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वाह री बहन जी! यूं पी सरकार का लेखा जोखा करेंगे निजी सी ए!

ए राजा के २ जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में कैग की रिपोर्ट से उठे बवाल से सबक लेते हुए उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने ऐसी संस्थाओं के हाथ पैर बाँधने की पूरी तैयारी कर ली है ताकि सरकार के अन्दर हो रहे घपलों की जानकारी बाहर आसानी से ना जा सके और इसके पूर्वाभ्यास के लिए सहकारी समितियों को चुना गया है.
बीती  २९ दिसंबर २०१० को राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा निर्णय लेकर प्रारंभिक कृषि ऋण सहकारी समितियों को स्वायत्ता प्रदान करके मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायतें को उ०प्र० सहकारिता अधिनियम १९६५, द्वारा प्रदत्त धरा ६४ के अंतर्गत लेखा परीक्षा के अधिकारों को गौण बना दिया गया है जिसके फलस्वरूप, लेखा परीक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण कार्य को करवाने के लिए, जिसमे, राज्य सरकार व केंद्र सरकार दोनों का करोडो रुपये का अनुदान प्रति वर्ष लगता है, निजी सी०ए० से करवाने की स्वायत्ता देने के परिणामस्वरूप, इस विभाग से जुड़े कर्मचारियों व अधिकारियों  को कार्य विहीन कर दिया गया है जिसकी शुरुआत अगले वित्तीय वर्ष से शुरू हो जाएगी.
सरकार की इस मंशा को भांपते हुए उत्तर प्रदेश सहकारी लेखा परीक्षक संघ ने मायावती सरकार से आर पार की लड़ाई का मन बनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस प्रस्ताव को वापस न लिया गया तो संघ आगामी २८ जनवरी से आन्दोलन और आमरण अनशन करेगा.
इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश सहकारी लेखा परीक्षक संघ की अध्यक्ष करिश्मा पाल और महामंत्री उदयराज सिंह ने मुख्यमंत्री मायावती को प्रेषित एक ज्ञापन में कहा है कि-” दिनांक २९/१२/२०१० के मंत्रिपरिषद के निर्णय के परिणामत: विभाग से प्राम्भिक कृषि ऋण सहकारी समितियों के चले जाने के बाद  कार्य विहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी जिसका प्रभाव अगले वित्तीय वर्ष अर्थात १/४/२०११ से ही परिलक्षित होने लगेगा.
संघ की अध्यक्ष करिश्मा पाल ने दूरभाष पर हस्तक्षेप.कॉम को बताया कि यदि केबिनेट का यह प्रस्ताव लागू हो जाता है तो सरकार द्वारा चयनित लेखा परीक्षक जो उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा को उतीर्ण करके आते हैं, वे बेकार हो जायेंगे और निजी सी ए फर्म्स के औडिट का कोई मतलब नहीं होगा. उन्होंने बताया कि-” मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार इस अधिसूचना में उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम १९६५ की धरा २९[क], जिसमें प्राम्भिक कृषि ऋण सहकारी समितियों, केन्द्रीय बैंकों एवं शीर्ष बैंक के प्रबंध कमिटी के शक्तियों तथा कर्तव्यों का प्राविधान है, में उपखंड १६-क जोड़ते हुए प्रबंध कमिटी द्वारा आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था निर्धारित करने, अंकेक्षकों को नियुक्त तथा अंकेक्षण की प्रतिपूर्ति करने का प्राविधान होगा..”
मज़े की बात यह है कि सरकार द्वारा नियुक्त इन लेखा परीक्षकों के प्रेक्षण का क्षेत्र लगभग ८० किमी से १०० किमी तक होता है, लेकिन सरकार इस परीक्षण के लिए इनको मात्र २००/- प्रतिमाह का यात्रा भत्ता देती  है, जबकि निजी सी ए फर्मों के लिए सरकार दिल खोलकर बैठी है.
करिश्मा पाल ने मांग की है कि इन समितियों के लेखा परीक्षण में पारदर्शिता लाये जाने के लिए विभाग का ओडिट एक्ट बनाया जाना और लेखा परीक्षित प्रतिवेदनों का परिपालन सुनिश्चित करने हेतु प्रतिवेदनों को विधान सभा पटल पर रखे जाने की व्यवस्था होनी चाहिए न कि निजी लेखा परीक्षकों की नियुक्ति?

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