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धनमन का बेमन

जुगनू शारदेय

हाय रे जमाना , बहुत नाइंसाफी है – ईस्स ! जिसे देखो धनमन को गरियाए जा रहा है । इससे तो अच्छा था कि धनमन किसी गरीब की लुगाइ होता । कम से सारे जमाने की भौजाई तो होता । कोई नहीं समझता धनमन का दर्द । यहां लोग हैं कि गुनगुना रहे हैं  जट यमला पगला दीवाना , ईत्ती सी बात न जाना …ईस्स !
सारा खेल बस इसी बात का है कि ईत्ती सी बात न जाना … धनमन भी यही कहता है कि ईत्ती सी बात न जाना …क्या कसूर इस गरीब का । यही न कि सिंहासन है , पर सिंहासन नहीं है । पादुका है पर चरण नहीं है । अब जरा सोचिए कि बिन सिंहासन , बिन चरण , पादुका कब से ढो रहा है धनमन । तन मन से सेवा कर रहा है धनमन कि धन बढ़े । धन कितना बढ़ाया धनमन ने कि देश का धन विदेश में पहुंच गया । ईत्ती सी बात न जाना …ईस्स !
और क्यों न पहुंचे देश का धन विदेश में । देश में ही धन के न जाने कितने लुटरे बैठे हैं । पहला लुटेरा देश का सेवा कर है । बिना कोई सेवा किए कर
लगाते हैं । इसी कर के डर से लोगों ने कर सेवा बंद कर दी । और भी लुटेरे हैं । कोई इनिशियल पब्लिक ऑफर के नाम पर लूट जाता है । कोई महंगाई के बहाने लूट लेता है । कोई मनरेगा के बहाने लूट लेता है । कुछ कुछ ऐसा हो गया है कि धन की लूट है , लूट सके तो लूट – पांच साल के बाद सरकार जाएगी छूट । धनमन की पूरी कोशिश है कि सब कुछ छूटे तो छूटे – सरकार न छूटे । ईत्ती सी बात न जाना …ईस्स !
धनमन अपने मन से कोई काम नहीं करता । तिलस्मी पादुका जो आदेश देती है ,वही पूरे मन से करता है । ऐसा त्यागी कहां मिलेगा , जो दूसरे का दोष अपने सिर पर ले । मन भी बहलाए , हौसला भी बढ़ाए कि जो आज किया , वह पूरा नहीं । अधूरा है । अभी बहुत काम करना है । साबित करना है कि मार्च तक महंगाई खत्म हो जाएगी । महंगाई न हुआ बीपीएल हो गया जो आंकड़े के हेर फेर से कभी बढ़ जाता है , कभी खत्म हो जाता । पर जब धनमन ने कहा है तो जरूर कोई न कोई बात होगी क्योंकि धनमन झूठ नहीं बोलता । ईत्ती सी बात न जाना …ईस्स !
धनमन मेरे , इस देश पर विश्वास न करो । कितने मन से तूने भारत को इंडिया बनाया । कितनी मेहनत से महंगाई बढ़ाई । कितनी मजबूरियों के बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ाया । विकास दर बढ़ाया । और न जाने क्या क्या बढ़ाया ।नहीं बढ़ाया तो देश का धन देश में ही रहे । वह नासमझ हैं जो सरकारी
लुटेरे के डर से देश का धन विदेश में जमा करते हैं । उन समझदारों की तरफ से कोई धनमन को शाबासी नहीं देता जो देश के धन के बल पर विदेश में कल कारखाना खोल रहे हैं । सब कुछ तो धनमन की धन नीति ने ही किया । फिर भी लोग धनमन को मामूली महंगाई पर गरियाते हैं । भूल जाते हैं कि धनमन का मन कितना बेमन है ,इस देश की बेवफाई से । हाय रे जमाना , बहुत नाइंसाफी है – ईस्स ! लोगों ने ईत्ती सी बात न जाना …ईस्स !

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