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Jagadishwar Chaturvedi

बंगाल में पापुलिज्म की भिड़न्त : पांच सांसदों वाले वाम की पांच ऐतिहासिक भूलें

वामदलों को सन् 2019 के लोकसभा चुनाव (Parliamentary elections of 2019) में अब तक की सबसे बुरी पराजय का सामना करना पड़ा है। सन् 2014 में वामदलों के 10 सांसद चुनकर आए थे, लेकिन 2019 में मात्र पांच सांसद चुनाव जीतकर आए हैं।

उल्लेखनीय है कि सन् 2004 में वामदलों के 59 सांसद चुने गए थे। सन् 2009 में 24 सांसद चुने गए थे। इनमें माकपा के सन् 2004 में 44, सन् 2009 में 16, सन् 2014 में 9 और सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके मात्र तीन सांसद लोकसभा में चुनकर आए। उल्लेखनीय है वामदलों की पांच में चार सीटें तमिलनाडु से आई हैं और एक सीट केरल से आई है।

बंगाल में वामदलों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। सन् 2014 में माकपा को 22.96 फीसदी वोट मिले थे, जो सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में घटकर 6.3 फीसद रह गए हैं।

इसी तरह भाकपा को 2014 में 2.36 फीसदी वोट मिले थे जो 2019 में घटकर 0.39 फीसदी रह गए हैं।

यह कहा जा रहा है कि वाम के वोटों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास चला गया। मामला इतना सरल नहीं है।

इसबार के चुनाव में जो कुछ घटा वह अभूतपूर्व था, मसलन् अनेक इलाकों में बड़े पैमाने मतदान केन्द्रों पर वोटों की खुली लूट हुई है, जिसको माकपा और अन्य वामदल रोकने में असमफल रहे। चुनाव आयोग ने भी अनेक जेनुइन शिकायतों पर उचित कार्रवाई नहीं की।

माकपा की पराजय को सरलीकृत ढ़ंग से व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। यह सच है कि वामदल बुरी तरह हार गए लेकिन उसके कारणों और वहां की जटिल परिस्थितियों को समझने की जरूरत है।

इस प्रसंग में पहली बात यह कि सन् 2011 में ममता के सत्तारूढ होने के बाद पिछले आठ सालों में वामदलों के कार्यकर्ताओं पर असंख्य हमले हुए हैं। सैंकड़ों पार्टी कार्यालयों को तोड़ा गया, तकरीबन 60हजार माकपाकर्मी और समर्थक बंगाल के बाहर जाकर शरण लेने को मजबूर हुए हैं। ममता के इस हिंसाचार और दमन का भाजपा-मोदी ने खुलेआम समर्थन किया। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें इस बार माकपा अपने न्यूनतम संसाधनों के साथ लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरी।

इसबार के चुनाव में जहां एक ओर ममतावाहिनी के गुंडागिरोह हमलावर थे, वहीं दूसरी ओर भाजपा ने देश के विभिन्न इलाकों से अपने गुंडों और लठैतों को गोलबंद करके आक्रामक प्रचार अभियान और हिंसाचार का सहारा लिया। इस चुनाव में माकपा ने कहीं पर भी हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसको विभिन्न इलाकों में हिंसा, धमकी आदि का सामना करना पड़ा।

बंगाल के संदर्भ में माकपा की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसने टीएमसी और भाजपा दोनों को समान शत्रु मानकर चुनाव लड़ा।

यह सच है टीएमसी ने माकपाईयों पर भयानक जुल्म किए हैं, लेकिन टीएमसी और भाजपा को एक ही तराजू पर नहीं तोलना चाहिए। भाजपा आज सबसे बड़ा खतरा है, इस खतरे को बंगाल में कम करके आंका गया।

कायदे से टीएमसी-कांग्रेस और माकपा के बीच में राजनीतिक समझौता करके चुनाव लड़ने की कोशिश की जाती तो बेहतर होता, यदि टीएमसी नहीं मानती तो माकपा को टीएमसी को बिना शर्त समर्थन देकर बंगाल में भाजपा को हराने का प्रयास करना चाहिए था। लेकिन माकपा ने टीएमसी-भाजपा को एक साथ समान शत्रु मानकर चुनाव लड़ा जो कि एकदम गलत फैसला था।

इस समय देश में भाजपा विरोधियों ताकतों को हर स्तर पर एकजुट करने की जरूरत है। तमिलनाडु में माकपा ने यह काम किया और वहां भाजपा बुरी तरह हारी।

असल में माकपा की इसबार के चुनाव में पराजय उसकी गलत नीतियों के कारण हुई है। माकपा की तीसरा मोर्चा न बनाने या भाजपा विरोधी मोर्चा न बनाने की नीति का कुपरिणाम है इसबार की पराजय।

दूसरा बड़ा कारण है माकपा का कांग्रेस के प्रति अछूतभाव।

कांग्रेस की भूमिका आज बदल गयी है, कांग्रेस के बारे में पुराने अ-प्रासंगिक प्रस्तावों के जरिए राय बनाकर माकपा नेताओं का काम करना आम जनता को एकदम पसंद नहीं है। खासतौर पर बंगाल में एक सम्मानजनक ले-देकर राजनीतिक समझौता करके वामदल खुलकर लडाई लड़ सकते थे, लेकिन बंगाल में कांग्रेस के साथ मोर्चा बनाने में वे असफल रहे। इससे भाजपा को सीधे लाभ मिला। इस तरह अप्रत्यक्ष तौर पर माकपा ने भाजपा की मदद की।

उल्लेखनीय है पहले वाम शासन में ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी के कारण पश्चिम बंगाल को महत्वपूर्ण उद्योगों से हाथ धोना पड़ा। आम आदमी यह उम्मीद कर रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रवृत्ति को अपने शासन के दौरान पनपने नहीं देंगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

इस प्रसंग में कुछ मुख्य बातें हैं जो साफ दिखाई दे रही हैं।

राज्य प्रशासन का दलतंत्र के रूप में विस्तार हुआ है। पापुलिज्म बनाए रखने के लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बस्तियों के बाशिंदों का गुण्डावाहिनी के रूप में जमकर दुरूपयोग हो रहा है। बेकारी चरम पर है, टीएमसी-भाजपा दोनों बड़े पैमाने पर बेकारों को हथियारबंद करने में जुटे हैं।

मिलिटेंसी जब भी सिर उठाती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी सबसे पहले पंक्चर हो जाती है। आमतौर पर ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी संबंधित उद्योग तक सीमित रहती है लेकिन मौजूदा दौर में दलीय मिलिटेंसी सामने आई है, यह बंगाल के व्यापक अपराधीकरण का संकेत है। राज्य के विभिन्न इलाके गुंडों में बंट चुके हैं। बंगाल के भद्र समाज को गुंडा समाज में तेजी से रूपान्तरित किया जा रहा है। राज्य का मौजूदा नेतृत्व खुलकर इस अपराधीकरण को संरक्षण दे रहा है। वहीं दूसरी ओर भाजपा भी ईंट का जवाब पत्थर से देने के चक्कर में है। दलबदल को बढ़ावा दिया जा रहा है। हिंसा और पैसे के बल पर इलाका दखल की राजनीति का टीएमसी-भाजपा की ओर से इस्तेमाल किया जा रहा है।

राजनीति में पापुलिज्म कैंसर है।

पापुलिज्म के आधार पर सरकार गिराई जा सकती है, लेकिन सरकार चलायी नहीं जा सकती। पापुलिज्म के आधार पर इमेज बना सकते हैं लेकिन इस इमेज को टिकाऊ नहीं रख सकते। आज यही लोकतांत्रिक पापुलिज्म मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। आज उनका सामना पीएम मोदी के हिंसक पापुलिज्म से है।

वामदलों की मुश्किल यह है कि उनके पास किसी भी तरह का पापुलिज्म नहीं है। बंगाल की जनता इस समय दोनों किस्म के पापुलिज्म से घिर चुकी है। पापुलिज्म में विवेकपूर्ण राजनीति की अस्वाभाविक मौत हो जाती है।

ममता को पश्चिम बंगाल की सत्ता की कमांड संभाले उन्हें आठ साल हो गए हैं। इस दौरान उनकी कार्यशैली के अनेक मिथ टूटे हैं। इसके बाबजूद ममता बनर्जी की एक व्यक्ति के रूप में आम लोगों में अपील बरकरार है।

मीडिया ने पापुलिज्म के जरिए ममता बनर्जी की ईमानदार छवि और सादगीभरी जिंदगीशैली का जमकर प्रचार किया। इसकी आड में टीएमसी के हिंसक और जनविरोधी चरित्र को मीडिया ने आम जनता से छिपाने का काम किया। अपने अंध-वाम विरोध के चलते भाजपा ने भी ममता को सहयोग और समर्थन दिया, यहां तक कि ममता की पीएम मोदी ने जमकर प्रशंसा की, इसने ममता और टीएमसी के असली राजनीतिक चरित्र पर बहस को मुद्दा ही नहीं बनने दिया। पीएम मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ममता पर दबी जुबान में हमला किया। प्रच्छन्न ढ़ंग से सारधा कांड की जांच को शिथिल करके ममता की मदद की।

सन् 2010-11 में ममता बनर्जी ने जो कहा उसे राष्ट्रीय-क्षेत्रीय मीडिया बिना जांच- परख के अकाट्य सत्य मानकर छापता रहा। इस तरह का अंध मीडिया समर्थन देश में हाल के वर्षौं में पीएम मोदी के अलावा और किसी राजनेता को नसीब नहीं हुआ।

लंबे समय से मीडिया तो ममता बनर्जी और मोदी का दीवाना रहा है।

दीवानगी की यह पराकाष्ठा है कि इन दोनों के संदर्भ में मीडिया ने खबर और प्रौपेगैण्डा के बीच के अंतर को भी खत्म कर दिया और इन दोनों के प्रौपेगैण्डा को खबर बना डाला।

मीडिया की अंधभक्ति ने दुतरफा संकट पैदा किया है।

पहला संकट मीडिया के सामने यह है कि वह मोदी और ममता बनर्जी को वर्चुअल इमेजों के रूप में देखे या रीयल इमेजों में देखे। ममता की मीडियानिर्मित इमेजों ने ममता बनर्जी के सामने यह संकट पैदा किया है कि वे अपने बनाए सपनों में कैद होकर रह गयी हैं। आज ममता बनर्जी के लिए उनके सपने हासिल करना कठिन हो गया है।

विगत आठ साल के शासन में ममता बनर्जी की कार्यशैली में सबसे बड़ी बाधा वे स्वयं बनकर सामने आई हैं।

यह सच है कि वाममोर्चे को पराजित करके ममता सरकार को राज्य में लोकतांत्रिक माहौल को प्रतिष्ठित करने का श्रेय जाता है। वाममोर्चे ने जिस तरह की दमघोंटू राजनीतिक संस्कृति पैदा की थी उससे आम नागरिकों को निजात मिली। अमूमन दमघोंटू राजनीतिक संस्कृति के माहौल में लोकतांत्रिक पापुलिज्म संजीवनी होता है। यही वजह है कि ममता बनर्जी जब जीतकर आईं तो आमलोगों ने दिल खोलकर उनका स्वागत किया।

ममता बनर्जी ने वाममोर्चा को नकली और स्वयं को असली वामपंथी कहते हुए जीत हासिल की थी। ममता पापुलिस्ट स्टायल में बोलती हैं और आमलोगों को आकर्षित करती हैं। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के पहले और बाद वाली इमेज में जमीन-आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री बनने के पहले उन्होंने मानवाधिकार हनन से जुड़ी समस्याओं को पापुलिज्म के कलेवर में पेश किया। इससे आमलोगों में यह मिथ बना कि ममता बनर्जी मानवाधिकार हनन के खिलाफ लड़ने वाली जंगजू महिलानेत्री हैं।

राजनीतिक सवालों को पापुलिज्म की चाशनी में डुबोकर देने से उनको लाभ मिला उनके भाषणों में पापुलिज्म को आमलोग रियलिज्म समझने लगे। उनके भाषण और मीडिया उन्माद को आनेवाली सच्चाई समझने लगे और यह उम्मीद करने लगे कि ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनेंगी तो राज्य की समस्याएं तत्काल हल हो जाएंगी। लेकिन सारी दुनिया का तजुर्बा बताता है पापुलिज्म से जनता को सड़कों पर उतारा जा सकता है, वोट हासिल किए जा सकते हैं, युद्ध लड़े जा सकते हैं लेकिन जनहित के काम नहीं किए जा सकते। यह बात ममता और मोदी पर समान रूप से लागू होती है, क्योंकि दोनों ही पापुलिज्म के आधार पर चुनाव लड और जीत रहे हैं।

पापुलिज्म अनेक किस्म के खतरों को जन्म दे सकता है। मसलन् पापुलिज्म में एकनेता का शासन चलता है लेकिन सरकार सामूहिक नेतृत्व से चलती है। पापुलर नेता के रूप में ममता बनर्जी अपने दल के लोगों को एक खास किस्म की राजनीतिक भाषा और मुहावरे में प्रशिक्षित करके सत्ता के शिखर तक पहुँची हैं।

तृणमूल कांग्रेस ने एक खास किस्म की पापुलिस्ट भाषा विकसित की है जिसमें सामाजिक-राजनीतिक बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है। यानी वे सरकार की भाषा और दल की भाषा में पहले से चले आरहे घालमेल को अभी तक दूर नहीं कर पायी हैं। लेकिन अनेक मामलों में प्रशासन को स्वतंत्र अभिव्यक्ति और स्वतंत्र रूप से काम करने का उन्होंने मौका दिया है। लेकिन मौटे तौर पर प्रशासन और दलतंत्र में वाम मोर्चे के शासनकाल में बना गठजोड़ ज्यों का त्यों बना हुआ है।

ममता बनर्जी और नरेन्द्र मोदी में समानताएं

ममता बनर्जी और नरेन्द्र मोदी में कुछ समानताएं भी हैं, मसलन् दोनों के पापुलिज्म का आधार है अंध-प्रचार, उदारतावाद का विरोध, अंध वाम विरोध और मीडिया मार्केटिंग।

ममता बनर्जी ने अपनी पापुलर इमेज बनाने के लिए सिंगूर से आंदोलन आरंभ किया था, इस आंदोलन ने ममता की इमेज के साथ पूंजीपति विरोधी की इमेज भी बनी है। टाटा के नैनो कारखाने का विरोध अंततः पुख्ता एंटी कैपिटलिस्ट इमेज बनाने में सफल रहा। इस इमेज के सहारे आंदोलन करके जनता को भड़काया गया। लेकिन सरकार में आने के बाद यही इमेज राज्य में औद्योगिक विकास के मामले में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गयी है।

ममता बनर्जी की रेडीकल इमेज के निर्माण की प्रक्रिया में सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान पश्चिम बंगाल में नए सिरे से रेडीकल मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का उभार आया था।

उल्लेखनीय है इस रेडीकल मध्यवर्ग का वामशासन में लोप हो गया था। रेडीकल मध्यवर्ग ममता के पापुलिज्म का बाईप्रोडक्ट है। दुर्भाग्य की बात है कि रेडीकल मध्यवर्ग से ममता सरकार आने के बाद अंतर्विरोध बढ़े हैं।

उल्लेखनीय है वामशासन के दौरान विभिन्न पद्धतियों के जरिए पश्चिम बंगाल के रेडीकल मध्यवर्ग को नपुंसक बनाया गया और अंत में उसे महज भोक्ता और पेसिव दर्शक में तब्दील करने में वाममोर्चा सफल रहा। लेकिन ममता बनर्जी की पापुलर राजनीति ने रेडीकल मध्यवर्ग के सपनों और आकांक्षाओं को जगाकर नए किस्म की संभावनाओं को पैदा किया। लेकिन वे उसके सपनों का सफल नहीं कर पायीं। आज बंगाली रेडीकल मध्यवर्ग ममता का कंधा छोड़कर भाजपा की ओर जा रहा है। उसे पीएम मोदी में बंगाल की मुक्ति नजर आ रही है, जो कि बुनियादी तौर पर गलत है।

उल्लेखनीय है बंगाल में बड़ी संख्या में किसानों ने खेती बंद कर दी है। खेती से उनका गुजर-बसर नहीं हो रहा है। राज्य में 34 सालों के वाम शासन में खेती करने वाले किसानों की संख्या में कमी आयी। ममता सरकार इस सिलसिले को रोकने में असफल रही है। आज के दौर में किसानी फायदे का सौदा नहीं है।

नेशनल सेम्पिल सर्वे के अनुसार राज्य में सन् 1987-88 में 39.6 प्रतिशत भूमिहीन मजदूर परिवार थे जो सन् 1993-94 में बढ़कर 41.6 प्रतिशत और 1999-2000 में 49.8 प्रतिशत हो गए।

पश्चिम बंगाल में विभिन्न कारणों से पट्टादार और बर्गादार का जमीन से संबंध टूटा है। तेजी से पट्टादार और बरगादार किसानी छोड रहे हैं। सन् 2001 तक 13 प्रतिशत पट्टादार और 14 प्रतिशत बर्गादार खेती छोड़ चुके थे। दक्षिण 24 परगना में 22 प्रतिशत पट्टादार,11 प्रतिशत बरगादार, उत्तर 24 परगना में 17 प्रतिशत पट्टादार, 17 प्रतिशत बरगादार, बर्धमान में 12 प्रतिशत पट्टादार, 15 फीसदी बरगादार,उत्तर दिनाजपुर में 23 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बर्गादार, दक्षिण दिनाजपुर में 20 प्रतिशत पट्टादार और 31 प्रतिशत बरगादार,दार्जिलिंग में 15 प्रतिशत पट्टादार और 16 प्रतिशत बरगादार, जलपाईगुड़ी में 17 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बरगादार, कूचबिहार में 13 प्रतिशत पट्टादार और 31 फीसदी बरगादार, मालदा में 11 फीसदी पट्टादार 7 फीसदी बरगादार, मुर्शिदाबाद में 16 प्रतिशत पट्टादार और 19 प्रतिशत बरगादार खेती करना छोड़ चुके हैं।

यानी जब किसानों में किसानी का रूझान घट रहा तब उन्हें किसानी की ओर धकेलने के प्रयास सफल नहीं हो सकते।

ममता बनर्जी के नेतृत्व में नई सरकार 20 मई 2011 को शपथ ली। वाम मोर्चे का विधानसभा चुनाव में हारना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई। इस जीत ने संदेश दिया कि लोकतंत्र में अकल्पनीय शक्ति है। लोकतंत्र को पार्टीतंत्र के नाम पर बंदी बनाकर नहीं रखा जा सकता।

पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ममता सरकार बनने के बाद एक महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट अपने पुराने सोच से बाहर नहीं निकलते तो उनको जनता खारिज कर देगी। यह भविष्यवाणी 2019 में सही साबित हुई।

वाम मोर्चा और खासकर माकपा ने अपनी विचारधारा में युगानुरूप परिवर्तन नहीं किया। पार्टी के अंदर लोकतंत्र की संगति में परिवर्तन नहीं किए। इसके कारण ही पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की अभूतपूर्व पराजय हुई है।

वाम की पराजय का पहला कारण है वाम मोर्चे और माकपा का सरकारी दल में रूपान्तरण। माकपा ने 1977 में सत्ता संभालने के बाद वाम मोर्चे ने भूमि सुधार आंदोलन के अलावा कोई भी बड़ा आंदोलन नहीं किया। खासकर अपनी सरकार के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया।

माकपा के नेतृत्व वाले जनसंगठनों की भूमिका जनप्रबंधक की होकर रह गयी। जनसंगठनों को जनप्रबंधक संगठन बनाकर उन्हें जनता को नियंत्रित और शासित करने के काम में लगा दिया गया। साथ ही राज्य सरकार की अनेक बड़ी कमियों और जनविरोधी नीतियों के प्रति आँखें बंद कर लीं। इसके कारण आम जनता के साथ वाम मोर्चे का अलगाव बढ़ता चला गया और उसने ही ममता बनर्जी को राजनीतिक हीरो बनाया।

सन् 2011 में ममता बनर्जी को मिला जन समर्थन सकारात्मक था। वाम मोर्चे के जनता से अलगाव का दूसरा बड़ा कारण था मंत्रियों-सांसदों-विधायकों की निकम्मी फौज।

वाम मोर्चे ने विगत 35 सालों में कभी खुलकर किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री या सांसद-विधायक के कामकाज की आलोचनात्मक समीक्षा प्रकाशित नहीं की। निकम्मेपन के कारण किसी भी मंत्री को पदमुक्त नहीं किया। इससे प्रशासनिक स्तर पर निकम्मेपन को बढ़ावा मिला। आम जनता की तकलीफें इससे बढ़ीं।

सन् 2011 में पश्चिम बंगाल के इतिहास में पहलीबार हिंसारहित मतदान हुआ। इक्का-दुक्का हिंसा की घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण और निर्भय होकर मतदान करने के कारण ममता की जीत हुई।

एक अन्य पहलू जिस पर गौर करने की जरूरत है, ममता बनर्जी के जनाधार, राजनीतिक ताकत और महत्ता को कभी वामनेता नहीं मानते थे। आज भी नहीं मानते। वे कभी ममता बनर्जी को सम्मान के साथ ममताजी कहकर नहीं बुलाते थे। इससे उनके अंदर छिपे असभ्यभावों को समझा जा सकता है।

वाम मोर्चे ने ममता बनर्जी को नेता के रूप में सम्मानित करने की बजाय बार-बार अपमानित किया। इस तरह की घटनाएं वामशासन में अनेक बार घटीं। यह वामदलों में सभ्यता के क्षय का संकेत है। वामदल यह देख नहीं पाए हैं कि ममता बनर्जी ने अपनी संघर्षशील-जुझारू नेता की इमेज विकसित करके आम जनता में वाममोर्चे और खासकर माकपा के जनविरोधी कामों और आतंक के वातावरण को नष्ट करने का ऐतिहासिक काम किया है।

ममता बनर्जी का राजनीतिक वर्गचरित्र कुछ भी हो लेकिन उसके जुझारू तेवरों ने माकपा के खिलाफ आम जनता को गोलबंद करने और गांधीवादी ढंग से शांति से चुनाव जीतने का शानदार रिकार्ड बनाया

ममता बनर्जी के प्रचार ने माकपा के 34 सालों के शासन को समग्रता में निशाना बनाया और खासकर उन बातों की तीखी आलोचना की जहां पर मानवाधिकारों का माकपा द्वारा हनन किया गया। पार्टीतंत्र बनाम लोकतंत्र में से चुनने पर जोर दिया।

ममता बनर्जी की जीत में राज्य कर्मचारियों की बड़ी भूमिका रही है। वाम मोर्चे की मजदूर विरोधी कार्यप्रणाली और नीतिगत फैसलों से राज्य कर्मचारी लंबे समय से नाराज चल रहे हैं, ममता को इसका राजनीतिक लाभ मिला है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मोर्चे के मतों में वृद्धि हुई। लेकिन ममता सरकार हिंसारहित बंगाल बनाने के सपने को पूरा नहीं कर पाईं, बेकारों को रोजगार नहीं दे पाईं, शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठा नहीं पाईं, इसके विपरीत कॉलेज-विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन का माहौल खराब हुआ है। शिक्षा का स्तर गिरा है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से भाजपा को सेंधमारी करने और 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने का मौका मिला है।

वाम और खासकर माकपा की कुछ बुनियादी भूलें रही हैं जिनके कारण बड़े पैमाने पर जनता नाराज है। इन भूलों के कारण ममता बनर्जी सन् 2011 में शासन में आई।

23 मार्च 2011 को राज्य के मुख्यमंत्री और माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रेस कॉफ्रेस में पार्टी सदस्यों की नागरिक जीवन में हस्तक्षेप करने वाली हरकतों की पहलीबार तीखी आलोचना की। उन पहलुओं पर पहलीबार खुलकर बोला जिन पर वे अब तक पार्टी के अंदर बोलते रहे।

असल में गड़बड़ियां ज्यादा गहरी हैं। इन्हें संक्षेप में मार्क्सवाद की 5 भूलों के रूप में देख सकते हैं।

पहली भूल, पार्टी और प्रशासन के बीच में भेद की समाप्ति। इसके तहत प्रशासन की गतिविधियों को ठप्प करके पार्टी आदेशों को प्रशासन के आदेश बना दिया गया।

दूसरी भूल,माकपा कार्यकर्ताओं ने आम जनता के दैनंन्दिन-पारिवारिक -सामाजिक जीवन में व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप किया है, और स्थानीय स्तर पर विभिन्न संस्थाओं और क्लबों के जरिए सामाजिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।

तीसरी भूल, पार्टी के विभिन्न संगठनों की कमेटियों ने कामकाज के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को तिलांजलि देकर तदर्थवाद और पक्षपातपूर्ण पद्धति को अपनाया। अवैध ढ़ंग से जनता से धन वसूली और अपराधी लोगों का लोकल तंत्र स्थापित किया।

चौथी भूल, बड़े पैमाने पर अयोग्य, अक्षम और कैरियरिस्ट किस्म के नेताओं के हाथों में विभिन्न स्तरों पर पार्टी और शिक्षा संस्थानों का नेतृत्व सौंपा गया। मसलन् जिन व्यक्तियों के पास भाषा की तमीज नहीं है, मार्क्सवाद का ज्ञान नहीं है, पेशेवर लेखन में शून्य हैं, बौद्धिकों में साख नहीं है, ऐसे लोग पार्टी के अखबार,पत्रिकाएं और टीवी चैनलों में वैचारिक गुरू बने हुए हैं। अ-लेखक-अ-बुद्धिजीवी किस्म के लोग बुद्धिजीवियों के संगठनों के नेता बने हुए हैं। जो व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में सामान्य विचारधारात्मक ज्ञान नहीं रखता वह पार्टी नेता है। जिस विधायक या सांसद की साख में बट्टा लगा है वह अपने पद पर बना हुआ है।

पांचवी भूल, राज्य प्रशासन और पार्टी का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति नकारात्मक रवैय्या। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सबके अंदर ‘हम’ और ‘तुम’ के आधार पर सोचने की प्रवृत्ति ने राज्य प्रशासन के प्रति सामान्य जनता की आस्थाएं खत्म कर दीं। आम जनता के दैनन्दिन जीवन में प्रशासन सहयोगी की बजाय सबसे बड़ी बाधा बन गया, निहित स्वार्थी लोगों ने राज्य प्रशासन को मानवाधिकारों के हनन का औजार बना दिया। ये वे पांच बड़ी भूलें थीं जिनके कारण वाम का बंगाल में आम जनता से अलगाव बढ़ा।

अफसोस की बात यह कि बंगाल की पार्टी और केन्द्रीय नेतृत्व ने इन भूलों के लिए जिम्मेदार कॉमरेडों और नेताओं के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की, जिसके कारण आज माकपा आम जनता से पूरी तरह कट चुकी है।

आज के दौर में यदि वामदलों को नए सिरे से आम जनता का विश्वास हासिल करना है तो अपने किए के लिए माफी मांगनी होगी, दोषी कॉमरेडों को पार्टी से निकालना होगा, नई परिस्थितियों के अनुरूप नए कार्यक्रम और सांगठनिक संरचनाओं का भी निर्माण करना होगा।

जगदीश्वर चतुर्वेदी (Jagadishwar Chaturvedi)

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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