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हार से सबक नहीं ले रही कांग्रेस

चुनावों में हार के बाद निर्णय लेने में पार्टी दिख रही अक्षम
राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन को नहीं पहना पा रही अमलीजामा
फ्लॉप होने के बाद राहुल कर रहे सब कुछ ठीक करने का दावा
निर्णय लेने में सहयोगी दलों की पेंच भी बन रही बाधा
शेष नारायण सिंह
नई दिल्ली ! कांग्रेस पार्टी में लोकसभा 2014 चुनाव में हार के बाद संकट और गहराता जा रहा है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, असम और हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन की मांग बहुत तेजी से चल रही है, लेकिन तीनों ही राज्यों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। चुनाव में हार के बाद भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने को किसी से कमजोर मानने को तैयार नहीं हैं। सारी दुनिया के राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेसी यह मानते हैं कि चुनाव में हार का कारण माननीय राहुल गांधी ही हैं लेकिन राहुल गांधी अभी भी यह कहते पाए जा रहे हैं कि वे सब ठीक कर देंगे।
 चारों राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की बात पर इसलिए अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है क्योंकि चुनाव के बाद राहुल गांधी विदेश चले गए थे। अब सोनिया गांधी उत्तरांचल चली गईं हैं। उम्मीद है कि संसद के मानसून सत्र के पहले चारों राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन हो जाएगा लेकिन, फिलहाल तो अनिश्चय के कारण कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल सेल्फगोल करने की भावना से ग्रस्त लग रही है। कांग्रेस आलाकमान ने लगभग तय कर लिया है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और असम के मौजूदा नेताओं की अगुवाई में चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। असम और हरियाणा में तो कोई दिक्कत नहीं है, वहां जो भी सोनिया गांधी कहेंगी, वही मान लिया जाएगा लेकिन, महाराष्ट्र में सबसे मुश्किल मामला है। महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री पृथ्वीराज चह्वाण का हटना तय है लेकिन राज्य में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पेंच फंसा दिया है। राज्य और देश में कांग्रेस की खस्ताहालत के चलते कांग्रेस नेतृत्व राज्य की राजनीति में कोई भी परिवर्तन बिना शरद पवार की सलाह के करने की स्थिति में नहीं है। शरद पवार की स्थिति यह है कि वे किसी भी मजबूत मराठा नेता को कांग्रेस में महत्व मिलते नहीं देखना चाहते। इसलिए उनकी जिद है कि पृथ्वीराज चह्वाण को हटाकर सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री बना दिया जाए लेकिन शिंदे मुख्यमंत्री बनने को तैयार नहीं हैं। वे खुद चाहते हैं कि किसी मजबूत मराठा नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाए जिसका लाभ पार्टी को अब से चार महीने बाद होने वाले चुनावों में मिल जाएगा लेकिन शरद पवार किसी गैर मराठा को लाने के लिए अपनी जिद नहीं छोड़ रहे है। नतीजा यह है कि कांग्रेस आलाकमान की मर्जी नहीं चल पा रही है। उत्तर प्रदेश की हालत और बदतर है। बड़े कांग्रेसी यह कहते देखे जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस मजबूत नहीं होती तो पार्टी के मजबूत होने की कोई संभावना नहीं है। वहां के मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष फैजाबाद के पूर्व सांसद निर्मल खत्री हैं। सभी कांग्रेसियों में इस बात पर एक राय है कि निर्मल खत्री को हटाकर किसी और को नेता बना दिया जाना चाहिए। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि निर्मल खत्री की भी यही राय है लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के इंचार्ज महासचिव मधुसूदन मिस्त्री की हिम्मत नहीं पड़ रही है कि किसी और का नाम प्रस्तावित करें। माहौल यह है कि अगर किसी का नाम आगे कर दिया जाएगा तो बाकी उम्मीदवार नाराज हो जाएंगे।
इस विवाद से बचने के लिए निर्मल खत्री को ही बनाए रखने पर कांग्रेस उपाध्यक्ष सहमत होते दिख रहे हैं। हालांकि मधुसूदन मिस्त्री की सलाह पर जिन नामों पर विचार हो रहा है वे कांग्रेस को जरूरी रफ्तार दे सकेंगे, इसमें सभी को शक है। पता चला है कि मिस्त्री जी की तरफ से राजाराम पाल और पीएल पुनिया का नाम चल रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति की जरूरी सच्चाई यह है कि पीएल पुनिया को अभी भी राज्य के पुराने कांग्रेसी मुलायम सिंह यादव और मायावती के सचिव के रूप में ही ज्यादा देखते हैं, उनको कांग्रेसी मानने को तैयार नहीं हैं। राजाराम पाल संसद सदस्य के रूप में 11 हजार रुपए के किसी विवाद में चर्चा में आ चुके हैं जिसके कारण उनकी संभावना भी कमजोर है। राज्य में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए वाराणसी के पूर्व सांसद राजेश मिश्र के नाम की भी चर्चा है और उनको बुलाकर सोनिया गांधी ने राज्य की राजनीतिक स्थिति की जानकारी भी ली है। लेकिन अभी उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ कह पाना संभव नहीं है। उम्मीद है कि इसी हफ्ते के अनत तक कोई न कोई फैसला हो जाएगा ।

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