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News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

बीमा विधेयक- पढ़ें भारतीय संसद कैसे बनी अमेरिकी हितों की मैनेजर

बीमा विधेयक (Insurance bill) – बीमा में एफडीआई (FDI in insurance) का भारत के विकास से कोई ताल्‍लुक नहीं जानिये कि कैसे इस देश की संसद अमेरिकी कंपनियों की मैनेजर (American companies manager) बन जाती है और कम्‍युनिस्‍ट आर्थिक मसलों पर अगर चिल्‍लाते हैं, तो क्‍यों उनकी चीख-पुकार को गंभीरता से सुना जाना चाहिए

नई दिल्ली। अगर छह साल पहले बीजेपी बीमा विधेयक के खिलाफ़ थी तो आज कैसे यह इतनी आसानी से पारित हो गया? आखिर कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों को जो शक़ था वह क्‍यों सही था? बीमा में एफडीआइ का भारत के विकास से कोई ताल्‍लुक क्‍यों नहीं है? यह फैसला कैसे सिर्फ अमेरिकी कंपनियों, रोजगारों और नीतियों के हित में है? भारत को कैसे समझाया गया कि बीमा क्षेत्र को खोलना उसके हित में है? कब से चल रही थी इसके लिए लॉबींग?

धैर्य से पढ़िए अमेरिका की 300 बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि संगठन की ओर से अमेरिकी व्‍यापार आयोग को पिछले साल दी गई गवाही का हिंदी में पूरा तर्जुमा।

जानिये कि कैसे इस देश की संसद अमेरिकी कंपनियों की मैनेजर बन जाती है और कम्‍युनिस्‍ट आर्थिक मसलों पर अगर चिल्‍लाते हैं, तो क्‍यों उनकी चीख-पुकार को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दस महीने में पहली ऐसी कामयाबी मिली है जो वाशिंगटन में बैठे उनके आकाओं के दिलों को चढ़ती गर्मी में ठंडक पहुंचाएगी।

कल यानी 12 मार्च को संसद में छह साल से लटका बीमा विधेयक पारित कर दिया गया। इसके मुताबिक भारत के बीमा क्षेत्र में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश की सीमा (FDI limit in India’s insurance sector) को 26 फीसद से बढ़ाकर 49 फीसद कर दिया जाएगा। विधेयक पारित होते ही एचडीएफसी लाइफ के प्रत्‍याशित आइपीओ की उम्‍मीद में शेयर बाज़ार सूचकांक ने उछाल मारी है जो पिछले तीन सत्र से लगातार गिर रहा था।

ध्‍यान रहे कि कांग्रेस जब 2008 में यह विधेयक लेकर आई थी तब बीजेपी ने इसका विरोध किया था। अब दोनों ने मिलकर इसे पारित करवा दिया है, तो इसके पीछे पिछले एक साल से चल रही अमेरिकी बीमा कंपनियों की जबरदस्‍त लॉबिंग थी, जिसका सबूत नीचे दी जा रही सामग्री है।

अमेरिका के अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार आयोग के समक्ष अमेरिका की ही 300 बीमा कंपनियों का प्रतिनिधित्‍व करने वाले संगठन अमेरिकन इंश्‍योरेंस एसोसिएशन ने पिछले साल 13 फरवरी को एक गवाही दी थी जिसमें विस्‍तार से बताया गया था कि भारत में बीमा क्षेत्र को और खोला जाना अमेरिकी कंपनियों के लिए क्‍यों अहम है। इस गवाही को हूबहू पढ़कर हम समझ सकते हैं कि भारत के बीमा क्षेत्र में 49 फीसद एफडीआइ लाया जाना कैसे पूरी तरह अमेरिकी फायदे के लिए लिया गया निर्णय है और यह भी समझ सकते हैं कि इस देश की कम्‍युनिस्‍ट पार्टियां क्‍यों इस विधेयक के इतना खिलाफ़ थीं – अभिषेक श्रीवास्तव

यूएस इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन के समक्ष अमेरिकन इंश्योरेंस एसोसिएशन की गवाही भारत में व्यापार, निवेश और औद्योगिक नीतियांः अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पर सुनवाई स्टीफेन एम.एच. सिमचक: 13 फरवरी, 2014 अमेरिकन इंश्योरेंस एसोसिएशन (एआइए) की ओर से मैं यूएस इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन (आइटीसी) के समक्ष यह गवाही देने में हर्ष महसूस कर रहा हूँ।

एआइए अमेरिका का एक अग्रणी प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमा संगठन है जो 300 अहम अमेरिकी बीमा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है जो अमेरिका और दुनिया भर के ग्राहकों को संपत्ति और आपात स्थिति का बीमा उपलब्ध कराती हैं।

एआइए के सदस्य अमेरिकी प्रीमियम के तौर पर सालाना 117 अरब डॉलर की राशि एकत्रित करते हैं और दुनिया भर में प्रीमियम के बतौर 225 अरब डॉलर की राशि का कारोबार करते हैं। एआइए के सदस्यों में दुनिया के सर्वाधिक सक्रिय प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमाकर्ता शामिल हैं। हम इस बात की सराहना करते हैं कि आइटीसी भारत में व्यापार, निवेश और औद्योगिक नीतियों तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभावों के संदर्भ में यह पड़ताल कर रही है।

प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमा क्षेत्र में निवेश में व्यापार संबंधी दूसरे देशों में आने वाले अवरोधों के अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित करने में आइटीसी अग्रणी रही है, विशेष तौर से 2009 में किए गए अपने अन्वेषण ‘‘प्रॉपर्टी एंड कैजुअल्टी इंश्योरेंस सर्विसेज़ः कम्पिटीटिव कंडीशंस इन फॉरेन मार्केट्स’’ में की गई जांच अहम थी।

इसी अन्वेषण में आइटीसी ने यह निष्कर्ष निकाला था कि अन्वेषित सभी देश यदि सीमापार प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमा निर्यात को पूरी तरह उदारीकृत कर दें तो अमेरिकी निर्यात 48 फीसदी (870 मिलियन डॉलर) बढ़ जाएगा और अमेरिकी स्वामित्व वाली कंपनियों की बिक्री 28 फीसदी (39.1 अरब डॉलर) बढ़ जाएगी यदि इन सभी देशों में इन कंपनियों की बिक्री पर लगी बंदिशों का पूर्ण उदारीकरण कर दिया जाता है।

आइटीसी ने माना था कि ऐसे उदारीकरण से अमेरिका में रोजगारों में पर्याप्त बढ़ोतरी होगी। ऐसे रोजगारों में औसत वेतन-भत्तों से ज्यादा देय होगा। इस निष्कर्ष की पुष्टि दो साल बाद प्रोफेसर ब्रैड जेनसन ने भी की जब उन्होंने कहा कि बीमा और अन्य वित्तीय क्षेत्रों में वे नौकरियां जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संबद्ध हैं, उनमें औसतन 20,000 डॉलर से ज्यादा सालाना भुगतान होता है बजाय उन क्षेत्रों की नौकरियों के जिनका अंतरराष्ट्रीय व्यापार से कोई लेना-देना नहीं है।

आइटीसी के विश्लेषण ने यह साफ कर दिया कि हमारे किसी भी व्यापारिक साझीदार की ओर से खड़ा किया गया ऐसा कोई अवरोध अमेरिका में नौकरियों को नुकसान पहुंचाता है और भारत इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। ऐसे रोजगार सीमापार निर्यात से पैदा होते हैं और अमेरिका में बैठे उन कर्मचारियों से संबंधित हैं जो वहां की कंपनियों के अनुषंगियों के सीमापार परिचालन को देखते हैं। भले ही बीमा क्षेत्र के कई रोजगारों को उन देशों में स्थानांतरित करना होता है जहां कंपनी कारोबार कर रही हो (मसलन बिक्री एजेंट), लेकिन जब अमेरिकी मुख्यालय वाली कोई कंपनी विदेश में अपना विस्तार करती है तो सामान्यतः वह अपने विदेशी अनुषंगी के प्रबंधन से जुड़े कई काम अपने अमेरिकी मुख्यालय से ही देखती है। इसीलिए जैसा कि आइटीसी ने पाया, अगर भारत में अमेरिकी निवेश वाली ज्यादा बीमा कंपनियां हुईं, तो वे कंपनियां भारत में रोजगार पैदा करेंगी और साथ ही अमेरिका में उनसे रोजगार सृजन होगा।

मेरा मानना है कि बीमा क्षेत्र इस बात का अहम उदाहरण है कि कैसे भारत में चलने वाली नीतियां अमेरिका की ओर से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश में बाधा का काम कर सकती हैं। आइटीसी की ओर से ऐसी पड़ताल जो बीमा व्यापार और निवेश की अहमियत को दिखाती है, वह ऐसे मसलों को यहां नीति निर्माताओं के वैश्विक आर्थिक एजेंडे के आलोक में सामने रखने में मददगार है।

आइटीसी ने इस काम में अब तक जो मेहनत की है हम उसकी सराहना करते हैं और 2009 की रिपोर्ट के आधार पर भारत में व्यापार और निवेश संबंधी अवरोधों की लागत से जुड़ी समग्र तस्वीर निर्मित करने में आइटीसी के अर्थशास्त्रियों व अन्य स्टाफ के साथ मिलकर काम करने की उम्मीद जताते हैं।

इन मसलों पर यूएस ट्रेड रेप्रेजेंटेटिव, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स और अन्य अमेरिकी एजेंसियों द्वारा दिए गए ध्यान की भी मैं सराहना करता हूँ। भारतीय बाजार का अवलोकन आर्थिक वृद्धि और बीमा की मांग हमजोली हैं और जब सरकारी लालफीताशाही से निजात पा ली जाती है, तो निजी बीमाकर्ता उस मांग को पूरा करने के लिए तैयार होते हैं। बीमाकर्ताओं के लिए भारत में अपार संभावनाएं मौजूद हैं क्योंकि

1) यहां अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले तेजी से आर्थिक वृद्धि हो रही है;

2) इसकी भारी आबादी लगातार बढ़ती जा रही है जिससे संभवित बीमा ग्राहकों की संख्या भी बढ़ रही है;

3) कई विकासशील देशों के मुकाबले यहां का बीमा क्षेत्र ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है;

4) गैर-जीवन बीमा क्षेत्र में बीमा का फैलाव अब भी काफी कम 0.8 फीसदी है। बीमा नियामक एवं विकास अधिकरण कानून 1999 के आने के बाद से यहां जब 1972 में राष्‍ट्रीयकरण के बाद पहली बार निजी बीमा कंपनियों को काम करने की छूट दी गई, तब से भारत का बीमा बाजार लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर रहा है।

फिलहाल अमेरिकी बीमा कंपनियां मेटलाइफ, प्रूडेंशियल, अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप, लिबर्टी म्यूचुअल भरत में संयुक्त उपक्रम चला रहे हैं और अन्य प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमाकर्ताओं की मानें तो यहां ऑटो बीमा की मांग बहुत तेज है। प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी प्रीमियम में इसका हिस्सा 40 फीसदी से ज्यादा है।

फायर इंश्योरेंस की मांग भी काफी मजबूत है जो कुल प्रीमियम में 11 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। इसके अलावा कॉरपोरेट लायबिलिटी बीमा की भी मांग तेजी पर है। इसके बावजूद भारत में बीमा अभी आवश्यकता से काफी नीचे है। मसलन, विश्व आर्थिक मंच प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमा के फैलाव के मामले में 62 देशों में भारत को 52वें स्थान पर रखता है। बीमा का कम फैलाव और सघनता जहां नए खिलाड़ियों को अवसर प्रदान करती है, वहीं बीमा का अभाव समूची अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए खतरा भी पैदा करता है।

भारतीय निगम जैसे-जैसे आकार और संख्या में बढ़ते जा रहे हैं, उन्हें अपनी संपत्ति और उत्पादों को बीमित करने की जरूरत आन पड़ रही है ताकि वे खुद को जवाबदेही से बचा सकें। भारत की आबादी जैसे जैसे बढ़ रही है और ज्यादा संपन्न होती जा रही है, निजी बीमा की जरूरत भी उसी क्रम में लगातार बढ़ती जाएगी। किसी भी देश में आर्थिक और सामाजिक स्थिरता सीधे तौर पर उस देश में बीमा की ग्राहकी से जुड़ी होती है।

ज्यादा बीमा कवरेज का अर्थ यह होगा कि भारत में कंपनियों और व्यक्तियों को विशाल ‘‘रेनी डे फंड’’ की जरूरत नहीं रह जाएगी और इसके बजाय वे पैसे का निवेश अपने कारोबारों के विस्तार, शिक्षा अथवा अपने समुदाय में किसी और तरीके से कर सकते हैं।

बीमा यह भी गारंटी देता है कि कोई खराब फसल, किसी कर्मचारी की ओर से किया गया कोई दुर्व्‍यवहार, वाहन दुर्घटना या कोई अन्य अप्रत्याशित घटना कंपनी को दिवालिया नहीं बना देगी या परिवार को बरबाद नहीं कर डालेगी।

कायदे से बीमा करवा के आप खुद को किसी भी हादसे की सूरत में खुद को बरबाद होने से बचा सकेंगे। बीमा से जो जोखिम टलता है वह बड़े कारोबारों के लिए तकरीबन अनिवार्य होता है लेकिन यह कहीं ज्यादा अहम लघु, अतिलघु और मझोले उद्यमों के लिए होता है जिनका आकार इतना बड़ा नहीं होता कि वे किसी भी झटके को सह लें।

अनुमान के मुताबिक भारत में ऐसे करीब 2.6 करोड़ उद्यम हैं जिसमें 1.5 करोड़ छोटे रीटेल आउटलेट भी शामिल हैं। यही वे लघु, अतिलघु और मझोले उद्यम हैं जो भारत जैसी उद्यमिता आधारित मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव हैं और इनकी आर्थिक स्थिरता राष्ट्रीय हित के लिहाज से एक बड़ा मसला है। क्र की बात है कि भारत सरकार ने इस बात को स्वीकार किया है कि देश में जरूरत से कम बीमा है और इस वजह से देश की बारहवीं पंचवर्षीय योजना में (2012-17) बीमा कवरेज के विस्तार को सार्वजनिक नीति का लक्ष्य घोषित किया है।

भारतीय बीमा नियामक प्राधिकरण (इरडा) भारत में नए खिलाड़ियों के बाजार में प्रवेश को प्रोत्साहित करता है और उन्हें मौका देता है कि वे नए और नवाचारी उत्पादों की पेशकश कर सें जो सरकारी बीमाकर्ता नहीं देते, जबकि उनके पास गैर जीवन बीमा प्रीमियम का 60 फीसदी आता है।

अमेरिकी बीमा कंपनियां इस जरूरत को पूरा करने में सक्षम हैं क्योंकि उनके पास वह अनुभव और तरीका है जिससे वे भारत की आबादी की बढ़ती मांग को पूरा कर सकते हैं। वे विशिष्ट, नवाचारी और वैश्विक उत्पाद वे नेटवर्क पेश करते हैं जो स्थानीय बीमा कंपनियों के उत्पादों से उलट हैं जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से निम्न दरजे के उत्पाद मुहैया कराए हैं जो मानकों पर खरे नहीं उतरते।

भारत में अमेरिकी भागीदारी को रोकने वाली चुनौतियां भारत में बीमा बाजार को खोले जाने के 14 साल बाद भी यहां ऐसे अवरोध मौजूद हैं जो अमेरिकी बीमा व्यापार और निवेश को उसकी क्षमता के हिसाब से काम नहीं करने दे रहे हैं। आइटीसी ने 2009 में किए अपने अन्वेषण में इस स्थिति को स्वीकार किया था जब उसने प्रोपर्टी-कैजुअल्टी बीमा व्यापार के मामले में भारत को अधिकतर प्रतिबंधात्मक देशों के बीच नीचे के तीसरे पायदान पर रखा था जो सिर्फ ब्राजील, अर्जेंटीना, चीन, वेनेजुएला आदि से ही ऊपर था।

1) एफडीआइ की सीमा निवेश में सबसे अहम और सबसे स्वाभाविक अवरोध भारत में बीमा कंपनियों के भीतर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा है जिसने बेशक अमेरिकी बीमाकर्ताओं को भारतीय बाजार में घुसने से हतोत्साहित किया है और जो इस बात की व्याख्या है कि आखिर क्यों कई विदेशी बीमाकर्ता जिनमें अमेरिकी भी शामिल हैं, हाल ही में भारत से क्यों निकल गए हैं। फिलहाल यह सीमा 26 फीसदी है जो इस क्षेत्र में सबसे कम है। परिणामस्वरूप, भारत में आने वाले सभी विदेशी बीमाकर्ताओं को एक साझीदार खोजना पड़ता है ताकि अपने निवेश का 74 फीसदी हिस्सा उससे पूरा करवा सके।

चीन, कोरिया, ताइवान और मैक्सिको में प्रोपर्टी-कैजुअल्टी बीमा कंपनियों में विदेशी मालिकाना 100 फीसदी है। यहां तक कि मलेशिया और फिलिपीन्स में भी 50 फीसदी से ज्यादा मालिकाने की छूट है। इसके अलावा भारत के वित्तीय क्षेत्र के भीतर अन्य वित्तीय उत्पादों के मुकाबले बीमा में एफडीआई की सीमा सबसे कम है, मसलन बैंकों में 74 फीसदी विदेशी मालिकाना हो सकता है जबकि आस्ति प्रबंधन कंपनियों में 100 फीसदी मालिकाने की छूट है।

मौजूदा स्थिति भारत सरकार ने पहले यह घोषणा की थी कि वह 2004 में एफडीआइ की सीमा को बढ़ाकर 49 फीसदी कर देगी, लेकिन एक दशक बाद तक वह 26 फीसदी बना हुआ है और इससे संबंधित विधेयक भारतीय संसद में लंबित है।

इस फैसले का समर्थन कांग्रेसनीत भारत सरकार कर रही है, लेकिन घरेलू सियासी वजहों के चलते विपक्ष ने इसमें अड़ंगा डाल रखा है। सीमा बढ़ाने के लाभ वैसे तो 49 फीसदी की सीमा भी एक अवरोध ही होगी, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यह सही दिशा में एक कदम होगा जिसका लाभ बीमाकर्ताओं और बीमितों को एक साथ मिलेगा।

बीमा में एफडीआइ की सीमा बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में दीर्घकालीन विदेशी निवेश आएगा जिसका एक बड़ा हिस्सा अमेरिका से होगा। इसके अलावा अन्य विदेशी कंपनियां भी अपने संयुक्त उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकेंगी।

फिलहाल, भारत में 24 जीवन बीमा कंपनियों में से 22 और 27 गैरजीवन बीमा कंपनियों में से 18 के संयुक्त उपक्रम मौजूद हैं। भारत सरकार ने भारत में बीमा के कम फैलाव और सघनता की समस्या को स्वीकार किया है और माना है कि बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था समेत हर तबके की सामाजिक जरूरतों के लिहाज से यह एक समस्या है, लेकिन बीमा कवरेज के विस्तार में पूंजी की जरूरत होगी।

ज्यादा पाॅलिसी करने, वितरण नेटवर्क फैलाने, स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षित और नियुक्त करने तथा इन सबसे ज्यादा अहम साॅल्वेंसी की जरूरतों को पूरा करने में बेशक बड़ी पूंजी की जरूरत होगी। इसके अलावा उद्योग में 49 फीसदी की एफडीआइ सीमा होने से समय के साथ बाजार में नए खिलाड़ी आएंगे।

कई अमेरिकी बीमा कंपनियां हैं जो भारत में आना चाहती हैं, लेकिन वे एफडीआइ सीमा को बढ़ाए जाने और बंदिशों को हटाए जाने का इंतजार कर रही हैं। यहां तक कि जो कंपनियां 26 फीसदी की सीमा पर भी भारतीय बाजार में उतरने को तैयार हैं, उन्हें एक उपयुक्त संयुक्त उपक्रम साझीदार को खोजने में दिक्कतें पैदा होती हैं तथा स्वामित्व में अल्पमत होने के नाते उन्हें अपनी कॉरपोरेट राजकाज की नीतियां लागू करने में चुनौती आती है। अकेले अमेरिकी बीमाकर्ता ही नहीं चाहते कि भारत में एफडीआइ की सीमा बढ़े।

ग्लोबल फेडरेशन ऑफ इन्श्योरेंस एसोसिएशंस (जीएफआइए), जिसका एआइए भी सदस्य है, दुनिया भर के 37 राष्ट्रीय बीमा संघों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्य दुनिया भर में कुल 87 फीसदी बीमा प्रीमियमों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जीएफआइए ने लगातार भारत में एफडीआइ की सीमा बढ़ाने की मांग की है और पिछली बार उसने 28 नवंबर 2013 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस बारे में एक खत लिखा था। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने अगस्त 2013 में भारत के लिए अपनी फाइनेंशियल सेक्टर असेस्मेंट प्रोग्राम की रिपोर्ट जारी की। इसमें आइएमएफ ने भारत को बीमा नियमन और इरडा को धन्यवाद देते हुए यह अनुरोध किया कि एफडीआइ सीमा को बढ़ाने से जुड़ा बीमा संशोधन विधेयक जल्द से जल्द पास किया जाए।

एफआइआइ से ज्यादा अहम क्यों है एफडीआइ भारतीय संसद के हालिया सत्रों में यह बात सामने आई थी कि बीमा कानून में संशोधन पर एक समझौता संभव है जिसमें कांग्रेस और विपक्षी बीजेपी इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि बीमा क्षेत्र में इक्विटी को बढ़ाने के लिए एफडीआइ के बजाय एफआइआइ (विदेशी संस्थागत निवेशक) का रास्‍ता अपनाया जाए। यदि ऐसा हुआ तो अमेरिकी बीमाकर्ता इसे अपने अनुकूल नहीं मानेंगे और इसका मतलब यह नहीं होगा कि बीमा निवेश की राह में लगा अवरोध समाप्त हो गया है।

जरूरी यह है कि इक्विटी बढ़ोतरी एफडीआइ के रास्ते हो न कि एफआइआइ के रास्ते क्योंकि एफआइआइ के रास्ते कोई भी निवेश सटोरिया निवेशकों को प्रोत्साहित करेगा जबकि गंभीर और दीर्घकालीन कारोबार की मंशा रखने वाले एफडीआइ निवेशकों जैसे बीमा कंपनियों के खिलाफ जाएगा।

2) नियामक प्रत्याशा और पारदर्शिता अमेरिकी बीमा कंपनियों के सीईओ अपनी संभावना वाले किसी भी बाजार में ‘‘नियामक प्रत्याशा’’ और ‘‘नियमन की पारदर्शिता’’ को काफी अहमियत देते हैं। मैं जितनी बीमा कंपनियों को जानता हूँ उनमें से कोई भी सशक्त और मजबूत नियमन की अवहेलना नहीं करती है जो उपभोक्ताओं का संरक्षण करने में सक्षम होता है और जब कभी जरूरी हो, व्यवस्थागत जोखिमों से उनका बचाव करता है। लेकिन हम यह मानते हैं कि नियामक अपनी बाध्यताओं को इस समझदारी के साथ पूरा करें कि मुक्त उद्यम के लिए अनावश्यक अवरोधों को हटाना अहम है और साथ संरक्षण के जरूरी स्तर का भी अनुपालन करें। यह मौजूदा नियमों में बदलावों समेत नए उत्पादों को मंजूरी पर भी लागू होता है जो कि भारत जैसे देश में अकसर ही लंबा वक्त लेता है।

मैं भले ही प्रॉपर्टी-कैजुअल्टी बीमा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूँ, लेकिन जीवन बीमा के क्षेत्र में नियामक मसलों के प्रभाव का एक ताजा उदाहरण गिनाना चाहता हूँ जो नियामक प्रत्याशा और पारदर्शिता की अहमियत को रेखांकित करता है। 2009 में जीवन बीमा प्रीमियम की कुल राशि 55.9 अरब डॉलर थी जो भारत के जीडीपी का 4.6 फीसदी है। जीवन बीमा का एक उत्पाद जिसमें काफी वृद्धि देखने को मिली वह था यूलिप (यूनिट लिंक्ड बीमा उत्पाद), जो कुल बिक्री का 85 फीसदी रहा।

2010 में यूलिप के नियमन पर सरकार की आंतरिक बहसों में अपनी प्रतिक्रिया में वित्त मंत्रालय ने यूलिप के नियमन के लिए इरडा को अधिकृत किया लेकिन यूलिप के ढांचे पर कहीं ज्यादा कठोर नियंत्रण लागू करते हुए एजेंटों के मुआवजे का तरीका भी तय किया।

भारत सरकार ने यूलिप पर नई बंदिशें लागू करते हुए उ़द्योग की चिंताओं को ज्यादा तरजीह नहीं दी। उसे पर्याप्त नोटिस नहीं दिया गया और प्रतिक्रिया का वक्त भी नहीं दिया गया। नए नियमों के प्रभाव पर भी कोई अध्ययन नहीं हुआ। तकरीबन रातोरात जीवन बीमा के इस अहम हिस्से को पूरी तरह रूपांतरित किर दिया गया और सभी मौजूदा यूलिप को रद्द कर दिया गया। नए उत्पादों की मंजूरी कम समय में लेने का प्रावधान किया गया जिसके चलते यूलिप का स्थान लेने के लिए प्रस्तावित कई नए उत्पाद धरे के धरे रह गए जिससे उपभोक्ताओं समेत कंपनियों को भी नुकसान झेलना पड़ा। जीवन बीमा नियमन में इस तीव्र बदलाव के चलते हर साल बीमा प्रीमियम घटने लगा।

2012 में जीवन बीमा प्रीमियम जीडीपी का सिर्फ 3.19 फीसदी रह गया और यह जीडीपी में उसके हिस्से में आई 31 फीसदी की गिरावट थी। मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि भारत सरकार ने यह फैसला बहुत जरूरी वजह से लिया। यह उपभोक्ता संरक्षण का मामला था जिसमें कई एजेंट यूलिप पर अप्रत्याशित रिटर्न की बात कह रहे थे।

सशक्त बीमा नियमन में उपभोक्ता संरक्षण एक मजबूत स्तंभ होता है और उद्योग इसका समर्थन करता है।

मैं यह नहीं कहना चाह रहा कि भारत सरकार और इरडा ने बीमा क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से यह फैसला किया था। इस मामले में उद्योग के साथ उत्कृष्ट वैश्विक आचार के संदर्भ में परामर्श अगर किया जाता तो कहीं ज्यादा अहानिकर नियमन को शक्ल दी जा सकती थी और बीमाकर्ताओं को आने वाले बदलावों के संदर्भ में अपने आचार को समन्वित करने का मौका भी दिया जा सकता था।

नियमन के प्रभावों पर परामर्श का अभाव ही वह वजह है जिसके चलते अमेरिकी बीमा एग्जीक्यूटिव भारत में निवेश को लेकर इतने सतर्क और चिंतित हैं।

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है जिसके चलते हम मानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था, अमेरिकी बीमाकर्ताओं की भारत में कारोबार करने की सामर्थ्‍य और भारत में बीमा क्षेत्र की कुल मजबूती को कहीं ज्यादा मदद की जा सकती यदि नियामक सुधारों में अधिक प्रत्याशा और पारदर्शिता का खयाल रखा जाता।

भारत अभी वित्तीय क्षेत्र पर बने विधायी सुधार आयोग की सिफारिशों के आलेाक में वित्तीय क्षेत्र की नियामक एजेंसियों में बदलाव पर विचार कर रहा है। हमें उम्मीद है कि वे परामर्श की सशक्त प्रक्रिया अपनाएंगे और नियामकों में बदलावों से होने वाले प्रभावों पर अध्ययन के प्रति वचनबद्धता जताते हुए नए उत्पादों की समीक्षा में तेजी लाएंगे।

3) पुनर्बीमा (रीइंश्‍योरेंस) फिलहाल भारत में पुनर्बीमा करने वालों यानी रीइंश्योररों को शाखाओं के तौर पर काम करने की छूट नहीं है और सरकारी कंपनी जनरल इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया ही अकेले भारत में पुनर्बीमा का काम करती है।

दुनिया भर में रीइंश्योरेंस का व्यापक इस्‍तेमाल होता है और यह असंबद्ध बीमा व पुनर्बीमा कंनियों के बीच तथा संबद्ध बीमा कंपनियों के बीच भी इस्तेमाल किया जाता है। रीइंश्योरेंस का इस्तेमाल जोखिम को बांटने और आपदाओं की सूरत में संरक्षण दिलवाने के लिए होता है ताकि वैश्विक कंपनियां जोखिमों का प्रबंधन कर के उनका विविधीकरण कर सकें।

भारत में शाखा के तौर पर पुनर्बीमा कंपनियों को काम करने देने की छूट देकर भारत के बाजार में ग्लोबल रीइंश्योरर को ज्यादा भागीदारी दी जा सकती है। इसके अलावा भारत में कैजुअल्टी बीमाकर्ताओं के लिए प्रावधान है कि वे अपना 5 फीसदी जोखिम जीआइसीरी के हवाले कर दें हालांकि 2007 से पहले यह सीमा 20 फीसदी थी, इस लिहाज से यह सुधार स्वागत योग्य है।

क्या किया जा सकता है मेरी कोशिश रही है कि मैं भारत में अमेरिकी बीमा व्यापार और निवेश की कोई प्रतिकूल तस्वीर न सामने रखूं, लेकिन कुछ चुनौतियां स्पष्ट तौर पर हैं जिन्हें पार किया जाना होगा।

इन चुनौतियों की सूरत में सवाल उठता है कि इनसे पार जाने के लिए क्या किया जा सकता है? एफडीआइ की सीमा के संदर्भ में दुर्भाग्यवश हमारे विकल्प सीमित हैं।

जैसा कि मैंने पहले बताया, एफडीआइ की सीमा को बढ़ाने पर उपजा गतिरोध भारत सरकार के मतभेद के चलते नहीं है। वास्तव में भारत सरकार इसे बढ़ाकर 49 फीसदी करने के पक्ष में ही है। यह गतिरोध राजनीतिक प्रकृति का है।

भारत की घरेलू राजनीति में मेरी विशेषज्ञता नहीं होने के चलते मैं इस बात पर टिप्पणी करने से बचूंगा कि भारत में सियासी तौर पर ऐसा क्या होना चाहिए जिससे एफडीआइ की सीमा बढ़ाने का काम साकार हो पाए। हालांकि अमेरिका कुछ कदम उठा रहा है और उसे यह जारी रखना चाहिए ताकि एफडीआइ की सीमा बढ़ाने को प्रोत्‍साहन दिया जा सके और साथ ही अन्य निवेश व व्यापार संबंधी अवरोधों को भी संबोधित किया जा सके।

ऐसी तमाम कार्रवाइयों में हमें याद रखने की जरूरत होगी कि भारत एफडीआइ की सीमा पर तभी काम करेगा जब यह बात सामने लाई जा सके कि यह भारत के हित में है।

भारत में एफडीआइ की सीमा बढ़ाने के लिए समर्थन जुटाने हेतु एक अहम विकल्प यह है कि व्यापार और निवेश संबंधी वार्ताएं दुतरफा हों। इस दिशा में हमें उम्मीद है कि दोनों ही पक्ष अमेरिका-भारत द्विपक्षीय निवेश संधि में यथाशीघ्र दोबारा जान फूंकेंगे।

भारत फिलहाल अमेरिकी माॅडल वाले बीआइटी के एक समरूप की समीक्षा करने में जुटा है और अमेरिका को यह बात साफ कर देनी चािहए कि हम भारत के साथ एक उच्चस्तरीय बीआइटी के तलबगार हैं और उसमें हम राष्ट्रीय हितों का पूरा खयाल रखेंगे, जिसमें एफडीआइ की सीमा बढ़ाना भी शामिल है।

इसी तर्ज पर हमें भारत के साथ यूरोपीय संघ की द्विपक्षीय वार्ताओं को भी करीब से देखने की जरूरत है चूंकि यूरोप ने बीमा में एफडीआइ की सीमा को एक अहम तजीह दे रखी है। भले ही बीआइटी की तरह एक अभिपुष्ट संधि के तौर पर इसकी कानूनी बाध्यताएं उतनी बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन यूएस इंडिया ट्रेड पाॅलिसी फोरम को भी प्राथमिकता में रखना होगा।

जहां तक संभव हो सके, टीपीएफ को अपने लक्ष्य साफ तौर पर तस कर लेने चाहिए और तमाम क्षेत्रों में समयबद्ध तरीके से प्रगति के मानक तय करने चाहिए जो दोनों ही देशों के आर्थिक लाभ के काम आ सकें।

टीपीएफ के प्राइवेट सेक्टर एडवायज़री ग्रुप की बैठक बुलाने से दोनों देशें के कारोबारों में भी संवाद बढ़ेगा और साथ ही कारोबारों व सरकारों के बीच परामर्श का एक अहम अवसर बन सकेगा।

अंत में, अमेरिका को आर्थिक नीति के मोर्चे पर भारत के साथ अब औपचारिक संलग्नताओं में कमी लानी होगी। अमेरिकी कारोबार इस मामले में काफी भाग्यशाली हैं कि दुनिया भर में अमेरिका के कुछ बेहद कुशल आर्थिक कूटनीतिज्ञ ऑफिस ऑफ ट्रेड रेप्रेजेंटेटिव, वाणिज्य विभाग और विदेश विभागों में मौजूद हैं। इन्हें राष्ट्रीय स्तर के नेताओं और विपक्षी नेताओं तक अपनी पहुंच बनानी चाहिए ताकि भविष्य के संभावित नेताओं के साथ रिश्ते बनें और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ताधारी नेताओं के साथ भी रिश्ते कायम हों सकें।

भारत में व्यापार और निवेश के अवरोधों को दूर करना भारत के हित में क्यों है यह बात साफ तो है लेकिन इसे विविध हितधारकों को समझाए जाने की जरूरत भी है। मुझे अपना वक्तव्य रखने का मौका देने के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ और मैं आपके सवालों का जवाब देने में खुशी महसूस करूंगा।

(साभारः अमेरिकन इंश्योरेंस एसोसिएशन)

(अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव, ‘लोक संवाद’ से पुनर्प्रकाशित)

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