसे सार्थक बनाया जाए और बच्चे सीखे हुए कौशलों में कक्षा तक ले जा सकें।

कौशलेंद्र प्रपन्न

शिक्षा एवं भाषा विशेषज्ञ

टेक महिंद्रा फाउंडेशन

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