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शिवसेना अध्यक्ष को कड़क आवाज में डाँट दिया शेष जी ने

Shesh Narain Singh शेष नारायण सिंह

क्या सांसदों को ऐसा करना चाहिये था ? क्या उन्हें इसकी सजा मिलेगी ? (Should MPs have to do this? Will they get the punishment?) यही सवाल था एबीपी न्यूज की एंकर नेहा पंत (ABP News anchor Neha Pant,) का, जिस पर भाजपा के सुधांशु मित्तल (BJP’s Sudhanshu Mittal) ने बेहद काबिले कबूल बयान दिया हालांकि उनका झुकाव पानी की तरह झील की ओर रहा। लेकिन वीएचपी (VHP) के प्रकाश आग बबूला हुए बैठे थे, उन्होंने उस बहस को हास्यास्पद करार दिया, जिसकी वजह से संसद ठप्प रही, जिसकी वजह से 20 करोड़ मुसलमानों के साथ तमाम दूसरे धार्मिक लोगों की भावनाओं को भी ठेस पहुंची।

इतना ही नहीं प्रकाश ने इस ABP को साफ– साफ कहा कि धिक्कार है इस चैनल पर, और कई बार आपा खो बैठे। मगर इस बहस का सबसे बेहतरीन पहलू था शान्त से दिखने वाले मगर लेखनी में सरकारों की बखिया उधेड़ने वाले वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह (Shesh Narain Singh) का।

शेष सर अपने साथ संविधान की किताब लेकर स्टूडियो में बैठे थे। उन्होंने कहा कि इस बहस में एसे अयोग्य को बुला लिया गया जिन्हें बात करने का सलीका ही नहीं है। इस पर शिवसेना के अध्यक्ष आग बूबला होते। शेष सर ने कड़क आवाज में कहा “….. सुनिये आप …. बात सुनिये….”।

खैर आखिर में वही हुआ जिसकी वीएचपी से उम्मीद की जा सकती।

वीएचपी के प्रकाश ने कहा कि कांग्रेस और दूसरे सैक्यूलर दलों को अपना रजिस्ट्रेशन पाकिस्तान या बंग्लादेश में करा लेना चाहिये, क्योंकि इन्हें सिर्फ देश के 12 करोड़ मुस्लिमों की फिक्र है। यह मानसिकता है तथाकथित राष्ट्रवादियों की। उन्हें इससे सरोकार नहीं कि जिस देश में रोजेदारों के सम्मान में गैरमुस्लिम रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन कराते हों, जिस देश में रोजेदार के सामने कोई गैर मुस्लिम सिगरेट पीने में भी शर्म इसलिये महसूस करता हो कि कहीं इससे मेरे मुस्लिम दोस्त की धार्मिक भावना को ठेस न पहुंच जाये, उस देश में एक सांसद, जिसके ऊपर लेबल लगा है कि वह जनप्रतिनिधि है, एक गरीब वेटर का रोजा जबरन तुड़वा देता है। लेकिन इस संगठन के लोगों को इस पर बजाय शर्म के बजाय माफी मांगने के उल्टे इस कुकर्म की वकालत की पड़ी है। देश की छवि विश्व स्तर पर खराब करने में यह संगठन कोई कमी नहीं छोड़ रहा है।

मुनव्वर राना (Munavwar Rana) ने कहा था कि …

ए सियासत तेरा मेयार न गिरने पाये/ मेरी मस्जिद है ये मीनार न गिरने पाये।

इतना ही ग़ज़ल और बढ़ती है, और उसका एक शेर गुरद्वारे की चौखटों से टकराकर कुछ यूं कह देता है कि

मिलता जुलता है सभी चेहरों से मां का चेहरा / गुरद्वारे की भी दीवार न गिरने पाये।

मगर ये सियासी लोग जिन्हें सियासत करने का मौका सिर्फ इस वजह से मिल गया क्योंकि उन्होंने धार्मिक सद्भाव की ऐसी तैसी की थी। वे उन अल्फाज को क्यों पढ़ेंगे ? क्यों जानेंगे ? क्यों समझेंगे कि God Is One ?

(वसीम अकरम त्यागी, लेखक साहसी युवा पत्रकार हैं।)

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