Home / बढ़ता दलित उत्पीड़न लोकतंत्र के गाल पर तमाचा !
संजय कुमार देश में दलित उत्पीड़न की घटना की गूंज सड़क से संसद तक सुनाई पड़ी है। प्रधानमंत्री को जनसभा में कहना पड़ता है कि, दलितों को मत मारो, अगर मारना है तो मुझे मारो। इसके बाद सरकार राज्य सरकारों को फरमान जारी कर हर हाल में दलित उत्पीड़न को रोकने की अपील भी होती है। इसके बावजूद दलित उत्पीड़न रूकने का नाम नहीं ले रहा है? प्रधानमंत्री की अपील और संसद में घटनाओं के विरोध के स्वर के बीच आंध्रप्रदेश के पूर्वी गोदावारी जिले में एक मृत गाय की खाल उतारने की कोशिश कर रहे दो दलित युवकों की पिटाई और आरोप में पुलिस की ओर से 10 अगस्त को आठ लोगों को गिरफ्तार किया जाना, शर्मनाक है। 8 अगस्त की रात को घटने वाली इस घटना को गाय और दलित से जोड़ देखा जा रहा है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस घटना पर नाराजगी जाहिर करते हुए चेतावनी दी है कि दलितों पर हमला करने वाले या कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। तो वहीं, उत्तर प्रदेश के संभल के थाना गुन्नौर क्षेत्र के गांव गंगुर्रा में चिलचिलाती व उमसभरी गर्मी में खेत में काम कर रही एक 13 साल की दलित बच्ची जब डूंडा बाबा के मंदिर में लगे नल पर पानी पीने से मंदिर के पुजारी द्वारा पानी पीने से रोका जाता है। बच्ची ने जब यह वाकया अपने पिता को बताया तो उन्होंने पुजारी से इसका विरोध जताया। इस पर मंदिर के पुजारी ने अपनी गलती मानने के बजाय दलित बच्ची के पिता पर त्रिशूल से जान लेवा हमला कर दिया। पुलिस ने पहले मामले को रफा-दफा करना चाहा, लेकिन विरोध के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। त्रिशूल से घायल चरनसिंह को गंभीर अवस्था में गुन्नौर के सीएचसी में भर्ती कराया गया है। गुजरात,बिहार,उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश सहित अन्य राज्य में तेजी से दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटना ने देश व समाज के समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आज हम देश की आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहे है और आजाद भारत में हाशिये पर रहे वंचितों पर जुल्म ढाहा जा रहा है। इसके खिलाफ हालाँकि,सरकार ने भौंवे तान ली है। हाल में ही, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के बाबूटोला में सामंतों द्वारा दो दलित युवकों के मुंह में पेशाब करने की घटना को देखें तो, देश व समाज के बदलने की वकालत करने वालों के गाल पर कस कर तमाचा मारा है। राजनीतिक एवं सामाजिक आलोचना में गुजरात हो या फिर बिहार, हर जगह सामंती ताकतों पर घृणित स्तर पर उतरकर दलितों पर दमन ढाने और उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार करने को सभी ने बेहद शर्मनाक बताया। सवाल भी उठा है कि आजादी के इतने सालों बाद भी इस देश में दलितों को सामंती ताकतों के बर्बर जुल्म से निजात नहीं मिल सकी है। गुजरात में जो हुआ पूरा देश जान गया। लेकिन, 20 जुलाई को मुज्जफरपुर के पारू में जो हुआ वह मानवीय संवेदना को तार-तार करने वाला साबित हुआ है। मोटरसाइकिल चोरी का आरोप लगा कर दलित युवकों को मारा पीटा गया साथ ही उन्हें पेशाब पिलाया गया। इस दलित उत्पीड़न घटना के पीछे राजनीतिक संरक्षण का भी आरोप सामने आया है। भाकपा-माले की एक जांच टीम ने 24 जुलाई को घटनास्थल का दौरा किया कर मीडिया के सामने सच को लाने का काम किया है। जांच टीम ने कहा है कि बाबूटोला में दो दलित नवयुवक, जो आपस में साला-बहनोई हैं, राजीव पासवान और मुन्ना पासवान अपनी बाइक से यज्ञ देखने गए थे। जब वे यज्ञ से लौटे तो जहां पर उन्होंने अपनी बाइक खड़ी की थी, उस स्थान पर बाइक नहीं थी। वे अपनी बाइक ढूंढने लगे। तभी बगल के सुमन ठाकुर व सुशील ठाकुर ने पूछा क्या ढूंढ रहे हो? जब इन दोनों युवकों ने कहा कि हमारी बाइक नहीं मिल रही, तो उन्होंने बाइक दिखलाते हुए कहा कि इसका कागज दिखलाओ। फिर कहने लगे कि यह चोरी का बाइक है और दोनों दलित युवकों की पिटाई करने लगे। उन्हें रॉड से पीटा गया व रूम में बंद कर दिया गया। उसके बाद गांव का मुखिया पति मुकुल ठाकुर पहुंचा और उसने कहा कि इनके मुंह में पेशाब कर दिया जाए। उसके आदेश पर उन दलित युवकों के मुंह में पेशाब कर दिया गया। जब इन युवकों को बचाने के लिए उनके पिता आए तो उनके गर्दन में कपड़ा लपेटकर उन्हें भी पीटा गया। उसके बाद यज्ञ में खड़ी पुलिस ने आकर उन दलित युवकों से कहा कि यहां से भागो। जब ये दोनों थाना पहुंचे, तो थाना ने दबाव में मुकदमा लेने से मना कर दिया। यहां तक कि आवेदन फाड़ दिया। बाद में प्रतिवाद आंदोलन के बाद मुकदमा दायर किया गया। इस घटना के पीछे सामंती सोच के सामने आने की खबर है। पंचायत चुनाव में इन लोगों ने दबंगों को वोट नहीं किया था, जिसका बदला उन्होंने इस पाश्विक तरीके से लिया। बिहार की मीडिया में भी यह खबर आयी। लेकिन केवल एकआध जगह। खबर के सोशल मीडिया पर चलने से मामला गरम हुआ। फिर राजनीति भी गरमाई। सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्य की दलित उत्पीड़न रूके इस पर पहल तो जारी है। लेकिन, दलितों पर उत्पीड़न का बढ़ता मामला लोकतंत्र का सरासर अपमान प्रतीत होता है। तमाम कोशिशों के बावजूद दलित उत्पीड़न का लगातार बढ़ना चिंतनीय व सोचनीय है। मंदिर में प्रवेश के सवाल पर, 15 अगस्त के मौके पर तिरंगा फहराने के सवाल पर, मजदूरी मांगने के सवाल पर, दलित लड़के का द्विज लड़की से प्रेम का सवाल....हो या फिर कोई और सवाल। दलितों पर दंबग द्विजों का कहर समय-समय पर ढाया जाता रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनीति-सत्ता-प्रशासन में वंचितों के काबिज रहने के बावजूद यह कहर जारी है? दलित उत्पीड़न की घटना के बाद मामले पर राजनीतिक दलों के बीच बयानों से हमला का जो सिलसिला शुरू होता है उसमें मूल मुद्दे को दबाने की बू आती है। जिस राज्य की घटना होती है तो वहां के विपक्षी दलों का सत्तारूढ़ दल पर हमला शुरू हो जाता है। गुजरात दलित मुद्दे पर भाजपा पर हमला होता है। तो वहीं, बिहार में दलित मुद्दे पर राजद-जदयू-कांग्रेस घेरे में आते हैं। कोई भी घटना के मूल में नहीं जाता है। आखिर यह होता क्यों है। दलित उत्पीड़न पर दलितों के नेताओं का खामोश चेहरा भी सवालों के घेरे में आता है। सत्ता व पावर के लोभ में उनकी खामोशी और विरोधी तेवर नहीं दिखते हैं। तभी तो चर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपने ब्लाग पर सवाल उठाते लिखा हैं कि, लोकसभा में 131 अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसद हैं। इन सांसदों ने भी दलितों को अकेला छोड़ दिया है। ये सभी नाम तो बाबा साहब का लेते हैं मगर बाबा साहब जिनका नाम लेते थे, बस उनका ही नाम नहीं लेते। ये अपनी पार्टी और नेता का नाम लेते हैं मगर उस समाज का नाम नहीं लेते जिनके लिए बाबा साहब संसद में इन्हें बिठा गए हैं। नाम लेते तो इन सौ से अधिक दलित आदिवासी सांसदों के कलेजे पर भी हर लाठी के निशान मिलते। ये भी संसद की सीढ़ियों पर चीखते चिल्लाते। बोलते देश कि देखो हमको ठीक से, हम तुम्हीं हैं, तुम्हीं हम हो। हमारी पीठ, तुम्हारी पीठ है। हमें अपना समझो। संविधान और सरकारों से इंसाफ माँगते मगर ये सांसद भी चुप रहे। सब चुप रहे (कस्बा से साभार)। यही हाल बिहार विधानसभा में है यहाँ भी दलित सदस्यों की संख्या अच्छी खासी है लेकिन दलित उत्पीड़ मामले पर गोलबंदी नहीं दिखती। दलितों की हिमायती सरकार और दलित विरोधी सरकार के स्वर में असली मुद्दा गोल हो जाता है। दलित जहां खड़ा था वहीं खड़ा दिखता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)।  

बढ़ता दलित उत्पीड़न लोकतंत्र के गाल पर तमाचा !

संजय कुमार
देश में दलित उत्पीड़न की घटना की गूंज सड़क से संसद तक सुनाई पड़ी है। प्रधानमंत्री को जनसभा में कहना पड़ता है कि, दलितों को मत मारो, अगर मारना है तो मुझे मारो।
इसके बाद सरकार राज्य सरकारों को फरमान जारी कर हर हाल में दलित उत्पीड़न को रोकने की अपील भी होती है।
इसके बावजूद दलित उत्पीड़न रूकने का नाम नहीं ले रहा है?
प्रधानमंत्री की अपील और संसद में घटनाओं के विरोध के स्वर के बीच आंध्रप्रदेश के पूर्वी गोदावारी जिले में एक मृत गाय की खाल उतारने की कोशिश कर रहे दो दलित युवकों की पिटाई और आरोप में पुलिस की ओर से 10 अगस्त को आठ लोगों को गिरफ्तार किया जाना, शर्मनाक है।
8 अगस्त की रात को घटने वाली इस घटना को गाय और दलित से जोड़ देखा जा रहा है।
आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस घटना पर नाराजगी जाहिर करते हुए चेतावनी दी है कि दलितों पर हमला करने वाले या कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
तो वहीं, उत्तर प्रदेश के संभल के थाना गुन्नौर क्षेत्र के गांव गंगुर्रा में चिलचिलाती व उमसभरी गर्मी में खेत में काम कर रही एक 13 साल की दलित बच्ची जब डूंडा बाबा के मंदिर में लगे नल पर पानी पीने से मंदिर के पुजारी द्वारा पानी पीने से रोका जाता है।
बच्ची ने जब यह वाकया अपने पिता को बताया तो उन्होंने पुजारी से इसका विरोध जताया। इस पर मंदिर के पुजारी ने अपनी गलती मानने के बजाय दलित बच्ची के पिता पर त्रिशूल से जान लेवा हमला कर दिया।
पुलिस ने पहले मामले को रफा-दफा करना चाहा, लेकिन विरोध के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया।
त्रिशूल से घायल चरनसिंह को गंभीर अवस्था में गुन्नौर के सीएचसी में भर्ती कराया गया है।
गुजरात,बिहार,उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश सहित अन्य राज्य में तेजी से दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटना ने देश व समाज के समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
आज हम देश की आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहे है और आजाद भारत में हाशिये पर रहे वंचितों पर जुल्म ढाहा जा रहा है। इसके खिलाफ हालाँकि,सरकार ने भौंवे तान ली है।
हाल में ही, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के बाबूटोला में सामंतों द्वारा दो दलित युवकों के मुंह में पेशाब करने की घटना को देखें तो, देश व समाज के बदलने की वकालत करने वालों के गाल पर कस कर तमाचा मारा है।
राजनीतिक एवं सामाजिक आलोचना में गुजरात हो या फिर बिहार, हर जगह सामंती ताकतों पर घृणित स्तर पर उतरकर दलितों पर दमन ढाने और उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार करने को सभी ने बेहद शर्मनाक बताया।
सवाल भी उठा है कि आजादी के इतने सालों बाद भी इस देश में दलितों को सामंती ताकतों के बर्बर जुल्म से निजात नहीं मिल सकी है। गुजरात में जो हुआ पूरा देश जान गया। लेकिन, 20 जुलाई को मुज्जफरपुर के पारू में जो हुआ वह मानवीय संवेदना को तार-तार करने वाला साबित हुआ है।
मोटरसाइकिल चोरी का आरोप लगा कर दलित युवकों को मारा पीटा गया साथ ही उन्हें पेशाब पिलाया गया। इस दलित उत्पीड़न घटना के पीछे राजनीतिक संरक्षण का भी आरोप सामने आया है।
भाकपा-माले की एक जांच टीम ने 24 जुलाई को घटनास्थल का दौरा किया कर मीडिया के सामने सच को लाने का काम किया है।
जांच टीम ने कहा है कि बाबूटोला में दो दलित नवयुवक, जो आपस में साला-बहनोई हैं, राजीव पासवान और मुन्ना पासवान अपनी बाइक से यज्ञ देखने गए थे। जब वे यज्ञ से लौटे तो जहां पर उन्होंने अपनी बाइक खड़ी की थी, उस स्थान पर बाइक नहीं थी। वे अपनी बाइक ढूंढने लगे। तभी बगल के सुमन ठाकुर व सुशील ठाकुर ने पूछा क्या ढूंढ रहे हो?
जब इन दोनों युवकों ने कहा कि हमारी बाइक नहीं मिल रही, तो उन्होंने बाइक दिखलाते हुए कहा कि इसका कागज दिखलाओ।

फिर कहने लगे कि यह चोरी का बाइक है और दोनों दलित युवकों की पिटाई करने लगे।
उन्हें रॉड से पीटा गया व रूम में बंद कर दिया गया। उसके बाद गांव का मुखिया पति मुकुल ठाकुर पहुंचा और उसने कहा कि इनके मुंह में पेशाब कर दिया जाए।
उसके आदेश पर उन दलित युवकों के मुंह में पेशाब कर दिया गया। जब इन युवकों को बचाने के लिए उनके पिता आए तो उनके गर्दन में कपड़ा लपेटकर उन्हें भी पीटा गया।
उसके बाद यज्ञ में खड़ी पुलिस ने आकर उन दलित युवकों से कहा कि यहां से भागो। जब ये दोनों थाना पहुंचे, तो थाना ने दबाव में मुकदमा लेने से मना कर दिया। यहां तक कि आवेदन फाड़ दिया।
बाद में प्रतिवाद आंदोलन के बाद मुकदमा दायर किया गया।
इस घटना के पीछे सामंती सोच के सामने आने की खबर है। पंचायत चुनाव में इन लोगों ने दबंगों को वोट नहीं किया था, जिसका बदला उन्होंने इस पाश्विक तरीके से लिया।
बिहार की मीडिया में भी यह खबर आयी। लेकिन केवल एकआध जगह। खबर के सोशल मीडिया पर चलने से मामला गरम हुआ। फिर राजनीति भी गरमाई।

सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्य की दलित उत्पीड़न रूके इस पर पहल तो जारी है।
लेकिन, दलितों पर उत्पीड़न का बढ़ता मामला लोकतंत्र का सरासर अपमान प्रतीत होता है। तमाम कोशिशों के बावजूद दलित उत्पीड़न का लगातार बढ़ना चिंतनीय व सोचनीय है। मंदिर में प्रवेश के सवाल पर, 15 अगस्त के मौके पर तिरंगा फहराने के सवाल पर, मजदूरी मांगने के सवाल पर, दलित लड़के का द्विज लड़की से प्रेम का सवाल….हो या फिर कोई और सवाल। दलितों पर दंबग द्विजों का कहर समय-समय पर ढाया जाता रहा है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनीति-सत्ता-प्रशासन में वंचितों के काबिज रहने के बावजूद यह कहर जारी है? दलित उत्पीड़न की घटना के बाद मामले पर राजनीतिक दलों के बीच बयानों से हमला का जो सिलसिला शुरू होता है उसमें मूल मुद्दे को दबाने की बू आती है। जिस राज्य की घटना होती है तो वहां के विपक्षी दलों का सत्तारूढ़ दल पर हमला शुरू हो जाता है। गुजरात दलित मुद्दे पर भाजपा पर हमला होता है। तो वहीं, बिहार में दलित मुद्दे पर राजद-जदयू-कांग्रेस घेरे में आते हैं। कोई भी घटना के मूल में नहीं जाता है।

आखिर यह होता क्यों है। दलित उत्पीड़न पर दलितों के नेताओं का खामोश चेहरा भी सवालों के घेरे में आता है।

सत्ता व पावर के लोभ में उनकी खामोशी और विरोधी तेवर नहीं दिखते हैं। तभी तो चर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपने ब्लाग पर सवाल उठाते लिखा हैं कि, लोकसभा में 131 अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसद हैं।
इन सांसदों ने भी दलितों को अकेला छोड़ दिया है। ये सभी नाम तो बाबा साहब का लेते हैं मगर बाबा साहब जिनका नाम लेते थे, बस उनका ही नाम नहीं लेते। ये अपनी पार्टी और नेता का नाम लेते हैं मगर उस समाज का नाम नहीं लेते जिनके लिए बाबा साहब संसद में इन्हें बिठा गए हैं।
नाम लेते तो इन सौ से अधिक दलित आदिवासी सांसदों के कलेजे पर भी हर लाठी के निशान मिलते। ये भी संसद की सीढ़ियों पर चीखते चिल्लाते। बोलते देश कि देखो हमको ठीक से, हम तुम्हीं हैं, तुम्हीं हम हो। हमारी पीठ, तुम्हारी पीठ है। हमें अपना समझो। संविधान और सरकारों से इंसाफ माँगते मगर ये सांसद भी चुप रहे। सब चुप रहे (कस्बा से साभार)।
यही हाल बिहार विधानसभा में है यहाँ भी दलित सदस्यों की संख्या अच्छी खासी है लेकिन दलित उत्पीड़ मामले पर गोलबंदी नहीं दिखती। दलितों की हिमायती सरकार और दलित विरोधी सरकार के स्वर में असली मुद्दा गोल हो जाता है। दलित जहां खड़ा था वहीं खड़ा दिखता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)।
 

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