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जीएम सरसों के व्यवसायीकरण के प्रस्ताव के खिलाफ प्रतिरोध

जीएम सरसों के व्यवसायीकरण के प्रस्ताव के खिलाफ प्रतिरोध, सैकड़ों संगठनों और सिविल सोसाइटी सदस्यों ने विरोध में सरकार को दी चेतावनी
नई दिल्ली, 6 नवंबर 2015। आज कई सिविल सोसाइटी संगठनों ने जीएम सरसों के व्यवसायीकरण के खिलाफ एकजुट होकर सरकार से इसे रोकने की मांग की है।
सरसों सत्याग्रह के प्रतिनिधियों ने सरकार से जीएम के मामले में आगे नहीं बढ़ने को कहा है। संगठनों ने कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में एक अनावश्यक, असुरक्षित, अपरिवर्तनीय और बेकाबू प्रौद्योगिकी द्वारा किसानों और उपभोक्ताओं के विकल्प के अधिकार का उल्लंघन नहीं होने देंगे।
आम नागरिकों ने भी जीएम सरसों के खिलाफ जारी ऑनलाइन पेटिशन पर हस्ताक्षर किया है, जिसमें उन्होंने पर्यावरण मंत्री से इसे रोकने की अपील की है।
एक नये घटनाक्रम में, सरसों खेती वाले गुजरात क्षेत्र से एपीएमसी ने नियामक को पत्र लिखकर कहा है कि गैर-जीएम खाद्य उपभोक्ताओं द्वारा पसंद किया जा रहा है लेकिन जीएम खाद्य की मांग बाजार में नहीं है। इसलिए जीएम सरसों को लाना उनकी स्थिति को खतरे में डालने जैसा होगा। एपीएमसी से लगभग एक लाख किसान जुड़े हैं जो लगभग 400 करोड़ रुपए का व्यापार करते हैं।
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डा. अंबुमणि रामदॉस द्वारा वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर बैंगन और जीएम सरसों के बीच समानताओं पर ध्यान दिलाया है और पूछा है कि भारत को एक असुरक्षित तकनीक क्यों अपनाना चाहिए जबकि विकल्प मौजूद हैं?
करीब पांच लाख सदस्यों वाली गुजरात का किसान संगठन भारतीय किसान संघ ने जमीनी अनुभव के आधार पर कहा है कि वर्णसंकर सरसों को उपजाने में कोई फायदा नहीं है। संगठन ने अपने पत्र में हाल के दिनों में बीटी कपास के साथ अपने कड़वे अनुभव को व्यक्त किया है और बीटी कपास को गैरजरूरी बताया है।
संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए जीएम मुक्त भारत अभियान की कविता कुरुंगटि ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि भूमि अधिग्रहण मामले से सरकार कुछ सीख लेगी और जनता के हितों के खिलाफ नहीं जाएगी। यदि सरकार जीएम फसलों की वजह से आजीविका पर होने वाले असुरक्षा और इसके प्रौद्योगिकी के खिलाफ सबूत होने के बावजूद हम पर जीएम फसलों को थोपती है तो उसे जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि इस तरह के खतरनाक तकनीक न तो किसानों के लिये स्वीकार्य है और न ही उपभोक्ताओं के लिये।”
इस बीच भोजन का अधिकार अभियान ने भी प्रकाश जावेड़कर को पत्र लिखकर कहा है कि तिलहन उत्पादन के साथ समस्याएँ सिर्फ उत्पादन से नहीं जुड़ी है बल्कि सरकारी नीतियों की वजह से ही समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं और इस समस्या को खतरनाक तकनीक का सहारा लेकर नहीं सुलझाया जा सकता है।
भारतीय किसान युनियन (बीकेयू टिकैत) की तरफ से धर्मेन्द्र मल्लिक ने कहा, “यदि सरकार किसान हितैषी फसलों की सही कीमत और वास्तविक खरीद शामिल होने वाली नीतियां लेकर आती है तो उत्पादन कोई समस्या ही नहीं है। जीएम सरसों की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि इससे खेतों की जीविका पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।”
उन्होंने कहा, “वर्तमान किसानों के अधिकार संबंधी कानून से भारतीय सरसों के विभिन्न किस्मों को लाभ नहीं मिल रहा है। 54 आवेदनों में से सिर्फ एक ही किसान के एक किस्म को पंजीकृत किया जा सका है जबकि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली में 46 पंजीकृत किस्म मौजूद हैं क्योंकि सरकार गैर-जीएम किस्मों को प्रोत्साहन नहीं दे रही है।”
संवाददाता सम्मेलन में बोलते हुए सरसों सत्याग्रह के आयोजक अभिषेक जोशी ने कहा, “हमारे देश में जीएम फसलों और खासकर जीएम सरसों को लगातार अस्वीकृत किया गया है। हम देश के सभी भागों में इसके खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया देख सकते हैं। अगर इन्हें सरकार और नियामक नजरअंदाज करके आगे बढ़ते हैं तो यह समाज और विज्ञान के लिये अनुत्तरदायी और गैर जिम्मेदाराना रवैया होगा। बीटी बैंगन की तरह जीएम सरसों के मामले में भी राज्य सरकार से समर्थन नहीं जुटाया गया है। राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे सरसों उत्पादन वाले और बीजेपी शासित प्रदेशों ने भी जीएम सरसो के फील्ड ट्राइल को मना कर दिया है।”
डॉक्टर्स फॉर फूड सेफ्टी एंड बायोसेफ्टी की तरफ से बोलते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञ डा. मीरा शिवा ने हमारे देश में जीएमओ सुरक्षा के मूल्यांकन में पूर्ण अपर्याप्तता की तरफ इशारा करते हुए कहा, “जीएमओ में सुरक्षा को लेकर कमी समय-समय पर साबित होता रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त तकनीकी विशेषज्ञ समिति के सदस्यों ने भी बीटी कॉटन और बीटी बैंगन पर बनी डॉजियर में यह बात स्वीकार किया है कि नियामकों ने संयोग से इसे सुरक्षित प्रमाणित किया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ग्लाइफोसेट को संभावित कैंसरजन के रूप में वर्गीकरण यह बताता है कि उत्पाद के सुरक्षा के लिये पर्याप्त दीर्घकालिक परीक्षण नहीं किया गया जिससे कोई वैज्ञानिक निर्णय लिया जा सके। बिना उपयुक्त परीक्षण के किसी उत्पाद को सुरक्षित कहना अवैज्ञानिक है। दुर्भाग्य से जीईएसी एक जिम्मेदार नियामक होने की बजाय लगातार जीएमओ के प्राचरक के रूप में काम कर रहा है। नियामक संस्था में हितो का टकराव जारी है। यह न सिर्फ  अपर्याप्त जैव सुरक्षा आकलन प्रणाली है बल्कि इसके अध्ययन को जनता के बीच सार्वजनिक होने  से भी छिपाया जा रहा है”।
नागरिक समूहों द्वारा पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर को भेजा गया एक पत्र भी संवाददाता सम्मेलन में रिलीज किया गया। राजस्थान से मजदूर किसान संगठन, भाकर भिटरौत आदिवासी विकास मंच ने भी इस पत्र को अपना समर्थन दिया है। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के साथ-साथ कई पर्यावरण समूहों ने भी इस पत्र को अपना समर्थन दिया है।

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