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कामचोर नहीं हैं… बीएसएनएल के कर्मचारी

जब कभी भी कर्मचारियों के, मेरा मतलब शासकीयअर्द्ध शासकीय कार्यालयों और कारखानों के कर्मचारियों (Employees of government, semi government offices and factories) के कामचोरी की बात होती है तो मुझे थोड़ा आश्चर्य होता है। इन्हीं कर्मचारियों की बदौलत देश ने इतनी औद्योगिक और आर्थिक तरक्की (Industrial and economic promotion) की है। इन्हीं ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र को, औद्योगिक क्षेत्र को निर्माण और वित्तीय क्षेत्र को, इतनी मजबूती और समृद्धि दी, जिससे विदेशी निवेशकों को भारत में आकर उन व्यवसायों में घुसने की लालच हुई। 1990 के पूर्व का एक भी आर्थिक, औद्योगिक, वित्तीय और निर्माण क्षेत्र कोई बता नहीं सकता जो घाटे में गया हो। देश के अंदर उस बुनियादी ढांचा का निर्माण (Building infrastructure) इन्हीं सरकारी उपक्रमों(Government undertakings) की बदौलत तैयार हुआ है, जिस पर पैर रखकर आज निजी क्षेत्र सरकार की सहायता से उड़ान भरने का दंभ भरता है। हमारे देश के पूंजीपति हों या विदेशी सभी ने सबसे पहले इन्हीं सरकारी उपक्रमों को हथियाने की चेष्टा की।

जब देश आजाद हुआ तो देशी धन्नासेठ इनमें से किसी भी क्षेत्र में पैसा लगाने को तैयार नहीं थे क्योंकि शुरू में निवेश ज्यादा होना था और मुनाफ़ा बहुत ठहर कर आना था। विदेशी निवेशक दूसरे विश्व युद्ध से बाहर आये थे और या तो उनके पास पूंजी कम थी या गरीब भारत का बाजार उन्हें आकर्षक नहीं लगता था या उन्हें भी ढांचागत निर्माण में पैसा लगाकर देर से मुनाफ़ा कमाना जमता नहीं था। जब वे भी समृद्ध हुए और भारत में बाजार खड़ा हो गया तो वैश्विक दबाव भी बढ़ा और हमारे देश के पूंजीपति भी ललचाए। सभी सरकारी उपक्रमों को शनैः-शनैः सरकार की नीतियों ने ही बीमार किया है।

बीएसएनएल (Bharat Sanchar Nigam Limited – BSNL) का ही उदाहरण लें, सरकार ने जहां निजी ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम (Spectrum to private operators) बांटे, बीएसएनएल को लंबे समय तक प्रवेश की इजाजत नहीं दी। आज भी, एक भी निजी ऑपरेटर बिना बीएसएनएल के टावर्स के इस्तेमाल के अपना नेटवर्क नहीं चला सकता। बीएसएनएल को 4G में प्रवेश के लिए वर्षों तक सरकार ने लटकाया। उसका सारा सर्विस देने का काम धीरे धीरे ठेकेदारों के हाथों में चला गया। वे मजदूरों को कम भुगतान करते हैं, सेवाएं नियमित नहीं देते क्योंकि कर्मचारी कम रखते हैं, और बदनामी बीएसएनएल की होती है।

आज भी बीएसएनएल को अनिल अम्बानी की कंपनी आरकाम (Anil Ambani’s company RCOM) से 700 करोड़ रुपये वसूलने हैं। बीएसएनएल लिमिटेड होने के बावजूद सरकारी उपक्रम ही है और इस पैसे को अनिल अम्बानी की कंपनी से बीएसएनएल को वापस दिलवाने की जिम्मेदारी सरकार की भी उतनी ही है, जितनी बीएसएनएल की उसे आरकाम से वसूलने की। पर, हम देख रहे हैं कि अनिल अम्बानी को हजारों करोड़ रुपये के नित नए ठेके दिलवाने वाली सरकार इस मामले में हाथ पीछे बांधकर बैठी है।   

जहां तक कामचोरी का संबंध है, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की ऐसे कर्मचारियों की संख्या, जो काम से जी चुराते हों, किसी भी जगह 2% से ज्यादा नहीं होगी निजी क्षेत्र में मालिक चोरी करता है और कर्मचारी शोषित होते हैं जिसे सरकारी क्षेत्र में कामचोरी कहा जाता है, वह शोषण के कम होने का सबूत है। आज भी यदि सरकारी क्षेत्र नौकरी नहीं दे रहा है तो बेरोजगारी बढ़ रही है।

आजादी के बाद रोजगार देना और आवश्यकता से अधिक कर्मचारी रखना गरीब देश में कल्याण का काम था। रोजगार देना प्रमुख था, 12 घंटे काम लेना नहीं। यह राज्य के कल्याणकारी होने की नीतियों से संबंधित है, जिससे नवउदारवाद आने के बाद सभी सरकारों ने पीछा छुडा लिया है और सभी नीतियां कारपोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जाने लगी हैं। वर्तमान का ही एक उदाहरण लें, लिमिटेड होने के बाद भी बीएसएनएल है तो एक सरकारी उपक्रम और देश के प्रधानमंत्री उसके स्वाभाविक पोस्टर ब्वाय (प्रचारकर्ता) होना चाहिये पर हमारे माननीय प्रधानमंत्री जियो जो अम्बानी का उपक्रम हैं, उसके पोस्टर ब्वाय बने, बीएसएनएल के नहीं।

यह देश के उन उपक्रमों के बारे में सरकारी सोच को दिखाता है जिसकी कर्ता-धर्ता सरकार ही है। बीएसएनएल की कार्यप्रणाली (Functioning of BSNL) को जाने बिना और निजी ऑपरेटर्स की धोखाधड़ी (Private Operators Fraud) को समझे बिना बीएसएनएल कर्मचारियों की बुराई करना या उन्हें कामचोर कहना अज्ञानता के सिवा कुछ नहीं है। दूसरा सबसे बड़ा सच यह है कि सभी सरकारी सेवा संस्थानों को ढांचागत सुधार के लिए सरकार की इजाजत बहुत देर से या लगभग नहीं मिलती है। सरकार की सारी घाटे वाली योजनाओं का भार ढोते हुए वे किन हालात में काम करते हैं यह बहुत ही शोचनीय है। दूसरा उदाहरण किसान फसल योजना (Farmer crop scheme) है, जिसका कर्ता-धर्ता सरकार ने निजी कंपनियों को बनाया और अंतत: किसानों के बहुसंख्यक हिस्से को धोखे के सिवा कुछ नहीं मिला। तीसरा उदाहरण वे चिकित्सा योजनाएं (Medical plans) हैं, जिनके क्रियान्वयन का सारा भार निजी कंपनियों को सौंपा गया है और सरकार के पैसे से वे मालामाल हो रही हैं। सरकारी बैंकों को उन सारी सरकारी योजनाओं का भार ढोना पड़ता है जो अंतत: घाटे का सौदा होती हैं। इसमें मोदी जी की बहुप्रचारित जन-धन योजना से लेकर माल्या और नीरव को कर्ज देने तक की परिस्थिति शामिल है।

यह एक मशहूर कहावत के समान ही है कि नागिन खुद अपने बच्चों को जन्म देने के बाद खा जाती है क्योंकि वह अंधी हो जाती है। सरकारें भी 1991 से अंधी हो गईं हैं और अपने उपक्रमों को खा रहीं हैं।

अंतिम बात, ये दुर्भाग्य है की वे कर्मचारी जो अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए लाल झंडे के नीचे आते हैं, अपने कार्य क्षेत्र से बाहर आकर भाजपाई, कांग्रेसी और न जाने क्या क्या हो जाते हैं और अपनी ही कौम के लिए काँटा बोते हैं। यह एक अफसोस नाक बात है, पर सच्चाई है। इतने कामचोर निजी क्षेत्र में भी मिलते हैं यहाँ तक की स्वरोजगार में भी।

अरुण कान्त शुक्ला

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