बस्तर में लोकतंत्र की बहाली के लिए राजनैतिक दलों व जनसंगठनों का धरना कल बूढ़ापारा में

बस्तर में लोकतंत्र की बहाली के लिए राजनैतिक दलों व जनसंगठनों का धरना कल बूढ़ापारा में 
मनीष कुंजाम और सोनी सोरी भी लेंगी हिस्सा.

रायपुर,20 नवंबर। बस्तर में लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर गैर-भाजपा राजनैतिक दल और जनसंगठन एक मंच पर आ रहे हैं.

वामपंथी पार्टियों की पहल पर कल बूढ़ापारा में आयोजित धरने में आप और जद(यूं) तो भाग लेगी ही, कांग्रेस के भी भाग लेने की संभावना है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और बस्तर बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति से जुड़े विभिन्न जनसंगठनों सहित नदी घाटी मोर्चा और संस्कृतिकर्मियों के संगठन भी इस धरना में शामिल होंगे.
भाकपा नेता मनीष कुंजाम और आप नेता सोनी सोरी के भी इस धरना में शामिल होने की संभावना है.
इन पार्टियों और संगठनों के प्रतिनिधि बस्तर में माओवाद से निपटने के नाम पर राज्य-प्रायोजित हिंसा के खिलाफ आईजी एसआरपी कल्लूरी की बर्खास्तगी और रमन सरकार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. अरविंद नेताम और आदिवासी संगठनों के नेतृत्व में कल ही बस्तर में आर्थिक नाकेबंदी का आह्वान भी किया गया है.

पिछले ही दिनों माकपा कार्यालय में नेताम की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई थी. बैठक में राज्य सरकार द्वारा कल्लूरी को संरक्षण दिए जाने की तीखी निंदा की गई थी. यह संरक्षण तब भी दिया जा रहा है, जबकि ताड़मेटला कांड में सीबीआई ने कल्लूरी के खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी है और मानवाधिकार आयोग ने भी उसे पेश होने की नोटिस जारी कर दी है. फर्जी मुठभेड़ों की कई कहानियां पुख्ता सबूतों के साथ सामने आ रही है, जिसका अदालत में जवाब देना सरकार के लिए भी संभव नहीं हो पा रहा है. राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित वकीलों, पत्रकारों और आम आदिवासियों के अधिकारों पर दमन के किस्सों में एक नया मामला तब और जुड़ गया, जब जेएनयू-डीयू के प्रोफेसरों और माकपा-भाकपा के नेताओं पर एक आदिवासी की हत्या का मामला दर्ज कर उन पर जन सुरक्षा क़ानून थोपने की धमकी कल्लूरी द्वारा दी गई. इस मामले की व्यापक प्रतिक्रिया हुई और सरकार को सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन देना पड़ा है कि इन सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

इन पार्टियों और संगठनों का आरोप है कि बस्तर में नए तरीके से फिर से सलवा जुडूम की शुरूआत की का रही है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में ही प्रतिबंध लगा दिया है. यह मुहिम इसलिए चलाई जा रही है कि बस्तर की प्राकृतिक संपदा और संसाधनों को कार्पोरेट घरानों को सौंपा जा सके.

भाजपा सरकारों की इस नीति का शिकार सीधे आदिवासियों को ही होना पड़ रहा है, जिन्हें बड़े पैमाने पर जल-जंगल-जमीन से बेदर्दी से बेदखल किया जा रहा है. इसके लिए बस्तर में राजनैतिक दलों को भी निशाना बनाया जा रहा है.
भाकपा नेता मनीष कुंजाम की पत्रकार वार्ता में पुलिस की मौजूदगी में हुआ हमला और सोनी सोरी पर किया गया हमला इसी बात का सबूत है.
इन पार्टियों और संगठनों ने स्पष्ट किया है कि बस्तर में राजनैतिक कार्य करना, आदिवासियों को संगठित कर भाजपा की आदिवासी-विरोधी नीतियों के खिलाफ जनआंदोलन विकसित करना और आम नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नागरिक और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करना उनका अधिकार है और भाजपा सरकार व उसका पुलिस प्रशासन इसे किसी भी हालत में नहीं छीन सकता.

उन्होंने कहा कि बस्तर की स्थिति की गंभीरता को पूरे प्रदेश और देश की आम जनता के सामने रखने और यहां लोकतंत्र की बहाली के लिए व्यापक अभियान चलाया जाएगा और यह धरना इसी की एक कड़ी है

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