पीपीपी गुजराती विकास कामसूत्र का नया अध्याय- विनिवेश का नया तरीका लाने की तैयारी

शिकारी शार्क मछलियां निगल रहीं समुंदर, कंपनियां होंगी बेदखल अब और विदेशी होगा खुदरा कारोबार
खुदरा कारोबार में मल्टी ब्रांड एफडीआई और ईटेलिंग के ईकामर्स माध्यमे एकमुश्त कृषि और कारोबार को खत्म कर देने की जुगत है
पलाश विश्वास
विनिवेश का नया तैयारी लाने की अब तैयारी है क्योंकि बैंकिंग, बीमा और सारे सरकारी उपकरमं के बेसरकारी करण पूरा हुए बिना सारे संसाधनों का बंदर बांट असंभव है।
केसरिया कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर जियानी धर्मोन्मादी राजकाज की सर्वोच्च प्राथमिकता इसीलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विनिवेश हैं। इसी बंदोबस्त के तहत शिकारी शार्क मछलियां निगल रहीं समुंदर, कंपनियां होंगी बेदखल अब और विदेशी होगा खुदरा कारोबार।
न खेत बचेंगे और न बचेगा कारोबार।
बचेगा कबंधों का हुजूम और बचेगा राजनीति व्यापार।
अरबपति बचेंगे, मारे जायेंगे बाकी सारे लोग,
चाहे अब हो करोड़ों का कारोबार।
खुदरा कारोबार में मल्टी ब्रांड एफडीआई और ईटेलिंग के ईकामर्स माध्यमे एकमुश्त कृषि और कारोबार को खत्म कर देने की जुगत है।
छोटे व्यापारियों ने खुदरा क्षेत्र में बड़े औद्योगिक घरानों के प्रवेश के मद्देनजर बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए आम बजट में इस क्षेत्र पर एक विनियामक गठित करने की मांग की है। तो इसी के मध्य सीमा तोड़कर खुदरा वर्चस्व की होड़ मची है।
आम आदमी पार्टी सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार की ओर से राष्ट्रीय राजधानी में बहु ब्रांड खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को दी गई मंजूरी के फैसले को खारिज कर दिया तो सर आंखों, पलक पांवड़े पर बिठाकर उसकी कदमबोशी कर रहे सत्ता तबके ने उस अर्श से फर्श पर गिरा दिया और उसकी तो कमर ही तोड़ दी गयी।
डालरनत्थी सर्वनाशी अर्थव्यवस्था का पेंडुलम डोल रहा है और शिकारी शार्क मछलियां शिकार पर निकली समुंदर निगल रही हैं, बड़ी छोटी मछलियां बेखबर हैं क्योंकि बाजार के पैमाने और तथ्य सांढ़ संस्कृति के मुताबिक तिलस्मी भी हैँ और दिलफरेब भी।
हालांकि शार्क मछलियों का हश्र भी काले अफ्रीकी गैंडों जैसा हो सकता है। काले अफ्रीकी गैंडों का तो शिकारियों ने लगभग पूरी तरह से सफ़ाया कर दिया है। अब ऐसे गैंडे कुछ अफ्रीकी देशों के राष्ट्रीय उद्यानों में संरक्षित क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। शायद, कुछ वर्षों के बाद, शार्क मछलियों की कुछ प्रजातियों को एक्वैरियम में ही देखा जा सकेगा। हर साल लाखों शार्क मछलियों का शिकार किया जाता है। चीन और कुछ अन्य एशियाई देशों में शार्क मछलियों के परों से पके शोरबे की बड़ी मांग है। वैज्ञानिकों ने इन शार्क मछलियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए इन्हें पकड़ने के काम पर कुछ पाबंदियाँ लगाने के लिए अपनी आवाज़ उठाई है।
लेकिन यह आम लोगों की कथा व्यथा जैसी ही पर्यावरण जीवनचक्र की तस्वीर है खूनी नरभक्षी शार्कों के एकाधिकारी वर्चस्व की कथा किंतु अलग है।
इसीलिए बाघों और शार्क मछलियों के विलुप्त हो जाने की कथाओं के मध्य भारतीय मुक्त बाजार व्यवस्था में शिकारी शार्क मछलियों का यह बिंब विरोधाभासी लग सकता है।
हमारे अग्रज आनंद स्वरुप वर्मा ने नेपाल में नरेंद्र मोदी की विलक्षण वाक् शैली का अद्भुत नजारा पेश करके बताया है कि पर्यावरण बंधु बाघ कैसे नरभक्षी हो जाते होंगे। तो युवा तुर्क अभिषेक श्रीवास्तव ने ग्राउंड जीरो से केसरिया सत्ताकाल का जो लेखाजोखा अब तक का पेश किया है, वह विपरीतधर्मी विरोधाभासों का पुलिंदा ही हैं।
इसीके मध्य आनंद तेलतुंबड़े ने शैफरन निओलिबरिलज्म पर ईपीडब्लू में लिखा है और हम उसकी हिंदी जल्दी पेश करने वाले हैं।
हालीवुड फिल्मों में नरभक्षी शिकारी शार्क मछलियों की धूम है। तो भारतीय डालर उपनिवेश में इन्ही शार्क मछलियों का राज अब निरंकुश होता जा रहा है।
न खेत बचेंगे और न कारोबार।
मुद्दे पर आयें। आज ही बंगाल में पीपीपी माडल गुजरात के तहत निरंकुश प्रमोटर राज के लिए नई शहरीकरण नीति जारी की गयी है और सरकारी गैरसरकारी जमीन पर आवासीय व्यवसायिक निर्माण के लिए प्रोमोटरों बिल्डरों को थोक भाव से छूट दी गयी है। कहा जा रहा है कि इससे आवास की समस्या खत्म हो जायेगी। हर सर के साथ छत नत्ती हो जायेगी।
कहा जा रहा है कि इस तरह घास को बढ़ने की इजाजत है और गधों को चरने की भी इजाजत। प्रोमोटरों के अपने प्रोजेक्ट में जलाशय वगैरह डालने होंगे तो टैक्स म्युटेशन वगैरह में भी इफरात छूट।
इसपर हम बाद में चर्चा करते रहेंगे।
केसरिया कारपोरेट पद्मप्रलय जारी रखने के लिए संघ परिवार अब सत्तापक्ष के अलावा विपक्ष की भूमिका भी हाईजैक करने लगा है। कांग्रेस का मामला यह जाहिर है ही नहीं।
जिस पार्टी में माताजी अध्यक्ष, पुत्र उपाध्यक्ष, बेटी निकट भविष्य में महासचिव और शायद दामादजी कोषाध्यक्ष हों, उस पार्टी के अंधभक्तों को छोड़कर बाकी किसी को उससे किसी तरह की विपक्षा भूमिका की उम्मीद है तो हैरत होगी।
उत्तराखंड की उलटबांसी में उपचुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक में ढहतीं केसरिया दीवारों से भी हालात बदलेंगे नहीं और इसका इंतजाम यूपी में हो रहे अविराम दंगों के दुश्चक्र से जाहिर है। गुजरात विशेषज्ञों को राजनीतिक  खेल में मात देना शाही जमाने में असंभव ही है।
गौर करने वाली बात है कि अंतरराष्ट्रीय वैश्विक संगठनों से भारत में जनांदोलनों, पर्यावरण और जनअधिकारों से जुड़े बवालिया गैर सरकारी संगठनों यानि एनजीओ को फंडिग पर रोक भारतीय विदेशनीति और राजनय का मुख्य कार्यभार है क्योंकि अब प्रधानमंत्री और भारत सरकार के पोर्टल से केसरिया एनजीओ नेटवर्क तैयार हो रहा है। आप राय बतायें। परियोजना बनायें।
ग्राउंड वर्क करें और देशी विदेशी फंडिग का पूरा इंतजाम रहेगा।
ताजा उदाहरणः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध किया है। संघ ने कहा है कि अगर सरकार ने इस आशय का विधयेक पेश किया तो वह अन्य यूनियनों के साथ तत्काल हड़ताल करेगा।
देखते रहिये अब कि बीएमएस सहित विभिन्न केंद्रीय श्रमिक यूनियनों की सात अगस्त को बैठक होगी जिसमें बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा बढ़ाने के मुद्दे तथा श्रम कानूनों में प्रस्तावित सुधारों पर आगे के कदम का फैसला किया जाएगा। आपमें प्रतिरोध विरोध का दम तो है नहीं, उनके भरोसे बैठे रहिये, सर गढ़ाकर शुतुरमुर्ग की तरह। लेकिन समझ लीजिये कि यह पैट्रियट मिसाइल प्रतिरोधक इसलिए क्योंकि इंश्योरेंस बिल पर तनातनी बढ़ गई है।
इंश्योरेंस में एफडीआई के मुद्दे पर विपक्ष भी बंट गया है। समाजवादी पार्टी का कहना है कि वो शुरू से ही एफडीआई का विरोध कर रहे हैं। बीजेपी के करीबी समझे जाने वाले एआईएडीएमके ने कांग्रेस का साथ देने का फैसला किया है। उधर यूपीए के घटक एनसीपी ने इंश्योरेंस बिल का समर्थन किया है।
वहीं अगर सरकार इस बिल को अपने आप पास नहीं करा पाती है तो संसद के संयुक्त अधिवेशन का विकल्प खुला है। हालांकि सरकार के मुताबिक संयुक्त अधिवेशन की नौबत नहीं आएगी। फिलहाल एनडीए को राज्य सभा में 64 सीट हासिल हैं और बिल पास कराने के लिए 122 सीटें चाहिए। एनसीपी से 6 और बीजू जनता दल 7 के सहयोग से 13 वोट और मिल सकते हैं। वहीं एआईएडीएमके से सरकार को 11 वोट की उम्मीद है। इसी के चलते बीएसपी, एसपी मिली तो 24 वोट और मिल जाएंगे और बिल पास कराया जा सकेगा।
इसीतरह मुक्त बाजार व्यवस्था के खिलाफ चीखने चिल्लाने के लिए संघ परिवार का किसान आदिवासी आंदोलन, मजदूर महिला और छात्र युवा आंदोलन भी पूरे जलवे में हैं।
कोई आंदोलन नहीं है कोई आवाज बुलंद नहीं है मुक्त बाजार के खिलाफ नहीं, बाजारु हिंग्लिश के खिलाफ नहीं, नालेज इकोनामी के खिलाफ नहीं, बेइंतहा बेरोजगारी हायर फायर छंटनी और आटोमेशन के खिलाफ नहीं, न ही अविराम जारी बेदखली के खिलाफ, न ही प्रतिरक्षा से लेकर मीडिया और खुदरा बाजार  तक में एफडीआई के खिलाफ, न बेसरकारीकरण और विनिवेश के खिलाफ, न विनियंत्रण और विनियमन के खिलाफ और न ही डालर प्रभुत्व के खिलाफ कोई मुद्दा है इस प्रायोजित मुख्य विपक्ष के लिए।
लेकिन इस फर्जी मुद्दों और फर्जी आंदोलन में सभी रंग केसरिया में सरोबार हैं और सभी झंडे खून से सराबोर हैं।
उनका विरोध मातृभाषा को प्राथमिकता देने वाली त्रिभाषा फार्मूला को सिरे से खत्म करने पर भी नहीं है।
सीसैट के तहत संपर्क भाषा क्रांति की दिशा में धकेली जा रही है युवा पीढ़ी।
अंग्रेजीपरस्त सत्ता तबके के सारे हित साधते हुए अंग्रेजी भाषा के खिलाफ धर्मोन्मादी जिहाद की घोषणा है। यह हिंदी प्रेम भी नहीं है। सत्ता से नत्थी हिंदी में राजकाज भी उतना ही जनविरोधी है जितना अंग्रेजी। हिंदी में जो धर्मोन्मादी केसरिया तड़का है, वह तो अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं में अनुपस्थित है।
इसी हिंदी प्रेम की आड़ में सत्तावर्ग ने लेकिन जनसंहारी नीति निर्माण की सूचनाएं सिरे से गायब कर दी हैं। संसद का बजट सत्र है और जनता के मुद्दे पर संसद के भीतर बाहर समानधर्मी सन्नाटा है।
आदिवासियों को जल जंगल जमीन आजीविका से उजाड़ने वाले सलवाजुड़ुम वर्ग का आंदोलन है आदिवासियों के धर्मांतरण के खिलाफ।
यह सबकुछ अरबपति वर्ग के उमड़ते हुए वर्णनस्ली वर्चस्व के विरुद्ध खंड खंड अस्मिता आंदोलनों के बहुपरिचित भंवर जैसा है, जिसका ग्लोबीकरण, उदारीकरण और निजीकरण से कोई विरोध है ही नहीं।
मसलन, तेलंगना अस्मिता के मध्य आंध्र का विभाजन हो गया और तेलंगाना आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत के धारक वाहक उत्तराधिकारियों ने वहां सत्ता की कमान धारण कर ली वैसे ही जैसे बंगाल में वाम अवसान के बाद मां माटी मानुष की सरकार ने।
जैसे कि बंगाल में माटी का धंधा अब धरती उगले सोना ही सोना है, उसी तरह तेलंगना से कृषि जीवी लोगों के हक हकूक बहाल होने की कोई खबर फिलहाल नहीं है। न तेलंगना महाविद्रोह के समय की तरह आदिवासी इलाकों में जारी निजाम के कायदे कानून खत्म होने के आसार हैं।
तेलंगाना से ताजा खबर यह है कि अलग राज्य बन जाने के बाद वहां सौ किसानों की जानें चलीं गयीं कृषि संकट की वजह से।
पवार समय का कारपोरेट दुष्काल खत्म हो जायेगा देश में दसों दिशाओं में पद्म प्रलय से और चुनावी विज्ञापनों की और से आसमान से अच्छे दिन बरसेंगे मूसलाधार ऐसा प्रचार अभियान लेकिन अब भी जोरों पर है।
दूसरी ओर, सलवा जुडुम भूगोल से और सघन बेदखली की खबर ब्रेक हुई है। छत्तीसगढ़ में 4 अल्ट्रा मेगा इस्पात संयंत्रों की स्थापना की जाएगी।
जाहिर है कि यह भी पीपीपी गुजराती विकास कामसूत्र का नया अध्याय है, जिसके पन्ने हर राज्य में हर क्षेत्र में और सीमाओं के आर पार खुल रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल में भी।
यह विकास है या नंगा युद्धोन्माद या थोक रक्षा सौदों की तैयारी या प्रितरक्षा में विदेशी पूंजी बेइंतहा झोंकने का स्थाई बंदबस्त है यह,ऐसा हम फिलहाल बता नहीं सकते।
दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों की बेसब्र कारपोरेट वकालत की जेटली चिदंबरम युगलबंदी है तो दूसरी हरित क्रांत की बुलेट ट्रेन भी निकल पड़ी है भारतीय जनगण को रौंदने के लिए।
हम पहले ही पीपीपी माडल के भूमि अधिग्रहण के बारे में लिखते रहे हैं और एफडीआई के इंटरनेशनल नार्म के बारे में।
दूसरी हरित क्रांति से अभिप्राय है संपूर्ण रियल्टी प्रोमोशन क्रांति और कृषिजीवी तबके का सफाया।
बेशर्म तरीके से बताया जा रहा है कि मुक्तिकामी कृषिजीवी जनता की मुक्ति जीएम, यानि जिनेटिकेली मोडीफाइड बीजों में हैं और अमेरिका में इन बीजों के किसी दुष्प्रभाव के बारे में पता नहीं चला है।
मनसैंटा के खिलाफ जो जनविद्रोह है, उसे सिरे से ब्लैक आउट करते हुए डंके की चोट पर बीज क्रांति की तैयारी है संपूर्ण स्वदेशी।
जैसे केंद्र में श्रम संशोधन कानून पास होने से पहले ही राजस्थान में सारे श्रम संशोधन लागू कर दिये गये, ठीक उसी तरह बंगाल में पीपीपी गुजराती के मध्य निर्माण विनिर्माण के लिए भूमि लूट का पूरा इंतजाम कर दिया गया है सेजविरोधी सत्ताकाल में।
फ्लिपकर्ट, अमेजन, स्नैप डील और वालमार्ट वे शार्क मछलियां हैं, जो लगती बेहद आकर्षक और निरीह हैं, लेकिन जिनकी आदतें नरभक्षी हैं। इनमें आपस में मारामारी प्रबल है। जो जाहिरा तौर पर सत्तावर्ग का स्वाभाविक आचरण है।
एकाधिकारवादी वर्णनस्ली वर्चस्व के साथ साथ कारपोरेट प्रतिद्वंद्विता का किस्सा हरिकथा अनंत है।
याद करें, सत्तर अस्सी के दशक में नुस्ली वाडिया और धीरुभाई अंबानी की प्रतिद्वंद्विता को तो सिंगुर छोड़ने के रतन टाटा के उस प्रेस कांफ्रेस को भी याद करें कि कैसे उन्होंने सिंगुर आंदलन की पृष्ठभूमि में कारपोरेट प्रतद्वंद्विता का आरोप लगाया था।
अब मुक्त बाजारी पृष्ठभूमि में कारपोरेट देशी विदेशी कंपनियों में सेक्टरवाइज वर्चस्व की हिस्सेदारी तय हो गयी है। मसलन तेल गैस में रिलायंस तो पोर्ट में अदाणी, इस्पात में टाटा तो माइनिंग में वेदांता का वर्चस्व निर्विवाद है।
टेलीकाम में वर्चस्व की लड़ाई बेहद घनघोर रही है और इसी का नतीजा नीरा राडिया टेप प्रकरण है।
इसी तरह आटो, ऊर्जा, इंफ्रा, बीमा, प्रतिरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा, औषधि और रसायन, रेलवे, विमानन, परिवहन, उपभोक्ता सामग्री, सौंदर्य प्रसाधन, मीडिया, मनोरंजन और बाकी तमाम सेक्टरों में भयानक मारामारी है। लेकिन खुदरा बाजार में जो कुरुक्षेत्र सजा है, उसमें अबकी दफा कुरु वंश के साथ पांडवों का सर्वनाश भी तय है।
गनीमत है कि अभी मल्टी ब्रांड सेक्टर में एफडीआई की इजाजत नहीं है लेकिन ईटेलिंग ईकामर्सके फंडे से पूरा खुदरा कारोबार और एक के साथ एक फ्री बतर्ज ईटेलिंग रिटेलिंग इंफ्रा के लिए भूमि अधिग्रहण निरंकुशका चाकचौबंद इंतजाम है।
अब फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, अमाजेन और वालमार्ट में जो आपसी प्रतिद्वंद्विता है वह टेक ओवर का गेस स्टार्टअप है। आवारा लपट पूंजी ईटेलिंग रिटेलिंग के जरिये खुदरा कारोबार की सारी देशी कपनियों के अलावा प्रतिद्वंद्वी दूसरी विदेशी कंपनियों को निगलने वाली हैं तो खेत भी नहीं बचेंगे।
गुजरात में तो कारपोरेट कंपनियों को सस्ती दरों पर जमीन देना ध्येय वाक्य है और ऐसा करिश्मा बंगाल में कामरेडों ने भी सालाना 1300 रुपये के बदले एक हजार एकड़ जमीन की गिप्ट टाटा मोटर्स की दी थी और उस जमीन पर परियोजना के लिए टाटा को बैंकों से दो सौ करोड़ रुपये महज एक प्रतिशत ब्याज पर मिला था।
सेज से लेकर स्मार्ट बुलेट तक टैक्स होलीडे का विस्तार है तो करों में छूट का सिलसिला जारी है लेकिन मनरेगा खारिज है और सब्सिडी भी समझ लीजिये खारिज है।
भारत में एकमुश्त कृषि आजीविका जल जंगल जमीन नागरिकता और कारोबार हड़पने के लिए अब शार्क मछलियां शिकार पर निकली हैं। बीमा, खुदरा बाजार और बैंकिंग सेक्टर में विनिवेश और एफडीआई का एजंडा पूरा हो जाये तो गरीबों की क्या औकात, जो मध्य वर्ग है, उच्च मध्य वर्ग है, वह भी एअर इंडिया बने जाने को है। सामाजिक समता, समरस, डायवर्सिटी, सामाजिक न्याय का यह केसरिया एजंडा है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर को पढ़कर अंदाजा लगाये कि परिभाषाओं और पैमाने बदल देने से विकास का गल्प किस तरह लहलहाने लगता है।
[author image=”https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSD_Jo0EyzC-_V8xGBjC_ijNo1ruhcPFFy7Bo-fRkLBQR-nQfk_NMMNrUs” ]पलाश विश्वास। लेख

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