Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / मोदी का विकास मॉडल वस्तुतः विकास विरोधी, सामाजिक विभाजनकारी और संवैधानिक संस्थान विरोधी मॉडल है
Sikar: Prime Minister and BJP leader Narendra Modi addresses during a public meeting in Rajasthan's Sikar, on Dec 4, 2018. (Photo: IANS)

मोदी का विकास मॉडल वस्तुतः विकास विरोधी, सामाजिक विभाजनकारी और संवैधानिक संस्थान विरोधी मॉडल है

बिहार विधानसभा चुनाव का मिथभंजन और यथार्थ Myths and realities of Bihar assembly elections

नरेन्द्र मोदी के विकास मॉडल से भिन्न बिहार की विकास दर निश्चित तौर पर आकर्षित करने वाली है

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों (Results of Bihar assembly elections) ने सबको मुसीबत में डाल दिया है। इस बार के चुनाव परिणाम जो कुछ कह रहे हैं, वह सतह पर जितना सरल दिख रहा है वास्तव में वह उतना सरल नहीं है। इस चुनाव को बिहार का मिथ भंजन कहें तो समीचीन होगा।

पहला मिथ, बिहार विकासहीन राज्य है, लेकिन व्यापक प्रचार अभियान के दौरान सत्य और तथ्य की खोज के क्रम में मिथ टूटा कि बिहार पिछड़ा और विकासहीन राज्य है। बिहार की विकास दर (Bihar’s growth rate) सन् 2008-09 में 11.44 प्रतिशत थी। देश के 18 राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों में बिहार में सबसे ज्यादा सकल घरेलू उत्पाद दर्ज किया गया। यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया जबकि सारी दुनिया में मंदी का तेज असर था। भारत में भी मंदी थी और राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू उत्पाद 9 फीसदी से घटकर 6.7 फीसदी आ गया था।

केन्द्रीय सांख्यिकी विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार बिहार की विकास दर 11.44 फीसदी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास मॉडल से भिन्न बिहार की यह विकास दर निश्चित तौर पर आकर्षित करने वाली है और उसने बिहार के विकासहीन मिथ को तोड़ा है।

Democracy in Bihar did not win the caste equation!

आम लोगों में यह प्रचार है कि बिहार में लोकतंत्र नहीं जाति समीकरण की जीत हुई है। यह बात एक सिरे से गलत है। यह सही है कि भारत में जातियाँ हैं, ताकतवर और कमजोर जातियाँ हैं, लेकिन आम चुनाव कभी भी मात्र जातियों के बलबूते पर नहीं जीत सकते। किसी भी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में जाति समीकरण के बल पर चुनाव जीतना संभव नहीं है।

दूसरी बात यह कि जाति तो इस चुनाव का प्रधान एजेण्डा ही नहीं थी। लोकतंत्र में चुनाव हमेशा राजनीतिक मुद्दों पर होता है, इस बार भी मुद्दा विकास था, इससे पहले भी मुद्दा विकास था और नीतीश कुमार के नेतृत्व पर आम जनता को भरोसा था, यह बहुत बड़ा कारक है जिसके कारण महागठबंधन को जीत मिली। जाति की कुछ अंश तक भूमिका रहती है, लेकिन निर्णायक भूमिका राजनीतिक मसले और आम जनता की राजनीतिक चेतना की रहती है।

मीडिया भी हारा

इस बार के चुनाव ने दूसरा मिथ तोड़ा है मीडिया निर्मित राय का। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि मीडिया जो राय बनाता है आम जनता उसका अनुसरण करती है। लेकिन बिहार की जनता ने मीडिया निर्मित राय के आधार पर मतदान न करके यह सिद्ध किया है कि मीडिया संदेशों का संचार तो हुआ लेकिन संप्रेषण नहीं हुआ, प्रचार तो हुआ लेकिन राजनीतिक असर प्रतिकूल रहे, खासकर भाजपा-एनडीए-मोदी के प्रचार अभियान को ध्यान से देखें तो हर स्तर पर जबर्दस्त आक्रामक मीडिया प्रचार किया गया लेकिन वह निष्प्रभावी रहा। आम जनता की राय को निर्मित करने में परंपरागत संचार और उसके उपकरणों की निर्णायक भूमिका रही, इस मामले में महागठबंधन ने सही रणनीति अपनायी उसने परंपरागत मीडिया और मासमीडिया दोनों का संतुलन के साथ इस्तेमाल किया। जबकि मोदी एंड कंपनी ने सिर्फ मासमीडिया का ही जमकर इस्तेमाल किया, परंपरागत मीडिया के उपयोग में वे पिछड़ गए। मसलन्, परंपरागत मीडिया के तौर पर घर-घर कार्यकर्ता पहुँचाने या कायिक तौर पर संदेश पहुँचाने वाली मशीनरी को वे प्रभावशाली नहीं बना पाए।

लोकतंत्र की खूबी (The power of democracy) है कि वह मिथ बनाता है तो मिथ भंजन भी करता है। लोकतंत्र का मिथ (Myth of democracy) है कि वह शरीफों का तंत्र है, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव इस मिथ को तोड़ते हैं। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि बिहार विधानसभा में चुनकर आए विधायकों में 58प्रतिशत विधायक ऐसे हैं जिन पर आपराधिक केस चल रहे हैं।

“बिहार इलेक्शन वाच एंड एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म” के अनुसार 2015 के विधानसभा चुनाव में 3450 उम्मीदवार  158 दलों की ओर से मैदान में थे। सन् 2010 के चुनाव में 91 दलों के लोग मैदान में थे। इस बार आठ फीसदी महिला उम्मीदवार खड़े हुए। जबकि 2010 में नौ फीसदी महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। तकरीबन 1.71 फीसदी यानी 59 उम्मीदवारों के पास दस करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति की सूचना सामने आई। इसके अलावा औसतन हर उम्मीदवार के पास 1.44 करोड़ रुपये की संपत्ति है। यानी तकरीबन हर उम्मीदवार करोड़पति था।

यानी बिहार में मध्यवर्ग में संपत्ति का तेजी से संचय बढ़ा है। समृद्धि आई है। उम्मीदवारों की संपत्ति का जो ब्यौरा सामने आया है, वह अपने आपमें बिहार के विकास का नमूना मात्र है। मसलन्, दस करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वाले 59 उम्मीदवार मैदान में थे, पांच करोड़ से लेकर दस करोड़ रुपये तक की संपत्ति के मालिक 95 उम्मीदवार मैदान में थे, एक करोड़ रुपये लेकर पांच करोड़ तक की संपत्ति के मालिक 706, जबकि 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की संपत्ति के मालिक 506 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिनकी संपत्ति 50 लाख से कम थी, ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 2084 थी।

संपत्ति के विकास ने सामंती मूल्यों के खिलाफ संघर्ष को कमजोर किया

उम्मीदवारों की संपत्ति का आंकड़ा बिहार के मध्य वर्ग की बदलती हुई प्रकृति के बारे में बहुत कुछ कह रहा है। इस बदलाव को गंभीरता के साथ समझने की जरुरत है।

बिहार के मध्यवर्ग में आई संपत्ति ने तमाम किस्म की सामंती ह्रासशील प्रवृत्तियों को भी बल पहुँचाया है, यही वजह है बिहार में दबंगई को बुरी नजर से नहीं देखते। संपत्ति के विकास ने सामंती मूल्यों के खिलाफ संघर्ष को कमजोर किया है, संपत्ति मोह को सबसे बड़ा सामाजिक मोह बना दिया है।

New strong coalition of domination and secularism in Bihar

संपत्तिमोह मूलतः धर्मनिरपेक्ष लक्षण है, अतः इस प्रक्रिया में साम्प्रदायिक मूल्यों के कमजोर होने की संभावनाएं ज्यादा  है। यही वजह है बिहार में दबंगई और धर्मनिरपेक्षता का नया मजबूत गठबंधन उभरकर सामने आया है। बिहार के नवोदित मध्यवर्ग की विशेषता है कि वह पहले वाले मध्यवर्ग की तुलना में आज ज्यादा मिश्रित सामाजिक प्रक्रियाओं से गुजर रहा है, इसलिए इसमें नए मिश्रित समाज और बहुलतावाद के प्रति जबर्दस्त आकर्षण है जिसके कारण साम्प्रदायिक एजेण्डे को बिहार में शिकस्त का सामना करना पड़ा है।

यह मिथ दिमाग से निकाल देना चाहिए कि बिहार में भाजपा का सफाया हो गया है

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों को देखकर यह लगता है कि भाजपा का सफाया हो गया, लेकिन वास्तव में हकीकत यह नहीं है। भाजपा को इस बार के चुनाव में सभी दलों से ज्यादा वोट मिले हैं, भाजपा को 24.4फीसदी वोट मिले हैं, जबकि जेडीयू को 16.8फीसदी, राजद को 18.4फीसदी, कांग्रेस को 6.7 फीसदी वोट मिले हैं।

दलीय जनाधार की दृष्टि से भाजपा आज भी बिहार में सबसे बड़ा दल है। इसलिए यह मिथ दिमाग से निकाल देना चाहिए कि बिहार में भाजपा का सफाया हो गया है। भाजपा के इतने व्यापक जनाधार की अनदेखी करना सही नहीं होगा।

यह सच है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा-गठबंधन हार गया है। लेकिन भाजपा आज भी अकेला सबसे बड़ा दल है। आमतौर पर यह होता है कि जीत की खुशी में हम सब सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की अनदेखी कर बैठते हैं। इस तरह के शार्टकट से बचना चाहिए।

आंकड़े बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा गठबंधन को पाँच फीसदी कम वोट मिले हैं। जबकि महागठबंधन को तीन फीसदी कम वोट मिले हैं। वोटों में आई इस गिरावट के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि महागठबंधन और भाजपा दोनों की लोकप्रियता में कमी आई है।

इस बार के विधानसभा चुनाव में आरक्षित सीटों के परिणाम निश्चित तौर पर एनडीए के लिए निराशाजनक रहे, बिहार में आरक्षित सीटों की संख्या 38 है, इसमें से मात्र सात सीटों पर एनडीए जीत पाया जबकि 29 सीटों पर महागठबंधन की जीत हुई है। इसके अलावा एनडीए को आरक्षित सीटों में एससी सीटों पर 33.9 फीसदी वोट मिले हैं जबकि एसटी सीटों पर 31.7फीसदी वोट मिले। इसके विपरीत महागठबंधन को एससी सीटों पर 44.9 फीसदी और एसटी सीटों पर 39.9 फीसदी वोट मिले हैं।

विकास प्लस साम्प्रदायिकता की राजनीति का उत्साह कुछ देर के लिए ठंड़ा पड़ा

इस बार के चुनाव में मूलतः विकास के मॉडल पर ही वोट पड़ा है, समस्या है आम जनता किस तरह का विकास पसंद करती है, एनडीए ने विकास का जो मॉडल पेश किया वह आम जनता को आकर्षित नहीं कर पाया, एनडीए का मॉडल था विकास प्लस साम्प्रदायिकता, जबकि महागठबंधन के विकास मॉडल का आधार है  विकास प्लस धर्मनिरपेक्षता। आम जनता ने विकास प्लस धर्मनिरपेक्षता के मॉडल को स्वीकृति दी और इससे साम्प्रदायिक ताकतों को गहरा राजनीतिक आघात लगा है। इससे विकास प्लस साम्प्रदायिकता की राजनीति का उत्साह कुछ देर के लिए ठंड़ा पड़ा है।

विकास प्लस साम्प्रदायिकता के मॉडल को आधार बनाकर मोदी सरकार सारे देश में सामाजिक-धार्मिक विभाजन को तेज करना चाहती है और उसे विकास के आवरण से ढंककर रखना चाहती है। विकास प्लस साम्प्रदायिकता के मॉडल के निशाने पर जहाँ एक ओर जनता है तो दूसरी ओर संवैधानिक संस्थाएं हैं।

मोदी सरकार विभिन्न तरीकों से संवैधानिक संस्थाओं और संवैधानिक अधिकारों पर बड़ी बारीकी से हमले कर रही है इन हमलों के खिलाफ आम जनता को सचेत करने की जरुरत है। संवैधानिक संस्थाओं पर हो रहे हमलों को महागठबंधन इस बार के चुनाव प्रचार में जमीनी स्तर पर सम्प्रेषित करने में सफल रहा। आरक्षण समाप्ति का जो सुझाव आरएसएस ने दिया है वह असल में एससी-एसटी के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है और इस हमले को बिहार की आम जनता ने सीधे पकड़ा है।

महज जाति का सवाल नहीं है आरक्षण Reservation is not just a question of caste

आरक्षण का सवाल महज जाति का सवाल नहीं है वोटबैंक का सवाल नहीं है। मोदी सरकार के विकास के मॉडल में यह अन्तर्निहित है कि संवैधानिक संस्थाएं पंगु बनायी जाएं या फिर उनको खत्म कर दिया जाय मोदी सरकार ने बड़े सुनियोजित ढ़ंग से योजना आयोग को खत्म कर दिया, पंचवर्षीय योजना की नीति को ध्वस्त कर दिया,जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और न्याय संस्थान से जुड़े कॉलेजियम सिस्टम को खत्म कर दिया, महंगाई को बेलगाम कर दिया, केन्द्र सरकार के संस्थानों और विभागों में नई नियुक्तियों पर पाबंदी लगा दी, इससे यह साफ हो गया कि मोदी का विकास मॉडल वस्तुतः विकास विरोधी, सामाजिक विभाजनकारी और संवैधानिक संस्थान विरोधी मॉडल है। यह बात आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में चली बहस के दौरान बिहार की जनता में सम्प्रेषित हुई है और एससी-एसटी आदि पिछड़े तबकों ने इस हमले को गंभीरता से लिया है। इस अर्थ में बिहार का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है।

आरक्षण के पक्ष में बिहार की जनता का खडे होना मूलतः संवैधानिक अधिकारों और संविधान के पक्ष में खड़ा होना है। इस नजरिए से देखें तो बिहार विधानसभा चुनावों के दूरगामी परिणामों के असर की कल्पना करने में मदद मिलेगी।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

Check Also

Obesity News in Hindi

गम्भीर समस्या है बचपन का मोटापा, स्कूल ऐसे कर सकते हैं बच्चों की मदद

एक खबर के मुताबिक भारत में लगभग तीन करोड़ लोग मोटापे से पीड़ित हैं, लेकिन …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: