“वोल्गा से गंगा तक” का पुनर्पाठ

क्या वोल्गा तट की ठिठुरती सर्दी और हिंस्र पशु इससे बेहतर नहीं थे? कम से कम तब हम यह तो जानते थे कि हमारे शत्रु कौन हैं और मित्र कौन।
डॉ. शुभ्रा शर्मा
राहुल जी की सबसे अधिक चर्चित पुस्तक है- वोल्गा से गंगा। यह पुस्तक उस समय लिखी गयी थी जब भाषाशास्त्रीय अध्ययन के आधार पर यह माना जाता था कि विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं के विकास के पीछे एक साझा भारोपीय (इंडो-यूरोपियन) जाति का हाथ था। मूल रूप से यह भारोपीय जाति कैस्पियन सागर के तट पर बसती थी। बाद में जनसंख्या बढ़ने और खाने-पीने की कमी होने से इसकी विभिन्न टुकड़ियाँ अथवा जन विभिन्न दिशाओं में फैल गये और कालांतर में उन्हीं से अलग-अलग संस्कृतियों का विकास हुआ। भूमध्य सागर के किनारे बसने वाले हित्ती और मित्तानी के नाम से पहचाने गये और जो जन ईरान और भारत में आकर बस गये उन्हें आर्यों के रूप में जाना गया। वोल्गा से गंगा में इन्हीं जनों के प्रसार की कहानी कही गयी है।
प्रागैतिहासिक काल की कहानियों में निशा, दिवा और पुरुहूत प्रमुख हैं। राहुल जी ने वोल्गा की उपत्यका में भारोपीय जाति के शैशव का बहुत ही रोमांचक दृश्य उपस्थित किया है। भीषण शीत और भयंकर हिंस्र पशुओं से जूझते छोटे से क़बीले का विवरण ऐसा सजीव है कि पढते हुए आप भी उस भय और शीत से काँप-काँप उठते हैं। राहुल जी का मानना है कि इन क़बीलों में मातृ-सत्ता की प्रधानता थी क्योंकि केवल स्त्री ही संतान को जन्म दे सकती थी। उसके पास प्रकृति का ऐसा अमूल्य वरदान था, जो उसे पुरुष से श्रेष्ठतर सिद्ध करता था। माँ और संतान का सम्बन्ध ही एक निश्चित और शाश्वत सत्य था। अपनी संतान की रक्षा के लिए माँ जिस तरह लड़ सकती है, उस तरह किसी भी प्रजाति का पुरुष कभी नहीं लड़ता। यही गुण थे जो स्त्री को सहज स्वाभाविक ढंग से क़बीले का नेतृत्व सौंपने को पर्याप्त थे।
वोल्गा की घाटी में शैशव बिताकर भारोपीय जातियां पामीर और स्वात घाटी से होती हुई भारत तक आयीं। इसीलिए संकलन का नाम “वोल्गा से गंगा” रखा गया है।
निशा के बाद की दो कहानियां- दिवा और पुरुहूत संक्रमण काल का ब्यौरा देती हैं। पुरुधान कहानी में पशुपालक आर्यों और कृषि-प्रधान सिंधु सभ्यता के टकराव का विवरण है।  एक ओर थी घुमन्तू कबीलों के बीच प्रचलित गणतांत्रिक अथवा जनतांत्रिक परंपरा तो दूसरी ओर राजा और पुरोहितों के शासन में बँधी नागर सभ्यता। इस कहानी में ऋग्वेद के दिवोदास और सुदास बिलकुल अलग रूप में मिलते हैं।
उपनिषद् काल के कई प्रमुख व्यक्तित्व- याज्ञवल्क्य, उद्दालक और गार्गी अपने तमाम दार्शनिक चिंतन और तार्किकता के साथ प्रवाहण कहानी में नज़र आते हैं। प्रवाहण को राहुल जी ने कर्म-फल और आत्मा-पुनर्जन्म जैसे समस्त औपनिषदिक चिंतन का जनक घोषित करने के साथ-साथ यह भी साबित कर दिया है कि यह सब उसी की कोरी कल्पना थी।
भगवान बुद्ध का समय बन्धुल मल्ल और चाणक्य-चंद्रगुप्त का समय नागदत्त में उजागर होता है। प्रभा महाकवि अश्वघोष और दुर्मुख बाणभट्ट के जीवन पर प्रकाश डालती है।
चक्रपाणि से एक बार फिर स्पष्ट हो जाता है कि दिल्ली और कन्नौज का पतन ग़ज़नी और ग़ोर के सैनिकों की वीरता के कारण नहीं, हमारी अपनी फूट और कलह के कारण हुआ।
अलाउद्दीन ख़िलजी की तमाम क्रूरताओं को दरकिनार करते हुए राहुल जी उसे प्रजा का हितैषी ठहराते हैं, क्योंकि उसके राज्य में प्रजा सुखी थी।
सुरैया कहानी में अकबर कहता है- “मैंने चाहा कि हिन्दू-मुस्लिम जातियों के ख़ून का समागम हो। इसी को ध्यान में रखकर मैंने प्रयाग की त्रिवेणी पर यह क़िला बनाया।”
दूसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानी सुमेर का एक पात्र कहता है -“गाँधीवादी स्वराज हो या साम्यवादी, इसमें हमारा-तुम्हारा मतभेद हो सकता है,किन्तु स्वराज्य भारत के लिए होगा, इसमें तो संदेह नहीं है।”
संकलन की सभी कहानियों में राहुल जी का साम्यवाद की ओर झुकाव मुखरित है। लगभग सभी कहानियाँ मनुष्य को मनुष्य का दास न बनाने, स्त्री को पूरी स्वतन्त्रता देने और राजतंत्र की अपेक्षा गण अथवा जनतंत्र को प्रश्रय देने का सन्देश लिए हुए हैं। सम्भव है कि यह समय की मांग रही हो, मत भूलिए कि ये कहानियाँ ठीक स्वतंत्रता के आस-पास लिखी गयी थीं। और यह भी संभव है कि यह राहुल जी की अपनी आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना रही हो। जैसा कि कविकुलगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था-

जहां चित्‍त भय से शून्‍य हो
जहां हम गर्व से माथा ऊंचा करके चल सकें
जहां ज्ञान मुक्‍त हो
जहां दिन रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित कर
छोटे और छोटे आंगन न बनाए जाते हों
जहां हर वाक्‍य ह्रदय की गहराई से निकलता हो
जहां हर दिशा में कर्म के अजस्‍त्र नदी के स्रोत फूटते हों
और निरंतर अबाधित बहते हों
जहां विचारों की सरिता
तुच्‍छ आचारों की मरू भूमि में न खोती हो
जहां पुरूषार्थ सौ सौ टुकड़ों में बंटा हुआ न हो
जहां पर सभी कर्म, भावनाएं, आनंदानुभुतियाँ तुम्‍हारे अनुगत हों
हे पिता, अपने हाथों से निर्दयता पूर्ण प्रहार कर
उसी स्‍वातंत्र्य स्‍वर्ग में इस सोते हुए भारत को जगाओ

लेकिन क्या हम आज, स्वाधीनता के 67 वर्ष बाद तक रवि बाबू या राहुल जी के सपनों के भारत के आस-पास भी कहीं पहुँच पाये हैं? क्या आज भी हर भारतीय का चित्त भय से शून्य है? क्या हम गर्व से माथा ऊंचा कर चल पाते हैं? क्या हमारा ज्ञान मुक्त है? क्या हमारे यहाँ अब भी वसुधा को खण्डों में विभाजित कर छोटे-छोटे आँगन नहीं बनाये जाते?
सच तो यह है कि हम इनमें से किसी एक स्थिति को भी प्राप्त नहीं कर पाये हैं। हम अब विदेशी शासन के भय में तो नहीं जीते, लेकिन हमें डरा कर रखने वाले और बहुत से कारक पैदा हो गये हैं। हम बेटियों को घर से बाहर भेजते डरते हैं- पता नहीं किसकी कुदृष्टि उस पर पड़ जाये और एक बार फिर निर्भया की कहानी दोहरा दी जाये। हम खुद घर छोड़कर जाने से डरते हैं- कहीं शहर का कोई बाहुबली उस पर कब्ज़ा करके न बैठ जाये। हम सहयात्री के हाथ से कुछ लेकर खाने से डरते हैं- कहीं वह हमें बेहोश कर हमारा सामान न लूट ले जाये। हम सड़क किनारे लगे नल से पानी पीने से भी डरते हैं- कहीं किसी लाइलाज मर्ज़ से संक्रमित न हो जायें। हम अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने से डरते हैं- कहीं कोई नाराज़ न हो जाये। हम अत्याचार का विरोध करने से डरते हैं- कहीं हम खुद अत्याचार का शिकार न हो जायें।
ऐसे में हम गर्व करें भी तो किस पर करें और कैसे करें? पचास वर्ष पहले हमारे पास बहुत से ऐसे नेता थे, जिन पर हम वास्तव में गर्व कर सकते थे, जो सच्चे अर्थों में जन-नायक थे। आज उस अग्रिम पंक्ति की तो बात छोड़ ही दीजिये- उसके बाद की दूसरी, तीसरी या दसवीं पंक्ति में भी कहीं कोई वैसा जन-नायक नज़र नहीं आता। कभी कहीं से कोई उम्मीद की किरण नज़र आती भी है तो भ्रष्टाचार के कुहासे में कहाँ खो जाती है, पता ही नहीं चलता।
तब लगता है हम वोल्गा से चलकर गंगा तक आये ही क्यों? क्यों हमने आदिम समाज से तथाकथित सभ्यता और संस्कृति की ओर क़दम बढ़ाये? क्यों दिन-रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित कर छोटे, और छोटे आँगन बनाये? उन आँगनों में तुलसी के बिरवे की जगह पड़ोसी के प्रति जलन और नफ़रत बोई?
क्या वोल्गा तट की ठिठुरती सर्दी और हिंस्र पशु इससे बेहतर नहीं थे? कम से कम तब हम यह तो जानते थे कि हमारे शत्रु कौन हैं और मित्र कौन।
[author image=”https://fbcdn-sphotos-h-a.akamaihd.net/hphotos-ak-ash4/t1.0-9/10152496_660768963959427_5323052597142130384_n.jpg” ]डॉ. शुभ्रा शर्मा ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की. पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के लेक्चरर के रूप में जीवन की शुरुआत की और आजकल आकाशवाणी में कार्यरत हैं. साहित्य, संगीत और पत्रकारिता के क्षेत्र में इनका नाम है. बनारस में इनके बचपन का घर, हरि पदम, काशी की संस्कृति के जानकारों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था. काशी, शंकर और बनारसी तहजीब के शायर, नजीर बनारसी, की गोद में पलीं बढीं, शुभ्रा शर्मा के पिता कृष्ण चन्द्र शर्मा “भिक्खु” एक बड़े साहित्यकार थे. डॉ शुभ्रा शर्मा खुद भी एक लेखिका हैं लेकिन इनका अधिकतर लेखन अभी पांडुलिपि के रूप में इनकी डायरियों में छुपा हुआ है. [/author]

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