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कोई जीते, हारेगा तो बिहार ही

बिहार की धरती राजनीतिक आन्दोलनों के लिए बहुत उर्वर मानी जाती है। अगर महात्मा गांधी को महात्मा बनाने का श्रेय किसी प्रदेश को दिया जा सकता है तो उसमें अव्वल नंबर बिहार का है। क्योंकि चंपारण से ही गांधाी जी के महात्मा बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। आजादी के बाद भी बिहार राजनीतिक आंदोलनों के लिए उर्वर रहा और संपूर्ण क्रांति का ख्वाब देखने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण हीरो ही बिहार के छात्र आंदोलन के कारण बने। लेकिन पिछले लगभग दो दशक से बिहार की धरती राजनीतिक आंदोलन के लिहाज से बांझ होती जा रही है ओर यह गांधाी-जयप्रकाश की कर्मभूमि का दुर्भाग्य है कि वहां राजनीति आज लालू और नीतीश जैसे सियासी बाजीगरों के हाथ में है, जिन्होंने जयप्रकाश के सपनों को बेच डाला।

बिहार में विधाान सभा चुनाव होने वाले हैं और रणभेरी बज चुकी है। सामाजिक न्याय का रोना रोने वाली ताकतें अब इस न्याय की बात नहीं कर रही हैं। बात हो रही है तो इस पर कि सीएम कौन बनेगा! गोया चुनाव का मतलब केवल सीएम चुनना ही होता है और इसका बदलाव और जनता की आकांक्षाओं से कुछ लेना देना नहीं है। आरोप प्रत्यारोप के दौर तो हर चुनाव में चलते ही हैं लेकिन अगर सामाजिक न्याय की फसल काटने वाले लालू और नीतीश भी मुद्दों की बात न करके व्यक्तिगत छीछालेदर पर उतर आएं तो समझ लेना चाहिए कि राजनीति का पतन कहां तक हो चुका है? अगर जयप्रकाश नारायण आज जिन्दा होते तो अपने इन चेलों का यह रूप देखकर जार जार रो रहे होते। लालू प्रसाद यादव तो अपनी हंसोड़ शैली और बड़े से बड़े राजनीतिक मुद्दे को हवा में उड़ा देने के लिए प्रसिध्द हैं लेकिन नीतीश कुमार तो पिछले पांच सालों से स्वयं को  विकास पुरूष और गंभीर राजनेता के रूप में प्रोजेक्ट करते आए हैं। विकास पुरूष का ऐसा महिमामंडन पिछले पांच सालों के दौरान देश में तीन ही नेताओं का हुआ। पहले हैं अपने कांग्रेसी युवराज राहुल गांधाी दूसरे हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और तीसरे नीतीश कुमार। अब सवाल यह है कि अगर नीतीश इतने ही बड़े विकास पुरूष हैं और पांच सालों में उन्होंने बिहार की कायापलट कर दी है तो उन्हें ऊट-पटांग बोलने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? प्रधाानमंत्री मनमोहन सिंह से गरीबी कम करने और आर्थिक विकास की दर बढ़ाने के आंकड़ों की बाजीगरी सीखकर बिहार को विकास का मॉडल बनाने वाले नीतीश इतने परेशान क्यों हैं? जनता पर उन्हें भरोसा क्यों नहीं है? पिछले एक साल में नीतीश की सरकार ने जितने विकास के काम नहीं किए होंगे उसका कई गुना तो विकास के प्रचार पर मीडिया के ऊपर खर्च किया जा चुका है फिर फिकर किस बात की है?

लालू प्रसाद यादव के एक बयान के विरोध में नीतीश का बयान आया कि लालू जनता से रिजेक्टेड हैं और मॉक पीएम की तरह ही मॉक सीएम बन कर रह जाएंगे। ऐसे हलके बयान लालू के लिए तो ठीक हैं लेकिन नीतीश का हल्कापन बता रहा है कि राजसिंहासन डगमगा रहा है। वरना जिसे जनता पर भरोसा होता है और वास्तव में जिसने काम किया होता है वह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के पचड़े में नहीं पड़ता है बल्कि अपनी नीतियों और कार्यक्रमों की बात करता है।

लालू प्रसाद यादव के विषय में एक बात बार बार कही जाती है और नीतीश भी कह रहे हैं कि लालू ने अपने परिवार के पन्द्रह वर्ष के शासन में बिहार को बहुत पीछे धकेल दिया और बिहार की सारी दुर्दशा के लिए केवल लालू जिम्मेदार हैं। यह आरोप सतही तौर पर तो सही हैं लेकिन इस आरोप को लगाने वाले अपने नैतिक अपराध से मुंह कैसे मोड़ सकते हैं? लालू ने एक काम तो जरूर किया कि बिहार की अस्मिता के साथ जबर्दस्त खिलवाड़ किया। लालू ने ‘बिहारी’ शब्द को अपनी गैर जिम्मेदाराना शैली से सारे हिन्दुस्तान में तिरस्कार और अपमान का पर्याय बना दिया। अगर आज बिहारियों को दूसरे प्रांतों में अपमान का सामना करना पड़ता है तो उसके लिए काफी हद तक लालू की हसोड़ शैली जिम्मेदार है। विनोदी प्रकृति का होना अलग बात है लेकिन राजनीति मदारी का तमाशा नहीं है जहां आप कुछ भी बेजा हरकतें करते रहें।

रहा सवाल जाति के आधार पर समाज को बांटने का तो यह काम तो सभी ने किया, उसके लिए अकेले लालू जिम्मेदार नहीं हैं। क्या नीतीश ने इस एजेण्डे को आगे नहीं बढ़ाया? दलितों में भी महा दलित और मुसलमानों का अजलाफ और अशराफ में विभाजन करने की साजिशें तो नीतीश ने ही रचीं। रणवीर सेना को तो भाजपा ने पाला पोसा? बेलछी के लिए कौन जिम्मेदार है? फिर अकेले लालू कैसे समाज के विभाजन के लिए दोषी है? हां लालू ने इस विभाजन का फायदा लंबे समय तक उठाया।

बिहार को पीछे धाकेलने के लिए काफी हद तक लालू जिम्मेदार हो सकते हैं लेकिन उनके इस अपराध के लिए नीतीश और कांग्रेस बराबर के सहभागी हैं। लालू परिवार के पन्द्रह वर्षों के शासन के दौरान एक लम्बे समय तक नीतीश, लालू के सहयोगी रहे हैं। नीतीश की हैसियत एक समय में सत्ता में लालू के बाद नंबर दो की होती थी, नीतीश की बात सुनी भी जाती थी और मानी भी जाती थी। वहीं कांग्रेस भी लालू-राबड़ी सरकार में रबड़ी खा चुकी है। ऐसा सुन्दर संयोग या तो मधु कोड़ा का झारखण्ड में रहा कि निर्दलीय मुख्यमंत्री बना या उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह व समाजवादी पार्टी की सरकार में मुलायम सिंह ने प्रयोग किया कि छोटे सहयोगी दल के सारे विधायक मंत्री! बिहार में ऐसा ही दोहन कांगेस ने लालू का किया कि 23 में से 22 विधायक मंत्री। फिर भी बिहार की बर्बादी का ठीकरा लालू के सिर!

बिहार में कांग्रेस भले ही लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने का दावा कर रही हो परंतु अभी तक तो लड़ाई लालू और नीतीश की ही है। क्रांतिधर्मी बिहार की धरती का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? जीते कोई भी, बिहार की तो बर्बादी ही होनी है। वामपंथी दल वहां एक विकल्प बन सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी आत्महत्या की पटकथा लालू का पिछलग्गू बन कर स्वयं तैयार की है। कोई भी जीते अंतत: हारेगा तो बिहार ही!

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