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भारत रत्न राजीव गाँधी पर मोदी की अशालीन टिप्पणी : मोदी के खिलाफ सबसे कारगर हथियार, बहुजनों की सापेक्षिक वंचना

Rajiv Gandhi Narendra Modi

इस लेख को लिखे जाने के दौरान सत्रहवीं लोकसभा के पांचवें चरण का चुनाव (Seventh-phase Lok Sabha election) चल रहा है. अब तक हुए चुनावों के आधार पर राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सत्ताधारी पार्टी के लिए सकारात्मक लक्षण नहीं हैं. शायद इस बात का इल्म मोदी को भी हो चुका है इसलिए वे अपनी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए शालीनता की सारी सीमायें तोड़ते जा रहे हैं. उनका यह आचरण देखकर कुछ लेखकों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि उनमे न तो इतिहास का शऊर है, न पद की गरिमा का अहसास. इस क्रम में जिस तरह उन्होंने 4 मई को एक जनसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर टिप्पणी (Narendra Modi‘s indecent remarks on former Prime Minister Rajiv Gandhi) की है, उससे पूरा देश हतप्रभ है. उन्होंने कहा है ’आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन (Mr. Clean) बना दिया था. गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन मिस्टर क्लीन चला था. लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया.’

मोदी की इस अशालीन टिप्पणी पर सोशल मीडिया में जिन शब्दों में भर्त्सना की गयी है, उसकी झलक आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के इस ट्विट में देखी जा सकती है. उन्होंने कहा है, ’जो व्यक्ति इस दुनिया में नहीं, उसके बारे में ऐसी घटिया टिप्पणी गांजेबाज मोदी ही कर सकता है. चुनाव आयोग गांजे की बिक्री पर रोक लगाये. मोदी की जांच कराओ, वह नशे की हालात में भाषण दे रहे हैं.’

बहरहाल राहुल गांधी मोदी ने की घटिया टिप्पणी पर अपना आपा नहीं खोया है. उन्होंने शालीनता से इस पर जवाब देते हुए जो कहा है, उसकी सर्वत्र तारीफ़ हो रही है. उन्होंने कहा है, ’मोदी जी युद्ध समाप्त हो चुका है. आपके कर्म आपका इंतजार कर रहे हैं. खुद को लेकर अपनी सोच को मेरे पिता पर डालने से आप बच नहीं पाएंगे. प्यार और जोरदार झप्पी’.

मोदी की इस टिप्पणी को तमाम लोग चरम हताशा का सूचक मान रहे हैं. किन्तु इन बातों से बेखबर प्रधानमंत्री मोदी बाकी बचे चुनाव में अपनी स्थिति बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुस्लिम, गाय-गोबर का आखिरी दाँव खेलने में जुट गए हैं. अतः एक ऐसे समय में जबकि देश के विवेकवान लोग मोदी की सत्ता से विदाई की जरुरत और शिद्दत से महसूस करने लगे हैं, सम्पूर्ण विपक्ष, विशेषकर बहुजनवादी दलों को बहुजनों में पनपी उस सापेक्षिक वंचना के सदव्यवहार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जो सापेक्षिक वंचना मोदी राज में शिखर पर पहुँच चुकी है .

क्या होती है सापेक्षिक वंचना !  What is the relative swindling!

ऐसा करना चुनाव में बेहतर परिणाम दे सकता है. कारण, भारत में सामाजिक अन्याय की शिकार विश्व की विशालतम आबादी को आज भी जिस तरह विषमता का शिकार होकर जीना पड़ रहा है उससे यहां विशिष्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन(specific social movementt) पनपने की ‘निश्चित दशाएं’(certain conditions) साफ़ दृष्टिगोचर होने लगीं हैं. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतःसामाजिक असंतोष (social unrest), अन्याय, उत्पादन के साधनों का असमान बंटवारा तथा उच्च व निम्न वर्ग के व्याप्त खाई के फलस्वरूप होता है.

सरल शब्दों में ऐसे आन्दोलन आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की कोख से जन्म लेते हैं और तमाम अध्ययन साबित करते हैं कि भारत जैसी भीषणतम गैर-बराबरी पूरे विश्व में कहीं है ही नहीं. इस क्रान्तिकारी आन्दोलन में बहुसंख्य लोगों में पनपता ‘सापेक्षिक वंचना’(relative deprivation ) का भाव आग में घी का काम करता है, जो वर्तमान भारत में दिख रहा है.

क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है.

समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ ,’दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें !’

सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ,जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना. दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमे भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता.

बहुजनों के खिलाफ शत्रु की भूमिका में अवतरित मोदी ! Modi’s role of enemy against the Bahujans!

जहां तक भारत के मूलनिवास बहुजनों की वंचना का सवाल है ये हजारों साल से शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक-धार्मिक) से पूरी तरह बहिष्कृत रहे. इन्हें शक्ति के स्रोतों से जुड़ने अवसर आंबेडकर प्रवर्तित आरक्षण से मिला.और एससी/एसटी के बाद जब अगस्त 1990 में मंडल की संस्तुतियों के जरिये ओबीसी के लिए आरक्षण घोषित हुआ, भारत का जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के लेखक-पत्रकार-कलाकार, साधु-संत-पूँजीपति और राजनीतिक दल मूलनिवासियों के खिलाफ सीधे शत्रु की भूमिका में आ गए.

परवर्तीकाल में जिस आरक्षण के सहारे मूलनिवासी राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे थे, उस आरक्षण के खात्मे तथा सवर्णों को और शक्तिशाली बनाने के कुत्सित इरादे से सवर्णवादी शासकों ने 24 जुलाई, 1991 को अख्तियार किया नवउदारवादी अर्थनीति. यूं तो मूलनिवासियों के खिलाफ नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाने की दिशा में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह इत्यादि सबने प्रयास किया, किन्तु इस मामले में मोदी अपने पूर्ववर्तियों को छोड़कर मीलों आगे निकल गए. चूंकि मोदी एक ऐसे संगठन से प्रशिक्षित रहे,जिसका एकमेव लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का हित पोषण रहा है, इसलिए उन्होंने मूलनिवासियों के खिलाफ चरम शत्रुता का प्रदर्शन किया.

विगत साढ़े चार वर्षों में आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने की रणनीति के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ. बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई.

आरक्षण के खात्मे के योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी गयी. आरक्षित वर्ग के लोगों को बदहाल बनाने के लिए ही पांच दर्जन से अधिक यूनिवर्सिटियों को स्वायतता प्रदान करने के साथ –साथ ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि आरक्षित वर्ग, खासकर एससी/एसटी के लोगों का विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाना एक सपना बन गया. कुल मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया. इस आशय की घोषणा 5 अगस्त, 2018 को खुद मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने कर दिया. उन्होंने उस दिन कहा,’सरकारी नौकरिया ख़त्म हो चुकी है लिहाजा आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है.

बहरहाल जिस मोदी राज में आरक्षण को निरर्थक बना दिया गया, उसी मोदीराज के स्लॉग ओवर में संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए 7-22 जनवरी,2019 के मध्य सवर्ण और विभागवार : दो ऐसे आरक्षण लागू हुए जो बहुजनों पर सबसे बड़े आघातों में से एक के रूप में चिन्हित हो गए. इनमें 13 प्वाइंट रोस्टर के जरिये लागू होने वाले विभागवार आरक्षण को तो मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में मानवता के खिलाफ उठाये गये सबसे बड़े अमानवीय फैसलों में दर्ज हो गया है. कारण, इसके जरिये अवसरों पर दुनिया की उस सबसे बड़ी सुविधाभोगी जमात को अवसरों पर पहला हक़ प्रदान कर दिया गया है, जिसका कई हजार साल से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहां और आज भी अटूट है.

शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों के एकाधिकार का साक्ष्य !

केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार में ग्रुप ‘ए’ की कुल नौकिरयों की संख्या 84 हजार 521 है। इसमें 57 हजार 202 पर सामान्य वर्गो ( सवर्णों ) का कब्जा है। यह कुल नौकरियों का 67.66 प्रतिशत होता है। इसका अर्थ है कि 15-16 प्रतिशत सवर्णों ने करीब 68 प्रतिशत ग्रुप ए के पदों पर कब्जा कर रखा है और देश की आबादी को 85 प्रतिशत ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हि्स्से सिर्फ 32 प्रतिशत पद हैं। अब गुप ‘बी’ के पदों को लेते हैं। इस ग्रुप में 2 लाख 90 हजार 598 पद हैं। इसमें से 1 लाख 80 हजार 130 पदों पर अनारक्षित वर्गों का कब्जा है। यह ग्रुप बी की कुल नौकरियों का 61.98 प्रतिशत है।

इसका मतलब है कि ग्रुप बी के पदों पर भी सवर्ण जातियों का ही कब्जा है। यहां भी 85 प्रतिशत आरक्षित संवर्ग के लोगों को सिर्फ 28 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी है।

कुछ ज्यादा बेहतर स्थिति ग्रुप ‘सी’ में भी नहीं है। ग्रुप सी के 28 लाख 33 हजार 696 पदों में से 14 लाख 55 हजार 389 पदों पर अनारक्षित वर्गों ( अधिकांश सवर्ण )का ही कब्जा है। यानी 51.36 प्रतिशत पदों पर। आधे से अधिक है। हां, सफाई कर्मचारियों का एक ऐसा संवर्ग है, जिसमें एससी,एसटी और ओबीसी 50 प्रतिशत से अधिक है।

जहां तक उच्च शिक्षा में नौकरियों का प्रश्न है केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पदों पर सवर्णों की उपस्थित क्रमशः 95.2 , 92.90 और 76.12 प्रतिशत है. आंबेडकर के हिसाब से शक्ति के स्रोत के रूप में जो धर्म आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, उस पर आज भी 100 प्रतिशत आरक्षण इसी वर्ग के लीडर समुदाय का है. धार्मिक आरक्षण सहित सरकारी नौकरियों के ये आंकडे चीख-चीख कह रहे हैं कि आजादी के 70 सालों बाद भी हजारों साल पूर्व की भांति सवर्ण ही इस देश के मालिक हैं.

सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 89-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्ही मालिकों के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्हीं की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं.

देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद विधान सभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय विशेष का नहीं है.

सापेक्षिक वंचना के सदव्यवहार से एवरेस्ट को छू सकता है, मोदी के खिलाफ पैदा हुआ रोष!

H L Dusadh -एच.एल.दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय आध्यक्ष हैं.)
-एच.एल.दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय आध्यक्ष हैं.)

अतः भारत के जिस तबके की प्रगति में न तो अतीत में कोई अवरोध खड़ा किया गया और न आज किया जा रहा है ; जिनका आज भी शक्ति के समस्त स्रोतों पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है,वैसे शक्तिसंपन्न सवर्णों को मोदी राज में 10 प्रतिशत आरक्षण तथा 13 प्वाइंट रोस्टर के जरिये अवसरों पर पहला हक़ प्रदान करने का क्या कोई औचित्य था? नहीं था इसलिए 5 मार्च के भारत बंद को बहुजनों ने ऐतिहासिक बना दिया. क्योंकि मोदी के उस कदम ने सापेक्षिक वंचना को एकदम बुलंदी पर पहुंचा दिया था. इससे उनमे काफी रोष पैदा हुआ था. और वह रोष ऐसा-वैसा नहीं: अधिकार खोने के अहसास से उपजा रोष था.

ढेरों समाज विज्ञानी मानते हैं कि क्रान्ति गरीबी के जठर से नहीं: अधिकार खोने के अहसास से पैदा होती है. और कहने में अतिश्योक्ति नहीं है कि 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण और 13 पॉइंट रोस्टर के खतरे ने मूलनिवासी बहुजनों में सापेक्षिक वंचना को विस्फोटक बिन्दू पर पहुंचा दिया है. इस कारण भारत की जन्मजात आबादी में सापेक्षिक वंचना का जो अहसास जन्मा है, उससे वोट के जरिये लोकतान्त्रिक क्रांति के जो हालत आज भारत में पैदा हुए हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कभी किसी देश में उपलब्ध नहीं रहे. ऐसे में विपक्ष यदि मोदी को केन्द्रीय सत्ता से दूर रखना चाहता है तो उसे बहुजनों में सापेक्षिक वंचना के अहसास को तुंग पर पहुँचाने में सारी ताकत झोंक देनी चाहिए.

-एच.एल.दुसाध

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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