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Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

यह वक्त बलात्कार के खिलाफ चीखों का नहीं है शायद

लोकतंत्र ऐसे हाथों में सौंप दिया हमने या सौंप रहे हैं जो बलात्कार को मजे में बदल रहे हैं

भाजपा कहीं है ही नहीं वह तो अब नमोपा

पलाश विश्वास

पाश का लिखा आज भी सच है

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है

जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..

कितना बड़ा और कितना भयंकर सच है यह, इसका अंदाजा हममें से किसी को नहीं है। उपभोक्ता संस्कृति के मुक्त बाजार में सेलिब्रिटी राजनीति किस आत्मघाती ब्लैकहोल में समाहित करने लगी है और किस बरमुडा त्रिभुज में भारतीय समाज, भारत गणराज्य और उसका लोकतंत्र सिरे से लापता होने लगा है कि मलबे तक का नामोनिशान न रहे, इसका सचमुच पढ़े लिखे लोगों को तो कोई अंदाजा नहीं है।

मुक्त बाजार का भी व्याकरण होता है।

पूंजीवाद में भी लोककल्याण की अवधारणा निहित होती है।

हिन्दुत्व आखिर धर्म है, जो आदर्श नैतिकता पर आधारित है और उसका भगवान पुरुषोत्तम राम हैं।

हम मुक्त बाजार के खिलाफ हैं। हम धर्मोन्माद के विरुद्ध हैं।

हम संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे के खिलाफ हैं। लेकिन बहुसंख्य भारतीयों की आस्था हिन्दुत्व है और भारतीय संस्कृति में भी हिन्दुत्व निष्णात है, इस सच से इंकार नही कर सकते।

हिन्दुत्व कोई अनुशासित धर्म नहीं है। बाकी धर्मालंबियों की तरह हिंदुओं के लिए धर्मस्थल पर नियमित हाजिरी और अनिवार्य पूजा पाठ का प्रावधन नहीं है।

दरअसल सही मायने में हिन्दुत्व की बुनियादी अवधारणा संस्कृति बहुल भारतीय मिजाज के मुताबिक है।

हिन्दुत्व में सबसे बड़ा रोग मनुस्मृति आधारित जाति व्यवस्था और विशुद्धता का सिद्धांत है।

बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर से बहुत पहले इस अस्मिता आधारित नस्ली वर्चस्व के खिलाफ साधु संतों बाउल फकीरों ने क्रातिकारी आंदोलन छेड़ रखा था। और वह आंदोलन भी किसी खास धर्म के खिलाफ था नहीं।

संत कबीर, चैतन्य महाप्रभु, संत तुकाराम, हरिचांद गुरुचांद ठाकुर से लेकर दयानंद सरस्वती ने सुधार आंदोलन के जरिये तो बंगाल में नवजागरण के तहत कानूनी पाबंदियों के जरिये आदिम हिन्दुत्व का संशोधित स्वरुप हमारी पहचान है आज।

मुक्त बाजार और अबाध पूंजी के व्याकरण के विरुद्ध अपारदर्शी जनविरोधी उपभोक्ता विरोधी मुक्त कारोबार विरोधी आर्थिक सुधारों के नीति निर्धारण हम पिछले बीस साल से बिना प्रतिरोध जी रहे हैं।

मंडल विरोधी कमंडल मार्फत संघ परिवार के हिन्दुत्व का चरमोत्कर्ष अब हर हर मोदी घर घर मोदी है। जिस महादेव को आर्य- अनार्य दोनो प्रजातियों का आदि देव माना जाता है, जो आर्य अनार्य संस्कृतियों के समायोजन के सबसे जीवंत प्रतीक है।

आदिवासियों के टोटम जो सती कथा में समाहित आदिवासी देवियों के चंडी रूप के पति भैरव के रुप में शिव माहात्म के रुप में पूरे देश को जोड़ता रहा है सदियों से और देवी के वाहन के रुप में आदिवासियों के टोटम की पूजा की जो परंपरा है, उसे मोदी के प्रधानमंत्रित्व के लिए तिलांजलि दे रहा है हिन्दुत्व के सबसे बड़े प्रवक्ता संघ परिवार।

हम इसे निर्वाक सहन कर रहे हैं।

नस्ली भेदभाव के खंडन बतौर शिव की अवधारणा को समझें तो समझ में आने वाली बात है कि बाजार और पूंजी के समांतरनस्ली वर्चस्व के वैश्विक गठजोड़ का कौन सा खूनी खेल रचा जा रहा है।

अब शंकराचार्य ने हर हर मोदी के औचित्य पर संघ परिवार से ऐतराज जताया तो नरेंद्र मोदी ने भी अपने अनुयायियों से कह दिया कि यह नारा न लगायें। हालांकि सच तो यह है कि संघ परिवार और भाजपा इस वक्त मोदीमय है और मोदी एकमुश्त कारपोरेट राज और अमेरिकी हितों के देवादिदेव बनने को बेताब हैं। बाकी सारे देव देवी कूड़े के ढेर में हैं। भूतों प्रेतों को सिपाहसालार बनाकर मोदी भारत गणराज्य को कैलाश बनाने को तत्पर हैं।

इस महाभियान की बागडोर सूचना तकनीक और सोशल मीडिया में प्रबल रुप में उपस्थित नरेंद्र मोदी स्वयं संभाल रहे हैं। भाजपा चुनाव प्रचार अभियान के चेहरा वे ही हैं। पार्टी के टिकट उन्हीं के मर्जी से बांटे जा रहे हैं। रोज इतिहास का पुनर्पाठ रच रहे हैं वे। रोज उनको केंद्रित किंवदंतियां रची जा रही हैं। मुद्दे वे अपनी सुविधा के मुताबिक बना बिगाड़ रहे हैं।

काशी भारतीय संस्कृति का प्राचीनतम केंद्र है और मोहन जोदोड़ो हड़प्पा नगर सभ्यताओं के अवसान के बाद नदीमातृक सर्वाधिक प्राचीन नगरी भी है काशी।

धमाकों और हिंसा की छिटपुट वारदातों के बावजूद काशी के इतिहास को खंगाले तो तमाम संवाद शास्त्रार्थ के नाम पर काशी में ही घटित हुए।

काशी में महाकवि सुब्र्मण्यम भारती और पत्रकार मसीहा विष्णुराव पराड़कर का निवास भारतीयता को मजबूत करता रहा है।

काशी बाकी धर्मस्थलों की तरह एकतरफा प्रवचन का केंद्र नहीं है।

अस्सी के घाट पर वर्गहीन भारतीय समाज की प्रवाहमान अभिव्यक्ति से बाकी देश अपरिचित भी नहीं है।

ऐसे काशी में बाबा विश्वेश्वर महादेव हैं तो पार्वती स्वयं अन्नपूर्णा है, जो खाद्य सुरक्षा की गारंटी हैं।

इस काशी से ही नमो की सुनामी रचने की परियोजना है ताकि उत्तर प्रदेश और बिहार जीतकर बहुमती जनादेश के सहारे दिल्ली का सिंहासन नमो हो जाये।

अब शायद केसरिया शब्द पर भी पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि भाजपा अब भाजपा कहीं है ही नहीं वह तो अब नमोपा है और संघ परिवार भी संघ परिवार नहीं रहा, वह नमोपरिवर है।

तो इस नमोपा और नमो परिवार भारत देश को नमोदेश बनाने पर तुला है और इस परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए भारतीय संस्कृति के प्राणकेंद्र प्रगतिशील हिन्दुत्व के प्राचीन शास्त्रित गढ़ काशी को ही बाजारु अंकगणित से निर्वाचित किया गया है।

अब समझने वाली बात है कि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना की कमान संघ परिवार और नमो के हाथ में नहीं है,हम ऐसा सोचने का दुस्साहस भी नहीं कर सकते।

तो नमो के वाराणसी में दावेदारी घोषित होते ही गूंज उठा हर हर मोदी घर घर घर मोदी नारे की देश विदेश मथ रही प्रतिध्वनियां का क्या हिन्दुत्व के बहरे कानों तक पहुंचाने के लिए शंकराचाचार्य की वाणी ही प्रतीक्षित थी, इस पर सोचें।

इस पर भी सोचें की बहुसांस्कृतिक काशी के कायाकल्प के जो संघी प्रकल्प हैं, उससे सबसे पहले महादेव विस्थापित हो रहें हैं, यानी नस्ली वर्चस्व की खुली युद्धघोषणा है यह।

भाजपा और संघ परिवार के लोगों ने देव देवी मंडल ने टीवी पर चौबीसों घंटे सातों दिन गूंज रहे इस नारे को सुना ही नहीं, ऐसा अजब संजोग इस देश में हुआ ही नहीं। मोदी प्रधानमंत्रित्व का चेहरा हैं। यह कैसा चेहरा है जिसे अपने बुनियादी प्रकल्प की कैचलाइन की ही खबर नहीं होती और शंकराचार्य  के कहने पर उन्हें फतवा जारी करना पड़ता है, अब और नहीं। लेकिन नमोमीडिया फिर भी बाज नहीं आ रहा है।

शंकराचार्य की आपत्ति पर बाकायदा मतदान कराया जा रहा है और इस मतदान में भी मोदी के मुकाबले देवादिदेव महादेव की जमानत जब्त होती दिख रही है।

दरअसल गौरतलब तो यह है कि मोदी के मुकाबले चाहे केजरीवाल हो या चाहे डॉ. कर्ण सिंह और तीसरे चौथे अनगिनत कितने ही उम्मीदवार। नमो का मुकाबला भाजपा से था।

नमो का मुकाबला संघ परिवार से था। नमो का मुकाबला भारतीय लोकतंत्र से था। नमो का मुकाबला धर्मनिरपेक्षता से था।

भाजपा नमो पार्टी है। संघ परिवार नमो परिवार है।

अब नमो लोकतंत्र की बारी है।

नमोनिरपेक्षता और नमोदेश की बारी है।

सही मायने में नमो का असली मुकाबला काशी की गौरवशाली विरासत से है।

नमो के मुकबले दरअसल अकेले उम्मीदवार हैं काशी के अधिष्ठाता देवादिदेव बाबा विश्वेश्वर महादेव।

नमो पार्टी और नमो परिवार के उत्सव अकारण नहीं है क्योंकि एक भी वोट पड़े बिना काशी हारती नजर आ रही है और शिवशंकर भोलेनाथ की तो पहले से ही जमानत जब्त हो गयी।

हमेन कभी शिव के मत्थ जल नहीं चढ़ाया है। हमने कभी शिवरात्रि के मौके पर उपवास नहीं रखा है। हमने कभी किसी शिव मंदिर जाकर अपनी मनोकामनाें व्यक्त नहीं की।हम तो सिरे से इस लिहाज से अहिंदू ही हुए। नरकयंत्रणा के जसायाफ्ता कैदी। लेकिन जिनकी आस्था प्रबल है जो हिन्दुत्व के झंडेवरदार हैं जो भाजपा और संघ परिवार के प्रतिबद्ध सेनानी और सिपाही हैं,वे तनिक ठंडे दिमाग से सोचे काशी और महादेव को तिलांजलि देकर उनका हिंदू राष्ट्र कितना हिंदू होगा आखिरकार।

इससे भी बड़ा सवाल बुनियादी यह है कि सदियों की आजादी की लड़ाई के बाद जो हमने विभाजित लहूलुहान आजादी हासिल की और अपने लिए लोकगणराज्य बनाया, उन्हें हम किन हाथों में सौंप रहे हैं।

इस सवाल पर जवाब खोजने से पहले बंगाल के नये बवाल पर भी गौर करें। पहले ही अरविंद केजरीवाल मुद्दा बना चुके हैं कि भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा है।

पहले भी भारत की न्यायप्रणाली ने बार बार बता दिया है कि कैसे संसद और विधानसभायें अपराधियों और बाहुबलियों की शरणस्थलियां बन गयी हैं।

अरविंद तो नाम लेकर लेकर कारपोरेट एजंटों का खुलासा कर रहे हैं। राडिया टेप भी सार्वजनिक हैं। लेकिन बाजार अर्थव्यलव्स्था के साथ सैकड़ों करोड़ में खेलकर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के विज्ञापनी माडल प्रतिबद्ध और निष्ठावान नागरिकों और राजनेताओं को हाशिये पर धकेल कर जो अराजनीतिक अलोकतांत्रिक रैंप में बदलने को है संसद को, वह फैशनपरेड कितना लाजबवाब और जायतकेदार है, इस पर भी मुलाहिजा फरमायें।

बंगाल की अग्निकन्या बाकी भारत की देवी चंडिका हैं क्योंकि उन्होंने वामासुर को वध कर दिया। उनके परिवर्तन राज को दिल्ली स्थानांतरित करने के ख्वाब को भले ही अन्ना हजारे के ऐन मौके पर कदम पीछे करने से भारी धक्का लगा है।लेकिन आगामी लोकसभा चुनावों में बनेन वाली सरकार की रचना में उनकी,जयललिता की और बहन मायावती की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। तीनों महिलाएं अपने अपने राज्य में सत्ता के शिखर को स्पर्स किया हुआ है और उनके मजबूत वोट बैंक भी हैं।

दीदी को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उतने ही नापसंद हैं जितने कि जयललिता और मायावती को। लेकिन मायावती और जयललिता ने भी राजनेताओं को इतने थोक दरों पर किनारे नहीं किया है। दीदी के सारे उम्मीदवार या तो उनके अनुगत अंध भक्त हैं जो सवाल नहीं करते या फिर चौंधियाने वाले सितारे हैं, जो चमकते तो हैं, लेकिन जमीन पर कहीं होते ही नहीं हैं।

ऐसे ही एक सितारे का नाम है बांग्ला फिल्मों का मौजूदा नंबर वन स्टार देव जो गुरुदास गुप्ता के घाटालकेंद्र से तृणमूली उम्मीदवार हैं। गुरुदास बाबू नहीं लड़ रहे हैं और उनकी जगह भाकपा के संतोष राणा हैं। मेदिनीपुर तृणमूल का सबसे मजबूत गढ़ है और देव की दिवानगी अपराजेय है। लाखों वोटों से वे वामपक्ष की यह सीट छीन लेंगे, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है।

उन्हीं देव ने कल एक बांग्ला अखबार में साक्षात्कार में राजनीति के अपने अनुभव के बारे में बताते हुए खुद को रेप्ड बताया। किसने यह रेप किया, यह हालांकि उन्होंने नहीं बताया। लेकिन बलात्त्कार पीड़ितों के लिए एक रामवाण सुझा दिया। देव के मुताबिक बलात्कार के पीड़ितों के लिए दो ही विक्लप खुले होते हैं। या तो खूब चीखो या बलात्कार के मजे ले लो। उन्होंने बताया कि वे बलात्कार का शिकार होकर मजा ले रहे हैं। हालांकि मीडिया, राजनीति और समाज में हुई तीखी प्रतिक्रिया के मद्देनजर राजनीतिक समीकरण ही बदल जाने के खतरे को भांपते हुए देब की लगाम कस दी गयी है।

देव ने ट्विटर पर बयान जारी रखकर अपने इस वक्तव्य के लिए माफी मांग ली है। लेकिन इस बयान का मतलब एकदम बदल नहीं गया सोशल मीडिया पर जारी इस माफीनामे से।

युवाओं के सबसे बड़े बंगाली सुपरआइकन के इस सुवचन से युवा मानसिकता का कितना कायाकल्प होगा, अब आप इस पर विचार जरूर करें।

जाने अनजाने देव ने मुक्त बाजार की अर्थ व्यवस्था के सबसे बड़े सच को नंगा पेश कर दिया है।

यह वक्त बलात्कार के खिलाफ चीखों का नहीं है शायद।

हमने लोकतंत्र ऐसे हाथों में सौंप दिया है या सौंप रहे हैं जो बलात्कार को मजे में बदल रहे हैं।

इसक साथ ही प्रासंगिक एक सच यह है कि दिल्ली और मुंबईे के बहुचर्चित बलात्कार कांडों पर छह सात महीने में फैसले भी आ चुके हैं। लेकिन बंगाल में परिवर्तन राज में हुए किसी भी बलात्कारकांड की अभी सुनवाई ही नहीं हुई है। न अभियुक्तों के खिलाफ अभियोग दायर हो पा रहे हैं।

जाहिर है, कि सुपरस्टार भावी सांसद के सुवचन का तात्पर्य बेहद भयानक है।

उससे भी भयानक है मुक्त बाजार का यह स्त्री विमर्श।

आज से छब्बीस साल पहले, सिर्फ़ सैंतीस साल की उम्र में, ‪#‎पाश खालिस्तानी आतंकवाद के शिकार हुए थे.

उनकी प्रसिद्ध कविता…

‪#‎सबसे_खतरनाक_होता_है_हमारे_सपनों_का_मर_जाना !
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना…

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

गद्दारी, लोभ की मुट्ठी

सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है

पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

ना होना तड़प का

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौट कर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है

जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है

जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है

जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई

एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए

और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

गद्दारी, लोभ की मुट्ठी

सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना…..

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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