यूपी चुनाव : गुंडाराज, महागुंडाराज या राक्षसराज

मनोज कुमार झा

मोदी सरकार हर मोर्चे पर फेल हो गई है, इसमें कोई शक नहीं रह गया है। इस सरकार की नीतियों की वजह से दुनिया में भारत की छवि पर भी बुरा असर पड़ा है। पाकिस्तान हो या चीन, मोदी सरकार की विदेश नीति असफल साबित हुई है। बहरहाल, सरकार को इससे ज़्यादा मतलब नहीं है। अमेरिका की दलाली करने पर भी वहां उसे कुछ खास हासिल नहीं हुआ। हालत ये है कि हर जगह इस सरकार का मजाक उड़ रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी जैसा व्यक्ति सरकार के मंत्रियों और अफसरशाहों पर सवाल उठाता है और कोई कुछ नहीं कर पाता। दो साल के दौरान ही मोदी सरकार की दिवालिया नीतियों की वजह से इसे अब तक की सबसे खराब सरकार बताया जा रहा है। हालत ये है कि जो मंत्री सरकार की दो साल की उपलब्धियों का बखान करने जनता के बीच जा रहे हैं, उन्हें ईंट-पत्थरों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
विगत दिनों हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिल पाई। इसके पीछे इस सरकार के प्रति जनता का असंतोष है जो दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जाएगा। सिर्फ असम में भाजपा को सफलता मिली। इसके पीछे कांग्रेस का वहां लंबा शासन और उसके प्रति लोगों का असंतोष ही एकमात्र वजह है। अब भाजपा की निगाह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर है, जो अगले साल होना है। यूपी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। यूपी का फ़ैसला साबित कर देगा कि भाजपा का भविष्य क्या होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने एक तरह से यूपी चुनावों के लिए प्रचार भी शुरू कर दिया। वैसे भी इनका काम महज चुनाव-प्रचार करना ही रहा है। विधानसभा चुनावों के लिए शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने इतना प्रचार किया हो, जितना मोदी ने किया है। यूपी में मोदी ने अपनी जनसभा में बहुत ही भद्दे तरीके से प्रचार शुरू किया। उन्होंने कहा कि एक मौका देकर देखो, काम नहीं कर सका तो लात मार कर भगा देना।
ये लात मार कर भगा देने वाले इनके जुमले की बहुत निंदा हुई। दरअसल, प्रधानमंत्री से इस तरह की सड़कछाप भाषा की उम्मीद कोई नहीं करता। यह वाकई बहुत ही दुख और आश्चर्य की बात है कि एक प्रधानमंत्री ऐसी घटिया भाषा का इस्तेमाल करे।

पर मोदी ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा रखी ही कब ?
बिहार चुनाव हो या पश्चिम बंगाल का चुनाव, हर जगह उन्होंने अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी घटिया भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। बिहार इलेक्शन के दौरान ‘पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे’ वाला उनका जुमला काफी चर्चित हुआ था। जीत न बिहार में मिली, न बंगाल में। अब देखना है कि यूपी में क्या होता है।

यूपी में जीत के लिए भाजपा अपना सब कुछ दांव पर लगा देगी
इसमें कोई शक नहीं कि यूपी में जीत के लिए भाजपा अपना सब कुछ दांव पर लगा देगी। यूपी की जीत से ही उसे राज्यसभा में बहुमत हासिल हो सकता है और आगे सरकार को ताकत मिल सकती है। यूपी और बिहार वो राज्य हैं जो केंद्र की राजनीति को तय करते रहे हैं। लेकिन वहां मोदी ने शुरुआत ही बुरी की है। ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि मोदी के अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में उनके खिलाफ बहुत ज्यादा असंतोष है। काशी को क्योटो बना देने वाला जुमला बेकार साबित हुआ।

भाजपा चुनावों में अपनी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को छोड़ नहीं सकती।
यही उसकी एकमात्र पूंजी है। यही कारण है कि यूपी चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही भाजपा नेतृत्व ने कैराना का राग छेड़ दिया। कैराना से हिंदुओं के पलायन को बहुत बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की गई, लेकिन यह टांय-टांय फिस्स हो गया। बीजेपी नेताओं की सोच थी कि इस मुद्दे को उभार कर वे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की शुरुआत कर देंगे और लोगों के बीच वैमनस्य पैदा कर, कुछ दंगे-फसाद करवा कर चुनाव में उसकी फसल काट लेंगे। पर कैराना का सच सामने आ गया। लेकिन भाजपा के मंसूबे अभी भी वही हैं। इसकी वजह ये है कि इसके पास दूसरा कोई मुद्दा है ही नहीं। विकास की भद्द तो बढ़ती महंगाई से ही पिट गई।
मोदी सरकार ने बेशर्म फैसला करते हुए रक्षा समेत सभी क्षेत्रों को भी एफडीआई के लिए खोल दिया। जो काम कांग्रेस नहीं कर पाई, वह काम भाजपा ने कर दिखाया, जबकि विपक्ष में रहने के दौरान इसने एफडीआई का जबरदस्त विरोध किया था। इसके अलावा, दो वर्षों में सरकार ने एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया है, जिससे जनता को तनिक भी राहत मिली हो। इस वजह से चंद भाजापाइयों और संघ समर्थक जूठनखोरों के अलावा सबके मन में मोदी सरकार के प्रति भारी असंतोष है।

अब सवाल ये है कि भाजपा यूपी में जीत के लिए क्या करेगी।
ये देखने वाली बात होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि वह राममंदिर का मुद्दा उठाएगी। यद्यपि इस मुद्दे में अब कोई दम नहीं रहा, पर ऐसी घोषणाएं की जा रही हैं कि 2019 तक मोदी के प्रधानमंत्री रहते अयोध्या में राममंदिर बन जाएगा। यूपी के मतदाताओं के रिझाने के लिए एक घोषणा रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने की है यूपी में बुलेट ट्रेन चलाने की। पहली बुलेट ट्रेन चली नहीं, दूसरी की घोषणा हो गई। मोदी और उनके सहयोगियों का मानना है कि जनता बेवकूफ है और ऐसी घोषणाएं उसे रिझा सकती हैं, पर इसका हश्र सामने आ जाएगा।

सवाल है, यूपी में चुनाव के समीकरण क्या हैं ?
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, लाख कोशिशों के बावजूद उसका फिर से उठकर खड़ा हो पाना मुश्किल लगता है। पहले मोदी के लिए, बाद में नीतीश के लिए और अब यूपी में कांग्रेस के लिए काम कर रहा इलेक्शन कैम्पेनर और योजनाकार प्रशांत किशोर दावा कर रहा है कि यूपी में अगली सरकार कांग्रेस की बनेगी। यह हास्यास्पद है। अगर ऐसे प्रोफेशनल योजनाकारों के दम पर ही चुनाव जीते जा सकते तो फिर जनता के मतों की जरूरत क्या होती। प्रशांत किशोर जैसे चुनाव योजनाकारों का आना ही इस जनतंत्र की सच्चाई को सामने रख देता है। ज्यादातर गंभीर राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मत व्यक्त किया है कि यूपी में कांग्रेस की स्थिति में सुधार संभव नहीं है। वह सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ सकती। यूपी में हार के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का खात्मा संभव है। यह अलग बात है कि लालू-नीतीश और वामपंथी उसके साथ हैं, पर वामपंथियों को पश्चिम बंगाल में अपना हश्र नहीं भूलना चाहिए। वैसे भी यूपी में वामपंथियों की कोई ताकत नहीं है।

जहां तक मुलायम सिंह का सवाल है, इस बार चुनाव में समाजवादी पार्टी का सूपड़ा जरूर साफ हो सकता है, क्योंकि अखिलेश-मुलायम के शासन से जनता बुरी तरह त्रस्त हो गई है।
मुलायम को अपनी हार साफ दिखाई पड़ रही है और वे हताशा में कुछ ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनका अखिलेश ने भी विरोध किया। मुलायम के भाई शिवपाल यादव ने गैंगस्टर मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का विलय सपा में करा दिया। पर अखिलेश के विरोध के कारण यह विलय रद्द करना पड़ा।
कहा जा रहा है कि चुनाव में क्या रणनीति अपनाई जाए, इसे लेकर मुलायम के कुनबे में फूट पड़ चुकी है। सपा वैसे भी एक परिवार और कुनबे की पार्टी बन कर रह गई है। इसके कई नेताओं में भारी असंतोष है और उनमें से कुछ मौका मिलते ही भाजपा या बसपा में जा सकते हैं। कुल मिल कर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सपा का भी खात्मा हो सकता है। मुलायम और उनके कुनबे ने लंबे समय तक केंद्र और यूपी में सत्ता का मजा लिया है, पर यादव मतों के आधार पर और गैंगस्टरों के सहयोग से उनका दोबारा सत्ता में आ पाना असंभव प्रतीत होता है।

ऐसे में, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती फिर से यूपी की सत्ता पर काबिज हो सकती हैं। मायावती ने इसके लिए तैयारियां भी शुरू कर दी है। जोड़-तोड़ और किसी भी तिकड़म में मायावती भाजपा और सपा नेताओं से पीछे नहीं हैं। धनबल भी उनके पास कम नहीं। दलितों, पिछड़ों के साथ उच्च जातियों के वोटरों को भी साधने की कला का प्रदर्शन उन्होंने सफलतापूर्वक किया था। ऐसा वे फिर कर सकती हैं। उनकी जीत इसलिए भी संभव है, क्योंकि जनता में हताशा है।
यूपी में मायावती के राज को गुंडाराज कहा गया था और अखिलेश-मुलायम के राज को महागुंडाराज।
यह ठीक ही कहा गया था। अखिलेश ने पांच साल तक यूपी में राज कर लिया। इस दौरान यूपी लगातार गर्त में जाता रहा। अखिलेश सरकार माफिया और गुंडों के भरोसे चलती रही। मुलायम जो एक समय मुसलमानों के मसीहा माने जाते थे और मौलाना मुलायम के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे, कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यकों का भी उन पर भरोसा नहीं रहा। इसके पीछे मुजफ्फरनगर और अन्य दंगों में सपा की संदिग्ध भूमिका भी रही है। अल्पसंख्यक मायावती के करीब आ रहे हैं। मायावती की नीति है कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों के साथ ऊंची जाति के वोटरों को भी अपने पक्ष में गोलबंद कर लिया जाए। इसके लिए वे साम-दाम-दंड-भेद, कोई भी नीति अपनाने से गुरेज नहीं करेंगी। अगर उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, फिर भी इतनी सीटें तो मिल जाएंगी कि जोड़-तोड़ कर या गठबंधन कर सरकार बना लें।
बहरहाल, यूपी की जनता को गुंडाराज, महागुंडाराज और भाजपा के राक्षसराज में से ही किसी एक को चुनना है। अन्य विकल्प मतदाताओं के सामने नहीं है।

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