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राम की सौगंध खाते हैं कि अब इस मुल्क में इंसानों के कोई हक हकूक नहीं!

राम की सौगंध खाते हैं कि अब इस मुल्क में इंसानों के कोई हक हकूक नहीं!
अब यही हाल होना बाकी है।
बाकी जो हक हकूक हैं, अब उनकी भी खैर मनाइये कि वे भी खत्म हैं जैसे कि मेहनतकशों के हकहकूक क्योंकि सूअरबाड़े का दस्तूर यही है कि नगाड़े खामोश रहेगे और नौटंकी चालू रहेगी और सर भी कटेंगे आपके, हाथ पांव तो कटे हुए हैं ही , खैर करें कोई रब जो रब को मानते हैं, हम काफिरों का क्या!
जिस मुल्क में प्रधानमंत्री की पत्नी को अपने हकहकूक के लिए अदालत का दरवज्जा खटखटाना पड़े, वाहां कुछ भी संभव है।
PATNA COURT TO HEAR PLEA IN DOMESTIC VIOLENCE CASE AGAINST NARENDRA MODI ON BEHALF OF JASHODABEN
http://indiasamvad.co.in/patna-court-to-hear-plea-in-domestic-violence-case-against-narendra-modi-on-behalf-of-jashodaben/
हमारे लोगों के दिमाग होते नहीं हैं और न लब होते हैं हमारे लोगों के। अदब कायदे की तहजीब चूंकि नहीं है, इसलिए मुहब्बत और नफरत का फासला सिर्फ दो इंच का है और रास्ता दिल को छू लेने का है जो आग का दरिया भी है और डूबकर जाना भी है।
हम तो हुए खासा बदतमीज इसलिए कि जो हुक्मरान हैं वे भी खासे बदतमीज हैं और हरामजदगी उनकी नस नस में है। बदतमीजी अब हमारी जुबान है और हम गुफ्तगू भी उसी जुबान से कर रहे हैं।
क्योंकि फतवा है कि न नागरिक नागरिकों की कोई आजादी है और निजता का उनका कोई मौलिक अधिकार और दमन उत्पीड़न के सिलसिले बदस्तूर जारी है।
इस नामुराद बदफिजा में बदजुबान हुए बिना बात मुश्किल है। दोस्तों, अपने इस बेअदब, कमअक्ल, बुरबक बदतमीज को माफी बख्शना। माफ आप ही को करना है क्योंकि किसी रब के दरवज्जे मैं मत्था टेकता नहीं हूं।
राम की सौगंध हम खाते हैं, खाते हैं राम की सौगंध कि बच्चा बच्चा अब सिर्फ राम का है और भव्यराम मंदिर इस दुनिया में कहीं बने या न बने फासिज्म के राजकाज में बिजनेस फ्रेंडली बेशर्म नंगई की हुकूमत है और हकीकत यह है कि अब इस मुल्क में इंसानों के कोई हक हकूक नहीं कि फतवा है चूंकि मौलिक कोई अधिकार नहीं है निजता का, सोच हो या ख्वाब, घर हो या बिस्तर निगरीनी हर पल होगी बेदखली ताकि हो अबाध अबाध चूंकि महाजनी पूंजी है अबाध चूंकि जरायपेशा मजहब है और रब किराये पर है।
गौरतलब है कि हुकूमत ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संविधान में किसी भी नागरिक को मौलिक अधिकारों के तहत निजता का अधिकार नहीं मिला है। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने जस्टिस जे चेलामेश्‍वर के नेतृत्‍व वाली पीठ के मुताबिक यह नायाब दलील पेश की कि संविधान किसी भी नागरिक को निजता का अधिकार नहीं देता है।
हम माननीय अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का शुक्रिया अदा करते हैं कि करीब एक दशक से जो बात आदरणीय गोपाल कृष्ण जी, दूसरे तमाम लोग और हम बार बार देश भर में दौड़ दौड़ कर लिख बोलकर साबित करने की कवायद करते रहे हैं और अपने रोजनामचे में भाई अमलेंदु के मत्थ रात बिरात चढ़कर आप सबकी नींद खलल में डालने की बदमजगी करने की जुर्रत करके भी जो हम अबतक साबित न कर सके थे, सुप्रीम कोर्ट में हुकूमत ने वह हकीकत सरेआम बाबुलंद आवाज में कह दिया कि नागरिकों के निजता के अधिकार नहीं होते और आधार योजना मुक्त बाजार के हितों के लिए है, सब्सिडी खत्म करने के लिए जरुरी है और संसद से मंजूरी लिये बिना इस मद पर निजी कंपनियों को तोहफा देती रही है हुकूमत।
बहहाल माननीय अटॉर्नी जनरल साहिब रोहतगी ने 1950 के दशक में दिया सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आठ सदस्‍यों की पीठ ने फैसला दिया था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने पीठ को बताया कि देश में निजता के अधिकार पर कानून अस्पष्ट है। इसके साथ ही उन्‍होंने अपील की है कि मुद्दे पर एक आधिकारिक फैसले को पारित करने के लिए एक बड़ी बेंच के गठित की जानी चाहिए।
अब हम तो अपने बाबा साहेब को जिंदा नहीं कर सकते कि उनसे पूछते, बाबासाहेब, आपने सारे हकहकूक जो दे दिये हम कमीनों को, उसकी हिफाजत का बंदोबस्त किये बिना हमें क्यों जालिम बेरहम हत्यारों के हवाले कर गये कि हम हग रहे हों, मूत रहे हों, या इश्क में चोंचे लड़ा रहे हों, या कुछ सोच रहे हों या कुछ ख्वाब देख रहे हों तो वह हमारा हकहकूक नहीं है और अपनी जान माल की हिफाजत वास्ते हमारा कुछ भी गोपनीय नहीं है और हमारा सबकुछ देश बेचो ब्रिगेड ने नाटो और पेंटागन और सीआईए मोसाद के साथ साथ मसलन कि महज मोबाइल कनेक्शन और सब्सिडी के वास्ते निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जा रहा है और हम चूं नहीं कर सकते कि हमारी उंगलियों की छाप उनके जिम्मे हैं कि जब चाहे वे हमें कुछ भी साबित करके हमारा सबकुछ छीन लें।
बाबासाहेब, शुक्र हैं कि बहुजनों की, हाशिये पर जो इंसानियत है, जो सर्वहारा वंचित है, उनकी आवाज आप उठाने के लिए अब जिंदा नहीं हैं वरना वे आपकी गत क्या करते अंदाजा लगाना मुश्किल है और यकीनन वे आपको जीते जी भूत में तब्दील कर देते।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बावजूद आपकी मजबूरी यह है कि जरुरी सेवाओं को बहाल रखने की गरज हो तो फटाक से अपना सबकुछ उनके नाम कर दें औऱ झटाक से एक नंबर हासिल करके अपना वजूद उनके हवाले करके खालिस रोबोट या क्लोन कहकर जयश्री राम का हांका लगाये वरना वे किसी दिन फतवा दे देंगे कि आाप फलां देश चले जायें या आर मुल्क के दुश्मन हैं और आपको फांसी दे दी जायेगी या कमसकम आपके यहां दनादन सीबीआई के छापे पड़ेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का क्या, उसके उन फैसलों का क्या, जो कभी लागू ही नही होते और राज्य सरकारें और केंद्र सरकार को दमन उत्पीड़न कत्लेआम के सार हक हकूक हासिल हैं और कयामत के इस मंजर में इंसानों के कोई हक हकूक नहीं हैं।
दरअसल हम कबंध जो हुए और कबंधों का कोई हक हकूक होता नहीं है और जैसे उनका कोई चेहरा नहीं होता, वैसे ही उनका कोई दिलोदिमाग होता नहीं है।
पलाश विश्वास

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