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Home / धार्मिक आधार पर भेदभाव के लिये अवाम से सर्वोच्च न्यायालय माँगे माफी-रिहाई मंच
फाँसी की सजा के खात्मे की दिशा में ऐतिहासिक पहल है यह फैसला- मो. शुऐब अदालतें भी साम्प्रदायिक आधार पर ठीक उसी तरह व्यवहार करती हैं जैसे साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी सरकारें। लखनऊ 19 फरवरी 2014। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों की फाँसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील किये जाने के फैसले का स्वागत करते हुये रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा है कि भारत में फाँसी जैसी बर्बर व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक पहल है, जो देश को दुनिया के उन आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देशों की कतार में खड़ा कर सकता है जहाँ फाँसी की व्यवस्था को बर्बर और अमानवीय मानते हुये बहुत पहले ही खत्म किया जा चुका है। लेकिन, अच्छा होता कि इसकी शुरुआत संसद पर हुये हमले के कथित आरोपी अफजल गुरू के मामले से ही कर दी गयी होती, जिसकी पूरी घटना में संलिप्तता और उसे सुनाये गये फाँसी के फैसले पर भी कई न्यायविदों और मानवाधिकार समूहों द्वारा गम्भीर सवाल उठाये जाते रहे हैं। रिहाई मंच के प्रवक्ताओं राजीव यादव और शाहनवाज आलम ने कहा कि अफजल गुरू जिसे संसद हमले का आरोपी बताया गया था और जिसमें एक भी संसद सदस्य की मौत नहीं हुयी थी, को सिर्फ ’जनता की सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिये’ फाँसी की सजा और राजीव गाँधी जो पूर्व प्रधानमन्त्री और संसद सदस्य थे, की हत्या के आरोपियों के फाँसी के फैसले को उम्रकैद में तब्दील करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का धर्म आधारित पक्षपातपूर्ण और साम्प्रदायिक रवैया साफ उजागर हो जाता है। जिससे कश्मीरियों और आम भारतीय मुसलमानों में यह संदेश जाता है कि अदालतें भी साम्प्रदायिक आधार पर उनके साथ ठीक उसी तरह व्यवहार करती हैं जैसे साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी सरकारें। प्रवक्ताओं ने राजीव गाँधी के हत्यारों की फाँसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के बाद सर्वोच्च अदालत को अफजल गुरू के परिजनों, कश्मीरियों और पूरे देश के इंसाफ पसंद लोगों से सार्वजनिक माफी माँगने की मांग की ताकि, धर्मनिरपेक्ष आधार पर न्याय और इंसाफ की दिशा में देश एक नयी पहल कर सके। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत का दोषियों के प्रति धर्म के आधार पर यह भेदभाव नरेन्द्र मोदी के गुजरात 2002 दंगे में निभायी गयी उस भूमिका से बिल्कुल अलग नहीं है जिसमें उन्होंने दंगे के आरोप में पकड़े गये मुसलमान आरोपियों पर पोटा लगाया था और हिन्दू आरोपियों पर मामूली आपराधिक धाराएं। या जिस तरह एन.आई.ए बिना ठोस सबूतों के आतंकवाद के आरोप में निर्दोष मुसलमानों को आरोपी बना रही है लेकिन, असीमानन्द द्वारा कई बार यह बताने के बावजूद कि देश में हुये कई आतंकी हमलों में आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत, इन्द्रेश कुमार और सांसद योगी आदित्य नाथ की भूमिका थी, को एक बार भी गिरफ्तार करना तो दूर, उनसे पूछ-ताछ करना भी जरूरी नहीं समझा।  आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा है कि इस फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए कि आतंकवाद के ऐसे तमाम मामलों में जिनके फैसलों पर मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक समूहों के तरफ से सवाल उठाये जाते रहे हैं, उन फैसलों की समीक्षा के लिये एक अलग न्यायिक समीक्षा आयोग का गठन करे ताकि न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ सके।

धार्मिक आधार पर भेदभाव के लिये अवाम से सर्वोच्च न्यायालय माँगे माफी-रिहाई मंच

फाँसी की सजा के खात्मे की दिशा में ऐतिहासिक पहल है यह फैसला- मो. शुऐब
अदालतें भी साम्प्रदायिक आधार पर ठीक उसी तरह व्यवहार करती हैं जैसे साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी सरकारें।
लखनऊ 19 फरवरी 2014। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों की फाँसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील किये जाने के फैसले का स्वागत करते हुये रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा है कि भारत में फाँसी जैसी बर्बर व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक पहल है, जो देश को दुनिया के उन आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देशों की कतार में खड़ा कर सकता है जहाँ फाँसी की व्यवस्था को बर्बर और अमानवीय मानते हुये बहुत पहले ही खत्म किया जा चुका है। लेकिन, अच्छा होता कि इसकी शुरुआत संसद पर हुये हमले के कथित आरोपी अफजल गुरू के मामले से ही कर दी गयी होती, जिसकी पूरी घटना में संलिप्तता और उसे सुनाये गये फाँसी के फैसले पर भी कई न्यायविदों और मानवाधिकार समूहों द्वारा गम्भीर सवाल उठाये जाते रहे हैं।
रिहाई मंच के प्रवक्ताओं राजीव यादव और शाहनवाज आलम ने कहा कि अफजल गुरू जिसे संसद हमले का आरोपी बताया गया था और जिसमें एक भी संसद सदस्य की मौत नहीं हुयी थी, को सिर्फ ’जनता की सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिये’ फाँसी की सजा और राजीव गाँधी जो पूर्व प्रधानमन्त्री और संसद सदस्य थे, की हत्या के आरोपियों के फाँसी के फैसले को उम्रकैद में तब्दील करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का धर्म आधारित पक्षपातपूर्ण और साम्प्रदायिक रवैया साफ उजागर हो जाता है। जिससे कश्मीरियों और आम भारतीय मुसलमानों में यह संदेश जाता है कि अदालतें भी साम्प्रदायिक आधार पर उनके साथ ठीक उसी तरह व्यवहार करती हैं जैसे साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी सरकारें।
प्रवक्ताओं ने राजीव गाँधी के हत्यारों की फाँसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के बाद सर्वोच्च अदालत को अफजल गुरू के परिजनों, कश्मीरियों और पूरे देश के इंसाफ पसंद लोगों से सार्वजनिक माफी माँगने की मांग की ताकि, धर्मनिरपेक्ष आधार पर न्याय और इंसाफ की दिशा में देश एक नयी पहल कर सके। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत का दोषियों के प्रति धर्म के आधार पर यह भेदभाव नरेन्द्र मोदी के गुजरात 2002 दंगे में निभायी गयी उस भूमिका से बिल्कुल अलग नहीं है जिसमें उन्होंने दंगे के आरोप में पकड़े गये मुसलमान आरोपियों पर पोटा लगाया था और हिन्दू आरोपियों पर मामूली आपराधिक धाराएं। या जिस तरह एन.आई.ए बिना ठोस सबूतों के आतंकवाद के आरोप में निर्दोष मुसलमानों को आरोपी बना रही है लेकिन, असीमानन्द द्वारा कई बार यह बताने के बावजूद कि देश में हुये कई आतंकी हमलों में आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत, इन्द्रेश कुमार और सांसद योगी आदित्य नाथ की भूमिका थी, को एक बार भी गिरफ्तार करना तो दूर, उनसे पूछ-ताछ करना भी जरूरी नहीं समझा। 
आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा है कि इस फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए कि आतंकवाद के ऐसे तमाम मामलों में जिनके फैसलों पर मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक समूहों के तरफ से सवाल उठाये जाते रहे हैं, उन फैसलों की समीक्षा के लिये एक अलग न्यायिक समीक्षा आयोग का गठन करे ताकि न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ सके।

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