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नहीं लगता आपको कि देश का असली वाला शासन प्याज की परत की तरह है । असली वाला शासन केंद्र वाला होता है । राज्य वालों का शासन तो मुंबई महानगरपालिका से भी चिरकुट होता है । समझिए कि राज्यों का शासन प्याज की वह परत होता है जो खाई नहीं जाती , दिखाई जाती है । राज्य को कभी पता नहीं होता कि फसल खराब हो गई है । दरअसल राज्य को पता भी होता है तो वह इंतजार करता है कि केंद्र सरकार कोई कार्रवाई करेगी । केंद्र सरकार इंतजार करती है कि प्याज की कीमत बढ़ती रहे । प्याज का निर्यात होता रहे । हमारा देश तो शाकाहारियों का देश है प्याज – लहसून नहीं खाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है । तो असली वाला केंद्रीय शासन बड़ा लोकतांत्रिक है । इसका एक मंत्री हवा की तरंग बेच कर पौने दो लाख करोड़ का घाटा कर देता है । हम मंत्री के भ्रष्टाचार के पीछे पड़ जाते हैं । प्याज की परत की तरह एक के बाद एक टेप बजता जाता है । धीरे धीरे पता चलता है कि हवा की तरंग ही नहीं पूरे देश को बेचने की तैयारी चलती रहती है । वैसे यह एक सेमिनार का विषय है कि देश बिका हुआ है या नहीं । कितने खरीदार देश में लगातार आ रहे हैं । चलो भारत तो बेचारा है । बिलो प्रावर्टी लाइन का मारा है । इसका कोई खरीदार नहीं है । इंडिया को ही खरीदना होता है , इसी को बेचना होता है । सरकार की जिम्मेदारी भी नहीं है भारत की । भारत की जिम्मेदारी का निर्वहन राज्य करते हैं । प्याज की कीमतों पर नियंत्रण केंद्र के कृषि मंत्रालय की होती है । कृषि मंत्रालय मानता है कि जब पेट्रोल की कीमत बढ़ सकती है तो प्याज की कीमत क्यों नहीं बढ़ सकती है । वाहन चलाने के लिए पेट्रोल चाहिए तो तरकारी बनाने के लिए प्याज चाहिए । अगर पेट्रोल का हम आयात करते हैं तो प्याज का निर्यात भी करते हैं । हमारा निर्यात सिर्फ कारोबार नहीं होता । यह तो वसुधैव कुटुंम्बकम होता है । इधर हमने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी , उधर प्याज के नीरा राडियओं ने प्याज की कीमत बढ़ा दी । अब जा कर प्याज की कीमत सम्मानजनक हुई है । वरना पहले , कह दिया कि प्याज रोटी खाया है – यूपीए 2 का गुण गाया है । कृषि मंत्री , माने या ना मानें , हैं वह सचमुच में ऋषि । देश के इकलौते राष्ट्र महाराष्ट्र को संत मुणि की दृष्टि से देखते हैं । महाराष्ट्र में प्याज भी होता है । आँध्र में भी प्याज होता है । वहां प्याज के साथ राजनीति भी होती है । सच पूछिए तो अपने देश में राजनीति कहां नहीं होती । राजनीति क्या है । प्याज की परत है । खोलते जाओ , रोते जाओ । जब आंसू सूख जाते हैं तो प्रधानमंत्री को याद आता है कि प्याज की कीमत बढ़ गई है । उन्हें अपना बचपन याद आता है , जब प्याज रोटी खा कर इकॉनॉमी सिख रहे थे । कृषि मंत्री ज्योतिषि नहीं होता कि बता सके कि प्याज की कीमतें कब कम होंगी । प्याज कोई भ्रष्टाचार नहीं कि कहा जा सके कि कम कर के रहेंगे । पर प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से जूझते जूझते यह समझ हो जाती है कि तीन महीने में प्याज की कीमतें कम हो जाएंगी । यह फर्क है प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री में । एक ज्योतिषि नहीं होना चाहता , दूसरा ज्योतिषि हो जाता है । प्याज सिर्फ महंगा हो जाता है क्योंकि उसकी एक परत में जमाखोरी भी होता है ।

प्याज की परत

नहीं लगता आपको कि देश का असली वाला शासन प्याज की परत की तरह है । असली वाला शासन केंद्र वाला होता है । राज्य वालों का शासन तो मुंबई महानगरपालिका से भी चिरकुट होता है । समझिए कि राज्यों का शासन प्याज की वह परत होता है जो खाई नहीं जाती , दिखाई जाती है । राज्य को कभी पता नहीं होता कि फसल खराब हो गई है । दरअसल राज्य को पता भी होता है तो वह इंतजार करता है कि केंद्र सरकार कोई कार्रवाई करेगी । केंद्र सरकार इंतजार करती है कि प्याज की कीमत बढ़ती रहे । प्याज का निर्यात होता रहे । हमारा देश तो शाकाहारियों का देश है प्याज – लहसून नहीं खाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है ।

तो असली वाला केंद्रीय शासन बड़ा लोकतांत्रिक है । इसका एक मंत्री हवा की तरंग बेच कर पौने दो लाख करोड़ का घाटा कर देता है । हम मंत्री के भ्रष्टाचार के पीछे पड़ जाते हैं । प्याज की परत की तरह एक के बाद एक टेप बजता जाता है । धीरे धीरे पता चलता है कि हवा की तरंग ही नहीं पूरे देश को बेचने की तैयारी चलती रहती है । वैसे यह एक सेमिनार का विषय है कि देश बिका हुआ है या नहीं । कितने खरीदार देश में लगातार आ रहे हैं । चलो भारत तो बेचारा है । बिलो प्रावर्टी लाइन का मारा है । इसका कोई खरीदार नहीं है । इंडिया को ही खरीदना होता है , इसी को बेचना होता है । सरकार की जिम्मेदारी भी नहीं है भारत की ।

भारत की जिम्मेदारी का निर्वहन राज्य करते हैं । प्याज की कीमतों पर नियंत्रण केंद्र के कृषि मंत्रालय की होती है । कृषि मंत्रालय मानता है कि जब पेट्रोल की कीमत बढ़ सकती है तो प्याज की कीमत क्यों नहीं बढ़ सकती है । वाहन चलाने के लिए पेट्रोल चाहिए तो तरकारी बनाने के लिए प्याज चाहिए । अगर पेट्रोल का हम आयात करते हैं तो प्याज का निर्यात भी करते हैं । हमारा निर्यात सिर्फ कारोबार नहीं होता । यह तो वसुधैव कुटुंम्बकम होता है । इधर हमने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी , उधर प्याज के नीरा राडियओं ने प्याज की कीमत बढ़ा दी । अब जा कर प्याज की कीमत सम्मानजनक हुई है । वरना पहले , कह दिया कि प्याज रोटी खाया है – यूपीए 2 का गुण गाया है ।

कृषि मंत्री , माने या ना मानें , हैं वह सचमुच में ऋषि । देश के इकलौते राष्ट्र महाराष्ट्र को संत मुणि की दृष्टि से देखते हैं । महाराष्ट्र में प्याज भी होता है । आँध्र में भी प्याज होता है । वहां प्याज के साथ राजनीति भी होती है । सच पूछिए तो अपने देश में राजनीति कहां नहीं होती । राजनीति क्या है । प्याज की परत है । खोलते जाओ , रोते जाओ । जब आंसू सूख जाते हैं तो प्रधानमंत्री को याद आता है कि प्याज की कीमत बढ़ गई है । उन्हें अपना बचपन याद आता है , जब प्याज रोटी खा कर इकॉनॉमी सिख रहे थे । कृषि मंत्री ज्योतिषि नहीं होता कि बता सके कि प्याज की कीमतें कब कम होंगी । प्याज कोई भ्रष्टाचार नहीं कि कहा जा सके कि कम कर के रहेंगे । पर प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से जूझते जूझते यह समझ हो जाती है कि तीन महीने में प्याज की कीमतें कम हो जाएंगी । यह फर्क है प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री में । एक ज्योतिषि नहीं होना चाहता , दूसरा ज्योतिषि हो जाता है ।

प्याज सिर्फ महंगा हो जाता है क्योंकि उसकी एक परत में जमाखोरी भी होता है ।

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