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यूपी का चुनाव आ रहा, फिर मुंह में राम…

यूपी का चुनाव आ रहा, फिर मुंह में राम…
0 राजेंद्र शर्मा
खबर यह नहीं है कि आखिरकार प्रधानमंत्री भी ‘तीन तलाक’ के मुद्दे पर बोले। उनकी सरकार ने बाकायदा सुप्रीम कोर्ट में बयान देकर, इस मुद्दे पर एक निश्चित रुख अपनाया है। एक के बाद एक, उनकी सरकार के अनेक मंत्री महिला अधिकारों से लेकर संविधान तक की दुहाई देकर, मुस्लिम दकियानूसियत से लेकर जहालत तक के प्रतीक के रूप में, किसी तरह तीन बार तलाक बोले जाने भर से पुरुष की ओर से तलाक वैध मान लिए जाने पर बरस चुके थे।
ऐसे में प्रधानमंत्री के भी इस मुद्दे पर बोलने में किसी को क्यों अचरज होने लगा।
हां! यह जरूर वर्तमान प्रधानमंत्री के लिए स्वाभाविक होते हुए भी, विडंबनापूर्ण है कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे को सिर्फ और सिर्फ महिला अधिकारों की नजर से देखने और सत्तापक्ष बनाम विपक्ष की या संप्रदायों की राजनीति से दूर रखे जाने की दुहाई जरूर दे रहे थे, लेकिन खुद सांप्रदायिक राजनीति समेत ठीक वही सब कर रहे थे।
यह कोई संयोग ही नहीं था कि प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर एक तरह से पहली बार अपना मुंह खोलने के लिए, बुंदेलखंड में महोबा में भाजपा की कथित ‘परिवर्तन रैली’ का मौका चुना।

इस रैली की दलगत राजनीतिक प्रकृति के बारे में किसी संदेह की रत्तीभर गुंजाइश न छोड़ते हुए, मोदी ने 2017 के आरंभ में होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा को ही जिताने की अपील पर अपना भाषण समाप्त किया।
     लेकिन, यह सिर्फ इस मुद्दे के राजनीतिक इस्तेमाल का ही मामला नहीं है। इस मुद्दे पर बोलने के लिए महोबा का चुनाव, जहां मुस्लिम आबादी शेष उत्तर प्रदेश के औसत से काफी कम है, इस मुद्दे में छुपी सांप्रदायिक ध्वनियों के इस्तेमाल की कोशिश को ही दिखाता है।
जाहिर है कि प्रधानमंत्री कोई तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के भीतर से उठ रही सुधार की आवाज को संबोधित नहीं कर रहे थे।
सचाई यह है कि इस मुद्दे को, जो बराबरी के अधिकारों के लिए मुस्लिम महिलाओं के आंदोलन की आवाज के रूप में उठकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है और खुद समुदाय के भीतर से सुधार की मांग के तेज होने को दिखाता है, मोदी सरकार के माध्यम से संघ-भाजपा ने लगभग हाइजैक ही कर लिया है।
इसी हाइजैकिंग के हिस्से के तौर पर, मोदी सरकार के इशारे पर, उसके विधि आयोग द्वारा कथित रूप से बहस के लिए जारी की गयी एक प्रश्नावली के जरिए, तीन तलाक के विरोध को जान-बूझकर समान नागरिक संहिता के लिए समर्थन के साथ गड्डïमड्डï कर दिया गया है।

समान नागरिक संहिता की मांग, संघ-भाजपा के सांप्रदायिक गोलबंदी के प्रमुख हथियारों में से एक
सभी जानते हैं कि समान नागरिक संहिता की मांग, संघ-भाजपा के सांप्रदायिक गोलबंदी के प्रमुख हथियारों में से एक रही है।
चाहे प्रधानमंत्री ने महोबा के अपने भाषण में समान नागरिक संहिता पर कुछ नहीं कहा हो, उनके तीन-तलाक के मुद्दे के जिक्र में समान नागरिक संहिता की मांग की ध्वनि आसानी से सुनी जा सकती थी। 
     बहरहाल, सांप्रदायिक रंग के जिन मुद्दों को संघ-भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण को बढ़ाने के लिए उछाला जा रहा है, उनकी सूची सिर्फ तीन-तलाक तथा समान नागरिक संहिता तक सीमित नहीं है।

यूपी का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा, एक बार फिर राम मंदिर याद आ रहा
अचरज नहीं कि यूपी का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा गरमाने की कोशिशें तेज होती जा रही हैं।
ऐसी कोशिशों की शृंखला की ताजातरीन कड़ी में केंद्रीय पर्यटन व संस्कृति मंत्री, केंद्र द्वारा प्रस्तावित रामायण संग्रहालय के लिए जमीन की तलाश के नाम पर अयोध्या जा पहुंचे।
सीधे न सही, रामायण संग्रहालय के बहाने ही सही, राम मंदिर का मुद्दा और उस पर देश में सत्ता में बैठी भाजपा का रुख, कम से कम चर्चा में तो रहेगा।
इसीलिए, महेश शर्मा का कम से कम संग्रहालय की नींव रखे जाने के लिए सक्रिय होना स्वाभाविक था। सो नींव रखने के लिए जमीन की तलाश में वह खुद ही अयोध्या पहुंच गए।
जैसाकि अनुमान लगाया जा सकता है, पर्यटन मंत्री ने उक्त परियोजना को ‘अयोध्या को विश्व पर्यटन मंच पर लाने’ के नाम पर जरूरी बताने की कोशिश की है। लेकिन, 154 करोड़ रु0 की प्रस्तावित परियोजना की परिकल्पना से साफ है कि यह मंदिर मुद्दे को ही दूसरे तरीके से छेड़ने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं है।
अचरज नहीं कि इस मौके पर वह खुद रामलला तथा सरयू के दर्शन का कर्मकांड करने के साथ, इसकी याद दिलाना नहीं भूले कि प्रधानमंत्री ‘राम का काम’ करेंगे।

प्रधानमंत्री के दशहरा संबोधन में मिल गया था संकेत
     दरअसल, भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए राम मंदिर का मुद्दा गरमाने में अब और संकोच न करने का संकेत तो खुद प्रधानमंत्री के दशहरा संबोधन में मिल गया था।
उत्तर प्रदेश के चुनाव और राम मंदिर के मुद्दे के साथ सीधे रिश्ता जोड़ने के लिए, नरेंद्र मोदी ने लखनऊ के एशबाग के दशहरा कार्यक्रम में शामिल होने को ही नहीं चुना था, उन्होंने ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ अपने संबोधन का आरंभ और अंत भी किया था।
कहने की जरूरत नहीं है कि ‘जय सियाराम’ जैसे परंपरागत संबोधनों से भिन्न, ‘जय श्रीराम’ का नारा अभिन्न रूप से, राम मंदिर आंदोलन से जुड़ गया है, जो कथित कार सेवकों की भीड़ों द्वारा 6 दिसंबर 1992 को चार सौ साल से ज्यादा पुरानी बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने में अपने उत्कर्ष पर पहुंचा था।
खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लखनऊ में कई-कई बार यह नारा लगाए जाने का इशारा स्पष्ट था।
संभवत: इसी इशारे ने पर्यटन व संस्कृति मंत्री को, संग्रहालय के शिलान्यास के लिए जमीन की तलाश के लिए खुद अयोध्या का दौरा करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
इससे पहले, संभवत: उसी इशारे पर, विवादपसंद सांसद सुब्रमण्यम स्वामी यह एलान कर चुके थे, उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले और वास्तव में दिसंबर तक ही, राम मंदिर के निर्माण का रास्ता खुल जाएगा। हां! उनके हिसाब से यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से होने जा रहा है, जो लगातार सुनवाई की उनकी नवंबर में लगायी जाने वाली याचिका के आधार पर, अदालत सुनाने जा रही है!
     बहरहाल, अगर इस सबके पीछे मकसद राम मंदिर के मुद्दे को सिर्फ परोक्ष रूप से छेड़ने का यानी उसे इस तरह उठाने का था कि सत्ताधारी पार्टी तथा उसकी सरकार उसे सीधे उठाती नजर नहीं आए, तो उत्तर प्रदेश की जमीनी सचाइयां उनका यह खेल बिगाड़ती नजर आती हैं।
राम मंदिर आंदोलन से जुडक़र राज्य में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे, विनय कटियार ने इस परोक्ष या बारीक मंदिर राग की अपर्याप्तता पर सीधे उंगली रखते हुए, एलान कर दिया कि उत्तर प्रदेश की जनता को ‘लॉलीपॉप नहीं राम मंदिर चाहिए’।

विनय कटियार की आवाज, अकेले कटियार की ही आवाज नहीं
जाहिर है कि जब वह ‘लॉलीपॉप’ कहकर केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘रामायण संग्रहालय’ की उपयोगिता को खारिज कर रहे थे, तो वह उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए उसकी सीमित उपयोगिता पर भी टिप्पणी कर रहे थे।
जाहिर है कि वह खासतौर पर उत्तर प्रदेश के विधानसभाई चुनाव में और खुलकर, राम मंदिर का मुद्दा उठाने और भुनाने की मांग कर रहे थे।
     यह मानने का कोई कारण नहीं है कि विनय कटियार की आवाज, अकेले कटियार की ही आवाज है। ऐसा लगता है कि यह उत्तर प्रदेश भाजपा के बड़े हिस्से की आवाज है।
अगर वाकई ऐसा है तो यह नरेंद्र मोदी के प्रत्यक्ष नेतृत्व के बावजूद, जिसमें राज्य में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा का उम्मीदवार घोषित न कर, नरेंद्र मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़े जाने की प्रबल संभावना भी शामिल है, भाजपा की शाश्वत दुविधा के उसे कसकर जकड़ लेने का ही मामला है।
यह शाश्वत दुविधा, समूची जनता की बेहतरी की भाषा बोलने और धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण को राजनीतिक-चुनावी रूप से भुनाने के बीच की दुविधा है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ या मुख्यत: समूची जनता की बेहतरी की भाषा के ही भरोसे तो भाजपा, 2014 के आम चुनाव में भी नहीं रही थी। साल भर पहले ही हुए मुजफ्फरनगर के दंगों से भडक़े ध्रुवीकरण की काफी मदद उसे हासिल थी। खुद प्रधानमंत्री के भाषणों में कथित ‘पिंक रिवोल्यूशन’ पर हमला, इस ध्रुवीकरण में और मदद करता था।
फिर भी, उस चुनाव में विकास और उससे जुड़े रोजगार के नारे पर ज्यादा जोर था। लेकिन, नरेंद्र मोदी के ढाई साल के राज के बाद, विकास पुरुष की उनकी छवि का आकर्षण इतना कमजोर जरूर पड़ गया लगता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के जमीनी नेता, ‘राम मंदिर’ के प्रत्यक्ष सहारे की मांग कर रहे हैं।
बेशक, इसके पीछे पिछले साल की बिहार की करारी हार का अनुभव भी होगा। यह इसके बावजूद है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव में भाजपा को बिहार जैसे एकजुट विपक्षी मोर्चे का सामना नहीं करना होगा और उसे, कम से कम वास्तविक तिकोने मुकाबले का लाभ जरूर मिल रहा होगा।
क्या फेल हो गया सर्जिकल स्ट्राइक
वैसे यह और भी विडंबनापूर्ण है कि यह मांग तब उठ रही है जबकि सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में, पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद का ज्यादा से ज्यादा दोहन करने का हथियार मोदी सरकार, संघ परिवार को पहले ही मुहैया करा चुकी है।
     भाजपा का मंदिर राग, हारे को राम नाम का मामला है या नहीं, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा। लेकिन, इतना तय है कि भाजपा विकास के मुद्दे को पीछे रखकर, राम मंदिर समेत सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले सभी मुद्दों का आगे-आगे और ज्यादा इस्तेमाल करने जा रही है।                                                              0

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