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ठगी जाने के लिये है जनता, दस्तूर तो यही है

हमपेशा लोगों के प्रति इतने निर्मम
मीडिया जमात के भरोसे जनता
जनादेश तैयार करने की कवायद करेगी
तो ठगी ही जायेगी।
पलाश विश्वास
भारतीय पत्रकार संघ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर आग्रह किया है कि अखबारों के लिये डी ए वी पी द्वारा विज्ञापन दर में बढ़ोतरी कर दी गयी है लेकिन पत्रकारों के लिये वेज बोर्ड लागू नहीं हो पाया है। कृपया इसे लागू करवाया जाये। अब उस मीडिया पर क्या भरोसा कीजै, जो अपने ही संगी साथियों की कूकूरगति से विचलित हुये बिना सत्ता गलियारे में या कॉरपोरेट बेडरूम में चाँदी काटने के जरिये ही इहलोक परलोक साधते हैं और बहुत बुलन्द पत्रकारिता में नामचीन ज़िन्दगी जीते हुये मीडिया के अन्दर महल की नरकयंत्रणा पर खामोशी बरतकर हगीज कैरियर बटोरते हुये सिधार जाते हैं। तमाम फैसले सही टाइमिंग पर हो जाते हैं। चाहे लागू हों या नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि आधार को जरूरी सेवाओं से नत्थी न किया जाये। भारत सरकार बाकायदा संसद में कहती है कि आधार अनिवार्य नहीं ऐच्छिक हैं। लेकिन दुनिया जहाँ के मीडिया कर्मी गैस एकाधिकार कम्पनी के हितों के मद्देनजर अगल बजट में गधे के सिर से सींग की तरह  खत्म हो जाने वाली सब्सिडी के नकदीकरण का हवाला देते हुये जन गण में आतंक का माहौल रचने में एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं कि आधार नंबर न हुआ तो सत्यानाश हो जायेगा। तेल कम्पनियाँ संसद और सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करते हुये फतवा जारी कर रही हैं कि आधार नम्बर के बिना नहीं मिलेगी रसोई गैस। उधर गैस की कीमत दोगुनी कर दी गयी है खास कम्पनी के हित में। रोजाना गैस की कीमत में इजाफा हो रहा है। एक खास कम्पनी के फायदे के लिये सारे मीडियाकर्मी उसके कारिंदे बतौर काम कर रहे हैं। बाउंसर जैसा बर्ताव कर रहे हैं। बिना संसदीय इजाजत के आईटी कम्पनी और गैस एकाधिकार कम्पनी के फायदे के लिये लाखों करोड़ के न्यारे वारे पर खामोश मीडिया अब नंदन निलेकणि के प्रधानमंत्रित्व का दावा मजबूत करने के अभियान में जुट गये हैं।
गांव कस्बे के संवाददाता हुये तो भी उसके समीकरण धाकड़ हैं। संवाददाताओं को पत्रकारिता के नाम सारी सुविधाएं। डेस्क पर जो बंधुआ मजदूर संप्रदाय हैं, वे किसी प्रेस क्लब के मेम्बर भी नहीं हो सकते और न प्रेस को मिलने वाली रियायतें सुविधाओं का उन्हें लाभ है। संपादक, समाचार संपादक के घरों में सेवाएं पहुँच जाती हैं। अबाध यौनाचार का तो भंडाफोड़ हो ही गया है।
मीडिया के भीतर ही इतना ज्यादा रंगभेद है और वर्णवर्चस्व है कि मलाईदार तबके को गाड़ी-बाड़ी मुफ्त विदेश यात्रा, पाँच सितारा जीवन राजनेताओं के मुकाबले ज्यादा स्थायित्व वाला मिला हुआ है।
य़े ही वे लोग हैं जिनकी वजह से न वेतनमान लागू हो पा रहा है और न कार्यस्थितियाँ सुधर रही हैं। मजीठिया के वे मोहताज नहीं हैं। पत्रकार संगठनों के भी वे ही भाग्यविधाता हैं।
हर मुकदमे का सत्ता वर्ग के हितों के मुताबिक सटीक टाइमिंग के मुताबिक पैसला आ जाता है। काफी ब्रेक में ही फैसला तैयार होता जा रहा है। लेकिन पूरी एक पीढ़ी रिटायर होती जा रही है और मजीठिया पर अनन्त सुनवाई जारी है।
हमपेशा लोगों के प्रति इतने निर्मम मीडिया जमात के भरोसे जनता जनादेश तैयार करने की कवायद करेगी तो ठगी ही जायेगी।
सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों के लिये गठित मजीठिया वेज बोर्ड मामले की अगली सुनवाई के लिये 7 जनवरी की तिथि तय की गई है. 12 दिसम्बर को मामले की सुनवाई करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अगली तिथि की घोषणा की.         गौरतलब है कि सरकार ने मीडिया कर्मियों के वेतन और अन्य सुविधाओं में वृद्धि के साथ अन्य उनकी शिकायतों पर सुनवाई के लिये 2009 में मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया था जिसके खिलाफ प्रबंधन कोर्ट चला गया था। सरकार कोर्ट के समक्ष मजीठिया की सिफारिशों को लागू करने के पक्ष में हलफनामा दे चुकी है।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना ।

About हस्तक्षेप

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