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82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश
लखनऊ। राज्यसभा टीवी के संपादक उर्मिलेश ने कहा है कि भारत का मीडिया दुनिया का सबसे बड़ा मीडिया है। मीडिया का व्यवसाय 80 हजार सात सौ करोड़ का है। देश में 82 हजार अखबार और तीन सौ से ज्यादा चैनल हैं। देश में मीडिया व्यवसाय से 108 बड़े लोग जुड़े हुये हैं। इसके बावजूद आजादी के इतने वर्षो बाद भी मीडिया से दलित गायब हैं। वह “मीडिया में दलित और दलितों का मीडिया” विषय पर आयोजित सेमिनार में मुख्य अतिथि के तौर पर बोल रहे थे।

श्रई उर्मिलेश ने इसके लिये पूरी तरह से राज्यों को जिम्मेदार ठहराया। कहा कि यदि दुकानों और वृक्षों के लिये कानून बन सकता है, तो मीडिया के लिये कानून क्यों नहीं बन सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया में उच्च जातियों का कब्जा है। एडिटर्स गिल्ड को दलित भागीदारी के बारे में सोचना पड़ेगा। यदि दलित अच्छे प्रशासक हो सकते हैं, तो अच्छे पत्रकार क्यों नहीं हो सकते। कम्युनिस्ट आन्दोलन को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर से मतभेद को यदि कम्युनिस्ट आन्दोलन ने हल कर लिया होता, तो आज मीडिया सहित समाज का रूप बदल गया होता। वैकल्पिक मीडिया दलितों के लिये हथियार नहीं हो सकता। दलितों को मुख्यधारा की पत्रकारिता में आना होगा।

प्रख्यात समालोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि पत्रकारिता के स्वरूप को बदलना होगा। जिससे दलितों की मीडिया में भागीदारी हो। उन्होंने कहा कि कल्याणकारी राज्य की अवधाराणा समाप्त हो रही है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान दलितों को ही हो रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी का कहना था कि यह गम्भीर मुद्दा है कि दलितों की खबर क्यों नहीं छपती। उन्होंने कहा कि मीडिया वास्तव में जनता का मीडिया नहीं बन पा रहा है। मीडिया में जो भी दलित पत्रकार हैं वे भी दलित मुद्दों को नहीं उठा पा रहे हैं। क्योंकि मीडिया पूँजीपरस्त हो गया है और उसका चरित्र बदल गया है। मीडिया मुनाफा देख रहा है। इसलिए मीडिया से दलित, मुसलमान, महिला, किसान और मजदूर गायब हो गए हैं।

पत्रकार सुधीर मिश्र ने कहा कि वे दलित पत्रकारों को प्रशिक्षण देकर मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। पर इसके लिये दलितों को अपनी प्रतिभा दिखानी होगी। उन्होंने भी साइकिल पर लाटरी बेचने के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी और परिश्रम के कारण उन्हें यह मुकाम हासिल हुआ।

वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि मीडिया में मुसलमानों और पिछड़ों की स्थित खराब है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव ने कहा कि मूल प्रश्न यह है कि मीडिया में ही दलित क्यों, फिल्म में क्यों नहीं। मीडिया अब जन सरोकारों का मीडिया नहीं रहा, यह कारपोरेट मीडिया है। इस मीडिया में न तो जन हैं और न ही सरोकार है। उन्होंने कहा कि दलितों को वैकल्पिक मीडिया बनना चाहिए।

(स्रोत-डीएनए)

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