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Home / बूमेरंग : डूब मरो मेरे देश की सरकार चलाने वालों, आपको शर्म आनी चाहिए-यही कहा था मोदी ने
प्रधानमंत्री बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं.. अरुण कान्त शुक्ला देश में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसे उरी स्थित सैनिक बेस पर रविवार के तड़के हुए आतंकी हमले ने झकझोरा न हो। यद्यपि तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद भारतीय सेना के जवानों के हाथों चारों आतंकी घुसपेठिये मारे गए, मगर इस दौरान भारतीय सेना के 18 जवानों को देश ने खोया और लगभग 20 जवान घायल हुए। सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात यह है कि जो जवान शहीद हुए हैं, वे टेंटों में सो रहे थे और अधिकाँश की जान अनजाने में आतंकियों द्वारा टेंटो में आग लगाने के कारण जलकर हुई है। दुश्मन सेना का या इस उद्देश्य के लिए आतंकियों के हमलों का भी सामना करते हुए बन्दूक की गोली से जान जाने से एक सैनिक या उसके परिवार को शायद थोड़ा ढांढस होता होगा कि वह या उनके परिवार का सदस्य मुकाबला करते हुए शहीद हुआ है। पर, जैसा कि आतंकी हमलों का चरित्र होता है, ये ऐसे समय में और ऐसे लोगों के द्वारा करवाए जाते हैं, जो हमले तब करते हैं, जब सुरक्षा के मापदंड और प्रबंध थोड़े ढीले होते हैं और आतंकी स्वयं मरने के लिए तैयार होकर आते हैं। यह प्रत्येक आतंकी हमले की सच्चाई है। देशवासियों को यह भी थोड़ा असहज लगना स्वाभाविक है कि नियंत्रण रेखा से लगभग 18-19 किलोमीटर स्थित बेस केम्प तक आतंकी पहुँच जाएँ और सीमा सुरक्षा बलों, सेना को भनक तक नहीं लगे। इसका अर्थ है कि इतने आतंकी हमलों को सीमा पर और देश के अन्दर झेलने के बाद भी क्या हम उतने सतर्क नहीं हैं, जितना भारत जैसे विशाल फ़ौज और असले वाले देश को होना चाहिए? यह सवाल पठानकोट एयर बेस पर हमले के बाद भी उठा था और उसके पहले संसद पर हमले और फिर मुम्बई हमलों के बाद भी उठा था। इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। देश का एक साधारण नागरिक तो रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, सरकार में बैठे लोगों और सेना के अधिकारियों से यह उम्मीद ही कर सकता है कि वे इस मामले में गंभीर तो होंगे ही, उन सभी छेदों को भी भरेंगे, जिनके चलते भारत में आतंकी घटनाएं करना आसान हो जाता है। आतंकवाद छिपकर की जाने वाली ऐसी सैन्य कार्यवाही है, जिसका उद्देश्य कम से कम नुकसान उठाकर अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाना होता है। आतंकी समूह या गुट किसी भी देश को हों, जाहिरा तौर पर वह देश उनसे अपना संबंध नहीं दिखाना चाहता। इसीलिये पाकिस्तान से भी संचालित आतंकी गुट के साथ पाकिस्तान की सरकार कभी भी अपना संबंध नहीं मानेगी। अमूमन एक बार आतंकी समूह गठित होने के बाद जिस भी देश की सरकार की शह पर वह गठित हो, वह आतंकी समूह उस देश के भी नियंत्रण से बाहर हो जाता है और अधिकाँश मामलों में उस देश की सरकार तक उससे डरने लगती है। पाकिस्तान के साथ यही हो रहा है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा आतंकी हमले छिपकर और ऐसे समय में किये जाते हैं, जब अमूमन उनकी कोई आशंका नहीं होती, दो देशों के बीच लड़ा जाने वाला परंपरागत युद्ध कभी आतंकवाद का माकूल जबाब नहीं हो सकता है। इसका सबसे अच्छा विकल्प यही है कि संबंधित देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग थलग ही नहीं किया जाए बल्कि सैनिक साजो सामान उस देश को मुहैय्या कराने वाले देशों को भी रजामंद किया जाए कि वे पाकिस्तान को सैनिक सामान, नगद मदद देना बंद करे। जब भारत, अपने देश की बहुमत की अनिच्छा को भी अनदेखा करके, अमेरिका के साथ साझा सैन्य रणनीतिक समझौतों में जा रहा है, तब उसे अमेरिका के ऊपर पूरा दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए कि अमेरिका पाकिस्तान को सामरिक सामग्री और नगद मदद देना न केवल स्वयं बंद करे बल्कि अन्य यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने से रोके। ओबामा से कई बार गले मिल चुके हमारे प्रधानमंत्री चाहें तो ओबामा के गले पड़कर इस काम को करवा सकते हैं। अभी तक सेना के अधिकारियों और प्रधानमंत्री सहित अन्य जिम्मेदार मंत्रियों ने समझदारी का ही परिचय दिया है। सेना के अधिकारियों ने हमले के एक दिन बाद कहा कि “हम अपने चुने हुए समय और मैदान पर इसका माकूल जबाब देंगे”। प्रधानमंत्री के द्वारा बुलाई गयी बैठक के बाद भी जो लब्बो-लुआब निकलकर आया है, वह सही कूटनीतिक दिशा की ओर ले जाने वाला है। ऐसा बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने विदेश मंत्री, रक्षामंत्री और गृह मंत्री से कहा कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित, पर अलग-थलग करने के प्रयास और तेज किया जाएँ। फौरी तौर पर देखा जाए तो भारत के इन प्रयासों को सुहानभूति और सफलता दोनों मिलने की संभावनाएं हैं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन याने संयक्त राष्ट्र संघ के लगभग सभी स्थाई सदस्यों ने इस हमले की भर्त्सना की है। रशिया ने तो पाकिस्तान के साथ की जाने वाली संयुक्त सैन्य कवायद को समाप्त भी कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बेन-कि-मून ने भी इसकी भर्त्सना की है। याने जब विदेशमंत्री वहां जायेंगी तो उन्हें एक भारतीय पक्षधरता वाला माहोल मिल सकता है। इन सबके बीच यदि प्रधानमंत्री के लिए कुछ असुविधाजनक है तो उनका स्वयं का हालिया अतीत, जिसमें उन्होंने यूपीए की सरकार को बुजदिलों की सरकार कहते हुए बहुत लताड़ा था। जम्मू-कश्मीर में रविवार को हुए आतंकी हमले में 17 भारतीय जवानों के मारे जाने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर आलोचनाओं में घिर गए हैं। भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स भारतीय जवानों की श्रद्धांजलि देने के साथ ही नरेंद्र मोदी के पुराने भाषणों और बयानों का हवाला दे रहे हैं। कुछ उपभोक्ता नरेंद्र मोदी  2013 में दिए एक भाषण का वीडियो भी शेयर कर रहे हैं जिसमें उन्होंने चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली घुसपैठ को लेकर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था, “डूब डूब मरो मेरे देश की सरकार चलाने वालों, आपको शर्म आनी चाहिए।” उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। कुछ लोग उनके पुराने ट्वीट सामने ला रहे हैं तो कुछ उनका रजत शर्मा के साथ वाला इंटरव्यू दिखा रहे हैं। हो सकता है प्रधानमंत्री को अब अपने चुनाव के दौरान बोले गए बड़बोलों के लिए कुछ पछतावा होता हो। यह सब करने वाले वे ही भक्त हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं अपने बड़बोलों से पैदा किया था। इस अवसर पर मुझे बूमेरंग की याद आ रही है। एक ऐसा आस्ट्रेलियाई औजार जो वहां के मूलनिवासी चिड़ियों के शिकार के लिए इस्तेमाल करते थे। एक लकड़ी की चपटी प्लेट जिसे आसमान में फेंको तो वह लौटकर फेंकने वाले के पास ही आती है और यदि वह सतर्क न हो तो चोटिल हो सकता है। आज यही हो रहा है। जब जिम्मेदारी नहीं होती तो जुबान बहुत चलती है। मोदी ही क्यों, सुषमा, जेटली, राजनाथ सबकी जुबान बहुत चलती थी और युद्ध इन्हें बच्चों का खेल लगता था। लेकिन , वह सब आसान नहीं है, अब समझ में आ रहा है। मोदी स्वयं कबूल कर चुके हैं, सेना के पेंशन वाले मामले में कि वे इसे जितना आसान समझ रहे थे, वह है नहीं। सभी मामलों में ऐसा ही है। इसीलिये एक राजनीतिज्ञ को वह सत्ता में रहे या विरोध में, बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। खासकर जनता की भावनाओं को भड़काकर सत्ता हासिल करने की कोशिश तो कभी नहीं करना चाहिए। यह एक बूमेरंग है जो पलटकर फेंकने वाले को ही मारता है। मोदी जी उसी बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं।

बूमेरंग : डूब मरो मेरे देश की सरकार चलाने वालों, आपको शर्म आनी चाहिए-यही कहा था मोदी ने

प्रधानमंत्री बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं..
अरुण कान्त शुक्ला
देश में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसे उरी स्थित सैनिक बेस पर रविवार के तड़के हुए आतंकी हमले ने झकझोरा न हो। यद्यपि तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद भारतीय सेना के जवानों के हाथों चारों आतंकी घुसपेठिये मारे गए, मगर इस दौरान भारतीय सेना के 18 जवानों को देश ने खोया और लगभग 20 जवान घायल हुए।
सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात यह है कि जो जवान शहीद हुए हैं, वे टेंटों में सो रहे थे और अधिकाँश की जान अनजाने में आतंकियों द्वारा टेंटो में आग लगाने के कारण जलकर हुई है।
दुश्मन सेना का या इस उद्देश्य के लिए आतंकियों के हमलों का भी सामना करते हुए बन्दूक की गोली से जान जाने से एक सैनिक या उसके परिवार को शायद थोड़ा ढांढस होता होगा कि वह या उनके परिवार का सदस्य मुकाबला करते हुए शहीद हुआ है। पर, जैसा कि आतंकी हमलों का चरित्र होता है, ये ऐसे समय में और ऐसे लोगों के द्वारा करवाए जाते हैं, जो हमले तब करते हैं, जब सुरक्षा के मापदंड और प्रबंध थोड़े ढीले होते हैं और आतंकी स्वयं मरने के लिए तैयार होकर आते हैं।

यह प्रत्येक आतंकी हमले की सच्चाई है।
देशवासियों को यह भी थोड़ा असहज लगना स्वाभाविक है कि नियंत्रण रेखा से लगभग 18-19 किलोमीटर स्थित बेस केम्प तक आतंकी पहुँच जाएँ और सीमा सुरक्षा बलों, सेना को भनक तक नहीं लगे।
इसका अर्थ है कि इतने आतंकी हमलों को सीमा पर और देश के अन्दर झेलने के बाद भी क्या हम उतने सतर्क नहीं हैं, जितना भारत जैसे विशाल फ़ौज और असले वाले देश को होना चाहिए?
यह सवाल पठानकोट एयर बेस पर हमले के बाद भी उठा था और उसके पहले संसद पर हमले और फिर मुम्बई हमलों के बाद भी उठा था।
इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। देश का एक साधारण नागरिक तो रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, सरकार में बैठे लोगों और सेना के अधिकारियों से यह उम्मीद ही कर सकता है कि वे इस मामले में गंभीर तो होंगे ही, उन सभी छेदों को भी भरेंगे, जिनके चलते भारत में आतंकी घटनाएं करना आसान हो जाता है।
आतंकवाद छिपकर की जाने वाली ऐसी सैन्य कार्यवाही है, जिसका उद्देश्य कम से कम नुकसान उठाकर अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाना होता है।

आतंकी समूह या गुट किसी भी देश को हों, जाहिरा तौर पर वह देश उनसे अपना संबंध नहीं दिखाना चाहता।
इसीलिये पाकिस्तान से भी संचालित आतंकी गुट के साथ पाकिस्तान की सरकार कभी भी अपना संबंध नहीं मानेगी।
अमूमन एक बार आतंकी समूह गठित होने के बाद जिस भी देश की सरकार की शह पर वह गठित हो, वह आतंकी समूह उस देश के भी नियंत्रण से बाहर हो जाता है और अधिकाँश मामलों में उस देश की सरकार तक उससे डरने लगती है। पाकिस्तान के साथ यही हो रहा है।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा आतंकी हमले छिपकर और ऐसे समय में किये जाते हैं, जब अमूमन उनकी कोई आशंका नहीं होती, दो देशों के बीच लड़ा जाने वाला परंपरागत युद्ध कभी आतंकवाद का माकूल जबाब नहीं हो सकता है। इसका सबसे अच्छा विकल्प यही है कि संबंधित देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग थलग ही नहीं किया जाए बल्कि सैनिक साजो सामान उस देश को मुहैय्या कराने वाले देशों को भी रजामंद किया जाए कि वे पाकिस्तान को सैनिक सामान, नगद मदद देना बंद करे।
जब भारत, अपने देश की बहुमत की अनिच्छा को भी अनदेखा करके, अमेरिका के साथ साझा सैन्य रणनीतिक समझौतों में जा रहा है, तब उसे अमेरिका के ऊपर पूरा दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए कि अमेरिका पाकिस्तान को सामरिक सामग्री और नगद मदद देना न केवल स्वयं बंद करे बल्कि अन्य यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने से रोके।
ओबामा से कई बार गले मिल चुके हमारे प्रधानमंत्री चाहें तो ओबामा के गले पड़कर इस काम को करवा सकते हैं।
अभी तक सेना के अधिकारियों और प्रधानमंत्री सहित अन्य जिम्मेदार मंत्रियों ने समझदारी का ही परिचय दिया है। सेना के अधिकारियों ने हमले के एक दिन बाद कहा कि

“हम अपने चुने हुए समय और मैदान पर इसका माकूल जबाब देंगे”।

प्रधानमंत्री के द्वारा बुलाई गयी बैठक के बाद भी जो लब्बो-लुआब निकलकर आया है, वह सही कूटनीतिक दिशा की ओर ले जाने वाला है।
ऐसा बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने विदेश मंत्री, रक्षामंत्री और गृह मंत्री से कहा कि पाकिस्तान को कूटनीतिक तरीके से सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित, पर अलग-थलग करने के प्रयास और तेज किया जाएँ। फौरी तौर पर देखा जाए तो भारत के इन प्रयासों को सुहानभूति और सफलता दोनों मिलने की संभावनाएं हैं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन याने संयक्त राष्ट्र संघ के लगभग सभी स्थाई सदस्यों ने इस हमले की भर्त्सना की है।
रशिया ने तो पाकिस्तान के साथ की जाने वाली संयुक्त सैन्य कवायद को समाप्त भी कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बेन-कि-मून ने भी इसकी भर्त्सना की है।
याने जब विदेशमंत्री वहां जायेंगी तो उन्हें एक भारतीय पक्षधरता वाला माहोल मिल सकता है।
इन सबके बीच यदि प्रधानमंत्री के लिए कुछ असुविधाजनक है तो उनका स्वयं का हालिया अतीत, जिसमें उन्होंने यूपीए की सरकार को बुजदिलों की सरकार कहते हुए बहुत लताड़ा था।
जम्मू-कश्मीर में रविवार को हुए आतंकी हमले में 17 भारतीय जवानों के मारे जाने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर आलोचनाओं में घिर गए हैं।
भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स भारतीय जवानों की श्रद्धांजलि देने के साथ ही नरेंद्र मोदी के पुराने भाषणों और बयानों का हवाला दे रहे हैं।
कुछ उपभोक्ता नरेंद्र मोदी  2013 में दिए एक भाषण का वीडियो भी शेयर कर रहे हैं जिसमें उन्होंने चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली घुसपैठ को लेकर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था,

“डूब डूब मरो मेरे देश की सरकार चलाने वालों, आपको शर्म आनी चाहिए।”

उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
कुछ लोग उनके पुराने ट्वीट सामने ला रहे हैं तो कुछ उनका रजत शर्मा के साथ वाला इंटरव्यू दिखा रहे हैं।
हो सकता है प्रधानमंत्री को अब अपने चुनाव के दौरान बोले गए बड़बोलों के लिए कुछ पछतावा होता हो। यह सब करने वाले वे ही भक्त हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं अपने बड़बोलों से पैदा किया था।
इस अवसर पर मुझे बूमेरंग की याद आ रही है। एक ऐसा आस्ट्रेलियाई औजार जो वहां के मूलनिवासी चिड़ियों के शिकार के लिए इस्तेमाल करते थे। एक लकड़ी की चपटी प्लेट जिसे आसमान में फेंको तो वह लौटकर फेंकने वाले के पास ही आती है और यदि वह सतर्क न हो तो चोटिल हो सकता है।

आज यही हो रहा है। जब जिम्मेदारी नहीं होती तो जुबान बहुत चलती है।
मोदी ही क्यों, सुषमा, जेटली, राजनाथ सबकी जुबान बहुत चलती थी और युद्ध इन्हें बच्चों का खेल लगता था। लेकिन , वह सब आसान नहीं है, अब समझ में आ रहा है।
मोदी स्वयं कबूल कर चुके हैं, सेना के पेंशन वाले मामले में कि वे इसे जितना आसान समझ रहे थे, वह है नहीं।
सभी मामलों में ऐसा ही है। इसीलिये एक राजनीतिज्ञ को वह सत्ता में रहे या विरोध में, बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। खासकर जनता की भावनाओं को भड़काकर सत्ता हासिल करने की कोशिश तो कभी नहीं करना चाहिए।
यह एक बूमेरंग है जो पलटकर फेंकने वाले को ही मारता है। मोदी जी उसी बूमेरंग से दो चार हो रहे हैं।

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