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संघ ने रुकवा दी मौलाना आजाद फेलोशिप ?

केंद्र सरकार पर आरोप है कि नवंबर 2015 से मौलाना आजाद फेलोशिप योजना की राशि पर रोक लगा दी है
मौलाना आजाद फेलोशिप रोकने की वजह क्या है, यह देश के गरीब अल्पसंख्यक छात्र जानना चाह रहे हैं।
मोदी सरकार देश में दस हजार रोहित वेमुला बनाना चाह रही है
अंबरीश कुमार
नई दिल्ली। मौलाना आजाद फेलोशिप रोकने की वजह क्या है यह देश के गरीब अल्पसंख्यक छात्र जानना चाह रहे हैं।
कहा जा रहा है कि मौलाना आज़ाद फेलोशिप रोक मोदी सरकार देश में दस हजार रोहित वेमुला बनाना चाह रही है। यह भी कहा जा रहा है कि संघ के इशारे पर इसे रोका गया है। यह संघ के शिक्षा एजंडा का हिस्सा माना जा रहा है।
गौरतलब है कि सच्चर कमेटी की शिफारिशों पर मिलने वाली मौलाना आजाद फेलोशिप योजना का लाभ सिर्फ एक खास तबके के लिए रोकना भारत सरकार की धर्मिक पक्षपात नीति को दर्शाता है। यह बताता है कि सरकारी महकमा संविधान पर नहीं बल्कि एक खास विचारधारा के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है।
दरअसल मौलाना आजाद फेलोशिप योजना का लाभ सभी अल्पसंख्यक समुदाय को मिलता है जिसके तहत एमफिल और पीएचडी कर रहे स्टूडेंट इस विशेष फेलोशिप का लाभ उठाते है। लेकिन अब इस फेलोशिप को लेकर सरकार सवालों के घेरे में है।
केंद्र सरकार पर आरोप है कि नवंबर 2015 से मौलाना आजाद फेलोशिप योजना की राशि पर रोक लगा दी है। औऱ जिसका कोई कारण भी नहीं बताया है।
आपको बता दें कि साल 2010 में जब इस योजना की शुरूआत की गई तो गुजरात सरकार ने इस योजना पर अमल करने को मना कर दिया था। फिर मामला हाईकोर्ट में गया तो सरकार को झुकना पड़ा। तब गुजरात के मुख्यमंत्री तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे। इसके लाभार्थी एएमयू के सीनियर रिसर्च स्कॉलर छात्र मोहम्मद फुरकान भी इस भेदभाव व पक्षपातपूर्ण सरकारी रवैये को झेल रहे हैं। उन्हें बीते नवंबर 2015 से स्कॉलरशिप नहीं मिली है।
उच्च शिक्षा का भार मुस्लिम समुदाय नहीं उठा पाता है। जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अगुवाई में 9 मार्च 2005 को 7 सदस्यीय टीम गठित कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पता लगाने के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया। सच्चर कमेटी ने नबंवर 2006 को एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें सभी पहलुओं पर बहुत बारीकियों के साथ स्थिति को दर्शाया गया। अल्पसंख्यकों की शैक्षणिक स्थिति को दर्शाते हुए रिपोर्ट में लिखा कि “जहाँ समय के साथ उन्नति हुई है वहीं अंतर भी बना हुआ है। नतीजतन मुस्लमानों की वर्तमान पीढ़ी पिछड़ रही है”। इसके अलावा आगे इस रिपोर्ट में कहा गया कि श्रेष्ठतम काँलेजों में पूर्व स्नातक छात्रों में हर 25 छात्रों में एक औऱ परास्नातक के 50 में से सिर्फ एक मुस्लिम समुदाय का छात्र है। यह फासला सत्तर के दशक से ग्रामीण औऱ शहरी इलाकें में मुस्लमानों औऱ अन्य श्रेणियों में लगातार बढ़ता जा रहा है। (सच्चर रिपोर्ट) उच्च शिक्षा पर लगातार बढ़ते अंतर को पाटने के लिए यूपीए -2 की सरकार ने मौलाना आजाद स्कॉलरशिप शुरू किया।
गौरतलब है कि इस फेलोशिप का लाभ सिर्फ मुस्लिम समुदाय को नहीं बल्कि पूरे अल्पसंख्यक समुदाय को देने की बात कही। इस योजना का लाभ उच्च शिक्षा ले रहे बहुत से छात्र उठा रहे हैं, पर इस भेदभावपूर्ण नियम से मुस्लिम समुदाय के छात्र काफी परेशान है। स्कॉलरशिप रोकने से उनकी पढ़ाई में तमाम रूकावटे भी आ रही होंगी। स्कालरशिप नहीं मिलने पर अलीगढ़ मुस्लिम विवि के एक छात्र ने ख़त भेजा है, जिसे देखना चाहिए।  इस छात्र ने लिखा है,
 ‘फेलोशिप का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए सहायता प्रदान करना है। ये सहायता एमफिल और पीएचडी कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को पांच साल के लिए दी जाती है। इस की शुरुवात यूपीए के कार्यकाल में प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह द्वारा हुई थी, जो कि शोध छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
फेलोशिप में चयन के लिए छात्रो के पोस्ट ग्रेजुएट के नंबर देखे जाते हैं। मेरिट बनती है फिर मेरिट के आधार पर फेलोशिप मिलती है। ये योजना 2009-10 में शुरू की गयी थी, जिसका लाभ मुस्लिम, ईसाई और सिख समेत अन्य अल्पसंख्यक स्टूडेंट्स को मिलती है। आवेदन प्रतिवर्ष एक सेशन के लिए मांगे जाते हैं, लेकिन इस बार 2015 से 2017 के लिए एक साथ मांगे गए, जो आज तक समझ नहीं आया कि एक साल स्किप क्यों किया गया? इससे साफ़ ज़ाहिर होता है सरकार एक एक साल स्किप करके क्या करना चाह रही है।
इसकी ख़ास बात ये भी थी कि कांग्रेस के समय में हर महीना के पहले हफ्ते में निशित तौर पर पैसा बैंक अकाउंट में आ जाता था, लेकिन वर्ष 2014 से सरकार बदलने के बाद न जाने क्या हुआ। हर महीने की आखिरी तारीख में आने लगा, फिर महीना स्किप होने लगा और फिर नवम्बर 2015 से पूरी तरह बंद हो गया।  कहने का मतलब आज तक पैसा नहीं आया, कुछ समय इंतज़ार करने के बाद छात्रों ने सोशल मीडिया का सहारा लिया, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी।
पिछले साल जब तीन महीने के लिए विलम्ब हुआ था तो अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री ने ट्वीट करके भरोसा दिलाया था कि अब ऐसा नहीं होगा। लेकिन वह वादा भी नहीं निभाया गया। मार्च महीना शुरू हो गया और माननीय मंत्री जी कोई जवाब नहीं दे रहीं।’

problem of delay of fellowship is due to UGC and their bank I’m trying DBT to bank account of scholars soon wait a bit
— Najma Heptulla (@nheptulla) August 17, 2015

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