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Home / 84 कोसी परिक्रमा अभियान में ही लिखी जा चुकी थी मुजफ्फरनगर की पटकथा
इस दंगे में खूब हुयी है खून की बारिश, 2014 में अच्छी होगी वोटों की फसल आज़म शहाब अगर उत्तर प्रदेश की शब्दिक चित्रकारी की जाये तो अशांति, अराजकता, भय, आतंकवाद, सांप्रदायिकता, गुंडागर्दी और इसी प्रकार के अन्य शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार से अमन व शांति का जनाज़ा निकल रहा है, जिस प्रकार से मज़हबी घृणा बढ़ रही है, जिस तरह से सांप्रदायिकता का नंगा नाच हो रहा है, जिस तरह गुंडागर्दी अपने चरम पर है और जिस तरह पूरे राज्य में एक विशेष समुदाय के लोगों का जीवन छीना जा रहा है वह राज्य की यही छवि बनती है। यह छवि बनाने में प्रदेश की समाजवादी सरकार की सब से अधिक हिस्सेदारी है। इस लिये अगर यह कहा जाये कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में समाजवादी के अखिलेश सिंह यादव सरकार से निकम्मी, अयोग्य, अपाहिज और मजबूर सरकार आज तक स्थापित नहीं हुयी है तो ग़लत नहीं होगा। इस सरकार ने अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में चुनाव में किये गये अपने वादों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई हैं और जिस प्रकार से पूरे राज्य में 50 से अधिक बड़े सांप्रदायिक दंगे हुये और हो रहे हैं, जिस प्रकार से निर्दोष मुस्लिम युवाओं की रिहाई का नाटक स्टेज करके साम्प्रदायिकता की आग में तेल डालने की कोशिश की गई है और जिस तरह से सांप्रदायिक ताकतों को आग और खून की होली खेलने की न केवल खुली आजादी मिली हुयी है बल्कि किसी न किसी रूप में उसे सरकारी संरक्षण भी प्राप्त है, वह इस बात के लिये पर्याप्त है कि इस निकम्मी, अपाहिज और सांप्रदायिक सरकार को एक दिन भी सत्ता रहने का अधिकार न दिया जाये, सत्ता में रहने का यह अपना नैतिक अधिकार खो चुकी है, राष्ट्रपति को चाहिये कि तुरन्त इस सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागो कर दें। 15 दिनों तक केवल मुजफ्फरनगर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिले  साम्प्रदायिकता की आग में जलते रहे हैं, साम्प्रदायिकता का यह नंगा नाच उस सरकार के नेतृत्व हुआ  जो अमन, शांति और सब के जान-माल की रक्षा के बुलन्द दावों के साथ सत्ता में आयी थी और उन्हीं दावों के गर्व में जिसके मुखिया प्रधानमन्त्री बनने तक का सपना देख रहे हैं। परन्तु इस सरकार ने राज्य की ऐसी मिट्टी पलीद कि ‘न जाये रफ़्तन न पाए मादन’। मार्च 2012 में समाजवादी को सत्ता सौंपने वाले आज अपने उस फैसले पर मातम कर रहे हैं कि उन्होंने क्यों एक निकम्मी सरकार को वोट दिया। आज सरकार की किन-किन असफलताओं का उल्लेख किया जाये। साम्प्रदायिकता के नंगे नाच का कौन कौन सा दृश्य पेश किया जाये। सरकार की किन-किन वादाखिलाफियों का मातम किया जाये। सांप्रदायिक तत्वों को प्राप्त सरकारी समर्थन की कौन-कौन सी दलील दी जाये। पूरे राज्य में जारी अराजकता को किन-किन शब्दों में बयान किया जाये। मुजफ्फरनगर में जो कुछ हुआ वह इसे साबित करने के लिये काफी है कि अखिलेश यादव सरकार में सांप्रदायिक तत्वों को खुली छूट मिली हुयी है और उन्हें प्रशासन का पूरा समर्थन भी प्राप्त है। शायद यही कारण है कि हजार दावों और अपीलों के बावजूद सांप्रदायिक दंगे काबू में नहीं आ रहे हैं, बल्कि दिनों दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह सांप्रदायिक दंगे अखिलेश यादव सरकार पर निकम्मी, आलस्य, अपाहिज और मजबूर सरकार होने का लेबल लगाते हैं। यह सरकार अपने आप को धर्मनिरपेक्ष साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाती है, लेकिन अपरोक्ष संघियों से साठगांठ भी करती नज़र आती है। यही कारण है कि पूरे उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक तत्व दनदनाते घूम रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सत्ता की कमान जब अखिलेश सिंह यादव के हाथ में आयी थी तो यह गुमान किया जा रहा था कि राज्य में अमन वो शांति का दौर-दौरा होगा और लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति में सुधार पैदा होगा। क्योंकि राज्य की सत्ता एक युवा हाथों में आ रही थी जिस में अगर जवानी का जोश था तो उसके पिता का होश भी उसके साथ था। लेकिन बहुत कम समय में यह भावना एक धारणा बन गयी और मायावती का कार्यकाल गनीमत मालूम होने लगा, जिसमें कम से कम साम्प्रदायिक ताकतों पर तो लगाम लगी हुयी थी और सांप्रदायिक दंगों में लिप्त लोग जेल में हुआ करते थे। मगर वाह रे समाजवादी सरकार! कि उसने अपनी नाकामी और निकम्मेपन का रिकॉर्ड बनाते हुय़े सांप्रदायिक तत्वों को खुली छूट दे दी कि वो जहाँ चाहें और जिस तरह चाहें आग और खून की होली खेलते रहें, सरकार या प्रसाशन उनके रास्ते में रुकावट नहीं बनेगी। यहाँ यह बात ध्यान में रहे कि सांप्रदायिक दंगों का आरोप भले ही किसी पार्टी या किसी समुदाय पर लगाये जायें, लेकिन कोई सरकार, कोई प्रसाशन अपने आप को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं ठहरा सकती। सांप्रदायिक सदभावना, अमन वो शांति बनाये रखने और अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी सरकार की होती है। इस पृष्ठभूमि में समाजवादी सरकार जिस तरह मुजफ़्फ़रनगर तथा अन्य स्थानों के दंगों की जिम्मेदारी भाजपा व विपक्ष पर डाल कर अपना दामन बचा रही है वह एक प्रकार से सरकार पर आरोप पत्र है। अगर यह स्वीकार भी कर लिया जाये कि इन दंगों में सरकार की किसी तरह की सहमति नहीं थी, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या सांप्रदायिक दंगे करने व करवाने वाले सरकार से अधिक शक्तिशाली हैं? यदि नहीं तो फिर सरकार ने उन दंगाइयों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जो पिछले डेढ़ साल से पूरे राज्य में एक प्रकार से गृहयुद्ध की सी स्थिति पैदा किये हुये हैं? क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह राज्य में साम्प्रदायिकता की आग लगाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करे और किसी भी तरह लॉ एंड आर्डर की स्थिति बिगड़ने न दे? मुजफ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा एक सुनियोजित दंगा था, जिसकी स्क्रिप्ट 17 अगस्त 2013 को उस समय लिखी गयी थी जब 84 कोसी परिक्रमा यात्रा के सन्दर्भ में अशोक सिंघल सहित विहिप के कई नेताओं ने मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव से उनके सरकारी निवास पर मुलाकात की थी जिसमें मुख्यमन्त्री के साथ समाजवादी के मुखिया भी मौजूद थे। उस बैठक में जो खिचड़ी पकी थी उसकी महक उसी समय बाहर आनी शुरू हो गई थी जब अशोक सिंघल, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की मुस्कुराती हुयी तस्वीर मीडिया में आई थी। विहिप ने इस मुलाकात का विवरण देते हुये कहा था कि अखिलेश और मुलायम से अनुरोध किया गया है कि अगर संसद में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठे, तो वह समर्थन करें। उस समय विहिप ने अखिलेश और मुलायम की खूब जमकर तारीफ भी की थी। करीब दो घंटे तक चली इस बैठक के कई दूरगामी अर्थ निकाले गये थे, जिनके आधार पर यह राय कायम की जाने लगी थी यह मुलाकात एक धार्मिक परंपरा को पूरा करने के लिये नहीं बल्कि एक राजनीतिक खेल खेलने के लिये हुयी थी और वह राजनीतिक खेल यह था कि समाजवादी पार्टी की ओर से प्रस्तावित यात्रा रोकने की कोशिश की जाये जिससे विहिप सहित पूरे संघ परिवार को साम्प्रदायिकता का खेल खेलने का अवसर मिले और समाजवादी को अपनी धर्मनिरपेक्षता स्पष्ट करने का मौका मिल जाये, जो सरकार की राजनीतिक व नैतिक गलतियों से कुछ धुँधला सा गया था। इसलिये यह कहना कि मुजफ्फरनगर का दंगा सुनियोजित नहीं था, तथ्यों से चश्म-पोशी होगी। मुजफ्फरनगर दंगा होना था और इस तरह की हिंसा 2014 तक होते ही रहेंगे। राज्य में सांप्रदायिक दंगों की धमक 84 कोसी परिक्रमा यात्रा की विफलता (प्रत्यक्ष रूप से) के बाद से ही सुनाई देने लगी थी, जो अंततः मुजफ्फरनगर सहित पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखायी दे गई। अभी राज्य में और न जाने कितने मुजफ्फरनगर, फैज़ाबाद, कोसी कलां और अस्थाना बनेंगे। अगर सरकार की यही 'सतर्कता' कायम रही तो इस संभावना से नकारा नहीं जासकता कि 2014 आते-आते पूरा राज्य साम्प्रदायिकता की आग में जल उठे। क्योंकि सांप्रदायिक तत्वों को आग और खून की होली खेलने के लिये एक बहाना मात्र चाहिये। मुजफ्फरनगर में आग-खून की होली का यह बहाना रास्ता न देने के कारण दो मोटर साईकलों की भिड़न्त से शुरू हुआ, जो देखते-देखते 45 से अधिक लोगों की जनों को निगल गया, और जिस में बहुसंख्य मजबूर व बेसहारा मुसलमान थे। यहाँ हमें यह बात स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होनी चाहिये कि यूपी जितना संवेदनशील राज्य है, उतनी ही यहाँ की राजनीति और प्रशासन में संघी विचारधारा की जड़ें गहराई तक जमी हुयी हैं। उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में हिंदुत्व की जबरदस्त भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, चाहे वह ब्योरोक्रेट्स हों या पुलिस या राजनीतिज्ञ। धर्मनिरपेक्षता उनका पेशंस नहीं बल्कि मजबूरी है। उनके अन्दर की मुस्लिम दुश्मनी मौका मिलते ही प्रकट हो जाती है। सरकार अगर किसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी की हो तो यह संघी मानसिकता थोड़ी देर के लिये दब जरूर जाती है, लेकिन जैसे ही अवसर मिलता है प्रकट हो जाती है। इसकी पुष्टि राज्य में हुये सांप्रदायिक दंगों में प्रशासन की भूमिका से हो जाता है, जिस में जब तक एकतरफा तौर पर मुसलमानों का ज़बरदस्त जान-माल का नुकसान न हो जाये, हरकत में नहीं आता, और जब हरकत में आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। अब मुजफ्फरनगर दंगों की जांच होगी, न्यायिक आयोग का गठन किया जा चुका है, दो महीने बाद जाँच रिपोर्ट आयेगी और फिर मामला टायँ-टायँ-फिस्स। इस तरह की रिपोर्टों का क्या हश्र होगा इसका अंदाजा इसी अखिलेश सरकार में निमेश कमीशन रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जो आज एक साल से अधिक अवधि से मुख्यमन्त्रीजी के मेज पर धूल खा रही हैं। मुजफ्फरनगर का यह दंगा पिछले दंगों से अधिक गम्भीर और व्यापक था। इसमें खुले रूप से भाजपा शामिल थी, महापंचायतों में नफरत फ़ैलाने वाले भाषण हुये, नकली वीडियो सीडियाँ बाँटी गयीं और फिर योजनाबद्ध तरीक़े से मुसलमानों को निशाना बनाया गया। इस पूरे मामले में मुजफ्फरनगर प्रशासन खुले तौर पर दंगाइयों का साथ देता रहा। गुजरात दंगों की तरह दो दिनों तक मुजफ्फरनगर में दंगाइयों को सरकार व प्रशासन की ओर से खुली छूट रही। दो दिन बाद अखिलेश सरकार की नींद जब खुली तब तक 35 से अधिक लोग सांप्रदायिकता की चौखट पर कुर्बान हो चुके थे। बकिया जाने दंगे को काबू करते-करते चली गयीं। मुजफ़्फ़र नगर में जिस तरह का दंगा हुआ, उसने गुजरात दंगों की याद ताजा कर दी, जहाँ दंगाइयों ने मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा था। साम्प्रदायिकता का यह सम्पूर्ण खेल 2014 के चुनाव के लिये खेला गया है, जिस में उसी तरह की सफलता की उम्मीद लगायी जा रही है जिस तरह गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी ने हासिल की थी। इस लिहाज से मुजफ्फरनगर का यह दंगा चुनावी फसल काटने की एक कोशिश है। इसमें जिस प्रकार से इंसानी खून की बारिश हुयी है, उसे देखते हुये अनुमान यही लगाया जा सकता है कि 2014 के चुनाव में वोटों की फसल अच्छी होगी।  

84 कोसी परिक्रमा अभियान में ही लिखी जा चुकी थी मुजफ्फरनगर की पटकथा

इस दंगे में खूब हुयी है खून की बारिश, 2014 में अच्छी होगी वोटों की फसल
आज़म शहाब
अगर उत्तर प्रदेश की शब्दिक चित्रकारी की जाये तो अशांति, अराजकता, भय, आतंकवाद, सांप्रदायिकता, गुंडागर्दी और इसी प्रकार के अन्य शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार से अमन व शांति का जनाज़ा निकल रहा है, जिस प्रकार से मज़हबी घृणा बढ़ रही है, जिस तरह से सांप्रदायिकता का नंगा नाच हो रहा है, जिस तरह गुंडागर्दी अपने चरम पर है और जिस तरह पूरे राज्य में एक विशेष समुदाय के लोगों का जीवन छीना जा रहा है वह राज्य की यही छवि बनती है। यह छवि बनाने में प्रदेश की समाजवादी सरकार की सब से अधिक हिस्सेदारी है। इस लिये अगर यह कहा जाये कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में समाजवादी के अखिलेश सिंह यादव सरकार से निकम्मी, अयोग्य, अपाहिज और मजबूर सरकार आज तक स्थापित नहीं हुयी है तो ग़लत नहीं होगा।

इस सरकार ने अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में चुनाव में किये गये अपने वादों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई हैं और जिस प्रकार से पूरे राज्य में 50 से अधिक बड़े सांप्रदायिक दंगे हुये और हो रहे हैं, जिस प्रकार से निर्दोष मुस्लिम युवाओं की रिहाई का नाटक स्टेज करके साम्प्रदायिकता की आग में तेल डालने की कोशिश की गई है और जिस तरह से सांप्रदायिक ताकतों को आग और खून की होली खेलने की न केवल खुली आजादी मिली हुयी है बल्कि किसी न किसी रूप में उसे सरकारी संरक्षण भी प्राप्त है, वह इस बात के लिये पर्याप्त है कि इस निकम्मी, अपाहिज और सांप्रदायिक सरकार को एक दिन भी सत्ता रहने का अधिकार न दिया जाये, सत्ता में रहने का यह अपना नैतिक अधिकार खो चुकी है, राष्ट्रपति को चाहिये कि तुरन्त इस सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागो कर दें।

15 दिनों तक केवल मुजफ्फरनगर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिले  साम्प्रदायिकता की आग में जलते रहे हैं, साम्प्रदायिकता का यह नंगा नाच उस सरकार के नेतृत्व हुआ  जो अमन, शांति और सब के जान-माल की रक्षा के बुलन्द दावों के साथ सत्ता में आयी थी और उन्हीं दावों के गर्व में जिसके मुखिया प्रधानमन्त्री बनने तक का सपना देख रहे हैं। परन्तु इस सरकार ने राज्य की ऐसी मिट्टी पलीद कि ‘न जाये रफ़्तन न पाए मादन’।

मार्च 2012 में समाजवादी को सत्ता सौंपने वाले आज अपने उस फैसले पर मातम कर रहे हैं कि उन्होंने क्यों एक निकम्मी सरकार को वोट दिया। आज सरकार की किन-किन असफलताओं का उल्लेख किया जाये। साम्प्रदायिकता के नंगे नाच का कौन कौन सा दृश्य पेश किया जाये। सरकार की किन-किन वादाखिलाफियों का मातम किया जाये। सांप्रदायिक तत्वों को प्राप्त सरकारी समर्थन की कौन-कौन सी दलील दी जाये। पूरे राज्य में जारी अराजकता को किन-किन शब्दों में बयान किया जाये।

मुजफ्फरनगर में जो कुछ हुआ वह इसे साबित करने के लिये काफी है कि अखिलेश यादव सरकार में सांप्रदायिक तत्वों को खुली छूट मिली हुयी है और उन्हें प्रशासन का पूरा समर्थन भी प्राप्त है। शायद यही कारण है कि हजार दावों और अपीलों के बावजूद सांप्रदायिक दंगे काबू में नहीं आ रहे हैं, बल्कि दिनों दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह सांप्रदायिक दंगे अखिलेश यादव सरकार पर निकम्मी, आलस्य, अपाहिज और मजबूर सरकार होने का लेबल लगाते हैं। यह सरकार अपने आप को धर्मनिरपेक्ष साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाती है, लेकिन अपरोक्ष संघियों से साठगांठ भी करती नज़र आती है। यही कारण है कि पूरे उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक तत्व दनदनाते घूम रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में सत्ता की कमान जब अखिलेश सिंह यादव के हाथ में आयी थी तो यह गुमान किया जा रहा था कि राज्य में अमन वो शांति का दौर-दौरा होगा और लॉ एण्ड आर्डर की स्थिति में सुधार पैदा होगा। क्योंकि राज्य की सत्ता एक युवा हाथों में आ रही थी जिस में अगर जवानी का जोश था तो उसके पिता का होश भी उसके साथ था। लेकिन बहुत कम समय में यह भावना एक धारणा बन गयी और मायावती का कार्यकाल गनीमत मालूम होने लगा, जिसमें कम से कम साम्प्रदायिक ताकतों पर तो लगाम लगी हुयी थी और सांप्रदायिक दंगों में लिप्त लोग जेल में हुआ करते थे। मगर वाह रे समाजवादी सरकार! कि उसने अपनी नाकामी और निकम्मेपन का रिकॉर्ड बनाते हुय़े सांप्रदायिक तत्वों को खुली छूट दे दी कि वो जहाँ चाहें और जिस तरह चाहें आग और खून की होली खेलते रहें, सरकार या प्रसाशन उनके रास्ते में रुकावट नहीं बनेगी।

यहाँ यह बात ध्यान में रहे कि सांप्रदायिक दंगों का आरोप भले ही किसी पार्टी या किसी समुदाय पर लगाये जायें, लेकिन कोई सरकार, कोई प्रसाशन अपने आप को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं ठहरा सकती। सांप्रदायिक सदभावना, अमन वो शांति बनाये रखने और अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी सरकार की होती है। इस पृष्ठभूमि में समाजवादी सरकार जिस तरह मुजफ़्फ़रनगर तथा अन्य स्थानों के दंगों की जिम्मेदारी भाजपा व विपक्ष पर डाल कर अपना दामन बचा रही है वह एक प्रकार से सरकार पर आरोप पत्र है। अगर यह स्वीकार भी कर लिया जाये कि इन दंगों में सरकार की किसी तरह की सहमति नहीं थी, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या सांप्रदायिक दंगे करने व करवाने वाले सरकार से अधिक शक्तिशाली हैं? यदि नहीं तो फिर सरकार ने उन दंगाइयों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जो पिछले डेढ़ साल से पूरे राज्य में एक प्रकार से गृहयुद्ध की सी स्थिति पैदा किये हुये हैं? क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह राज्य में साम्प्रदायिकता की आग लगाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करे और किसी भी तरह लॉ एंड आर्डर की स्थिति बिगड़ने न दे?

मुजफ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा एक सुनियोजित दंगा था, जिसकी स्क्रिप्ट 17 अगस्त 2013 को उस समय लिखी गयी थी जब 84 कोसी परिक्रमा यात्रा के सन्दर्भ में अशोक सिंघल सहित विहिप के कई नेताओं ने मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव से उनके सरकारी निवास पर मुलाकात की थी जिसमें मुख्यमन्त्री के साथ समाजवादी के मुखिया भी मौजूद थे। उस बैठक में जो खिचड़ी पकी थी उसकी महक उसी समय बाहर आनी शुरू हो गई थी जब अशोक सिंघल, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की मुस्कुराती हुयी तस्वीर मीडिया में आई थी। विहिप ने इस मुलाकात का विवरण देते हुये कहा था कि अखिलेश और मुलायम से अनुरोध किया गया है कि अगर संसद में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठे, तो वह समर्थन करें। उस समय विहिप ने अखिलेश और मुलायम की खूब जमकर तारीफ भी की थी। करीब दो घंटे तक चली इस बैठक के कई दूरगामी अर्थ निकाले गये थे, जिनके आधार पर यह राय कायम की जाने लगी थी यह मुलाकात एक धार्मिक परंपरा को पूरा करने के लिये नहीं बल्कि एक राजनीतिक खेल खेलने के लिये हुयी थी और वह राजनीतिक खेल यह था कि समाजवादी पार्टी की ओर से प्रस्तावित यात्रा रोकने की कोशिश की जाये जिससे विहिप सहित पूरे संघ परिवार को साम्प्रदायिकता का खेल खेलने का अवसर मिले और समाजवादी को अपनी धर्मनिरपेक्षता स्पष्ट करने का मौका मिल जाये, जो सरकार की राजनीतिक व नैतिक गलतियों से कुछ धुँधला सा गया था। इसलिये यह कहना कि मुजफ्फरनगर का दंगा सुनियोजित नहीं था, तथ्यों से चश्म-पोशी होगी। मुजफ्फरनगर दंगा होना था और इस तरह की हिंसा 2014 तक होते ही रहेंगे।

राज्य में सांप्रदायिक दंगों की धमक 84 कोसी परिक्रमा यात्रा की विफलता (प्रत्यक्ष रूप से) के बाद से ही सुनाई देने लगी थी, जो अंततः मुजफ्फरनगर सहित पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखायी दे गई। अभी राज्य में और न जाने कितने मुजफ्फरनगर, फैज़ाबाद, कोसी कलां और अस्थाना बनेंगे। अगर सरकार की यही ‘सतर्कता’ कायम रही तो इस संभावना से नकारा नहीं जासकता कि 2014 आते-आते पूरा राज्य साम्प्रदायिकता की आग में जल उठे। क्योंकि सांप्रदायिक तत्वों को आग और खून की होली खेलने के लिये एक बहाना मात्र चाहिये। मुजफ्फरनगर में आग-खून की होली का यह बहाना रास्ता न देने के कारण दो मोटर साईकलों की भिड़न्त से शुरू हुआ, जो देखते-देखते 45 से अधिक लोगों की जनों को निगल गया, और जिस में बहुसंख्य मजबूर व बेसहारा मुसलमान थे।

यहाँ हमें यह बात स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होनी चाहिये कि यूपी जितना संवेदनशील राज्य है, उतनी ही यहाँ की राजनीति और प्रशासन में संघी विचारधारा की जड़ें गहराई तक जमी हुयी हैं। उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में हिंदुत्व की जबरदस्त भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, चाहे वह ब्योरोक्रेट्स हों या पुलिस या राजनीतिज्ञ। धर्मनिरपेक्षता उनका पेशंस नहीं बल्कि मजबूरी है। उनके अन्दर की मुस्लिम दुश्मनी मौका मिलते ही प्रकट हो जाती है। सरकार अगर किसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी की हो तो यह संघी मानसिकता थोड़ी देर के लिये दब जरूर जाती है, लेकिन जैसे ही अवसर मिलता है प्रकट हो जाती है। इसकी पुष्टि राज्य में हुये सांप्रदायिक दंगों में प्रशासन की भूमिका से हो जाता है, जिस में जब तक एकतरफा तौर पर मुसलमानों का ज़बरदस्त जान-माल का नुकसान न हो जाये, हरकत में नहीं आता, और जब हरकत में आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। अब मुजफ्फरनगर दंगों की जांच होगी, न्यायिक आयोग का गठन किया जा चुका है, दो महीने बाद जाँच रिपोर्ट आयेगी और फिर मामला टायँ-टायँ-फिस्स। इस तरह की रिपोर्टों का क्या हश्र होगा इसका अंदाजा इसी अखिलेश सरकार में निमेश कमीशन रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जो आज एक साल से अधिक अवधि से मुख्यमन्त्रीजी के मेज पर धूल खा रही हैं।

मुजफ्फरनगर का यह दंगा पिछले दंगों से अधिक गम्भीर और व्यापक था। इसमें खुले रूप से भाजपा शामिल थी, महापंचायतों में नफरत फ़ैलाने वाले भाषण हुये, नकली वीडियो सीडियाँ बाँटी गयीं और फिर योजनाबद्ध तरीक़े से मुसलमानों को निशाना बनाया गया। इस पूरे मामले में मुजफ्फरनगर प्रशासन खुले तौर पर दंगाइयों का साथ देता रहा। गुजरात दंगों की तरह दो दिनों तक मुजफ्फरनगर में दंगाइयों को सरकार व प्रशासन की ओर से खुली छूट रही। दो दिन बाद अखिलेश सरकार की नींद जब खुली तब तक 35 से अधिक लोग सांप्रदायिकता की चौखट पर कुर्बान हो चुके थे। बकिया जाने दंगे को काबू करते-करते चली गयीं।

मुजफ़्फ़र नगर में जिस तरह का दंगा हुआ, उसने गुजरात दंगों की याद ताजा कर दी, जहाँ दंगाइयों ने मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा था। साम्प्रदायिकता का यह सम्पूर्ण खेल 2014 के चुनाव के लिये खेला गया है, जिस में उसी तरह की सफलता की उम्मीद लगायी जा रही है जिस तरह गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी ने हासिल की थी। इस लिहाज से मुजफ्फरनगर का यह दंगा चुनावी फसल काटने की एक कोशिश है। इसमें जिस प्रकार से इंसानी खून की बारिश हुयी है, उसे देखते हुये अनुमान यही लगाया जा सकता है कि 2014 के चुनाव में वोटों की फसल अच्छी होगी।

 

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