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Margot Honecker, born in 1927, former minister of education of the German Democratic Republic and widow of longtime Socialist Unity Party (SED) Secretary General and GDR State Chairperson Erich Honecker (1912-1994)
Margot Honecker, born in 1927, former minister of education of the German Democratic Republic and widow of longtime Socialist Unity Party (SED) Secretary General and GDR State Chairperson Erich Honecker (1912-1994) - Photo with courtesy - https://www.workers.org

पूँजीवाद और समाजवाद का मिलन उतना ही मुश्किल, जितना आग और पानी का मिलना-Margot Honecker

Interview with the GDR’s Margot Honecker — ‘The past was brought back’

89 वर्षीय कामरेड मार्गोट होनेकर; पूर्वी जर्मनी नेता एरिक होनेकर की बेवा हैं, पूर्वी जर्मन की पूर्व शिक्षा मंत्री जो आजकल चिली में स्व निर्वासित जीवन बिता रही हैं। उनका साक्षात्कार बहुत सारी बातों की निशानदेही करता है, इस दुर्लभ साक्षात्कार को समकालीन इतिहास में रुचि रखने वालों को जरूर पढ़ना चाहिए, पढ़िए और सोचिए, बर्लिन दीवार तोड़ने का सच और उसके पीछे के सच को. जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (जीडीआर) में 1989 में प्रतिक्रांति से संबंधित, उसके पराभव के बाद पूँजीवादी बदनिजामी की वापसी, वैज्ञानिक विश्व दृष्टिकोण को बनाये रखना और इजारेदारियों की तानाशाही के खिलाफ ग्रीक अवाम का संघर्ष।

Margot Honecker का साक्षात्कार। हिंदी अनुवाद किया है साथी कामता प्रसाद ने। 

माज़ी को फिर से हाजिर कर दिया गया कोई भी इसे “क्रांति” का नाम नहीं दे सकता।–

Margot Honecker संघर्ष करने वाले हार सकते हैं – लेकिन जो संघर्ष ही नहीं करते पहले ही हारे हुए होते हैं

साक्षात्कार : By Antonis Polychronakis

1927 में  जन्मी जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य की पूर्व शिक्षा मंत्री और सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी (एसईडी) के लंबे समय तक महासचिव और जीडीआर के अध्यक्ष रहे Erich Honecker (1912-1994) की बेवा Margot Honecker ने Santiago de Chile के निकट अपनी खुद की चुनी गयी निर्वासन की जगह से लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं की थी। तथापि, अक्टूबर में Athenian और Macedonian समाचार एजेंसी (ANA-MPA) ने अत्यधिक संक्षिप्त रूप में निम्नलिखित साक्षात्कार को प्रकाशित किया

(यहाँ प्रकाशित बड़े संस्करण को ग्राहकों के लिए सुरक्षित रखा गया था)।

जर्मन रोजनामचे Junge Welt ने एकमात्र जर्मन जबान में मुकम्मल साक्षात्कार को प्रकाशित किया और भला हो ग्रीक सहयोगियों का जिन्होंने मुद्रित करने की अनुमति प्रदान की।

वर्कर्स वर्ल्ड Junge Welt और ग्रीक पत्रकारों के प्रति इस साक्षात्कार को प्रकाशित करने की अनुमति देने के लिए आभार व्यक्त करता है, जिसमें जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के अतीत और 1945 से लेकर 1989 तक दो समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच वर्ग संघर्ष की अगली कतार पर उसकी अवस्थिति के बारे में काफी जानकारी दी गयी है।

Translation from German by Greg Butterfield and John Catalinotto.

Antonis Polychronakis : 1989 की घटनाएं किस प्रकार से घटित हुईं? आप और आपके जीवन-साथी ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें किस रूप मे लिया?

Margot Honecker : अगर आपका तात्पर्य “1989 की घटनाओं”, उस वर्ष के पराभव, और विशेष रूप से जीडीआर की घटनाओं से है, जिनका वर्णन मैं प्रतिक्रांति के रूप में करती हूँ, तो हमें उसके बारे में किताब लिखनी चाहिए। और वास्तव में कई पहले ही लिखी जा चुकी हैं। संक्षिप्त उत्तर के साथ उनका पर्याप्त रूप से वर्णन नहीं किया जा सकता। संभवतः केवल यहः विदेशी एवं आंतरिक कारकों के बीच वस्तुगत संबंध था। रीगन काल की शस्त्रों की होड़ ने सोवियत संघ को उसके वांछित उद्देश्य तक पहुँचने के लिए मजबूर कियाः सोवियत संघ ने अपने को चरम सीमा तक हथियारों से लैस कर लिया।

इसके फलस्वरूप सोवियत संघ पर पड़े आर्थिक बोझ ने देश में गंभीर सामाजिक अव्यवस्थाओं को जन्म दिया, जिसका अर्थ यह निकला कि समाजवादी शिविर की अग्रणी शक्ति अपनी घरेलू एवं विदेश नीति की जिम्मदारियों के साथ न्याय नहीं कर पायी। सोवियत संघ ने सुधारों के जरिये अपने हालात पर फिर से काबू पाने का प्रयास किया और शुरू-शुरू में भलीभाँति निर्दिष्ट थे।

लेकिन शीघ्र ही तथाकथित सुधारकों ने राजनीति एवं अर्थशास्त्र की केंद्रीय आधारशिलाओं पर कब्जा जमा लिया और आर्थिक तबाही एवं समाज को अस्थिर बनाने की तरफ आगे बढ़ चले। इसका अंतिम परिणाम समस्त सोवियत उपलब्धियों को समर्पित करने के रूप में सामने आया। केवल पश्चिमी देशों ने ही इन परिवर्तनों की प्रशंसा नहीं की। बल्कि, जीडीआर के पड़ोसी कुछ समाजवादी मुल्कों में भी “सुधारवादी’’ सक्रिय थे और उन्हें पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल था। जीडीआर इस वैश्विक टकराव में शामिल था।

आखिर में, यह समाजवादी समुदाय का हिस्सा था। और 1980 के दशक में जीडीआर को अपनी आर्थिक नीतियों को विकसित करने या उसमें सुधार लाने की जरूरत का भी सामना करना पड़ा।

सामाजिक जीवन में आपूर्ति, घाटों में कमियाँ थीं, जिन्होंने असंतोष को जन्म दिया। हमने अपना गृहकार्य सदैव समुचित रूप से नहीं किया – आंशिक रूप से अपनी खुद की अक्षमता के कारण, आंशिक रूप से हमें अवरूद्ध कर दिया गया था।

जाहिरा तौर पर, हम लोगों को यकीन दिलाने और शोषण, दमन एवं युद्ध पर आधारित पूँजीवादी समाज की तुलना में हमारे द्वारा हासिल की गयी वास्तविक सामाजिक प्रगति से प्रति उन्हें सचेत करने में विफल रहे।

जीडीआर में बहुत से लोग यह मानकर चल रहे थे कि वे पूँजीवाद के तहत वस्तुओं की जगमगाती दुनिया और समाजवाद की सामाजिक सुरक्षा को एक साथ प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन, जैसा कि Erich Honecke ने विभिन्न भाषणों में कहा कि पूँजीवाद और समाजवाद का मिलन उतना ही मुश्किल है, जितना कि आग और पानी का मिलना। हमने व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव किस प्रकार से किया? उन समस्त लोगों के मुस्तक़बिल के लिए सरोकार के साथ, जिन्होंने इस पुरअमन लोकतांत्रिक गणराज्य का अपने श्रम से निर्माण किया था, जिसने फासीवादी युद्ध और नाजी विचारधारा के ध्वंसावशेषों से शुरू करके मुश्किल रास्ते को अपनाया था।

और व्यक्तिगत रूप से अक्टूबर में अपने इस्तीफे के बाद मेरे पति अपने समस्त राजनीतिक कार्यों से मुक्त हो गये। मैंने जीडीआर की मंत्रिपरिषद के नवंबर की शुरुआत में इस्तीफे से भी पहले राष्ट्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आप पूर्वी जर्मनों के “उभार”, जैसा कि उसे पश्चिम में कहा जाता है, की व्याख्या किस प्रकार से करती हैं।

Margot Honecker : यह “उभार” नहीं था। प्रदर्शन तो हो रहे थे, लेकिन श्रमिक अपने काम पर जा रहे थे, बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे, सामाजिक जीवन बदस्तूर जारी था। 1989 के पतझड़ में सड़कों पर उतरने वाले अधिकतर लोग अपना असंतोष जाहिर कर रहे थे। वे परिवर्तन और सुधार चाहते थे। वे बेहतर जीडीआर चाहते थे। वे इसके खात्मे के लिए प्रदर्शन नहीं कर रहे थे। यहाँ तक कि विपक्ष भी यह नहीं चाहता था। इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि विपक्ष के भीतर भी दुश्मनाना ताकतें थीं, जो मुख्य रूप से चर्च के झंडे तले जमा हुईं।

यह स्पष्ट है कि जर्मन संघीय गणराज्य (एफआरजी, पश्चिमी जर्मनी-जुंग वेल्ट ) – असंतुष्ट लोगों को छल-नियोजित करने और अंततः बेहतर जीडीआर के लिए आंदोलन को आगे ले जाने नें सफल रहे। हम “अवाम हैं!” की चीख-पुकार से यह “हम सब एक हैं!” में बदल गया। इस प्रकार से, उन्हें वह चालक-शक्ति प्राप्त हो गयी, जिसे वे जीडीआर के वजूद की शुरुआत से तलाश रहे थे, जो कि पूर्वी जर्मनी के नागरिकों को “मुक्त” करने का उनका घोषित इरादा था।

इसकी बाबत, हमें याद रखना चाहिएः जर्मन पूँजी एवं उसकी चाकरी करने वाले नेताओं के साथ मिलकर काम करने वाली पश्चिमी ताकतों ने सबसे पहले जर्मनी को विभाजित किया और फिर जर्मन संघीय गणराज्य को पवित्रता का चोला पहनाया। जो कि 1945 में चार विजयी शक्तियों के पोट्सडैम समझौते में निहित अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रावधानों के बोध का नकार था, जो एकीकृत लोकतात्रिक जर्मनी को आवश्यक बनाता था।

हम यानि कि जर्मनी की समस्त प्रगतिशील ताकतें चाहती थीं कि समूचा जर्मनी लोकतांत्रिक, फासीवाद विरोधी राज्य बने। हमने कभी भी इस लक्ष्य को आंखों से ओझल नहीं होने दिया, पर इसे प्राप्त करने में विफल रहे। इसके फलस्वरूप जीडीआर की स्थापना हुई।

दोबारा बुलंदी पर पहुँचे जर्मन साम्राज्यवाद ने हर तरह से इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी और 1989 में उसे दूसरी जर्मनी जीडीआर को खत्म करने का अवसर नजर आया। 40 सालों से वह ऐसा करने में विफल रहा था। हमारे साथ गँठजोड़ करने वाला सोवियत संघ जब जीडीआर से अलग हो गया तभी जाकर संघीय गणराज्य सफल हुआ।

1989 में जिस बात ने पलीता लगाने का काम किया, वह थी जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिकों का संघीय जर्मन गणराज्य की तरफ बढ़ती हुआ पलायन। पश्चिमी ताकतों ने इसे गति प्रदान करने की हर मुमकिन कोशिश की।

हम बिल्कुल शुरू में यात्रा की पाबंदियों को आसान बनाने की योजना को कारगर बना पाने सफल नहीं रहे।  यहाँ तक कि 1989 से पहले भी नागरिक पश्चिमी जर्मनी जा रहे थे, जिसने अत्यधिक शिक्षित लोगों से संपर्क किया और उन्हें भर्ती किया। पश्चिम जर्मनी जाने के उद्देश्य अलग-अलग थे।

बेशक, उपभोक्तावाद के आकर्षण और मुक्त यात्रा ने अहम भूमिका निभायी। पश्चिमी जर्मनी के प्रचार ने कभी भी यह दावा करने की कोशिश नहीं की कि जीडीआर को छोड़ने वाले लोग समाजवाद के खिलाफ पुरजोर तरीके से खड़े थे।

तथापि, 1990 से लेकर अब तक 30 लाख लोग पूर्वी जर्मनी से यहाँ आ चुके हैं, हालांकि अब दोनों ही जर्मनी के राजनीतिक हालात एक जैसे हैं। क्यों? जीडीआर में कोई खून-खराबा नहीं हुआ, कोई गृह-युद्ध नहीं छिड़ा, किसी तरह की गरीबी या दुख-दैन्य नहीं था, जबकि इन्हीं कारणों के चलते आज मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया – डबलयू डबलयू) या अफ्रीका में अपना घर-बार छोड़कर लाखों लोग यूरोप का रुख कर कर रहे हैं।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: पश्चिम जर्मनी में इसका उल्लेख “शांतिपूर्ण क्रांति” के रूप में किया गया, लेकिन समाजवादी राज्य में “क्रांति” संभव ही कैसे हो सकती है?

Margot Honecker : क्रांति, जैसा कि मैंने उसे समझा है, सामाजिक संबंधों में आमूलचूल बदलाव एवं शोषण तथा दमन से अवाम की मुक्ति को लक्षित गंभीर सामाजिक उथल-पुथल है। इस लिहाज से, 1917 में प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी संबधों पर विजय पाना या जर्मनी में सोवियत संघ के कब्जे वाली पट्टी में 1945 में फासिस्ट विरोधी जनतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण, क्रांतियां थीं। पूँजी की ताकत को अवाम के ऊपर हुकूमत को जारी रखने से महरूम कर दिया गया।

अगर सामाजिक एवं उत्पादन के संबंधों को उलट दिया जाता है, जिन पर पहले विजय प्राप्त कर ली गयी थी, इस तरह से जो कुछ घटित हुआ उसे क्रांति के रूप में नहीं लिया जा सकता है। इसके विपरीत यह प्रतिक्रांति थी।

आपको मैं याद दिलाती चलूं कि समाजवादी जीडीआर यूरोप में शांति की गारंटी था। उसने कभी भी अपने बेटों एवं बेटियों को युद्ध में नहीं भेजा। तथापि, जर्मन संघीय गणराज्य खूनी युद्ध में शामिल हुआ, जिसे कि अमेरिका और नाटो ने पूरी दुनिया में भड़काया था। फ्रांसीसी समाजवादी Jean Jaurès (1859-1914–JW) ने इस संबंध को चिह्नांकित किया हैः “पूँजीवाद स्वंय अपने भीतर युद्ध को लेकर चलता है, जैसे कि बादल वर्षा को।” और केवल यही नहीं।

पूँजीवाद स्वयं फासीवाद के बीज को भी अपने भीतर समाये रहता है। हमने जीडीआर में युद्ध और फासीवाद की आर्थिक जड़ों का उन्मूलन कर दिया था। देश का पश्चिमी हिस्सा पूँजीवादी बना रहा। 1990 में, जीडीआर को इस समाज ने निगल लिया, जिसने जर्मन इतिहास में इतनी हानि पहुँचायी थी। माज़ी को फिर से हाजिर कर दिया गया कोई भी इसे “क्रांति” का नाम नहीं दे सकता।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आपके ख्याल से, मिखाइल गोर्बाच्येव [सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महासचिव] इस घटनाक्रम में किया भूमिका अदा की?

Margot Honecker : कुछ वर्ष पहले, गोर्बाच्येव ने अंकारा में व्याख्यान के दौरान कहा कि उन्होंने 1985 में साम्यवाद पर विजय प्राप्त करना शुरू कर दिया था।  आप उस पर यकीन करें या न करें। यह साफ है कि अपनी नीति के साथ उन्होंने उसे बेधड़क दाँव पर लगा दिया, जिसे सोवियत संघ और दूसरे समाजवादी देशों ने बड़ी कुर्बानी देकर सृजित किया था।

सोवियत संघ के दृष्टिपटल से गायब हो जाने पर दुनिया बदलकर और खूबसूरत नहीं हो गया। घमासान युद्ध, हिंसा और आतंकवाद एजेंडे पर था। गोर्बाच्येव के कार्य के बारे में इतिहास का फैसला सकारात्मक नहीं होगा।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: 9 नवंबर 1889 को “फासिस्ट-विरोधी हिफाज़ती दीवार”, बर्लिन दीवार को, जिसे पश्चिमी जर्मनी सीमा कहता था, गिरा दी गयी। इस वर्ष “जर्मन एकता” की 25वीं सालगिरह का जश्न मनाया गया। क्या 1961 में दीवार का निर्माण आवश्यक था या एक गलती था?

Margot Honecker : “दीवार” का निर्माण आवश्यक था क्योंकि नहीं तो युद्ध हो जाता। वैश्विक हालात तनावपूर्ण थे। अमेरिका ने आक्रामक ढंग से कार्रवाई की। इस बहाने की आड़ लेकर कि पूर्वी जर्मनी से खतरा है, उन्होंने अपनी सेना का और भी स्तरोनयन किया। क्यूबा पर विफल सैन्य आक्रमण [अप्रैल-डबलयू डबलयू] में अमेरिका ने बुरी तरह से मुँह की खायी।

द्वितीय विश्व के खात्मे के समय से बर्लिन अनसुलझे मसले से धधक उठा। आग के शोले निरंतर दहकते रहे।

जून 1961 में, ख्रुश्चेव और केनेडी नाभिकीय हथियारों के परीक्षणों की समाप्ति तथा जर्मनी के साथ शांति शंति एवं पश्चिम बर्लिन के मसले के हल पर समझौता वार्ता करने के लिए विएना में मिले। यहाँ पर टकराव पैदा हो गया। महाशक्तियों का लहजा तीव्र हो गया। सैन्य युद्धाभ्यास होने लगे। युद्ध की आशंका फिजाँ में तैरने लगी। और इस स्थिति में सीमा को बंद करना पड़ा।

यह जीडीआर की तरफ से उठाया गया कोई एक पक्षीय कदम नहीं था। यह सीमा दूसरे विश्वयुद्ध का परिणाम थी, जिसे जर्मन साम्राज्यवाद ने भड़काया था। पट्टी (कब्जेवाली) की सीमाओं के नियम का निर्णय 1945 की गर्मियों में विजयी शक्तियों के द्वारा किया गया। तथापि, पृथक जर्मन राज्य, एफआरजी के निर्माण (23 मई 1449 को – जेडबलयू), ने जर्मनी के विभाजन को मुकम्मल कर दिया और पश्चिमी पट्टियों एवं सोवियत संघ के कब्जे वाली पट्टी के बीच की हदबंदी राज्य की सीमा थी। तथापि, यह महज राज्य की सीमा नहीं थी, आंतरिक जर्मन सीमा की बात तो छोड़ ही दीजिए, जैसा कि इसे हमेशा पश्चिमी जर्मनी में कहा गया।

यह वार्सा संधि की पश्चिमी सीमा, पूर्वी जर्मनी का प्रतिरक्षा गठजोड़ और नाटो की पूर्वी सीमा थी। दुनिया में दो सर्वाधिक शक्तिशाली सैन्य गुट थे, जो कि शीत-युद्ध चला रहे थे।

1945 में चार विजयी शक्तियों को प्रदान किये गये उसके चार सेक्टरों के साथ सीमा बर्लिन से होकर जाती थी, शहर से होकर जाती थी। लेकिन बर्लिन में सीमा खुली हुई थी। लिहाजा, बर्लिन विजयी शक्तियों के मध्य खतरनाक टकरावों का विषय बना रहा, जो कि बर्लिन और जीडीआर के लिए हानिकारिक था।

वार्सा संधि के राज्यों के संचालक निकाय राजनीतिक सलाहकार समिति ने 1961 की ग्रीष्म ऋतु में तय कर लेने के बाद कि सैन्य टकरान को अब असंभव नहीं बनाया जा सकता, बर्लिन में सीमा को बंद करने का निर्णय लिया।

मैं ऐसा नहीं सोच सकती कि कोई भी संभावित तीसरे युद्ध का निवारण भूल थी। नाटो की अग्रिम पंक्तियों पर स्पष्ट दशाओं की निर्मिति और वार्सा संधि ने उस समय प्रारंभ में दोनों देशों के संबंध सुधारने को सुगम बनाया।

इसके फलस्वरूप यूरोप में सुरक्षा एवं सहयोग पर वार्ता हुई, जिसके अंतिम अनुबंध पर हेल्सिंकी में 1975 में हस्ताक्षर हुए, जिस पर जीडीआर के द्वारा भी हस्ताक्षर किये गये। यह महाद्वीप में सामूहिक सुरक्षा की प्रणाली को सृजित करने का प्रयास था। तथापि, जैसा कि आज हम देखते हैं कि सोवियत संघ के पतन और अमेरिका द्वारा नाटो के पूर्व की तरफ विस्तार को बढ़ाये जाने के साथ सुरक्षा ढाँचे को नष्ट कर दिया गया है।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आप और आपके पति ने सीमा खोले जाने को कहाँ से देखा?

Margot Honecker : अपने अपार्टमेंट से।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: क्या आपकी राय में (हाल ही में परलोक सिधारे सूचना विज्ञान एवं मीडिया राजनीति की एसईडी केंद्रीय समिति के भूतपूर्व महासचिव–JW) Günter Schabowski की सीमा को खोलने की घोषणा एक दुर्घटना थी या जैसा कि (पश्चिमी बर्लिन के भूतपूर्व मेयर –JW) Walter Momper ने बर्लिन के मेयर Erhard Krack के साथ एक साक्षात्कार के दौरान दावा किया था, इसके बारे में पहले से पता था अथवा यह नियोजित थी?

Margot Honecker : मुझे इसके बारे में कुछ पता नहीं है।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: बर्लिन दीवार पर मारे गये लोगों के बारे में आपका क्या कहना है?

Margot Honecker : हाँ, बर्लिन दीवार पर लोग मरे थे – शरणार्थी और जीडीआर सीमा के गार्ड्स। हिंसा में होने वाली हरेक व्यक्ति की मृत्यु खेदजनक है। गैरकानूनी ढंग से सीमा को पार करते समय मारे गये हरेक व्यक्ति तमाम लोगों में एक थे। इससे परिवारों के ऊपर आपदा का पहाड़ टूट पड़ा।

राजनीतिक नेताओं को युवाओं की मृत्यु पर उससे कम दुःख नहीं हुआ, जितना कि अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु पर होता, क्योंकि ये युवा स्वयं अपने जीवन के लिए अपनी जिम्मेदारी की प्रति सचेत नहीं थे या उन्हें पश्चिमी एजेंटों के द्वारा बहलाया-फुसलाया नहीं गया था, उन्होंने सीमा को गैर-कानूनी ढंग से पार करने के जोखिम को स्वीकार किया था।

1990 के बाद, सीमा-रक्षकों पर मुकदमा चलाया गया, हालांकि उन्होंने जीडीआर के कानून के अनुसार कार्रवाई की थी। यहाँ तक कि पार्टी एवं राज्य के पदाधिकारियों समेत नेताओं पर भी मुकदमा चलाया गया, जिन्होंने इस वजह से वर्षों नाजी जेलों में सजा भुगती थी और यातना शिविरों में रहे थे, कि वे फासीवाद के खिलाफ लड़े थे। उन्हें एफआरजी जस्टिस के द्वारा सजा सुनायी गयी, जिसने फासीवादियों को कभी भी उनके ओहदे से नहीं हटाया था।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: जीडीआर में क्या अच्छा था और “जर्मन धरती पर प्रथम समाजवादी राज्य” को बचाने के क्रम में समाजवादी सरकार ने कौन से अच्छे कदम उठाये थे?

Margot Honecker : इस राज्य में, प्रत्येक व्यक्ति का एक स्थान था। सभी बच्चों के लिए शिक्षा मुफ्त थी, उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण मिलता था या उन्हें आगे का पढ़ाई करवाई जाती थी और प्रशिक्षण के बाद उनके लिए काम की गारंटी थी। काम महज पैसा कमाने का जरिया होने से बड़ी चीज थी।

पुरुषों और औरतों को समान काम और कार्य-प्रदर्शन के लिए समान वेतन मिलता था। औरतों के लिए लिए महज कागजी नहीं थी। बच्चों एवं बुजुर्गों की देखभाल के लिए कानून बनाया गया था। चिकित्सा सेवा मुफ्त थी, सांस्कृतिक और मनबहलाव की गतिविधियाँ जेब पर डाका डालने वाली नहीं थीं। सामाजिक सुरक्षा अनिवार्य थी। भिखारियों एवं बेघरों का नामो-निशान नहीं था। एकजुटता का बोध था।

लोग न केवल अपने लिए जिम्मेदार महसूस करते थे, बल्कि साझे हितों के आधार पर तमाम लोकतांत्रिक निकायों में काम करते थे।

जीडीआर जन्नत नहीं था। ऐसी खराबियाँ थीं जो रोजमर्रा के जीवन को मुश्किल बनाती थीं, आपूर्ति में कमी थी और रोजमर्रा के राजनीतिक जीवन में कमियां थीं। विभिन्न स्तरों पर ऐसे निर्णय लिये गये,जिनमें जन-सरोकारों को लाजिमी तौर पर शामिल नहीं किया गया। तथापि, इस समय अधिकांश पूँजीवादी देशों में व्याप्त दशाओं की तुलना में यह स्वर्ग के करीब था।

जीडीआर में जीवन का अनुभव ले चुके ज्यादा से ज्यादा लोग इस बात को समझते हैं। 25 वर्षों के बाद, अब एक ऐसी पीढ़ी आयी है, जिसके पास जीडीआर की सजीव यादें नहीं हैं, क्योंकि तब वे बहुत छोटे थे। यह एफआरजी के एजेंडे के अनुकूल हैः इसके बारे में भूल जाइए।

जीडीआर का इतिहास जितना पुराना होता जाएगा, उतना ही उसके बारे में फैलाया गया झूठ बढ़ता जाएगा।

आपके प्रश्न पर वापस लौटते हैं। बदतर होते हालात को लेकर गंभीर मसलों के बारे में अगर हमने खुलकर अवाम से बात की होती तो हम काफी बेहतर काम कर सकते थे। आपको समस्या का हल करने के लिए उन्हें साथ लेकर चलना होगा। लेकिन उस समय व्याप्त परिस्थितियों में क्या हम जीडीआर को बचा सकते थे, इसे लेकर संदेह है।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: स्टासि के बारे में काफी कुछ कहा गया है। मजदूरों एवं किसानों के राज्य में उसके वजूद को किस प्रकार परिभाषित करती हैं?

Margot Honecker : सबसे पहलेः यह आवश्यक था। जर्मन धरती पर मजदूरों एवं किसानों का पहला राज्य पूँजीवादियों की आँखों का काँटा था। वे हर तरह से इसके खिलाफ लड़े।

प्रारंभ से ही, जीडीआर पर हमले होने लगे। आतंकवादी कार्रवाई से नहीं झिझकने वाले एजेंटों के द्वारा तोड़फोड़, घुसपैठ आम थी। दुनिया की सभी खुफिया सेवाओं ने बर्लिन को अपना अड्डा बना रखा था। Teufelsberg की पहाड़ियों (पश्चिमी जर्मनी की पहाड़ी, दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख निगरानी स्टेशन की जगह) से अमेरिकियों ने पूर्वी जर्मनी की हजारों किलोमीटर तक आहट ली।

जीडीआर ने राज्य सुरक्षा मंत्रालय की छतरी तले विदेशी खुफिया एवं प्रतिरक्षा को बनाये रखा। यह वैध एवं कानूनी संस्था थी, जिसका वजूद जमीन के दूसरे सभी देशों में है।

“स्टासि” को 1990 के बाद दानव के रूप में प्रस्तुत किया गया, उसके कर्मचारियों की भर्त्सना की गयी, उनके और उनकी संस्थान के बारे में कुत्सा-प्रचार किया गया, “स्टासि” द्वारा कथित तौर पर कायम किये गये आतंक के बारे में खौफनाक कहानियां फैलाने के लिए किताबें मुद्रित की गयीं, फिल्में बनायी गईं और संग्रहालय स्थापित किये गये।

धीरे-धीरे नागरिकों को पता लगे लगा कि खुफिया सेवाओं द्वारा निगरानी और जासूसी ऐसी किसी चीज के मुकाबले आज बहुत अधिक सघन और मुकम्मल है, जिसे छोटा सा जीडीआर वहन या चाह सकता था। अगर जीडीआर को दुश्मनाना ताकतों के हमलों का मुकाबला करना था तो राज्य की सुरक्षा जरूरी थी।

अब जीडीआर नहीं रहा तो अब आपको “स्टासि” की जरूरत नहीं रही। मेरा ख्याल है कि वर्तमान में खुफिया सेवाएं न केवल ज्यादा खतरनाक है, जितनी कि वे उस समय थीं, वरना गैर-जरूरी भी हैं। उनका पूरी दुनिया से खात्मा किया जाना चाहिए।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आपके ऊपर ज़ाती तौर पर शिक्षा मंत्री के रूप में नागरिक प्रतिरक्षा के पाठों को लागू करके स्कूलों के  सैन्यीकरण का आरोप है। क्या यह सही है?

Margot Honecker : हालाँकि यह हैरत की बात नहीं है कि मेरे ऊपर ऐसी शिक्षा प्रणाली में शामिल होने का आरोप नहीं है, जहाँ पर तीन से छह साल की उम्र के बच्चे शिशु-विद्यालय और उसके बाद प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे, जहाँ पर उन्हें सुप्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा मानववाद, शांति और सभी लोगों के लिए सम्मान की भावना से पढ़ाया जाता था।

फिर भी, कुछ घंटे नागरिक प्रतिरक्षा की कक्षाओं के थे, तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि मैंने समूची शिक्षा प्रणाली का सैन्यीकरण किया। इन कक्षाओं की शुरुआत मुझ समेत जिम्मेदार मंत्रियों की साझा राय से हुई, कि हाई स्कूल के युवाओं के लिए 18 महीनों की अनिवार्य सेवा का हमारे कानूनी दायित्व के अनुरूप सैन्य सेवा से पहले कुछ बुनियादी ज्ञान प्रदान करना उपयोगी रहेगा। हो सकता है कि यह हमारी सर्वश्रेष्ठ योजना न रही है पर पश्चदृष्टि से देखना सदैव आसान होता है।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: क्या आप मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति वफादार बनी हुई हैं और अभी भी खुद को कम्युनिस्ट कहती हैं, अगर ऐसा है तो क्यों?

Margot Honecker : मैं खुद को केवल वफादार किस्म की नहीं मानती – मैं कम्युनिस्ट हूँ। वफादारी संभवतः उपयुक्त शब्द नहीं है।  मार्क्सवाद-लेनिनवाद एक विचारधारा, विश्व को समझने के लिए अन्वेषण की पद्धति, ऐसा नियम है जिसके अनुसार वह गतिमान होता है, जिससे कि आप विश्व में स्वयं को अनुकूल बना सकें। कुछ खुदा की मर्जी पर यकीन करते हैं तो दूसरे पहले से तय तकदीर पर। हम कम्युनिस्ट भौतिकवादी होते हैं। हम वैज्ञानिक नजरिये को अनुसरण करते हैं, जो यह मानकर चलता है कि समाज और उसमें उत्पन्न होने वाली हरेक चीज मनुष्यों का काम है।

शोषण और दमन न तो खुदाई हुक्म है और न ही ये बुराइयाँ स्वीकार्य हैं। हमें मानवीय, उचित, पुरअमन दुनिया के लिए संघर्ष करना होगा और आज इसकी जरूरत पहले हमेशा से अधिक हो गयी है। हमें अवश्य ही इसकी इजाजत देने से इन्कार कर देना चाहिए कि लोग युद्ध, भूख और बीमारी से मरें और यह कि कुदरती संसाधन तथा लोगों की रोजीरोटी एकमात्र मुनाफे के लिए निर्मम पूँजीवादी दोहन के द्वारा खत्म या नष्ट हो।

मानवता को अगर अपना भविष्य चाहिए तो बैंकों एवं निगमों की ताकत का अवश्य ही खात्मा करना होगा। वे अपनी मर्जी से अपनी ताकत को छोड़ने वाले नहीं हैं।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: क्या आप अभी भी अपने पूर्व साथियों, जैसे कि जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी (डीकेपी) या ग्रीक कम्युनिस्ट पार्टी (केकेई) या दूसरे साथियों के साथ संपर्क बनाये हुए हैं।

Margot Honecker : मैं बेहद करीब से जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी एवं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ जर्मनी (केपीडी) के साथ-साथ वाम दल के साथियों के साथ भी जुड़ी हुई हूँ। जर्मनी के बहुत से नागरिक मेरे संपर्क में हैं – वे लोग जिनसे मैं कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली – जो आज मुझे ईमेल भेजते हैं।  कुछ यहाँ Santiago de Chile में मुझसे मिलने आते हैं। भला हो इंटरनेट का, मेरे सभी दिशाओं में संबंध हैं और वे मुझे विश्व में घटित होने वाली हरेक चीज के बारे में अवगत कराते हैं। दक्षिण अमेरिका के Andes में रहने का अर्थ चाँद पर होना नहीं होता।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आप यूरोप में, विशेषकर ग्रीस के घटनाक्रमों का मूल्यांकन कैसे करती हैं। आर्थिक लिहाज से कठोर कदम और राजनीति के लिहाज सेः सत्ता में Syriza — स्थित?

Margot Honecker : आपत्तिः Syriza ने सचमुच सरकार कायम की और दोबारा जीते लेकिन उसके पास कोई शक्ति नहीं थी। ग्रीस में सत्ता अभी भी देशी और उत्तरोत्तर विदेशी पूँतिपतियों के पास जा रही है। यह यूरोप ऊपर के लोगों और नीचे के लोगों के बीच, अमीर एवं गरीब के बीच, धनवान एवं विपन्न देशों के बीच बँटा हुआ है।

प्रभुत्व और मुनाफे के लिए महाशक्तियों के बीच की होड़ बढ़ती ही जा रही है। बिल्कुल शुरुआत से, यह यूरोप एकाधिकार रखने वाली पूँजी, अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाने के लिए साम्राज्यवादी ढाँचे की परियोजना रहा है। लोकतांत्रिक एवं सामाजिक ह्रास की नीति बहुराष्ट्रीय निगमों की हितों के द्वारा आदेशित यूरोपीय संघ की संधियों में प्रतिष्ठापित है। सशक्त राज्य कमजोर राज्यों को धकियाकर उन्हें रसातल में पहुँचा देते हैं।

वाम हलके में यह बात आयी थी कि इस यूरोप को सुधारा जा सकता है। लेकिन ग्रीस को लेकर यूरोपीय अधिकारियों के लूट-खसोट करने वाले रवैये ने यह साफ कर दिया कि यह भ्रम है।

ग्रीक जनों पर हुकूमत गाँठने वालों ने ट्रस्ट एजेंसी एवं निजीकरण के उपायों के द्वारा जीडीआर की अर्थव्यवस्था के मॉडल के अनुसार निजीकरण की माँग की। इस तरीके ने जीडीआर में भारी बुराइयों को जन्म दिया था। कारखानों को बंद कर दिया गया और शक्तिशाली उद्यमों को निगमों को लौटा दिया गया, जिनसे युद्ध के बाद कभी जनमत संग्रह के द्वारा उन्हें जनता के मालिकाने में ला दिया गया था। इसके फलस्वरूप जीडीआर में बड़े पैमाने पर वि-औद्योगीकरण हुआ। हजारों-लाखों को रातों-रात अपनी नौकरी गँवानी पड़ी।

पूर्वी जर्मनी यानि के जीडीआर पर शुद्ध पूँजीवाद लाद दिया गया। पश्चिमी जर्मनी में मजदूरों द्वारा हासिल किये गये अधिकारों पर डाका डाला जाने लगा क्योंकि अगले दरवाजे का समाजवादी राज्य तिरोहित हो चुका था।

चिंतातुर होकर मैं एकाधिकारी निगमों को निरंतर बढ़ते हुए, जर्मन साम्राज्यवाद को महाद्वीप की वर्चस्वशील शक्ति बनाने के उद्देश्य को देखती रही। 1914 और 1945 के बीच दो बार उसने बंदूक के दम पर इस मक़सद को हासिल करने की कोशिश की पर विफल रहे।

विश्व पर प्रभुत्व कायम करने की अपनी लालसा को वह कभी नहीं छोड़ पाया और हमेशा से सैन्य दुस्साहस करने के लिए तैयार रहा।

मैंने हमदर्दी के साथ Syriza के विकास पर नजर रखी क्योंकि मैं एकाधिकारी निगमों की तानाशाही के खिलाफ हरेक विरोध-प्रदर्शन, ऐसे किसी आंदोलन में सहानुभूति के साथ शामिल हुई, जो कि लोकतांत्रिक नियमों का उपयोग करके इस पूँजीवाद के बढ़ते कदमों को रोकने की कोशिश करता है। लेकिन हमें अवश्य ही यथार्थवादी होना चाहिए।

“इंटरनेशनल ऑफ दि पावरफुल” अभी भी दबे-कुचले और उत्पीड़ित लोगों की तरफ से किसी जोरदार मुखालफत का सामना नहीं कर रहा है।

यूरोपीय देशों में एकाधिकारी निगम-विरोधी वामपंथ के द्वारा सतत एवं प्रभावी गतिविधि गैर-हाजिर है और न ही वहाँ पर पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय एकजुटता एवं साझा गठजोड़ है। ग्रीस में साम्राज्य ने जोर का झटका दिया और इस भ्रम को चूर-चूर कर दिया कि यूरोप को सुधारा जा सकता है। इन तरीकों से कोई दूसरा यूरोप जन्म नहीं ले सकता।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: क्या समाजवाद आमतौर तौर पर और विशेष रूप से यूरोप के लिए अभी भी एक विकल्प है। Margot Honecker : नहीं तो क्या! मानवता अगर बर्बरता में नहीं डूब जाना चाहती तो यह एकमात्र विकल्प है।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: आप इस समय किस प्रकार से जीवन-यापन कर रही हैं। आप अपनी जब्त की गयी परिसंपत्तियों के लिए फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी के खिलाफ मुकदमा हार गयी हैं। Margot Honecker : “जब्त की गयी परिसंपत्ति” से ऐसा ध्वनित होता है मानो यह कोई बड़ी भारी पूँजी हो। यह हमारी बचत से ताल्लुक रखता है। जीडीआर के सभी नागरिकों की तरह हमने भी बैंक में बचत की थी।

आपको पता होगा जीडीआर के नागरिकों की पेंशन को मनमाने तरीके से घटा दिया गया और यह अन्याय आज के दिन तक जारी है। मुझे सेवानिवृत्ति की सामान्य पेंशन मिलती थी, क्योंकि यहाँ तक कि मेरे ऊपर भी समस्त जर्मन नागरिकों के लिए बने कानूनी नियम लागू होते थे।

ANTONIS POLYCHRONAKIS :: क्या आप तथाकथित संस्थाओं के कड़े कदमों से त्राहि-त्राहि कर रही ग्रीक जनता को कोई पैगाम देना चाहेंगी।

Margot Honecker : मैं यहाँ रह रहे लोगों के लिए एकजुटता, हमदर्दी और सम्मान के एहसास के साथ सोचती हूँ।

मैं ग्रीस के साथ उन्हीं हार्दिक यादों को साझा करती हूँ, हालाँकि मैं कभी वहाँ नहीं गयी थी। जब मैने ग्रीस के बारे में सुना तो मुझे Manolis Glezos का ख्याल आया, जिसने उस समय Acropolis से स्वस्तिक झंडा नीचे उतारा थी, जबकि मैं जर्मनी में उसी फासीवादी सेना के खिलाफ लड़ रही थी।

मैं उन ग्रीक जनों के बारे में सोचती हूँ, जिन्हें  उस समय जीडीआर में शरण दी गयी थी, खासकर ग्रीक बच्चों के बारे में जिन्हें हमारे साथ रहने को मिला था, जबकि फासीवादी फौजी अफसरों ने 1967 में तख्तापलट करवाया था।

मैं Mikis Theodorakis के बारे में सोचती हूँ, जिन्हें जीडीआर के हजारों-लाखों बच्चों ने जेल में एकजुटता कार्ड भिजवाए थे। उनके संगीत, बच्चों के “Canto General” संगीत, पाब्लो नेरुदा, जो कि जीडीआर में बहुत मकबूल थे, ने भी मुझे भाव-विभोर किया। ग्रीस अपने इतिहास में तमाम परीक्षा की घड़ियों से होकर गुजरा है।

मुझे लगता है कि इससे भी पार पा लेगा। हम कहते हैं : संघर्ष करने वाले हार सकते हैं – लेकिन जो संघर्ष ही नहीं करते पहले ही हारे हुए होते हैं। और ग्रीक जन जानते हैं कि अपने अधिकारों और अपने घर के लिए किस प्रकार से लड़ा जाए, जैसा कि उन्होंने अपने इतिहास में बारंबार साबित किया है। विश्व भर के बहुत से मित्रों की एकजुटता उनके साथ है।

(Source: www.jungewelt.de/2015/11-11/059.php  )

अंग्रेजी में साक्षात्कार यहाँ देखें – http://www.workers.org/articles/2015/11/16/interview-with-the-gdrs-margot-honecker-the-past-was-brought-back/

Interview with the GDR’s Margot Honecker — ‘The past was brought back’

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