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[box type="note" ]विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये, जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूला होने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबा साहेब के रास्ते चलें वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है, उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं। बाबा साहेब भी नहीं और मार्क्स भी नहीं।[/box] पलाश विश्वास विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये, जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूला होने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबा साहेब के रास्ते चलें वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है, उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं। बाबा साहेब भी नहीं... और मार्क्स भी नहीं। सर्वस्वहाराओं का चौरतरफा सत्यानाश समय है यह। विडंबना यह है कि वर्ग संघर्ष के जरिये क्रांति का सपना देखने वाले वामपंथी भी सत्तासुख के लिए जाति समीकरण जोड़ते रहे हैं। बंगाल में तो वर्ण वर्चस्व और मनुस्मृति राज बाकी देश की तुलना में बेहद मजबूत है। बिना केसरिया सुनामी के बंगाल में जीवन यापन मुकम्मल केसरिया है। बंगाल के विभाजन के जरिये सत्ता से बहुजनों को बेदखल तो किया ही गया, दलित शरणार्थियों को बंगाल बाहर करके देश भर में छिड़ककर उनकी पहचान और राजनीतिक ताकत मिटा दी गयी। बहुसंख्य ओबीसी को सत्ता से जोड़कर रखा गया तो अखंड बंगाल में बहुसंख्यक मुसलमान अल्पसंख्यक बनकर वोट बैंक में तब्दील हो गये। सच्चर कमिटी की रपट की भूमिका सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, इस पर चर्चा कम हुई है, लेकिन बाकी देश के केसरिया कायाकल्प को समझने के लिए इसे समझना बेहद जरूरी है। सन् 1977 तक बंगाल में अल्पसंख्यक मुसलमान बाकी देश की तरह कांग्रेस के पाले में बने रहे। सत्ता खातिर कामरेड ज्योति बसु की अगुवाई में बाहर छिटका दिये गये दलित शरणार्थिों को बंगाल वापस बुलाकर शरणार्थी वोट बैंक बनाने का खेल इसीलिए रचा गया क्योंकि मुसलमान कांग्रेस के पास थे और वामदलों का कोई मुकम्मल वोट बैंक नहीं था, लेकिन जब तक मरीचझांपी में शरणार्थी आकर बसे, तब तक 1977 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वामदलों के साथ हो गये। 1977 से लेकर 2009 तक मुसलमान वोट बैंक वामदलों के कब्जे में रहा। इस बीच गैरजरूरी शरणार्थियों को मरीचझांपी नरसंहार के जरिये जनवरी, 1979 में वाम सरकार ने बंगाल से खदेड़ बाहर कर दिया। खास बात यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले सच्चर कमिटी रपट से खुलासा हुआ कि बंगाल में वाम शासन के दौरान मुसलमानों का कल्याण हुआ नहीं है। मुसलमान नंदाग्राम नरसंहार के बाद एकमुश्त ममता बनर्जी के साथ खड़े हो गये तो बंगाल में बजरिये परिवर्तन मां माटी मानुष की सरकार का गठन हो गया। लेकिन अब ताजा सर्वेक्षण आज ही बांग्ला दैनिक अखबार एई समय में प्रकाशित हुआ है, जिसके तहत परिवर्तन जमाने में भी बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ वही साजिशाना धोखाधड़ी का सिलसिला जारी है जैसा कि आईपीएस साहित्यकार नजरुल इस्लाम ने अपनी पुस्तक मुसलमानदेर कि करणीय, में खुलकर पहले ही लिख दिया है कि मुसलिम कट्टरपंथ को संरक्षण देने के अलावा ममता बनर्जी के नमस्ते दोया अभियान से मुसलमानों का कोई कल्याण नहीं हो रहा है। गौरतलब है कि अखंड बंगाल में मुसलमान ही बहुजन आंदोलन की रीढ़ है तो पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और दलितों का कोई गठबंधन नहीं है। आदिवासी और बहुसंख्य ओबीसी अलग-अलग हैं। इन सबको खैरात और आरक्षण बांटकर समीकरण साधा जाता रहा है। गौरतलब है कि बंगाल में तमाम किसान आंदोलनों में मुकम्मल बहुजन समाज का वजूद रहा है। अठारवी सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरु होने के तत्काल बाद हुए चुआड़ विद्रोह से लेकर नील विद्रोह, सन्यासी विद्रोह होकर तेभागा आंदोलन तक। गौरतल है कि मतुआ आंदोलन का प्रस्थान बिंदु ब्राह्मणवाद का विरोध रहा है और हरिचांद ठाकुर से लेकर गुरुचांद ठाकुर तक मतुआ एजेंडा पर स्त्री मुक्ति, कर्मकांड निषेध, शिक्षा आंदोलन, अस्पृश्यता मोचन से भी ऊपर भूमि सुधार का कार्यक्रम सबसे ऊपर था और इसी एजेंडे को अपनाकर तेभागा की पकी हुई जमीन पर वाम दलों का जनाधार बना। गौरतलब है कि बंगाल में अब अबेडकर को संविधान सभा भेजने वाले जोगेंद्रनाथ मंडल को जैसे याद नहीं किया जाता, ठीक उसी तरह अखंड बंगाल के प्रथम प्रधानमंत्री फजलुल हक को याद करने वाला इस पार, उस पार बंगाल में कोई नहीं है। लेकिन इन्हीं फजलुल हक की कृषक प्रजा पार्टी ने 1901 में ढाका में बनी मुसलिम लीग और उसके बाद बनी हिंदू महासभा दोनों की हवा खराब कर रखी थी और वे बहुजनों के निर्विरोध नेता थे। उनकी पार्टी के एजेंडा पर भूमि सुधार सबसे ऊपर था। लेकिन सत्ता में आते ही फजलुल श्यामा हक मंत्रिमंडल ने भूमि सुधार आंदोलन को हाशिये पर रख दिया। नतीजतन बंगाल में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों की चल निकली। बाकी देश में जो बहुजन आंदोलन मुसलमान समर्थन से ओबीसी को साथ लेकर चल रहा था, वह जाति पहचान पर आधारित था, संसाधनों के बंटवारे और भूमि सुधार के एजंडा मार्फत अबेडकरी जाति उन्मूलन एजंडा के तहत पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद दोनों को दुश्मन मानकर नहीं। विपरीत इसके आरक्षण राजनीति के तहत सत्ता वर्ग ने बंगाली मुसलमानों की तरह बहुजन जातियों को रंग बिरंगी पार्टियों के वौटबेंक में सीमाबद्ध कर दिया। जिसके नतीजे के बतौर बहुजनों की मजबूत दो चार जातियां सत्ता तक पहुंच गयी और सत्ता संरक्षण में उन जातियों के बाहुबलि धनपशुओं ने बाकी छह हजार से ज्यादा जातियों पर कहर बरपाने का सिलसिला जारी रखा है। बंगाल में जाति पहचान की बात कोई करता नहीं है और न कोई जाति पूछता है लेकिन मुकम्मल जाति तंत्र है। बाकी देश में जाति तंत्र ही लोकतंत्र है। अंबेडकर ने हिंदू समाज में जाति उन्मूलन असंभव जानकर बौद्ध धर्म अपनाया तो अब जाति व्यवस्था को बहुजन राजनीति के सत्ता माध्यम बना देने और सत्ता वर्ग की मौकापरस्त सत्ता राजनीति से अस्मिता मजबूत बनाओ अभियान के तहत कांशीराम के आवाहन मुताबिक अपनी-अपनी जाति मजबूत करने के तहत आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्मान्तरित बहुजनों के मार्फत इस्लाम, ईसाइत, सिख धर्म, बौद्ध धर्म में भी जाति वर्चस्व का खेल शुरू हो गया। अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजेंडा को फेल करके बहुजन आंदोलन ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये कई राज्यों में सवर्णों को जो सत्ता से अलग कर दिया, जवाबी बंगाली ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग से उसका पटाक्षेप हो गया। दलित उत्पीड़न का सिलसिला अनंत है। स्त्री का दमन अनंत है। अब रामराज में खुल्ला सांढ़ बने गये मजबूत जाति के गुंडातंत्र वही गुल खिला रहे हैं, जो बंगाल में परिवर्तान राज का रोजनामचा है। विडंबना है कि इस गुंडाराज से बचने के लिए बहुजन और वाम कार्यकर्ता नेता भारी पैमाने पर केसरिया तंबू में ही शरण ले रहे हैं। जैसे बंगाल में तृणमूली गुंडाराज से बचने के लिए सुरक्षा की गारंटी अब हिंदू महासभा वंशलतिका भाजपा है, जिसका चालीस के दशक के आखिर तक विशुद्ध आर्थिक एजेंडे के तहत बंगाल के अखंड बहुजन समाज ने मुस्लिम लीग की तरह हाशिये पर रख दिया था। खास बात तो यह है कि बंगाल और भारत के मुकाबले बांग्लादेश में दलित आंदोलन समूचे बहुजन समाज, प्रगतिशील तबके और धर्मनिरपेक्ष लोकतात्रिक ताकतों के साथ सत्ता वर्ग और कट्टरपंथ के विरुद्ध अब भी लामबंद है क्योंकि वहां सत्ता समीकरण के लिए दलित आंदोलन नहीं है और वजूद बहाल रखना बुनियादी तकाजा है। मार खाने के डर से न कोई मसीहा है और न कोई दुकान। न बहुजन मजबूत जातियों का वहां वजूद है और न उनका कोई गुंडातंत्र है।                                                                                     अनीता भारती ने सही लिखा है- दलित महिलाओं के साथ लगातार बढ़ रहे उत्पीड़न, शोषण, बलात्कार और हत्याओं को राष्ट्रीय समस्या मानकर उससे युद्धस्तर पर लड़ना और खत्म करना होगी, ताकि दलित महिलाओं के मान- सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित किया जा सके। फिर एच एल दुसाध जी का यह फेसबुकिया मंतव्य गाँव के दबंगों ने, जो जाति से पटेल हैं, उनकी भाई-भाभी की अनुपस्थिति का लाभ उठकर रेप की घटना अंजाम दिया है। आगे कोई कार्रवाई न हो इसके लिए जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। घटना मिरजापुर जिले की है। दबंगों के प्रभाव के कारण पुलिस सही एक्शन नहीं; ले रही है। मिर्जापुर, भगाणा और बदायूं केस की तह में जाने पर पाएंगे कि घटना के पीछे हिन्दू समाज की कमजोर का यम बनने की मानसिकता जिम्मेवार है। अनवरत जारी ऐसी घटनाओं पर हाय-तोबा से कुछ नहीं होने वाला। आपको यह बात ध्यान रखकर कार्य योजना बनानी होगी कि हिन्दू सख्त का भक्त भी होते हैं। अतः अशक्तों को सशक्त बनाकर ही ऐसी बर्बर घटनाओं से राष्ट्र को निजात दिला सकते हैं। अतः सोचें बीमार हिन्दू समाज को कैसे दुरुस्त कर सकते हैं। लालजी निर्मल का कहना है- बहुजनों का आन्दोलन तो सिर्फ आरक्षण तक सीमित हो कर रह गया। देश की चौथाई आबादी तो आज भी बेबस और बदहाल है। दलितों में भी जाति बोध, जाति मोह पनप रहा है। जातियों के किये जा रहे सशक्तिकरण से अम्बेडकर के सपनों का भारत तार-तार हो रहा है। सवाल है क्या अम्बेडकरी आन्दोलन कमजोर हो रहा है ! सवाल है क्या दलितों के सशक्तिकरण के लिए जमीन वितरण का एजेंडा मुख्य बिंदु बनाया जाना चाहिए, सवाल है क्या हजारों सालों की दासता ने जब दलितों का सब कुछ निगल लिया तो आजादी के बाद दलितों को जीवन यापन के लिए मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए था ? दलित आन्दोलन को इन सारे सवालों से जूझना होगा। इसी सिलसिले में हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़़े का लिखा भी पढ़ लें- अपने अकेले बेटे को क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी ‘हत्याओं’ की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की ‘बलात्कारों’ की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं। इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं। युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं। एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक-ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट-पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं…. इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया। वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया। वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है। ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं। भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है। यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है। यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है। दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका! [author image="https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSD_Jo0EyzC-_V8xGBjC_ijNo1ruhcPFFy7Bo-fRkLBQR-nQfk_NMMNrUs" ]पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। [/author]

गुण्डों की सल्तनत का महापर्व

विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये, जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूला होने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबा साहेब के रास्ते चलें वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है, उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं। बाबा साहेब भी नहीं और मार्क्स भी नहीं।
पलाश विश्वास
विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये, जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूला होने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबा साहेब के रास्ते चलें वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है, उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं। बाबा साहेब भी नहीं… और मार्क्स भी नहीं। सर्वस्वहाराओं का चौरतरफा सत्यानाश समय है यह।
विडंबना यह है कि वर्ग संघर्ष के जरिये क्रांति का सपना देखने वाले वामपंथी भी सत्तासुख के लिए जाति समीकरण जोड़ते रहे हैं। बंगाल में तो वर्ण वर्चस्व और मनुस्मृति राज बाकी देश की तुलना में बेहद मजबूत है। बिना केसरिया सुनामी के बंगाल में जीवन यापन मुकम्मल केसरिया है। बंगाल के विभाजन के जरिये सत्ता से बहुजनों को बेदखल तो किया ही गया, दलित शरणार्थियों को बंगाल बाहर करके देश भर में छिड़ककर उनकी पहचान और राजनीतिक ताकत मिटा दी गयी। बहुसंख्य ओबीसी को सत्ता से जोड़कर रखा गया तो अखंड बंगाल में बहुसंख्यक मुसलमान अल्पसंख्यक बनकर वोट बैंक में तब्दील हो गये। सच्चर कमिटी की रपट की भूमिका सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, इस पर चर्चा कम हुई है, लेकिन बाकी देश के केसरिया कायाकल्प को समझने के लिए इसे समझना बेहद जरूरी है। सन् 1977 तक बंगाल में अल्पसंख्यक मुसलमान बाकी देश की तरह कांग्रेस के पाले में बने रहे। सत्ता खातिर कामरेड ज्योति बसु की अगुवाई में बाहर छिटका दिये गये दलित शरणार्थिों को बंगाल वापस बुलाकर शरणार्थी वोट बैंक बनाने का खेल इसीलिए रचा गया क्योंकि मुसलमान कांग्रेस के पास थे और वामदलों का कोई मुकम्मल वोट बैंक नहीं था, लेकिन जब तक मरीचझांपी में शरणार्थी आकर बसे, तब तक 1977 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वामदलों के साथ हो गये। 1977 से लेकर 2009 तक मुसलमान वोट बैंक वामदलों के कब्जे में रहा। इस बीच गैरजरूरी शरणार्थियों को मरीचझांपी नरसंहार के जरिये जनवरी, 1979 में वाम सरकार ने बंगाल से खदेड़ बाहर कर दिया।
खास बात यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले सच्चर कमिटी रपट से खुलासा हुआ कि बंगाल में वाम शासन के दौरान मुसलमानों का कल्याण हुआ नहीं है। मुसलमान नंदाग्राम नरसंहार के बाद एकमुश्त ममता बनर्जी के साथ खड़े हो गये तो बंगाल में बजरिये परिवर्तन मां माटी मानुष की सरकार का गठन हो गया। लेकिन अब ताजा सर्वेक्षण आज ही बांग्ला दैनिक अखबार एई समय में प्रकाशित हुआ है, जिसके तहत परिवर्तन जमाने में भी बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ वही साजिशाना धोखाधड़ी का सिलसिला जारी है जैसा कि आईपीएस साहित्यकार नजरुल इस्लाम ने अपनी पुस्तक मुसलमानदेर कि करणीय, में खुलकर पहले ही लिख दिया है कि मुसलिम कट्टरपंथ को संरक्षण देने के अलावा ममता बनर्जी के नमस्ते दोया अभियान से मुसलमानों का कोई कल्याण नहीं हो रहा है।
गौरतलब है कि अखंड बंगाल में मुसलमान ही बहुजन आंदोलन की रीढ़ है तो पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और दलितों का कोई गठबंधन नहीं है। आदिवासी और बहुसंख्य ओबीसी अलग-अलग हैं। इन सबको खैरात और आरक्षण बांटकर समीकरण साधा जाता रहा है।
गौरतलब है कि बंगाल में तमाम किसान आंदोलनों में मुकम्मल बहुजन समाज का वजूद रहा है। अठारवी सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरु होने के तत्काल बाद हुए चुआड़ विद्रोह से लेकर नील विद्रोह, सन्यासी विद्रोह होकर तेभागा आंदोलन तक।
गौरतल है कि मतुआ आंदोलन का प्रस्थान बिंदु ब्राह्मणवाद का विरोध रहा है और हरिचांद ठाकुर से लेकर गुरुचांद ठाकुर तक मतुआ एजेंडा पर स्त्री मुक्ति, कर्मकांड निषेध, शिक्षा आंदोलन, अस्पृश्यता मोचन से भी ऊपर भूमि सुधार का कार्यक्रम सबसे ऊपर था और इसी एजेंडे को अपनाकर तेभागा की पकी हुई जमीन पर वाम दलों का जनाधार बना।
गौरतलब है कि बंगाल में अब अबेडकर को संविधान सभा भेजने वाले जोगेंद्रनाथ मंडल को जैसे याद नहीं किया जाता, ठीक उसी तरह अखंड बंगाल के प्रथम प्रधानमंत्री फजलुल हक को याद करने वाला इस पार, उस पार बंगाल में कोई नहीं है। लेकिन इन्हीं फजलुल हक की कृषक प्रजा पार्टी ने 1901 में ढाका में बनी मुसलिम लीग और उसके बाद बनी हिंदू महासभा दोनों की हवा खराब कर रखी थी और वे बहुजनों के निर्विरोध नेता थे। उनकी पार्टी के एजेंडा पर भूमि सुधार सबसे ऊपर था। लेकिन सत्ता में आते ही फजलुल श्यामा हक मंत्रिमंडल ने भूमि सुधार आंदोलन को हाशिये पर रख दिया। नतीजतन बंगाल में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों की चल निकली।
बाकी देश में जो बहुजन आंदोलन मुसलमान समर्थन से ओबीसी को साथ लेकर चल रहा था, वह जाति पहचान पर आधारित था, संसाधनों के बंटवारे और भूमि सुधार के एजंडा मार्फत अबेडकरी जाति उन्मूलन एजंडा के तहत पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद दोनों को दुश्मन मानकर नहीं। विपरीत इसके आरक्षण राजनीति के तहत सत्ता वर्ग ने बंगाली मुसलमानों की तरह बहुजन जातियों को रंग बिरंगी पार्टियों के वौटबेंक में सीमाबद्ध कर दिया। जिसके नतीजे के बतौर बहुजनों की मजबूत दो चार जातियां सत्ता तक पहुंच गयी और सत्ता संरक्षण में उन जातियों के बाहुबलि धनपशुओं ने बाकी छह हजार से ज्यादा जातियों पर कहर बरपाने का सिलसिला जारी रखा है।
बंगाल में जाति पहचान की बात कोई करता नहीं है और न कोई जाति पूछता है लेकिन मुकम्मल जाति तंत्र है। बाकी देश में जाति तंत्र ही लोकतंत्र है। अंबेडकर ने हिंदू समाज में जाति उन्मूलन असंभव जानकर बौद्ध धर्म अपनाया तो अब जाति व्यवस्था को बहुजन राजनीति के सत्ता माध्यम बना देने और सत्ता वर्ग की मौकापरस्त सत्ता राजनीति से अस्मिता मजबूत बनाओ अभियान के तहत कांशीराम के आवाहन मुताबिक अपनी-अपनी जाति मजबूत करने के तहत आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्मान्तरित बहुजनों के मार्फत इस्लाम, ईसाइत, सिख धर्म, बौद्ध धर्म में भी जाति वर्चस्व का खेल शुरू हो गया। अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजेंडा को फेल करके बहुजन आंदोलन ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये कई राज्यों में सवर्णों को जो सत्ता से अलग कर दिया, जवाबी बंगाली ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग से उसका पटाक्षेप हो गया।
दलित उत्पीड़न का सिलसिला अनंत है। स्त्री का दमन अनंत है। अब रामराज में खुल्ला सांढ़ बने गये मजबूत जाति के गुंडातंत्र वही गुल खिला रहे हैं, जो बंगाल में परिवर्तान राज का रोजनामचा है।
विडंबना है कि इस गुंडाराज से बचने के लिए बहुजन और वाम कार्यकर्ता नेता भारी पैमाने पर केसरिया तंबू में ही शरण ले रहे हैं। जैसे बंगाल में तृणमूली गुंडाराज से बचने के लिए सुरक्षा की गारंटी अब हिंदू महासभा वंशलतिका भाजपा है, जिसका चालीस के दशक के आखिर तक विशुद्ध आर्थिक एजेंडे के तहत बंगाल के अखंड बहुजन समाज ने मुस्लिम लीग की तरह हाशिये पर रख दिया था।
खास बात तो यह है कि बंगाल और भारत के मुकाबले बांग्लादेश में दलित आंदोलन समूचे बहुजन समाज, प्रगतिशील तबके और धर्मनिरपेक्ष लोकतात्रिक ताकतों के साथ सत्ता वर्ग और कट्टरपंथ के विरुद्ध अब भी लामबंद है क्योंकि वहां सत्ता समीकरण के लिए दलित आंदोलन नहीं है और वजूद बहाल रखना बुनियादी तकाजा है। मार खाने के डर से न कोई मसीहा है और न कोई दुकान। न बहुजन मजबूत जातियों का वहां वजूद है और न उनका कोई गुंडातंत्र है।                                                                                     अनीता भारती ने सही लिखा है-

दलित महिलाओं के साथ लगातार बढ़ रहे उत्पीड़न, शोषण, बलात्कार और हत्याओं को राष्ट्रीय समस्या मानकर उससे युद्धस्तर पर लड़ना और खत्म करना होगी, ताकि दलित महिलाओं के मान- सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित किया जा सके।

फिर एच एल दुसाध जी का यह फेसबुकिया मंतव्य

गाँव के दबंगों ने, जो जाति से पटेल हैं, उनकी भाई-भाभी की अनुपस्थिति का लाभ उठकर रेप की घटना अंजाम दिया है। आगे कोई कार्रवाई न हो इसके लिए जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। घटना मिरजापुर जिले की है। दबंगों के प्रभाव के कारण पुलिस सही एक्शन नहीं; ले रही है। मिर्जापुर, भगाणा और बदायूं केस की तह में जाने पर पाएंगे कि घटना के पीछे हिन्दू समाज की कमजोर का यम बनने की मानसिकता जिम्मेवार है। अनवरत जारी ऐसी घटनाओं पर हाय-तोबा से कुछ नहीं होने वाला। आपको यह बात ध्यान रखकर कार्य योजना बनानी होगी कि हिन्दू सख्त का भक्त भी होते हैं। अतः अशक्तों को सशक्त बनाकर ही ऐसी बर्बर घटनाओं से राष्ट्र को निजात दिला सकते हैं। अतः सोचें बीमार हिन्दू समाज को कैसे दुरुस्त कर सकते हैं।

लालजी निर्मल का कहना है-

बहुजनों का आन्दोलन तो सिर्फ आरक्षण तक सीमित हो कर रह गया। देश की चौथाई आबादी तो आज भी बेबस और बदहाल है। दलितों में भी जाति बोध, जाति मोह पनप रहा है। जातियों के किये जा रहे सशक्तिकरण से अम्बेडकर के सपनों का भारत तार-तार हो रहा है। सवाल है क्या अम्बेडकरी आन्दोलन कमजोर हो रहा है ! सवाल है क्या दलितों के सशक्तिकरण के लिए जमीन वितरण का एजेंडा मुख्य बिंदु बनाया जाना चाहिए, सवाल है क्या हजारों सालों की दासता ने जब दलितों का सब कुछ निगल लिया तो आजादी के बाद दलितों को जीवन यापन के लिए मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए था ? दलित आन्दोलन को इन सारे सवालों से जूझना होगा।

इसी सिलसिले में हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़़े का लिखा भी पढ़ लें-

अपने अकेले बेटे को क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी ‘हत्याओं’ की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की ‘बलात्कारों’ की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं। इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं। युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं। एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक-ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट-पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं….
इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया। वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया। वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है। ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं। भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है। यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है। यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है।
दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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