ओबामा का छद्म वार

एक तरफ अमरीका सारी दुनिया को ग्लोबलाइजेशन का ज्ञान बांट रहा है और खुद उस पर दोहरी नीति अपना रहा है। दरअसल ग्लोबलाइजेशन का कंसेप्ट साम्राज्यवादी ताकतों ने अपना व्यापार बढ़ाने, तीसरी दुनिया देशों के संसाधानों और मानव श्रम का शोषण करने के लिए निकाला था। लेकिन अब उनका यही हथियार जब उनके देशों में बेरोजगारी बढ़ा रहा है तो उन्हें ग्लोबलाइजेशन बुरा लगने लगा है। हालांकि इससे अमेरिका में बेरोज़गारी की समस्या थोड़ी बहुत तो हल हो सकती है लेकिन जिन अमरीकी कंपनियों के मुह में सस्ते श्रम का खून लग गया है क्या वह ओबामा को ऐसे कानून लागू करने की छूट देंगी? आउटसोर्सिंग का मुद्दा सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमरीका की अन्दरूनी राजनीति को भी बुरी तरह प्रभावित करेगा और इसकी आग में अकेले भारत नहीं बल्कि अमरीका भी जलेगा। भारत को इससे फौरी तौर पर तो नुकसान होगा लेकिन भारतीय राजनीति के नक्शे कदम पर चलने की ओबामा की नीति का खमियाजा अंतत: अमरीका को ही भुगतना पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में भारतीयों ने बराक ओबामा की जीत की कामनाएं करते हुए उन्हें हनुमान जी की मूर्ति भेजी थी। भारतीयों के इस प्रेम से अभिभूत ओबामा ने अब भारतीय राजनीति से प्रेरणा लेते हुए अपनी अर्थव्यवस्था की नाकामियां छिपाने के लिए सस्ते नारों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। तभी भारत के आई टी सेक्टर को झटका देने की उनकी कोशिशों ने रंग लाना शुरू कर दिया है। अमेरिका राज्य ओहियो में सरकार ने फरमान जारी कर कहा है कि राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े हुए किसी भी प्रकार के कार्य अब भारत या अन्य किसी देश में नहीं कराए जाएंगे। समझा जाता है कि ओहियो के बाद अन्य अमेरिकी राज्य भी ऐसा फरमान जारी कर सकते हैं। चूंकि ओबामा अपने निर्वाचन से पहले से ही आउटसोर्सिंग का विरोध करते रहे हैं और अमेरिकी मंदी के लिए काफी हद तक इसे जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। हालांकि मंदी का कारण आउटसोर्सिंग नहीं बल्कि अमरीका की अपनी आर्थिक नीतियां हैं। लेकिन अगर यही दौर जारी रहा तो ऐसे फैसलों से सबसे ज्यादा प्रभाव भारत पर पड़ेगा और बेंगलुरू, गुड़गांव, नौएडा और हैदराबाद जैसे शहर, जो रोजगार के नए केन्द्र बन रहे थे, काफी पीछे जा सकते हैं। हालांकि अमरीका के सरकारी काम काफी कम मात्रा में ही भारतीय कंपनियों को मिलते हैं और केवल टीसीएस ही अकेली ऐसी कंपनी है जो ओहियो में सरकारी काम करती है, लेकिन अगर एक बार ऐसी शुरूआत हो गई तो ओबामा प्रशासन का अगला निशाना निजी कंपनियां होंगी। वैसे भी वह आउटसोर्सिंग कराने वाली कंपनियों को टैक्स चोर की संज्ञा से नवाज चुके हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत और अमरीका के कूटनीतिक संबंध भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। इससे पहले बराक ओबामा ने प्रोफेशनल वीजा शुल्क में आठ गुना तक वृध्दि करने के प्रस्ताव को मंजूरी देकर इस दिशा में अपना पहला कदम चल दिया था। प्रोफेशनल वीजा की फीस में बढ़ोत्तरी से आउटसोर्सिंग कर रही भारतीय आईटी कंपनियों को सालाना करीब 1000 करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान है। तमाशा यह है कि ओहियो के गवर्नर ने विदेशों से आउटसोर्सिंग बंद कराने संबंधी आदेश में जो तर्क दिया है वह कहीं और ज्यादा चिंताजनक है। गवर्नर टेड स्ट्रिकलैंड ने अपने आदेश में कहा है कि विदेशी सेवा प्रदाता काम में देरी करते हैं और उनके काम की गुणवत्ता भी संतोषजनक नहीं है। जबकि वस्तुस्थिति इसके एकदम विपरीत है। भारतीय अंग्रेजी के अपने ज्ञान और साफ उच्चारण से बीपीओ और केपीओ (नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग) के क्षेत्र में सभी को पीछे छोड़ रहे हैं। बीमा, बैंकिंग, औषधिा, दूरसंचार, ऑटोमोवाइल और उड्डयन के क्षेत्र में भारतीय बीपीओस की तूती बोलती है। वीजा शुल्क बढ़ोत्तरी के बाद आउटसोर्सिंग पर पाबंदी से भारतीय आईटी सेक्टर को तगड़ा झटका लगा है। आउटसोर्सिंग अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का बदला हुआ स्वरूप है। पहले भी तो सभी देशों के बीच आयात- निर्यात होता था। अब बी. पी. ओ. के जरिए देशों के बीच सेवाओं का भी व्यापार होने लगा। दरअसल ओबामा शुरू से ही आउटसोर्सिंग के विरोधी रहे हैं। राष्ट्रष्पति का चुनाव लड़ते समय भी उन्होंने इसे आपने प्रचार अभियान का अहम मुद्दा बनाया था। राष्ट्रपति बनने के बाद भी वह लगातार इसे एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। उनका सोचना है कि आउटसोर्सिंग समाप्त करके देश में बढ़ती बेरोजगारी को रोका जा सकता है। वह पहले ही कह चुके हैं कि भारत से आउटसोर्सिंग कराने वाली अमेरिकी कंपनियों को टैक्स छूट का फायदा नहीं मिलेगा। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए कुछ दिन पहले ही वीजा शुल्क बढ़ाने के फैसले को मंजूरी देकर भी अप्रत्यक्ष तौर पर भारतीय आईटी कंपनियों को ही चोट पहुंचाई थी। एक तरफ अमरीका सारी दुनिया को ग्लोबलाइजेशन का ज्ञान बांट रहा है और खुद उस पर दोहरी नीति अपना रहा है। दरअसल ग्लोबलाइजेशन का कंसेप्ट साम्राज्यवादी ताकतों ने अपना व्यापार बढ़ाने, तीसरी दुनिया देशों के संसाधानों और मानव श्रम का शोषण करने के लिए निकाला था। लेकिन अब उनका यही हथियार जब उनके देशों में बेरोजगारी बढ़ा रहा है तो उन्हें ग्लोबलाइजेशन बुरा लगने लगा है। हालांकि इससे अमेरिका में बेरोज़गारी की समस्या थोड़ी बहुत तो हल हो सकती है लेकिन जिन अमरीकी कंपनियों के मुह में सस्ते श्रम का खून लग गया है क्या वह ओबामा को ऐसे कानून लागू करने की छूट देंगी? आउटसोर्सिंग का मुद्दा सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमरीका की अन्दरूनी राजनीति को भी बुरी तरह प्रभावित करेगा और इसकी आग में अकेले भारत नहीं बल्कि अमरीका भी जलेगा। भारत को इससे फौरी तौर पर तो नुकसान होगा लेकिन भारतीय राजनीति के नक्शे कदम पर चलने की ओबामा की नीति का खमियाजा अंतत: अमरीका को ही भुगतना पड़ेगा। ं     वीजा फीस में बढ़ोत्तरी और ओहियो के गवर्नर के फैसले का भारत-अमरीका व्यापारिक संबंध पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। यह फैसला भारत में अमरीकी नीतियों के जबर्दस्त पैरोकार मनमोहन सिंह के लिए भी मुसीबत बन सकता है। यह दोनों ही फैसले भारतीय आईटी कंपनियों को नुकसान पहुंचाने की गरज से ही किए गए हैं। और अमेरिका ने यह मान भी लिया है कि उसके इस फैसले से भारत को ही सर्वाधिक नुकसान होगा। भारत अंतर्राष्ट्रीय आउटसोर्सिंग बाजार का सबसे बड़ा भागीदार है। हालांकि अब हमें चीन से भी इस क्षेत्र में चुनौती मिलना शुरू हो गई है। भारत का आउटसोर्सिंग बाजार लगभग 52 बिलियन डॉलर होने का अनुमान लगाया गया है। भारत के आउटसोर्सिंग उद्योग में बैंकिंग तथा वित्ताीय सेवाओं का योगदान लगभग 40 प्रतिशत है। अनुमान है कि भारत में आईटी सेक्टर में सालाना 50 अरब डॉलर का आउटसोर्सिंग कारोबार होता है जिसका  बड़ा हिस्सा अमेरिका से ही आता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 30 लाख से भी ज्यादा लोग कॉल सेन्टर्स और बीपीओ में काम करते हैं। दरअसल आउटसोर्सिंग मंदी से उबरने के एक तरीके के रूप में ईजाद किया गया था लेकिन ये लंबे समय तक कारगर नहीं रहा। यह आउटसोर्सिंग का ही असर था कि अब लोग भारत से अमरीका भागने के बजाय बंगलौर, गुड़गांव, नोएडा और हैदराबाद जैसे शहरों की तरफ जाने लगे क्योंकि उन्हें लगा कि वहां उनकी स्थिति बेहतर भी होगी और अपने देश में ही अच्दा रोज़गार मिल जाएगा। आउटसोर्सिंग को लेकर अमरीकी जनता में काफी चिंता है. ख़र्चा बचाने की गरज से जब तक यह उनके लिहाज से व्यावहारिक रहा तब तक तो ठीक लेकिन जब इससे वहां रोज़गार कम होने लगा तो अमरीकियों को चिंता सताने लगी। हालांकि  अब अमरीकी अर्थव्यवस्था कुछ कुछ पटरी पर लौटने लगी है और मंदी के बादल छंटने लगे हैं। इसलिए इन कंपनियों को भारत में काम तो करवाना ही पड़ेगा मगर ऐसे नए सरकारी फरमान से उन्हें दिक्कतें होना स्वाभाविक हैं। चूंकि एक तो भारतीय आईटी पेशेवर अधिक मेहनती हैं और सस्ते भी हैं। पूरी अमरीकी अर्थव्यवस्था ही मुनाफे के सिध्दान्त पर टिकी है और अगर यह आईटी कंपनियां घाटे में जाती हैं तो ओबामा प्रशासन के सामने नई चुनौती होगी। इसलिए न चाहते हुए भी अमरीकी प्रशासन को आज नहीं तो कल आउटसोर्सिंग को अनुमति तो देनी ही होगी। वैसे अमरीका के पीछे आंखें मूंद कर भाग रहे हमारे अर्थशास्त्रियों और सरकार के लिए सबक लेने का यह सुनहरा अवसर है। नरसिंहाराव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने जिस अमरीकी अर्थव्यवस्था से प्रेरित होकर नेहरू-इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों की अर्थी निकाली और भारत में सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का जो फॉर्मूला निकाला उसके पलट अब खुद ओबामा अमरीका को मंदी से उबारने के लिए नेहरू-इंदिरा की नीतियों को अपनाने जा रहे हैं। अमेरिकी बेरोजगारी से चिंतित ओबामा ने घोषणा की है कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए बड़े पैमाने पर सड़कें और रेल लाइनें बनवाएंगे। इस परियोजना पर शुरु में 50 अरब डॉलर का खर्च आएगा ओबामा को उम्मीद है कि इससे देश में रोजगार सृजित होगा। वह डेढ़ लाख मील सड़कों को फिर से बनवाएंगे। इसके अलावा 4,000 मील रेल पटरियों की देखभाल की जाएगी। इसके अलावा 150 मील रनवे ठीक कराए जाएंगे। ओबामा को यह कदम उठाने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ रही है और आउटसोर्सिंग खत्म करने और वीजा फीस महंगी करने के बावजूद अमेरिकी लोगों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। देश की आर्थिक नीतियों को तय करते समय बार बार अमरीका का मुंह ताकने वाले प्रधाानमंत्री क्या ओबामा के फैसले और ताजा संकट से कोई सबक भी लेंगे????

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