‘देहाती औरत’ के दरवाजे पर जेटली की गुहार की बस इतनी सी सच्चाई…

अमलेन्दु उपाध्याय

अभी ज्यादा वक्त कहाँ गुजरा है जब भारतीय जनता पार्टी के भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवाणी पर संघ परिवार के संस्कारी छोकरे सोशल मीडिया पर जमकर गालियों की बौछार कर रहे थे और मोदी का रास्ता रोकने का आरोप लगाते हुये उनके घर के बाहर प्रदर्शन भी कर रहे थे। उस समय हमारे बहुत से राजनीतिक विश्लेषक स्थापना दे रहे थे कि यह आडवाणी जी की महत्वाकाँक्षा का परिणाम है और अब उन्हें आशीर्वादीलाल बनकर मोदी को आशीर्वाद दे देना चाहिए। हमने उस समय भी कहा था कि आडवाणी जी प्रतिबद्ध स्वयंसेवक हैं और उनका मोदी से संघर्ष महत्वाकाँक्षा का संघर्ष कतई नहीं है। अगर आडवाणी जी चाहते तो 1998 में ही प्रधानमंत्री बन सकते थे और उस समय आरएसएस या खुद अटल बिहारी वाजपेयी की हैसियत नहीं थी कि वे आडवाणी को रोक पाते। लेकिन आडवाणी ने संघ के जहरीले सांप्रदायिक एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए ही उस समय खुद वाजपेयी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ा दिया था। फिर 2014 में आडवाणी जी दिमाग नहीं फिर गया है कि यह भली भाँति जानते हुए भी कि भाजपा का जहाज डूबने वाला है और मोदी तो क्या साक्षात् हिटलर भी मैदान में उतर आए तो भी भाजपा सरकार बनाने के आस-पास नहीं फटक सकती, वह पीएम नहीं पीएम पद का उम्मीदवार बनने के लिए हठ पर उतर आएं ! दरअसल आडवाणी जी बहुत अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं, वह इस बात को भली भाँति ताड़ गए थे कि मोदी का सारा प्रपंच भाजपा के उद्धार के लिए नहीं बल्कि अपनी जान बचाने के लिए है और इसके लिए मोदी भाजपा की गर्दन फँसा रहे हैं।

हमने उस समय भी कहा था कि जिस तरह से 2002 के गुनाहों की सज़ा अब आकर मिलना शुरू हुयी है उसकी आँच अब मोदी तक पहुँचने लगी है। 2014 के बाद अगर मोदी का केन्द्र में दखल नहीं हुआ तो उनके माया कोडनानी और बाबू बजरंगी बनने का रास्ता साफ हो जायेगा। और अगर ऐसा नहीं है तो क्या राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी निभाने के लिये मोदी अब गुजरात किसी और के हवाले कर देंगे। यदि नहीं। उनमें यह साहस नहीं है तो तय मानिये कि उनकी सारी कवायद अपनी गर्दन बचाने की है न कि भाजपा को बढ़ाने की।

दरअसल मोदी भाजपा पर कब्जा करना ही इसलिये चाहते थे कि 2014 के बाद भले ही भाजपा सत्ता में न आये लेकिन वह प्रमुख विपक्षी दल तो रहेगी ही और जैसे अभी संसद् नहीं चलने देती है वैसे ही 2014 के बाद भी इस ताकत में तो रहेगी ही। ऐसे में 2014 के बाद 2002 के गुजरात के गुनाहों की सज़ा मिलने की बारी आये तो मोदी इसमें अकेले न खड़े रह जायें बल्कि इसे भाजपा बनाम सरकार कर दें। और हमारी यह शंका निर्मूल साबित नहीं हुई। भाजपा के बड़े नेता और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने जिस तरह से घबराकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर गिड़गिड़ाते हुए मोदी को बचाने की विनती की है उससे यह बात सच साबित हो गई है कि आडवाणी का हठ बेकार नहीं था और मोदी ने भाजपा को अधर में फँसा दिया है। दरअसल मोदी की जंग पीएम या पीएम इन वेटिंग बनने के लिये न आज है न कल थी। …और न मोदी इतने नादान हैं कि इस हकीकत वे वाकिफ नहीं हैं कि आडवाणी जी तरह उनकी कुण्डली में भी पीएम बनना नहीं लिखा है। दरअसल मोदी की यह सारी कवायद 2014 के बाद माया कोडनानी और बाबू बजरंगी बनने से बचने की है। जेटली के पत्र ने इस बात पर मुहर लगा दी है।

वरना अचानक ऐसी क्या मुसीबत आ गई थी कि जेटली साहब की कलम ठीक उसी समय चली जब कांग्रेस के सांसद रशीद मसूद को भ्रष्टाचार के एक मुकदमे में सजा होती है और 17 साल पुराने चारा घोटाले में कांग्रेस के सहयोगी लालू प्रसाद यादव जेल पहुँच जाते हैं। दरअसल अरुण जेटली नेता भले ही अच्छे और जनाधार वाले न हों लेकिन वकील तो बड़े हैं ही। वह अच्छी तरह समझ गए हैं कि अगर सीबीआई निष्पक्ष होकर बिना किसी दबाव में आए काम करती रही तो तुलसी प्रजापति, इशरत जहां और सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड में मोदी का नपना बिल्कुल तय है और फंदा मोदी के गले तक पहुँच चुका है। खास तौर पर पुलिस अफसर डीजी वंजारा के पत्र के बाद तो मोदी के बचने की सारी संभावनाएं समाप्त हो चुकी हैं। वंजारा के पत्र ने मोदी साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी है। अब अगर सीबीआई के हाथ मोदी की गर्दन तक पहुँचते हैं (जो पहुँचेंगे ही) तो भाजपा किस मुँह से ऊधम मचाएगी? और 2014 से पहले ही कहीं मोदी कृष्ण मंदिर पहुँच गये तो भाजपा का क्या होगा ? भाजपा किसके सहारे चुनावी समर में उतरेगी? क्या वह अब उन आडवाणी की शरण में जा सकेगी जिनको अभी बुरी तरह बेइज्जत करके चुकी है? लिहाजा जेटली का पत्र कुल मिलाकर मनमोहन सिंह से इतनी मोहलत चाहता है कि मोदी को 2014 से पहले कृष्ण मंदिर न भेजा जाए।

इसी डर और बेचैनी ने जेटली को उन प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के लिए बाध्य कर दिया जिन मनमोहन सिंह पर मोदी दो दिन पहले ही देहाती औरत का जुमला उछाल कर अभद्रता कर रहे थे और खुद भाजपा पिछले नौ वर्षों से मनमोहन सिंह के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें कठपुतली प्रधानमंत्री करार देती रही है। याद होगा कि आडवाणी ने भी 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपने संघी संस्कारों के मुताबिक मनमोहन सिंह के लिए अभद्र शब्दावली प्रयोग की थी। आखिर जेटली की पार्टी जिस व्यक्ति को लगातार कठपुतली कहती रही है, जेटली उसी को पत्र लिखकर मोदी को बचाने के लिए गिड़गिड़ा क्यों रहे हैं?

प्रधानमंत्री को इस समय जेटली के पत्र लिखने का एक और कारण हैं। दरअसल वह चाहते हैं कि इस समय कांग्रेस में मनमोहन बनाम राहुल की जो जंग शुरू हुई है उसमें प्रधानमंत्री राहुल कैम्प से खुन्नस में मोदी और भाजपा की मदद कर दें। चूँकि लाख कठपुतली होने के आरोपों के बावजूद संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री तो डॉ. मनमोहन सिंह ही हैं। इसीलिए जेटली ने मोदी को बचाने के लिए प्रधानमंत्री से राजनीतिक भाषा में गुहार लगाई है।

जेटली ने पत्र में लिखा है कि कांग्रेस की घटती लोकप्रियता के दौर में उसकी रणनीति साफ है। कांग्रेस राजनीतिक तौर पर भाजपा और नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकती। हार उनके चेहरे पर साफ नजर आती है।

दरअसल यह जेटली नहीं भाजपा का डर बोल रहा है। मोदी का मुकाबला तो मय जेटली के पूरी भाजपा भी मिलकर नहीं कर पा रही है जबकि एक अदद तुच्छ वंजारा मोदी समेत पूरी भाजपा को ऐसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति करा देता है कि जेटली जी प्रधानमंत्री को पत्र लिख मारते हैं। इस हड़बड़ी में जेटली यह भी लिख बैठे कि सीबीआई ने मोदी को फंसाने के इरादे के साथ अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि सीबीआई ने शाह को गिरफ्तार किया था जबकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने योग्य कोई सबूत नहीं था।

जेटली साहब वकील अच्छे हैं लेकिन जज नहीं हैं जो यह आदेश जारी कर दें कि “सीबीआई ने शाह को गिरफ्तार किया था जबकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने योग्य कोई सबूत नहीं था”। अब जब मोदी ने भाजपा की 2014 की कमान संभाल ही ली है तो ऐसी स्थिति में भाजपा को मोदी के सारे पाप अपने ऊपर लेने ही होंगे। जेटली के पत्र की बस इतनी सी सच्चाई है कि वह चाहते हैं कि मनमोहन सिंह राहुल गांधी से अपने अपमान का बदला लेते हुए मोदी को बचाने के लिए सीबीआई पर दबाव बनाएं।

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