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शहरी ग़रीबों में बीमारियों और कुपोषण की स्थिति चिन्तनीय

जागरूक नागरिक मंच के जन स्वास्थ्य शिविर में चिकित्सकों ने जताई राय
सत्येन्द्र सार्थक
लखनऊ, 19 मार्च। शहरी ग़रीबों की भारी आबादी बीमारियों, कुपोषण तथा इलाज के अभाव की शिकार है। स्त्रियों में एनीमिया तथा बच्चों में कुपोषण जनित रोगों की स्थिति चिन्तनीय है और कामकाजी पुरुषों में भी विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रतिशत बहुत अधिक है। स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच मुश्किल और महंगी होते जाने के कारण यह समस्या और भी गंभीर हो गई है। जागरूक नागरिक मंच तथा नौजवान भारत सभा द्वारा निशातगंज में आयोजित जन स्वास्थ्य शिविर में शामिल चिकित्सकों ने अपने अनुभव के आधार पर यह राय जाहिर की।
उत्तर प्रदेश में जन स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ी सेहत की पृष्ठभूमि में स्वास्थ्य के मूलभूत अधिकार पर लोगों को जागरूक करने की एक लंबी मुहिम के तहत इन संगठनों की ओर से आज निशातगंज स्थित बाबा का पुरवा के सामुदायिक केन्द्र में पोस्टर प्रदर्शनी एवं चर्चा तथा निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया।
अनुभवी चिकित्सकों की टीम द्वारा शिविर में करीब 200 मरीजों की जांच की गई जिनमें स्त्रियों और बच्चों की संख्या अधिक थी। डॉक्टरों ने बताया कि नब्बे प्रतिशत से अधिक महिलाएं खून की कमी से पीड़ित पाई गईं। बच्चों में अधिकांश कुपोषण और कम वज़न तथा इससे होने वाले रोगों से ग्रस्त थे। सरकारी अस्पताल में भीड़, दवाओं की अनुपलब्धता तथा खाद्य पदार्थों की महंगाई ने इस आबादी के बीच स्वास्थ्य की समस्या को और भी गंभीर बना दिया है।
इस शिविर में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. मालविका चतुर्वेदी तथा वरिष्ठ चिकित्सक डा. ए.ए. किदवई, दन्त चिकित्सक डा. लव श्रीवास्तव एवं डा. प्रदीप कुमार तथा नेत्र चिकित्सक डा. संजीव रावत ने रोगियों को देखा। इनके अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ शाकम्भरी तथा फिजियोथेरेपिस्ट गीतिका ने भी परामर्श प्रदान किया। डॉक्टरी जांच तथा सलाह एवं दवाओं के साथ मरीजों और उनके परिजनों को यह जानकारी भी दी गई कि रोगों से कैसे बचें और गलत धारणाओं तथा अन्धविश्वासों के चक्कर में न पड़कर स्वास्थ्य के प्रति वैज्ञानिक नजरिया अपनाएं। शिविर में बाबा का पुरवा, चक्करपुरवा तथा भीखमपुरवा बस्तियों के रोगियों को देखा गया।
इस अवसर पर आयोजित पोस्टर प्रदर्शनी में कार्टूनों तथा आंकड़ों के माध्यम से भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा, सरकारी नीतियों, दवा कंपनियों की लूट आदि का भंडाफोड़ किया गया और स्वास्थ्य अधिकारों के बारे में जानकारी दी गई।
इस अवसर पर मरीजों, नागरिकों तथा डाक्टरों के साथ हुई चर्चा में कहा गया कि  संविधान में लोगों को स्वास्थ्य देखभाल और पोषण की अच्छी सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने भी स्वास्थ्य के अधिकार को जीने के मूलभूत अधिकार का अविभाज्य अंग बताया है। लेकिन सरकार इस वादे से मुकर गई है। करों की भारी उगाही से नेताशाही और अफसरशाही का खर्च बढ़ता जा रहा है लेकिन जनता की बुनियादी सुविधाओं में भी कटौती हो रही है। इसकी सबसे अधिक मार गरीबों, औरतों और बच्चों पर पड़ रही है।
जागरूक नागरिक मंच के सत्यम ने कहा कि भारत सरकार प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष स्वास्थ्य पर केवल 1377 रुपये खर्च करती है जो श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान और अफ्रीका के कई निर्धन देशों से भी कम है। डा. नरेंद्र गुप्त कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार अगर सरकार हर साल केवल 287 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ा दे तो देश के हर व्यक्ति को सही स्वास्थ्य देखरेख मिल सकती है।
राहुल फाउण्डेशन की कात्यायनी ने कहा कि अच्छी सेहत के जन्मसिद्ध अधिकार के लिए हमें मिलकर आवाज़ उठानी होगी। जल्दी ही शहर के अन्य इलाकों में भी गरीब आबादी के बीच स्वास्थ्य की स्थिति का सर्वेक्षण करके एक रिपोर्ट जारी की जाएगी। सबके लिए स्वास्थ्य के सवाल पर जनअभियान चलाया जाएगा।

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