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Munshi Premchand

प्रेमचंद हिंदी साहित्य के हार्डवेयर हैं, तो भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के सॉफ्टवेयर !

हमारे समय में भीष्म साहनी

प्रगतिशील लेखक संघ की घाटशिला इकाई (झारखण्ड) का आयोजन: 14 नवम्बर, 2015

घाटशिला 14 नवम्बर, 2015. कालजयी कथाकार, नाटककार, अनुवादक, रंगमंचीय कलाकार अभिनेता भीष्म साहनी के जन्म शताब्दी वर्ष 2015 में देश भर में उन्हें याद किया जा रहा है. इसी कड़ी में घाटशिला प्रलेसं ने 14 नबम्वर को ताम्र नगरी मऊभण्डार स्थित आई.सी.सी. मजदूर यूनियन (घाटशिला) में “हमारे समय में भीष्म साहनी’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया. कार्यक्रम की शुरुआत जनगीत “तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’ (शैलेन्द्र) गाकर प्रलेसं और इप्टा के साथियों ने की. प्रथम सत्र में इसके बाद साहित्य अकादमी द्वारा निर्मित नंदन कुध्यादी निर्देशित भीष्म साहनी पर वृत्तचित्र (Documentary on Bhishma Sahni) का प्रदर्शन हुआ. ज्योति मल्लिक ने इस उदघाटन सत्र का संचालन किया.

द्वितीय सत्र में युवा साथियों ने गुलाब का फूल देकर मंचस्थ अतिथियों का सम्मान किया. मंच संचालन करते हुए घाटशिला के युवा कथाकार शेखर मल्ल्लिक ने भूमिका रखते हुए कहा कि, आज इस वक्त भीष्म जी को याद करने के मायने खास हैं. जिस दौर में हम आज हैं, वह एक ऐसा समय है, जिसमें भीष्म साहनी को याद किया जाना जरूरी है. प्रगतिशील और समतावादी रचनाकार भीष्म जी प्रेमचंद की परम्परा को आगे ले जाने वाले, आम आदमी को रचना में उसकी पुरी ताकत और कमजोरियों के साथ खड़ा करने वाले लेखक हैं. उनकी रचनाएँ साम्प्रदायिकता का सिर्फ़ निषेध नहीं करतीं, बल्कि उनके कारणों की तह तक जाती हैं और हमें उस नब्ज को पकड़ने के लिये उकसाती है. एक तरफ जहाँ गंगो का जाया, बसंती जैसी कहानियाँ और उपन्यास हैं, जो हमें श्रमिक निम्न मध्यवर्ग से वावस्ता कराती हैं, उनके शोषण और संघर्ष का यथार्थ दिखाती हैं, तो दूसरी तरफ अमृतसर आ गया जैसी कहानी , तमस जैसा उपन्यास और आलमगीर, मुआवजे जैसे नाटक लिखकर उन्होंने साम्प्रदायिकता की सच्चाईयों को भी बेनकाब किया है.

भीष्म जी एक आम आदमी थे… सादगी से भरपूर. उनकी लेखनी और जीवन में कोई फ़र्क नहीं रहा. संघर्षशील जनों के साथ वे सभी मोर्चों, जैसे सफ़दर हाश्मी की हत्या के बाद सडक पर उतरना हो, पर आगे की पंक्ति में रहे.

आज हम इस देश में साम्प्रदायिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा देख रहे हैं. गोमांस की अफ़वाह पर व्यक्ति हत्या हो रही है. और वो भी एक वायु सैनिक के पिता की. और खुद को चाय विक्रेता कह कर आम आदमी से प्रधानमंत्री बना व्यक्ति इस पर कुछ नहीं कहता. जबकि हर बात पर ट्वीट होता है. दाभोलकर, पानसरे और कल्बुर्गी की हत्या होती है. हम देख रहे हैं कि तर्क के लिये, सच के लिये कोई स्पेस नहीं बचा है… वे लोग जो सत्ता में हैं, सच और तर्क को गोलियों से बंद कर देना चाहते हैं. भीष्म साहनी को इस समय याद करने का यह समय सचमुच महत्वपूर्ण समय है…

जमशेदपुर से आये कथाकार कमल ने भीष्म साहनी के उपन्यास “तमस” पर अपना आलेख “एक तमस और असंख्य अँधेरे” पढ़ा. उन्होंने कहा कि आज हम भीष्म साहनी या “तमस’ को इसलिए नहीं याद कर रहे हैं कि हम उत्सव के मूड में हैं, बल्कि इसलिए कि आज भी भीष्म साहनी और ये किताब हमें जीवन की शक्ति का दर्शन कराती प्रतीत हो रही है.  “तमस’ में साम्प्रदायिकता और विभाजन केंद्रित कथावस्तु पर विस्तृत विश्लेषण और उपन्यास की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया कि लोगों को, निचले तबके के लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीतियों ने किस तरह काम किया. और साम्प्रदायिक दंगों की वजहें असल में कहाँ होती हैं. स्थितियाँ वहीं हैं.  भीष्म साहनी बताते हैं कि चाहे किसी भी काल की बात हो, दंगे पुरी तरह शासकों द्वारा प्रायोजित होते हैं. वे स्वत: स्फूर्त कभी नहीं होते. भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ को पढते हुए बार-बार मन कसमसाता है कि हम साम्प्रदायिकता का समूल नाश कर अपनी सभ्यता और संस्कृति को यहाँ से और आगे ले जाएँगे अथवा साम्प्रदायिकता के औजार बनकर वापस उसी अंधकार में लौट जाएँगे जहाँ से निकलने में हमें सदियाँ लगीं.

घाटशिला महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफ. नरेश कुमार ने कहा कि “तमस” उनका प्रिय उपन्यास है. भीष्म साहनी अपनी रचनाओं में कोई भी निर्णय देते हुए नहीं दिखते. वे पाठकों के लिये खुला छोड़ देते हैं. भीष्म जी की रचनाओं में, पात्रों में वस्तुपरकता है. उन्होंने कहा कि हिंदी में पंजाबी आदि भाषाओँ की तरह विभाजन (भोगे हुए यथार्थ) पर अधिक लेखन नहीं है.

करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर के उर्दू विभाग प्रमुख, शायर और आलोचक अहमद बद्र साहब ने  भीष्म जी के नाटकों में से “कबीरा खड़ा बाज़ार’ में नाटक पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि रचना भी विज्ञान और सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान आदि के सिद्धांतों – नियमों के अनुसार हो तो ही पूर्ण रचना हो सकती है, स्वीकार्य होती है. यानि तार्किकता जरूरी है. ‘कबीरा खड़ा बाज़ार’ में भीष्म जी ने बहुत पुराना पात्र उठाया. लेकिन ना उसमें कहीं इतिहास से टकराव होगा, ना कहीं सोशियोलोजी से टकराव होगा, ना कहीं अर्थशास्त्र के जो नियम हैं, उनसे टकराव होगा. कुछ भी नहीं टकराएगा और इसी वजह से शायद वह एक अच्छी कृति है, और मुझे लगता है कि जब ऐसा होता है, तभी रचना में स्ववाभिकता इस बात से होती है कि वो इनमें से किसी चीज से टकरा नहीं रही है. अगर वो इतिहास, भूगोल या  विज्ञानं से टकरा रही है तो कहीं ना कहीं उसमें दिक्कत होगी. भीष्म जी बड़े स्वाभाविक ढंग से अपने यहाँ इन चीजों को पिरो लेते हैं.  ‘कबीरा खड़ा बाज़ार’ में जो एक पात्र है बशीरा, भिश्ती. जहाँ सब लोग इकट्ठा होने वाले हैं, वहीं वह पानी का छिडकाव कर रहा होता है, ताकि धूल बैठ जाय. भिश्ती अपनी कहानी सुनाता है. भीष्म जी बड़े मार्के की बात कह जाते हैं, उस भिश्ती की कथा के बहाने. उसके पुरखों में पाँच भाईयों में दो मारे जाते हैं, दो कहीं चले जाते हैं, या मारे जाते हैं…. सौ साल का इतिहास भीष्म जी ने उठकर रख दिया है, जहाँ महामारी है, युद्ध के कारण मौत हैं, भुखमरी है… आम जनता का इतिहास यही है. जो हमले में दर-बदर होते रहे. बेगार में पकड़ कर जाते रहे, इधर फंसे रहे, उधर मरते रहे. कबीर के समकालीन सिकंदर लोदी वंश के भी पाँच भाइयों का क्या होगा, उनमें से दो कहाँ जाएँगे, और दो कहाँ जाएँगे और एक का क्या होगा… तो ये समझा जा सकता है. इसलिए कि निरंतरता है. अब सच्ची बात ये है कि भले ही ये मुग़ल वंश के शासन से पहले कि घटना है, कबीर का होना. लेकिन सच्चाई आज भी वही है. आज भी जो पांच बेटे हैं,  उसमें से भी दो बेटे कहाँ जाएँगे और दो बेटे कहाँ जाएँगे और एक का क्या होगा, ये कोई नहीं जानता है. इसलिए कि शासन के नियम वही हैं. तेवर वही है, रंग वही है. सत्ता हासिल करने का तरीका एक ही है. सत्ता चलने का तरीका एक ही है. चाहे वो राजशाही हो, चाहे आज का लोकतंत्र हो. इसमें कहीं कोई परिवर्तन नहीं आया है. इसीलिए कबर भी सार्थक हैं और भीष्म साहनी भी सार्थक हैं.

कोलकाता से आये कवि सुधीर साहू ने कहा कि ऐसी शक्तियां जो समाज में टकराव की स्थिति बनाये रखना चाहती हैं, उनसे भीष्म साहनी की सारी रचनाएँ टकराती हैं. ये टकराव बहुत जरूरी है.

भीष्म साहनी के “अमृतसर आ गया” जैसी कहानी के आधार पर उन्होंने अपनी बात कही. किस तरह दंगे फैलना का काम कुछ लोग करते हैं, और उसकी चपेट में वे साधारण लोग भी आ जाते हैं, जिनकी अपनी ऐसी कोई तय सोच नहीं है. उनकी मानसिकता कैसे बदल जाती है. वे कैसे साम्प्रदायिक मानसिकता की कब्जे में आकार व्यवहार करने लगते हैं. ये बात आज हमें बहुत ज्यादा देखने में आ रही है. आज तमाम माध्यम बिके हुए हैं. एक ही आदमी का गुणगान करने में लगे हुए हैं. सोशल मिडिया जो सबसे जयादा ताकतवर हैं, वहाँ भी ऐसा सोची समझी साज़िश के तहत हो रहा है. कुछ लोग हैं जो ये कर रहे हैं. ये जिस सोच के सत् हो रहा है, उसी सोच को पकड़ा था भीष्म साहनी ने. तो उसको, उस असहिष्णुता को हम कैसे रोक सकते हैं, ये भी हम भीष्म साहनी की रचनाओं को पढकर जान सकते हैं. कुछ लेखक कुछ माध्यमों से परहेज करते हैं, लेकिन भीष्म जी ने, जिन जिन माध्यम से पाठकों के बीच में अपने लिखे हुए को ले जा सकते हैं, वो ले गए. आज इस बात की बड़ी जरूरत है कि हम हर तरह के माध्यम का प्रयोग हमको साम्प्रदायिक विचारों को रोकने के लिये, और अपने अपने विचारों को फ़ैलाने के लिये करना चाहिए. और नए लेखक कैसे क्या लिखें, इसके लिये भीष्म साहनी की हर रचना एक पाठशाला, एक पाठ्यक्रम से कम नहीं है.

प्रलेसं के महासचिव डॉ. सुभाष गुप्ता ने भी अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि भीष्म साहनी जी का व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन एक व्यापक ऐतिहासिक महत्व रखता है. ऐतिहासिक इस अर्थ में कि उनका जन्म रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था और मृत्यु भारत में हुई. गुलाम भारत से लेकर आज़ाद भारत तक उनके जीवन और रचनाकर्म का फैलाव दिखाई देता है. इस फैलाव के भीतर भारतीय समाज और इतिहास की अनेक घटनाएँ-दुर्घटनाएँ दर्ज़ की गई हैं. इसलिए भीष्म साहनी को याद करना ना केवल एक कथाकार को याद करना है, बल्कि भारतीय समाज और पूरे दौर को याद करने के समान है.  यद्यपि वे कई कहानी के दौर के कथाकार थे, मगर वे उस धारा में शामिल ना होकर प्रगतिशील धारा के कहानीकार थे. उन्होंने प्रेमचंद कि परम्परा का वाहन तो किया, लेकिन प्रेमचंद की तरह ग्रामीण जीवन को संदर्भ नहीं बनाया. बल्कि नई कहानी आंदोलन के कथाकारों की तरह अपने कथा साहित्य में शहरी मध्यवर्ग को संदर्भित किया. भीष्म साहनी अपने दौर के अकेले ऐसे कथाकार हैं, जो नगरों में स्लम जीवन जीने वाले लोगों के सुख-दुःख, उनके सपनों, संघर्षों और उनके जीवन के भयावह यथार्थ को अपने कथा साहित्य में दर्ज़ करते हुए दिखाई देते हैं. प्रेमचंद के साहित्य में भारत का ग्रामीण जीवन जिस व्यापकता से दिखाई देता है, उसी व्यापकता के साथ भीष्म साहनी के साहित्य में शहरी जीवन दिखाई देता है. इसलिए इन दोनों के साहित्य में दर्ज़ गाँव और नगरी जीवन की व्यापकता को मिला दिया जाय, तो भारत की एक मुक्कमल तस्वीर बन जाती है. मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद समाज के भीतर जो मनुष्य है, उसकी पड़ताल करते हैं, जबकि भीष्म साहनी मनुष्य के भीतर जो समाज है, उसकी पड़ताल करते हैं. प्रेमचंद हिंदी साहित्य के हार्डवेयर हैं, तो भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के सॉफ्टवेयर !

भीष्म साहनी के सम्कनिल परिस्थितियों को समझे बिना उनकी रचनाशीलता को समझना मुश्किल है. भीष्म साहनी को भीष्म साहनी बनने में उनकी विचारधारा की कितनी भूमिका रही है. लेकिन उनकी विचारधारा किसी किताब से उधार ली गयी नहीं थी. या वह किसी लेखकीय फैशन के तहत अपनाई गयी विचारधारा नहीं थी. गौरतलब है कि भीष्म साहनी पहले आंदोलनकर्मी बने, पहले वे संगठन से जुड़े, पहले वे कार्यकर्ता बने, तब रचनाकर्मी बनते हैं. बहुत कम रचनाकारों के यहाँ ये प्रक्रिया दिखाई देती है. अपने समय के तमाम सामाजिक, राजनितिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में जुड़ते हुए दिखाई देते हैं. इन आंदोलनों की भागीदारी ने उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचाया कि पुरी दुनिया के सामने यदि कोई वैचारिक विकल्प है, तो मार्क्सवाद दिखाई देता है. आंदोलनों की आग में तप कर उन्होंने वामपंथी विचारधारा को आत्मसात किया. और इन आंदोलनों की भागीदारी ने उनके भीतर एक वैचारिक मजबूती दी, और इसी मजबूत आधार पर उन्होंने अपने साहित्य को शब्दों का आकार दिया.

भीष्म साहनी पहले एक्टीविस्ट हैं, फिर रचनाकार हैं. जिस दौर में हम सभी लोग जी रहे हैं, जहाँ लगातार सत्ता शासन के द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले किए जा रहे हैं, देश के बहुलतावादी ढाँचे पर लगातार हमले हो रहे हैं, तर्कवादी और तर्कसंगत बात करने वालों पर जिस तरह से जानलेवा हमले किए जा रहे हैं, ऐसे समय में तमाम कलमजीवियों को सिर्फ़ कलम तक सिमित रहने की जरूरत नहीं है, बल्कि लेखन के साथ साथ उन्हें एक्टिविज़्म की भूमिका में भी उतरने की जरूरत दिखाई देती है.

भीष्म साहनी मानते थे कि नागरिक दायित्व, सामाजिक दायित्व और रचनात्मक दायित्व में कोई बुनियादी फ़र्क नहीं होता है. और इसी बुनियादी फ़र्क न करने के कारण वो (भीष्म साहनी) जितने उर्जाशील, उर्जावान रचनात्मक स्तर पर दिखाई देते हैं, उतने ही सक्रिय सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के स्तर पर भी दिखाई देते हैं.
भीष्म साहनी की पुरी रचनाशीलता का साठ प्रतिशत दो सवालों को बुलंद करता है, एक तो भारत का आम आदमी, चाहे वो ग्रामीण जीवन से विस्थापित होकर शहर में गया हो, आम आदमी के जीने का प्रश्न और जीवन विरोधी परिस्थितियाँ, इन दोनों के टकराहट में आम आदमी कैसे अपनी जिजीवषा के साथ जीता है, इस सवाल को पुरी प्रखरता, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ भीष्म साहनी ने अपनी रचनाओं में उठाया है. और दूसरा महत्वपूर्ण सवाल जो उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है, वो है, साम्प्रदायिकता का सवाल. मैं ये मानता हूँ कि भीष्म साहनी जी की पुरी रचनाशीलता साम्प्रदायिक, प्रतिक्रियावादी शक्तियों के खिलाफ़ हस्तक्षेप है. और साझी संस्कृति को बचाए रखने की अपील भी है. और यही अपील आज की तारीख में हमें उन्हें बार बार पढ़ने, समझने और याद करने के लिये प्रेरित करती है. और शायद यदि हम नए सिरे से गोलबंद होकर सरकार का जो प्रतिक्रियावादी चेहरा है, उसके खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ अगर बुलंद कर सकें, तो शायद भीष्म साहनी को याद यही एक सच्ची और सार्थक प्रक्रिया होगी.

दिल्ली से आये म.प्र. प्रलेसं का महासचिव, प्रखर कवि और किसानी मामलों के गम्भीर अध्येता कॉम. विनीत तिवारी ने मुख्य वक्ता के तौर पर अपने विचार रखे. अपनी बात शुरू करते हुए उन्होंने कहा कि परिचर्चा के विषय “हमारे समय में भीष्म साहनी’ में एक छिपा हुआ शब्द है – ‘और हम’ यानि हमारे समय में भीष्म साहनी और हम ! हमारे समय में भीष्म साहनी की प्रासंगिकता को, उनके इतिहास को समझने के बाद हम क्या कर रहे हैं, ये सवाल हम सबके लिये इस विषय के अंदर शामिल है. उनके आग्रह पर आज पेरिस में आतंकी हमले में मारे गए लोगों के सम्मान में एक मिनट का मौन रखा गया.

कॉम. विनीत तिवारी ने विस्तार से भीष्म साहनी के जीवन, उनकी रचना दृष्टि, समकालीन स्थिति पर व्यापक प्रकाश डाला. भीष्म साहनी की आत्मकथा के उनके बचपन के किस्सों का उद्धरण पढ़ते हुए उन्होंने भीष्म जी को एक व्यक्ति के रूप में समझने की बात कही. उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा के इतिहास के हवाले से बताया कि बड़े भाई बलराज साहनी के संघर्ष के सामने और समकालीन दौर के बड़े व्यक्तित्वों जैसे कैफ़ी आज़मी, फैज़, सज्जाद ज़हीर, तुर्की में नाजिम हिकमत, सात्र के बीच भीष्म जी खुद को अत्यंत साधारण पाते थे, इसलिए उनमें कभी गर्व नहीं हुआ कि वे कोई बड़ा काम कर रहे हैं. “तमस’ एक उनका बड़ा काम है, मगर उसे लेकर भी उनके भीतर महानता का भाव नहीं आया. वे हमेशा विनम्र बने रहे. भीष्म साहनी ने जीवन के अंदर कुछ चीजों का चयन कर लिया, जैसे कि वे विलेन का काम नहीं करेंगे. जैसे तमस, मोहन जोशी हाज़िर हो, मिस्टर एंड मिसेज़ अय्यर में काम किया. लेकिन आप देखेंगे कि उनका जो काम था वो इतना ग्रेसफुल काम था, इतना ग्रेसफुल रोल था. जैसे कि आमतौर पर कहा जाता है कि जो एक्टर हर तरह का रोल करे वो अच्छा है. लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे अच्छे इंसान का ही रोल करना है. दुनिया में होते हैं खराब इंसान और खराब का भी रोल किसी ना किसी को करना पड़ेगा, लेकिन मैं नहीं करूँगा. तो ये कुछ जिंदगी के हिस्सों के तौर पर उन्होंने अपने लिये कुछ वो बनाये. दूसरी बात यह है कि समय के भीतर से लोग बनते.

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