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Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना
पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

मरे हुए लोकतंत्र की लाश ढोते हुए हम राम नाम सत्य हैं जहां-जहां जगेंद्र बोलेंगे जिंदा जला दिये जायेंगे

पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए जनसत्ता कोलकाता से अवकाश प्राप्ति के बाद उत्तराखंड के दिनेशपुर में ठिकाना। उनका यह आलेख मूलतः 03 जुलाई 2016 को प्रकाशित हुआ था। हस्तक्षेप के पाठकों के लिए पुनर्प्रकाशन….. पढ़ें और शेयर भी करें….

लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) ने आशंका जताई है कि आपातकाल (Emergency) दोबारा भी लग सकता है। महामहिम जंगखोर लौहपुरुष रामरथी संघ सिपाहसालार अर्द्ध सत्य बोले हैं। आपातकाल कब खत्म हुआ जी? जर जोरू जमीन, जल जंगल जमीन सब कुछ निशाने पर अपराधी फासिस्ट नस्ली सत्ता का नरसंहार (genocide of criminal fascist power) कब थमा है जी? 1975 से आपातकाल की निरंतर जारी है। बहरहाल भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना है कि भारतीय राजनीति में आज भी आपातकाल की आशंका है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

आडवाणी ने देश में आपातकाल की 40वीं बरसी (40th anniversary of emergency) से पहले एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में यह बात कही है।

आडवाणी ने कहा कि भविष्य में नागरिक स्वतंत्रता को निलंबित किए जाने से इनकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान में संवैधानिक और कानूनी कवच होने के बावजूद ताकतें लोकतंत्र को कुचल सकती है।

गौर हो कि 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी थी। जब उनसे पूछा गया कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि भारत में फिर से आपातकाल लगाया जा सकता है तो आडवाणी ने बताया कि मुझे हमारी राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा कुछ नहीं दिखता जो मुझे आश्वस्त करता हो। नेतृत्व से भी कोई अच्छा संकेत नहीं मिल रहा। लोकतंत्र और इससे जुड़े सभी पहलुओं को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। मुझे इतना भरोसा नहीं है कि फिर से आपातकाल नहीं थोपा जा सकता।

1975 से मीडिया में सेंसर शिप जारी है। 1975 से अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता है ही नहीं। 1978 से कला साहित्य माध्यम सब कुछ संघ परिवार के हवाले। सारा देश उत्तर प्रदेश है जहां-जहां जगेंद्र बोलेंगे जिंदा जला दिये जायेंगे।

पूरा देश के मीडिया के छल फरेब कारपोरेट शिकंजे में है और आपातकाल सिलसिला है वर्ग जाति वर्चस्व का सैन्यराष्ट्र तंत्र का। कि हर आवाज जो जनता के दर्द से भीगी है हर रूह जो लहूलुहान है देशद्रोही है और हर युद्ध अपराधी राष्ट्रनेता है।

जनता के खिलाफ जनतंत्र के खिलाफ जारी आपातकाल कब खत्म हुआ जी?

याद रखिये, राजसूय में बलि चाहे जिसकी हो, राजा लेकिन चक्रवर्ती है। चक्रव्यूह के चक्रवृद्धि ब्याज हम। जब चाहे, वसूली होगी क्योंकि सुखीलाला के राजकाज में आपातकाल जारी है।

न संघ परिवार में फूट है न भाजपा में टूट है। फरेब का नया सिलसिला यह दिलासा कि आपातकाल नहीं है कि हमारी लड़ाई शुरू होने से पहले खत्म हो जाये तत्काल कि हम मान लें जी कि आपातकाल नहीं है।

गौरतलब है कि आपातकाल संबंधी आडवाणी की चिंता को विपक्ष ने जायज डर बताया। आपातकाल संबंधी आडवाणी की चिंता को विपक्ष ने जायज डर बताया।

आडवाणी के इस बयान पर ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर केंद्रित हैं। हालांकि, आरएसएस ने ऐसी किसी बात को खारिज किया है जबकि कांग्रेस तथा भाजपा के अन्य प्रतिद्वन्द्वी दलों ने आडवाणी की इस चिंता को साझा किया है।

संसदीय राजनीति की संसदीय सहमति का यह खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है। खजाने की लूटखसोट में सारे अरबपति करोड़पति काले चोर बराबर के हिस्सेदार और लूटखसोट में बराबारी की हिस्सेदारी, बरारबरी की मुनाफा वसूली की यह समरसता है। अस्मिताओं के सारे राम इसीलिए हनुमान।

आपातकाल का शोर इसलिए कि कारपोरेट वकील वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वैश्विक निवेशकों को विश्वास दिलाया है कि नरेंद्र मोदी सरकार भारत में सुधार प्रक्रिया गति, कर प्रणाली और नीतियों में स्थिरता को लेकर व्यक्त की जा रही चिंताओं को दूर करने में लगी है।

जेटली ने शुक्रवार से शुरू 10 दिन की अपनी अमेरिका यात्रा में यहां निवेशकों के साथ बैठक की। उन्होंने कहा कि भारत के बारे यहां बहुत जोश और रोमांच है लेकिन आर्थिक नीतियों में सुधारों की गति और नीतिगत स्थिरता के बारे में कुछ चिंताएं दिखी हैं।

आपातकाल को शोर इसलिए कि रिटेल निवेशक कंपनियों की पहली आवश्यकता बनी कॉरपोरेट एफडी आपातकाल को शोर इसलिए हमने कहा था बात शुरू हुई तो बहुत दूर तलक बात चलेगी कि खत्म न करें बातों का सिलसिला कभी। अब लीजिये मूसलाधार घनघोर।

हमने लिखा है कि सुषमा और वसुंधरा का किस्सा तो आम है। वे बदनाम हैं लेकिन जो परदे के पीछे हैं, असली जलवा उन्हीं का है। तनि ऊ बरखा बहार हुई जाये मानसून आयें न आये। राजा का बाजा बजा। खा लें खाजा। राजकाज में राजे को बलप्रदत्त मानें न मानें लपेटे मैं है महामहिम कि राष्ट्रपति भवन की नींव में घोटाला की जड़ें तमाम।

पहेली अजब जब है कि टू बबी र नट टू बी.. यह तो झांकी है, बाकी किस्सा अभी बाकी है, जो हनुमानजी की पूंछ है और संवैधानिक संकट की घनघटा है मानसून हो न हो।

1971 में बांग्लादेश के मुक्तिसंग्राम में मातृभाषा के अधिकार को राष्ट्रीयता में बदलने की पहली और आखिरी क्रांति हो गयी। 1975 से अस्मिताओं की लड़ाई में हम आजादी और आजादी की लड़ाई क्या है, भूल चुके हैं। भूल गये मातृभाषा। भूल गये कला माध्यमों की आजादी। भूल गये विचारधारा और प्रतिबद्धता। जनसरोकार खत्म और जनसुनवाई भी खत्म।

मरे हुए लोकतंत्र की लाश ढोते हुए हम राम नाम सत्य हैं, सत्य बोलो गत्य है, की हांक लगाने वाले हिंदी साम्राज्यवाद की फासिस्ट सत्ता के रोबोट हैं।

गांधी और अंबेडकर से लेकर हर मरे हुए पुरखे को हम गोडसे बना रहे हैं इन दिनों। हम सारे बजरंगी हुए इन दिनों। बाकी जो बचे, वे भी अंडे सेंते लोग।

संविधान की रोज हो रही हत्या और न कहीं कानून का राज है। न समता है और न न्याय। उनका मिशन, अखंड नरसंहार। फिरभी आपातकाल की आशंका गोया कि अब आपातकाल नहीं है?

1975 से हमारी इंद्रियां बेदखल हैं। हम वही देखते हैं, जो हमें दिखाया जाता है। हम वही सुनते हैं जो सत्ता की भाषा होती है। हम वही बोलते हैं, जो शुतुरमुर्गों की भाषा हो सकती है। और हमारी अपनी कोई मातृभाषा नहीं है। हमारा कोई घर नहीं है। हमारी कोई जमीन नहीं है। हमारा कोई जंगल नहीं है। हमारी कोई सांसें नहीं है।

हमारा कोई दिल नहीं है। न हमारा कोई देह है और न हमारा दिमाग है हम रीढ़विहीन प्रजाति में तब्दील हैं। उस आपातकाल की कोख में इस लोक गणराज्य का अवसान हो गया। जो है वह निरंकुश सैन्यतंत्र है। जो है वह निरंकुश सलवा जुड़ुम है। जो है वह सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून है, जिसकी जद में हम उसीतरह कैद है, जैसा समूचा हिमालय, समूचा पूर्वोत्तर और समूचा ग्रामीण भारत, समूचा अनार्य भारत और समूचा आदिवासी भूगोल। इतिहास बेदखल है। शिक्षा बेदखल है। चिकित्सा बेदखल है। उत्पादन प्रणाली बेदखल है। अर्थव्यवस्था बेदखल है। समूचा भूगोल बेदखल है। समूची कायनात बेदखल है। कायनात की सारी बरकतें या रहमतें अब कयामतों में तब्दील है। हमारे हिस्से में हैं निरंतर जारी आपदायें। निरंतर जारी सुनामियां। निरंतर जारी महाभूकंप। निरंतर जारी अनावृष्टि अतिवृष्टि। निरंतर जारी बाढ़, सूखा और भूस्खलन। निरंतर जारी भूख और कुपोषण।

सारा अमृत उनके हिस्से में सारी मलाई, दूध, मक्खन, घी से लेकर सोना दाना पैसा माल सब कुछउनके हिस्से में क्योंकि जर जोरू जमीन जल जंगल जमीन सब कुछ निशाने पर अपराधी फासिस्ट नस्ली सत्ता का नरसंहार कब थमा है जी? हम किसी देश के वाशिंदे नहीं हैं। न हमारा कोई देश है। गाते हुए वंदे मातरम हम मातृभूमि को जंजीरों में कैद किये हुए हैं।

देश बेचने वाले महाजिन्न के गुलाम हैं हम नागरिक और नागरिक मानवाधिकार सारे खत्म हैं। खत्म हैं मेहनतकशों के हक हकूक सारे। खत्म है हिमालय। खत्म है सारे जलस्रोत कि सूखने लगा है मानसून पिघलने लगे हैं ग्लेशियर। खिसकने लगा एवरेस्ट।

सारे समुंदर भी खत्म है। मनुष्य वध्य है, लेकिन वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। बलात्कार है, सामूहिक बलात्कार है अनंत शव साधना है हरिकथा विकास अनंत। जैसा कि सेनसेक्स उछले हैं फिर गिरे हैं सेनसेक्स। जैसे कि हवाओं में सुगंधित कंडोम शामियाना की तरह तना हुआ। और हर स्त्री देह विस्तृत समुद्रतट पांच सितारा। इतिसिद्धम्ः वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। तना हुआ शिवलिंग है यह कुरुक्षेत्रीय महाभारत और उसका पुरुषतंत्र निरंकुश जो मुक्त बाजार है अब दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त बाजार।

जो ग्रोथ है, वह दरअसल लैंगिक विकास है लक्ष्य में वही स्त्री भ्रूण। डोनर वीर्यपात से जनम रही पीढ़ियां किराये पर कोख हैं और हर बच्चा अब बंधुआ मजदूर है।

हम कंबंधों में तब्दील हैं और हमारा कोई चेहरा नहीं है। हम आइने में सत्ता का चेहरा देखते हैं और हम। कोलकाता के किसी राबिनसन स्ट्रीट के वाशिंदे हैं जहां मरे हुओं की लाशों से कोई गंध नहीं है। जहां मरे हुए लोग धर्म के नाम जिंदा हैं और नरकंकाल के साथ रिहाइश के अभ्यस्त हैं।

पूरा देश कोलकाता है और योगाभ्यास राजनीतिक मिलन आसन है योगाभ्यास मुकम्मल कामशास्त्र है सत्ता का योगाभ्यास सत्ता हानीमून है। योगाभ्यास सेनाओं का हिंदूकरण है। ताकि कदमताल होता रहे। ताकि दिमाग का दही होता रहे। ताकि जारी रहे शोषण का यह तंत्र। ताकि जारी रहे जनसंहार का मंत्रजाप अनंत। ताकि चालू रहे सर काटने के तमाम यंत्र। ताकि जारी रहे दमन और उत्पीड़न। ताकि हम मान लें जाति की वैधता। ताकि हम मान लें नस्ली वर्चस्व और बाजार के धर्म को अपना धर्म मान लें।

बाजार की आस्था हमारी आस्था हो और बाजार के हित जनहित हो। विनाश का यह सिलसिला क्योंकि हरिकथा अनंत है और सत्यनारायण की कथा है मंकी बातें फोर जी रिलायंस मोबाइल पर डाउन लोड महाजिन्न ऐप बजरंगी।

इस सीमेट के जंगल में कहीं नहीं, कहीं नहीं महकते इंसानियत के फूल, हजारों फूल क्या किसी अकेले गुलाब को खिलने की इजाजत नहीं है और हर मुस्कराहट पर चाकचौबंद पहरा है। आसमान हैं ड्रोन और राजमार्ग पर उतरे हैं युद्धक विमान।

परिंदे सारे पिंजड़े में कैद हैं और कटे हुए पंखों में कैद है उड़ान। खवाबों और ख्वाहिशों की तितलियां तमाम जिंदा लाशें। महामहिम जंगखोर लौहपुरुष रामरथी संघ सिपाहसालार अर्द्ध सत्य बोले हैं। आपातकाल कब खत्म हुआ जी? महामहिम जंगखोर लौहपुरुष रामरथी संघ सिपाहसालार अर्द्ध सत्य बोले हैं। आपातकाल कब खत्म हुआ जी?

लोगों को गलतफहमी रही है। न मैं कभी बदला हूं और न बदली है मेरी विचारधारा और प्रतिबद्धता। स्वजनों के हक हकूक की लड़ाई में किसी के भी मोर्चे पर खड़े हो जाने की रणनीति मैंने अपने पिता की कैंसर से जूझती जिंदगी से बड़ी लड़ाई के मोर्चे से सीखी है। अपने लोगों का भला हो, भारतीय जनगण को कोई राहत मिले, हिमालय के जख्मों को तनकि मलहम लगे, ऐसी किसी भी पहल के साथ मैं अपने पिता की तरह बेझिझक खड़ा हो सकता हूं, रंगों में फर्क के बावजूद। जनहित और जनसुनवाई के मुद्दे पर मैं किसी भी हद तक किसी के भी साथ खड़ा हो सकता हूं। फिर भी मेरी विचारधारा जो सत्तर के दशक में बनी, जैसे आज तक नहीं बदली है, वैसे ही आगे भी नहीं बदलने वाली है। मसलन अंबानी अडानी के जरखरीद गुलामों के फासिस्ट राजकाज के खिलाफ प्रतिरोध की गरज से वैचारिक दुश्मनों के साथ साझा मोर्चा बनाने के मुद्दे पर न्यूनतम कार्यक्रम बनाने की सर्वोच्च प्राथमिकता मेरी है, क्योंकि पहले तो हम इस देश में बचे खुचे लोकतंत्र को बचाने की जुगत लगायें, पहले तो रोज रोज मारे जा रहे स्वजनों की जान बचाने की कोशिश करें, फिर विचारधारा के विशुद्ध विकल्पों के बारे में सोचते रहेंगे।

आज सुबह-सुबह मुंबई से हमारे मित्र फिरोज मिठीबोरवाला ने ललित मोदी का इंटरव्यू वाला लिंक शेयर किया।

फिरोज विश्व व्यवस्था के ताने-बाने को मुझसे बेहतर समझते हैं। कश्मीरी जनता के हकहकूक हो या फिलस्तीन के मामलात या इस्लामी आबादी के तमाम मसले, फिरोज की समझ साफ-साफ है। जियोनिज्म का विशेषज्ञ तो वह हैं ही।

हमें तो तब झटका लगा था, जब देश भर के अनेक मित्रों की तरह वह केजरीवाल झांसे में आ गया और उसकी समझ पर मुझे थोड़ा-थोड़ा सा शक भी होने लगा।

वैसे मैं राजदीप सरदेसाई से कभी प्रभावित नहीं रहा, मेरे पसंदीदा करण थापर हैं। ललित मोदी के मुखातिब राजदीप का इस इंटरव्यू को लाइव मैंने इंडिया टीवी पर देखा है। आज फिर फिरोज का लिंक खोलकर इसे अपने ब्लागों पर कुछ प्रासंगिक अखबारी कतरनों के साथ अपने ब्लागों पर शेयर करते हुए तमाम चियारियों और चियारिनों के जलवाबहार फिर देखता रहा।

पहले ही दिन मैंने लिखा था, भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी के बाद सबसे सुंदर महिला सुषमा स्वराज के बचाव में पहले ही दिन मुझे मालूम था कि असली लड़ाई भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, घोड़ों की नीलामी, आईपीएल साफ्ट पोर्न कैसिनो और क्रिकेट बाजार की मुनाफावसूली की बंदरबांट को लेकर है और सुषमा स्वराज तो निमित्त मात्र है।

सुषमा के इस्तीफे से यह जलजला तुरंत सूख जायेगा, इसीलिए मैं बार-बार कह लिख रहा हूं कि सुषमा स्वराज से इस्तीफा नहीं मांगना चाहिए। अब आप तक फिरोज का भेजा यह लिंक पहुंच चुका होगा, थोड़ा फुरसत निकाल कर देख लें कि ललित मोदी क्या-क्या गुल खिला रहे हैं और इस गुल बगीचे में कौन कौन उनके साथ नहीं है। देखेः

About हस्तक्षेप

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Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक

साठ साल का देशबन्धु

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