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112 लोकसभा सीटों में से 109 जीतने वाली मोदी की भाजपा को प्रियंका रूलाएंगी ख़ून के आँसू

लोकसभा चुनाव Lok Sabha elections में अब सियासी दलों political parties का महासंग्राम शुरू हो चुका है। हालाँकि अभी चुनाव आयोग ने चुनावी रणभेरी नहीं बजाई है। उम्मीद की जा रही है कि संभवत: मार्च के महीने में चुनाव का ऐलान किया जाए, लेकिन सियासत की बिसातों ने अपना काम शुरू कर दिया है। विपक्षी दल opposition parties मोदी की भाजपा Modi's BJP को घेरने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ना चाहते हैं।

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

पहले हम बात करते हैं कुछ ऐसी सीटों की, जहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की मोदी की भाजपा से सीधी लडाई है। ऐसी सीटों की संख्या 112 है, जिसमें से मोदी की भाजपा के पास 2014 के चुनाव में 109 सीटें मोदी की सुनामी में आई थीं। तीन सीट कांग्रेस के पास रही थीं। राज्यवार अगर हम देखें तो इस बार कांग्रेस आधे से ज़्यादा सीटों में वहां खड़ी दिखाई दे रही है, क्योंकि मोदी की सुनामी का खेल अब खतम हो गया है। जिस लिए मोदी को लोगों ने पसंद किया था उसमें मोदी फेल रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस मज़बूत होती जा रही है। जैसे मध्य प्रदेश में कुल 29 सीटों में से 27 सीटें मोदी की भाजपा के खाते में गई थीं, मात्र दो सीट कांग्रेस के वर्तमान में राज्य के CM कमलनाथ व ज्योतिरादित्य सिंधिया ही जीतने में सफल हो पाए थे। गुजरात की 26 में से 26 मोदी की सुनामी जीतने में कामयाब रही थी। राजस्थान की 25 में से 25, छत्तीसगढ़ की 11 में से 11, दिल्ली की 7 में से 7, उत्तराखंड की 5 में से 5, गोवा की दो, अंडमान निकोबार की एक, दादर नगर हवेली व दमन दीव की एक सीट शामिल है, जहाँ मोदी की भाजपा ने कांग्रेस को चारों खाने चित किया था, लेकिन लगता है इस बार यहाँ कांग्रेस बहुत ही शक्तिशाली होकर मोदी की भाजपा को आइना दिखा रही है।

2014 के चुनाव के बाद मोदी की भाजपा ने चाहे कुछ किया ,झूठ से अपने लच्छेदार भाषणों से चाहे उसमें कुछ था या नहीं था, लेकिन कांग्रेस को उठने नहीं दिया। परन्तु कांग्रेस लगातार संघर्ष करती रही और आख़िरकार कांग्रेस एक शक्ति के रूप में मोदी की भाजपा के सामने खड़ी हो ही गई है। अब तक कांग्रेस को और उसके नेताओं को असभ्य भाषा का प्रयोग कर संबोधित करने वाले मोदी व उनके स्वयंभू चाणक्य अमित शाह की भाषा में बहुत फ़र्क़ देखा जा रहा है।

पहले कहा जाता था कि पप्पू हमारे लिए वरदान साबित होता है, लेकिन अब वही पप्पू मोदी की भाजपा के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। मोदी एण्ड शाह के गृह राज्य गुजरात से चला पप्पू का जादू कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में ऐसा चला कि मोदी की भाजपा को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यही वजह है कि इन राज्यों के परिणामों से पूर्व जिन भाजपा नेताओं को बर्फ़ में लगा दिया गया था, आज उनसे कहा जा रहा है कि अगर वह चाहें तो चुनाव लड़ सकते हैं। नहीं तो बेचारे मार्गदर्शक मंडली में डाल दिए गए थे। एल के आडवाणी की फ़ेस रीडिंग से बहुत कुछ पता चलता है। वह अपनी ख़ामोशी के फ़ोटो प्रदर्शित करा कर बहुत कुछ कह जाते हैं। उनकी यह बेचारगी वाली फ़ोटो भिगो-भिगो कर इतनी मार लगाती है जिसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। अगर कोई शर्मदार हो तो वहीं उनके चरणों में पड़कर माफ़ी माँग ले। ख़ैर शर्म इनको कहाँ आती है। अगर होती तो शायद यहाँ तक नहीं पहुँचते।

जहाँ कांग्रेस एक ओर खुद से खड़ी हो रही है वहीं राहुल गांधी के प्रयास भी शामिल हैं। कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश करना मोदी की भाजपा के लिए सिर का दर्द साबित हो रहा है। माना जा रहा है जब भी कांग्रेस कमज़ोर हुई तो उसे दक्षिण भारत ने मज़बूत किया है। प्रियंका गांधी का असर दक्षिण भारत में भी होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। स्व. इंदिरा गांधी को भी दक्षिण भारत से मज़बूती मिलती थी। 1977 में जनता लहर के चलते आयरन लेडी इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई थीं, उसके बाद इंदिरा ने कर्नाटका की चिकमंगलूर लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और जीतकर संसद पहुँची थीं। 1980 में भी इंदिरा ने आन्ध्र प्रदेश की मेंढक व यूपी की उनकी परम्परागत सीट रायबरेली से चुनाव लड़ा और वह दोनों जगह से जीतीं, लेकिन उन्होने मेंढक लोकसभा सीट को अपने पास रखा। सोनिया गांधी ने भी कर्नाटका की बेल्लारी सीट से चुनाव लड़ा और जीतने में कामयाब रहीं। दक्षिण राज्य कांग्रेस की कमज़ोर हालत में मदद करते हैं फिर अच्छे दिन पूरे देश में आ जाते हैं और कांग्रेस मज़बूत होकर उभरती है। ऐसे ही संकेत पिछले सियासी गुणाभाग इशारा करते हैं। मोदी की भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी के झूठ के खोखले वादों के अलावा कुछ नहीं है, जिसकी बुनियाद पर कहा जा सके कि मोदी चुनाव जिताकर एक बार फिर सत्ता के दरवाज़े पहुँच जाएँगे। सब कुछ लूट कर अब बुज़ुर्गों के पायदान पर जाना कहां तक उचित है। क्या यह बात वह बुज़ुर्गं नेता या जनता समझ नहीं रही कि पहले कैसे ज़लील किया और अब सत्ता में वापिस होने के लिए उन्हें सम्मान दिया जा रहा है।

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