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क्यूबा-अमेरिकी संबंध-शीत युद्ध पर विराम के असल मायने

क्यूबा और अमेरिका के बीच 50 साल से अधिक चले विध्वंसक शीत युद्ध पर विराम की खबर राष्ट्रपति ओबामा ने दिसंबर 17,2014 को दी। क्यूबा और अमेरिकी प्रशासन ने इस महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव पर एक सकारात्मक रुख अपनाते हुए सधी हुई प्रतिक्रियाएं दीं। दुनिया भर के दूसरे देशों खासकर दक्षिणी अमेरिकी देशों ने भी इस बदलाव पर संतोष व्यक्त किया। 17 दिसंबर को अमेरिकी प्रचार माध्यमों में अमेरिकी ख़ुफ़िया तंत्र से जुड़े एलन ग्रोस की रिहाई और क्यूबा से उनकी वापसी की ख़बरें छाई रहीं जो 2011 से क्यूबा में जासूसी के आरोपों में पकड़े जाने के बाद जेल में थे। ठीक इसी दिन अमेरिकी जेलों में दशकों से बंदी रहे तीन क्यूबाई जासूसों को रिहा कर उनके देश भेजा गया जिनका क्यूबा में राष्ट्रीय नायकों की भांति भव्य स्वागत किया गया। उनकी तस्वीरें अमेरिकी प्रचार माध्यमों में आश्चर्यजनक रूप से सिरे से गायब थीं। दुनिया भर में वाम और जनतांत्रिक ताकतों ने दशकों से ‘फ्री क्यूबन्स फाइव’ नाम की तहरीकें चलाई थी, टोरंटो स्थित अमेरिकी दूतावास के समक्ष कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने अनगिनत मुजाहिरे भी किये थे, दुनिया भर के कम्युनिस्ट समाचार पत्र पत्रिकाओं में सिलसिलेवार इन बंदियों पर खबरें, चित्र, विज्ञापन छपते रहे हैं।
क्यूबा और अमेरिकी संबंधों के इतिहास पर एक सरसरी नज़र डालना यहाँ प्रासांगिक होगा। 1 जनवरी 1959 को फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में अमेरिकी पिट्ठू क्यूबा के राष्ट्रपति बतिस्ता की हुकूमत गिरा कर क्यूबा में एक क्रांतिकारी सरकार का गठन हुआ था। दक्षिणी अमेरिकी देशों में क्यूबा उस समय व्यापक वाम आन्दोलनों का केंद्र बन चुका था जिसके अमेरिकी पूंजी हितों पर भयानक नकारात्मक प्रभाव पड़ने थे। मौके की नज़ाकत समझते हुए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने क्यूबा में कास्त्रो विरोधियों को संगठित करने और उन्हें प्रति क्रांति के लिए प्रेरित करने हेतु मार्च 1960 में ही 13.1 मिलियन डालर आबंटित कर अपनी नियत साफ़ कर दी थी। अमेरिकी विद्वेष सिर्फ विचार तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उसकी नीतियों का व्यावहारिक और अमली जामा 17 अप्रैल 1961 को क्यूबा की संप्रभुता का अतिक्रमण कर के किया जिसे इतिहास में अमेरिकी कुख्यात बे ऑफ पिग्स इंवेज़न के नाम से जाना जाता है जिसमें ब्रिगेड 2506 नाम के किराये के टट्टुओं ने क्यूबा पर एक सीमित आक्रमण किया था जिसका क्यूबा की फ़ौज और जनता ने डट कर मुकाबला किया और उसे परास्त भी किया। इस दुस्साहसिक अतिक्रमण के बाद अमेरिका चैन से नहीं बैठा, इसी संकट की चरम अवस्था 1962 में मिसाईल संकट के रूप में सामने आयी जिसके परिणाम स्वरूप उत्तरी अमेरिका में पहली बार परमाणु युद्ध की आहटें स्पष्ट रूप से सुनाई दी। इसी पसेमंज़र में अमेरिका ने क्यूबा के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी की जिसके चलते क्यूबा की जनता और सरकार को भारी आर्थिक दिक्कतों का सामना हुआ। सोवियत संघ के टूटने के बाद क्यूबा का आर्थिक संकट और अधिक गहराता गया क्योकि आर्थिक प्रतिबंधों के चलते वह बाह्य विश्व से किसी प्रकार के आर्थिक संबंध बना ही नहीं सकता था।
क्यूबाई सूत्रों के अनुसार पांच दशक से अधिक चले इन आर्थिक प्रतिबंधों के कारण क्यूबा की अर्थव्यवस्था को 1.1 ख़राब डालर का नुकसान उठाना पड़ा, सिर्फ 2014 में ही क्यूबा का यह नुकसान 3.9 अरब डालर का था। इन प्रतिबंधों के चलते कोई बैंक अथवा वित्तीय संस्था क्यूबा से न केवल नाता नहीं रख सकती थी बल्कि कोई ऐसा करता यदि पकड़ा जाए तो उसे भारी जुर्माना अदा करना होता था। 2004 तक क्यूबा के साथ व्यापार करते पकड़े जाने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों से अमेरिका ने 11 अरब डालर के जुर्माने अपने राजकोष में जमा कराये। इन आंकड़ों से क्यूबा को हुई अपार धन हानि का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्यूबा घूम कर आने के बाद हवाना की स़डकों पर चल रही 1960-1970 के दशक की कारों, पुरानी इमारतों और जर्जर संसाधनों को देख कर आलोचना करने वाला मध्यवर्गी उथला दिमाग इस समस्या की जड़ में अमेरिकी प्रतिबंधों को जोड़ कर देखने में हमेशा आपराधिक रूप से असमर्थ रहा। अमेरिकी प्रतिष्ठानी चिंतकों ने क्यूबाई निम्न जीवन स्तर और उससे पैदा होने वाले अंतर्विरोधों को राजनीतिक रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मायामी, फ्लोरिडा स्थित प्रवासी क्यूबाई समाज में प्रतिक्रतिकारियों को संगठित कर क्यूबा की सरकार के प्रति घुसपैठ और विध्वंसात्मक गतिविधियों को चलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया।
क्यूबन फाईव का जिक्र करने से पहले उपरोक्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करना जरूरी था। क्यूबा में कथित जनतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अमेरिकी कांग्रेस ने 1996 में 205 मिलियन डालर आबंटित किये, जिन्हें अमेरिका में बसे क्यूबा की क्रांति विरोधी शक्तियों और आपराधिक गिरोहों में विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के जरिये दिया जाना था। ऐसे ही एक क्यूबा विरोधी संगठन के मुखिया लुईस पोसाडा कर्रिल्स ने क्यूबा के एक यात्री विमान को वेनेजुअला में बम से उड़ा कर 76 यात्रियों की हत्याएं की थीं। उसकी गैर हाजिरी में पनामा में चले मुकदमे में उसे मृत्यु दंड मिल चुका है। इसके संगठन ‘क्यूबन अमेरिकन नेशनल फाउंडेशन’ ने ही हवाना के होटल में भी बम धमाके किये थे। ऐसा ही आतयायी संगठन के मुखिया जोसे बसुल्तो नाम के ठग ने ‘ब्रदर्स टू दी रेस्क्यू’ नाम का संगठन बनाया था जिसका काम क्यूबा के नागरिकों को कश्तियों पर सवार होकर अमेरिका में आने के लिए उकसाना था और फिर समुद्र में उन्हें उनकी कश्तियों से उठा कर टी वी कैमरों के सामने पेश कर के स्वयं को मानवाधिकारकर्मी साबित करना होता था। संयुक्त राष्ट्र संघ में जारी की गई एक क्यूबाई रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी अतिक्रमणों, घुसपैठिया कार्यवाहियों में 2001 तक 3,478 क्यूबाई नागरिकों की जाने जा चुकी हैं और यह सिलसिला अभी भी जारी है।
अमेरिकी भूमि से चल रही क्यूबा विरोधी ऐसी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए क्यूबा की हकुमत ने अपने गुप्तचरों को वहां भेजा था जिनमें से पांच जासूस 12 सितंबर 1998 को पकड़े गए थे। अजीबोगरीब तरीकों से चले इन मुकदमों में अंटोनियो गुरेरो और रेमो लाबनिनो को उम्र कैद की सजाएँ हुईं, रेने गोंज़ालेज़ को पंद्रह वर्ष की सजा सुनाई गयी, फेरमंडो  गोंजालेस को 19 वर्ष की सजा हुई और गेरार्डो हेर्नंडेज़ को दोहरे आजीवन कारावास की सजा हुई। रेने गोंज़ालेज़ को 7 अक्टूबर 2011 को रिहा किया गया और फेरमंडो गोंजालेस को गत वर्ष 27 फरवरी को रिहा किया जा चुका था। 25 किस्म की भिन्न-भिन्न धाराओं में चले इस मुकदमे से दुनिया भर में अमेरिकी अदालतों और न्याय व्यवस्था पर बहुत थू-थू हुई।
ध्यान रहे कि क्यूबा के विरुद्ध लगाये गए प्रतिशोधात्मक आर्थिक प्रतिबंधों वाली अमेरिकी विदेश नीति के चलते सयुंक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था में अमेरिका पिछले कई दशकों से अलग थलग पड़ा था। इन प्रतिबंधों को समाप्त करने के लिए क्यूबा के प्रस्तावों पर उसे दुनिया भर से समर्थन मिलता था। पिछले साल 29 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ में 1962 से क्यूबा पर लगाये गए अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को विश्व जनमत ने ठुकराया था। इस प्रस्ताव पर हुए मतदान में 193 सदस्य देशों में से 188 वोट क्यूबा के पक्ष में पड़े तीन देश अनुपस्थित रहे और विरोध में मात्र दो वोट पड़े। ये दो देश थे अमेरिका और इस्राईल। 1992 के बाद से अब तक क्यूबा के समर्थन में लगभग विश्व जनमत उसके साथ रहा है। 1992 में इस प्रकार के पहले प्रस्ताव पर तीन वोट विरोध में पड़े थे और 46 देशों ने अनुपस्थिति दर्ज की थी। जाहिर है क्यूबा नीति पर अमेरिका विश्व जनमत के समक्ष लगातार अलग-थलग पड़ता जा रहा था।
उपरोक्त राजनीतिक स्थिति के मध्य इस बीच क्यूबा की जेल में दिसंबर 2009  से पड़े अमरीकी जासूस एलन ग्रोस की रिहाई की मांग अमेरिकी प्रशासन को सताने लगी थी। एलन ग्रोस अमेरिकी ख़ुफ़िया तंत्रों द्वारा बनाए गए मानवाधिकार गैर सरकारी संगठनों का इस्तेमाल करते हुए क्यूबा में बसे यहूदियों की मदद करने के बहाने अपनी गतिविधियाँ जारी रखे हुए था और पकड़े जाने से पूर्व लगभग आधा दर्जन बार क्यूबा की यात्रा कर चुका था। एलन ग्रोस को क्यूबा सरकार के कायदे कानून तोड़कर क्यूबा में प्रतिबंधित संचार उपकरणों को लाने के अपराध, जासूसी का नेटवर्क तैयार करने जैसे आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया था। एलन ग्रोस की रिहाई के लिए पोप की मध्यस्था में क्यूबा और अमेरिकी अधिकारियों के बीच वार्ताएं हुईं, जिसमें कनाडा ने भी एक सकारात्मक भूमिका निभाई। क्यूबा ने अपने तीन कैदियों के बदले एलन ग्रोस को छोड़ने पर रजामंदी दी। पर्दे के पीछे चल रही कई माह पुरानी वार्ताओं के दौर का अंत 17 दिसंबर को कैदियों की रिहाई के रूप में सामने आयी और साथ ही अमेरिका ने क्यूबा के साथ अपने आर्थिक संबंध सामान्य बनाने की मंशा जग जाहिर की। इसके साथ ही 65 वर्षीय एलन ग्रोस को अमेरिका ने 32 लाख डालर इनाम देने की भी घोषणा की।
11 मिलियन की छोटी सी आबादी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था (जी.डी.पी.) का मात्र 0.3% के बराबर हिस्सा रखने वाले क्यूबा की जनता ने मानव जाति के इतिहास में अजीब कारनामे कर दिखाए हैं। अमेरिका हथियारों के बूते दुनिया पर राज करता है और क्यूबा दुनिया में सबसे अधिक डाक्टरों के लिए जाना जाता है। इबोला से लड़ने के लिए अमेरिका ने अपने 3000 फ़ौजी पहले भेजे लेकिन क्यूबा के 165 डाक्टर वहां इस मानवीय संकट से लड़ रहे थे (याद रहे भारत के डाक्टर उस समय अफ्रीका से लौटने के लिए चिल्ला रहे थे)। विगत में अंगोला के मुक्ति युद्ध में क्यूबा के योगदान को पूरी दुनिया जानती है। क्यूबा में प्रति 1000 नागरिकों पर विश्व में सर्वाधिक डाक्टरों का रिकार्ड है जो 6.7 है यह अनुपात अमेरिका में 2.5 ही है। हैती से लेकर पाकिस्तान में भूकंप आने पर क्यूबा के डाक्टरों को वहां मानवीय सेवा करते देखा जा सकता था। दुनिया में सर्वाधिक शिक्षित आबादी (99.9%) का रिकार्ड क्यूबा के ही नाम है। इतनी विपरीत जटिल आर्थिक परिस्थितियों में; बेहद सीमित संसाधनों में, भूख के जंजाल से निकाल कर देश के आवाम को ऐसी स्थिति में ला देना निश्चय ही संतोषजनक क्रांतिकारी  उप्लब्धि है।
मारियो पूजो द्वारा रचित प्रसिद्द उपन्यास गाड फादर और इसी नाम पर बनी हालीवुड की कालजयी फिल्म के एक सीन में एक बूढ़े माफिया का जन्म दिन मानते हुए क्यूबा के मानचित्र के रूप में बना केक उपस्थित माफिया, राजनीतिज्ञों, धनपतियों द्वारा खिलाया जाता है। इस बूढ़े माफिया को क्यूबा में अमेरिकी धन कुबेरों के लिए होटल और कैसीनो बनाने का नशा चढ़ा था और उधर क्यूबा में राष्ट्रपति बतिस्ता के खिलाफ जन विद्रोह चल रहा होता है, हवाना में चल रही इन माफियाओं और राजनीतिज्ञों की मीटिंग में भाग लेने जाते हुए फिल्म का नायक एक दृश्य देखता है जिसमें पुलिस एक क्रांतिकारी को गिरफ्तार करने के लिए बंदूकें तान देती है लेकिन वह गिरफ्तार होने के बजाये हथगोला फोड़ कर अपनी जान दे देता है। फिल्म का नायक इसे देख कर क्यूबा में निवेश के प्रति आशंकित हो जाता है। उसका तर्क था कि फ़ौज, पुलिस तनख्वाह के लिए काम कर रहे हैं जबकि विद्रोही देश के लिए, जीत उन्हीं की होगी।
अमेरिकी प्रतिबंधों के हटने के बाद अब अमेरिकी पूंजी क्यूबा के बाज़ार में अपना खेल खेलने के लिए शीघ्र ही दाखिल हो जायेगी। क्यूबाई क्रांतिकारियों का विचारधारात्मक संघर्ष अब एक नए धरातल पर लड़ा जायेगा। पूंजी अपनी पूरी ताकत से नेताओं को भ्रष्ट करने उन्हें ललचाने बहलाने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धताएं दशकों से रुके सामाजिक शक्तियों के सर्वांगीण विकास के पहिये को और तेज़ गति से चलाने का प्रयास करेंगी। आने वाले समय में पूरी दुनिया के क्रांतिकारियों को यह संघर्ष देखने की दिलचस्पी रहेगी, जीतेगा कौन यह भविष्य के गर्भ में छिपा प्रश्न है।
टोरंटो से शमशाद इलाही शम्स

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शमशाद इलाही शम्स। लेखक टोरंटो स्थित टीकाकार हैं।

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