शुरू से ही हुआ रहा है भारत के मुसलमानों का हिंदूकरण

धर्म बदलते हैं, सांस्कृतिक परंपरायें रह जाती हैं।
उज्जवल भट्टाचार्या
मुहर्रम पर, या उसके शोर-शराबे पर कुछ नहीं कहा गया, जबकि हिंदू त्योहारों पर कहा जाता है। – एक मित्र का कहना है।

व्यक्तिगत रूप से मैं कभी त्योहारों की आलोचना नहीं करता  हूँ। उन्हें लोक संस्कृति का अंग मानता  हूँ।
अन्य कई धर्मों के विपरीत इस्लाम की नैरेटिव कथा नहीं, इतिहास है। हसन और हुसैन की शहादत ऐतिहासिक घटनायें हैं, वे ऐतिहासिक पात्र हैं।
जहाँ तक ताजिये के जुलूस का सवाल है तो दक्षिण एशिया के बाहर अन्य मुस्लिम देशों में ऐसे सार्वजनिक ड्रामे नहीं किये जाते। कन्वर्ट मुस्लिम यहाँ अपनी परम्परायें ढोकर ले आये हैं।
दीवार की घुलघुली में जहाँ हनुमान जी की मूर्ति थी, मुसलमान बनने के बाद वहीं कुरान रख दिया गया। दीया जलाने के बदले धूपबत्ती जला दी गई। रामलीला न सही, मुहर्रम की गमी का जलूस निकाला गया।
भारत के मुसलमानों का हिंदूकरण शुरू से ही हुआ रहा है। और जहाँ तक भारतीयकरण का सवाल है तो रजवाड़ो, क्षेत्रों और भाषाओं में बँटे देश को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में पिरोने में इस्लाम का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
भारत में भी इस्लामी तहज़ीब का आधार क्षेत्र और भाषा नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने वाली मूल्य प्रणाली व प्रशासनिक व्यवस्था थी।
जब मैं भारतीयकरण की बात करता हूँ, तो ध्यान रखना पड़ेगा कि इस्लाम की यह भूमिका आज के सम्पूर्ण भारत में नहीं, बल्कि उत्तर भारत, आज के पाकिस्तान व आज के बांगलादेश में थी।

[author image=”https://fbcdn-sphotos-h-a.akamaihd.net/hphotos-ak-prn2/v/t1.0-9/1236374_10151682638674775_1470583413_n.jpg?oh=0f7682253d6c60f6e907d874de55a438&oe=54EC7B5C&__gda__=1423345770_6a0387f1177d4442ad12b9e8b106041d” ]उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।[/author]

 

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