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सरकार ने पकड़ा दिया लोकपाल का झुनझुना

विवेक दत्त मथुरिया
शहीद दिवस के दिन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ और लोकपाल के निर्माण की हुंकार के बाद गुरुवार को कैबिनेट ने राज्यसभा की प्रवर समिति द्वारा सुझाए गए संशोधनों के साथ लोकपाल को मंजूरी दे दी। कैबिनेट की लोकपाल को मंजूरी मिशन 2014 को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा एक ओर जनता को भरमाने तो दूसरी ओर राज्यसभा में पास न होने की स्थिति में उसका ठीकरा विपक्ष के सर फोड़ने की एक सोची समझी सियासी रणनीति का हिस्सा भर है न कि भ्रष्टाचार से लड़ने की सदिच्छा। अरविंद केजरीवाल का कहना सही है कि यदि मजबूत लोकपाल आ गया तो कैबिनेट में शामिल जिन मंत्रियों ने विधेयक में संशोधनों को मंजूरी दी है, वे जेल में होंगे। अन्ना ने भी इसे सरकार का नाटक बताया है। सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बिना दांत के जिस शेर को दिखा रही है उसे भ्रष्टाचार के जंगल में मौजूद चील और कौंए नौंच-नौंच कर खा जाएंगे।

लोकपाल में हुए संशोधनों और मसौदे पर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल सहित भाजपा ने भी अपनी नाराजगी और असहमति जाहिर की है। लोकपाल के जिस स्वरूप को कैबिनेट ने संशोधनों के साथ मंजूरी दी, वह दूर-दूर तक भ्रष्टाचार के शमन और अंकुश को लेकर आश्वस्त नहीं करता। बल्कि सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करता है। असल बात यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार लड़ना नहीं चाहती। अगर सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का खत्म हो गया तो फिर सत्ता और राजनीति का ग्लैमर ही खत्म हो जाएगा। फिर राजनीति बिना मेवा की सेवा बन कर रह जाएगी। विपक्ष और मीडिया बेरेजगार हो जाएंगे। सरकार ने सभी सियासी दलों की इस सामान्य इच्छा का खयाल लोकपाल के मसौदे में रखा है। तभी तो राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को बाहर रखा गया है। राजनीति और धर्म के मधुर रिश्तों का भी लोकपाल में विशेष खयाल रखा गया है। धार्मिक संस्थान लोकपाल के दायरे से बाहर है। जबकि धार्मिक संस्थान कालेधन की सुरक्षित खपत के सुलभ माध्यम हैं। हकीकत तो यह है कि धार्मिक संस्थानों के पास इतनी अकूत धन संपदा है अगर उसे राष्ट्र के कल्याण में लगा दिया जाए तो वास्तव में देश और समाज का चौतरफा कल्याण हो जाए। राजनीति और धर्म दोनो की इसी बिन्दु पर सहमति है कि अपना काम बनता,  भाड़ में जाए जनता। इसकी पुष्टि लोकपाल में हो रही है। लोकपाल के नाम पर सरकार अपने सियासी हितों को साधने का ही काम कर रही है। आरटीआई के भस्मासुर के बाद सरकार जनता को ऐसा कोई भी कानूनी हथियार नहीं देना चाहती जो खुद उसके लिए आत्मघाती सिद्ध हो। आरटीआई रूपी दूध से जली सरकार लोकपाल रूपी छाछ को भी फूँक- फूँक कर पीने की कोशिश कर रही है। भ्रष्टाचार के विमर्श का कुल जमा लब्बोलुआब यह है देश की पूरी की पूरी राजनीतिक जमात नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार के उनके विशेषाधिकर पर किसी तरह का कोई अंकुश लगे। इस बात में सरकार से लेकर विपक्ष तक चपरासी से लेकर अधिकारी की एक अघोषित मौन स्वीकृति है। इस बात की आश्वस्ति लोकपाल के मसौदे में परलक्षित होती है। लोकपाल में जिस तरह के संशोधन और विशेषताओं का उल्लेख किया गया है, वह भ्रष्टाचार पर अंकुश की बजाय संरक्षण की ओर इशारा करती दिखाई दे रही हैं। लोकपाल के मसौदे से सरकार की नीयत को समझने में किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जनता के सामने बड़ा सवाल यह है भ्रष्टाचार से किस तरह लड़ा जाए और उसका व्यवहारिक विकल्प क्या हो सकता है? भ्रष्टाचार से पहले सियासत का शोधन और परिमार्जन करना होगा, जिसके विकल्प तौर पर केजरीवाल का आम आदमी पार्टी के रूप में चुनावी दखल का निर्णय सही है। वोट की चोट से मदांध हो चुकी राजनीति को नियंत्रण में किया जा सकता है और अंतत: यह काम जनता को ही करना है। मदांध राजनीति के पैरों तले जनता को राहत देने वाले तमाम कानून लंबे समय से रौंदे जा रहे हैं। पूरी व्यवस्था मूकदर्शक की भांति तमाशा देख रही है और लोकपाल उसी तमाशे का नया इंद्रजाल है। आजादी के बाद से लोकतंत्र के मंच पर सत्ता और सियासत काम की बजाय स्वांग करने में ही लगी हैं।

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