बन्दर के हाथ में उस्तरा न दो

अमलेन्दु उपाध्याय जम्मू कश्मीर के मसले को लेकर सेना का राजनीतिकरण करने का जो प्रयास हो रहा है उसके परिणाम आने वाले दिनों में बहुत ही घातक सिध्द होंगे। यहां सवाल यह है कि सेना को यह विशेष अधिकार और तैनाती दोनों ही सरकार ने दिए हैं तो वायु सेना प्रमुख को परेशान होने की जरूरत क्यों है और अगर इस कानून के जरिए ही सेना सही से काम कर सकती है और इसका बेजा इस्तेमाल नहीं हुआ है तो कश्मीर में हालात बिगड़े क्यों हैं? क्या अब इस देश में लोकतंत्र खतरे में है और आहिस्ता आहिस्ता हम सैन्य शासन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं? लोगों की नज़र में प्रश्न बेतुका हो सकता है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में जम्मू कश्मीर को लेकर जिस तरह के हालात बन रहे हैं और इसके बीच सैन्य अफसरों द्वारा जो बयानबाजी की जा रही है और इशारों ही इशारों में सरकार को हड़काया जा रहा है उससे तो यही लगता है। जम्मू एवं कश्मीर में सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां अधिनियम (एएफएसपीए) को हटाने की मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मांग के बाद वायु सेना प्रमुख ने जिस तरह मोर्चा संभाला है वह वाकई चिन्ता बढ़ाने वाला है और सेना में बढ़ती अनुशासनहीनता की तरफ भी इशारा है। वायु सेना प्रमुख मार्शल पी.वी. नाइक ने अभी पत्रकारों से कहा, कि ''अगर आप चाहते हैं कि सैनिक अपने कर्तव्यों के साथ भरपूर न्याय करें तो इसके लिए उन्हें कानूनी संरक्षण दिया जाना जरूरी है।'' उन्होंने कहा कि ''मेरा मानना है कि सरकार इस मामले को लेकर काफी सजग है और वह सही फैसला करेगी।'' इससे पहले सेना प्रमुख वीके सिंह भी इस कानून की वकालत करके राजनीतक बयान दे चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों फतवा जारी कर दिया था कि जो लोग सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून एएफएसपीए, को वापस लेने या उसे हल्का बनाने की मांग रहे हैं वे दरअसल संकीर्ण राजनीतिक लाभों के लिए ऐसा कर रहे हैं। एएफएसपीए के कारण सैन्य अधिकारियों को उनके फैसलों को लेकर कानूनी संरक्षण मिलता है। इस अधिनियम की धारा 4 सेना को बिना वारंट तलाशी, गिरफ्तारी और गोली मारने की छूट देती है और किसी भी सैन्य अधिकारी को अपने फैसले को लेकर सजा, मुकदमा या फिर किसी अन्य प्रकार की कानूनी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ता है। यानी सैन्य अफसर अपने नागरिकों को गोली मारने का अधिकार चाहते हैं। देखने मे वायुसेना प्रमुख का हालिया बयान और सेना प्रमुख का पहले दिया गया बयान एक रुटीन का बयान लग सकता है लेकिन इस रुटीन से बयान के मायने बहुत गंभीर हैं। यह बयान सीधे- सीधे  सरकार और उन राजनेताओं को घुड़की हैं जो सैन्य कानून की खिलाफत कर रहे हैं। हमारे देश में लोकतंत्र की मजबूती के लिए सेना का करेक्टर धार्मनिरपेक्ष रखा गया था और सेना को राजनीतिक मसलों से दूर ही रखा जाता है। लेकिन जम्मू कश्मीर के मसले को लेकर सेना का राजनीतिकरण करने का जो प्रयास हो रहा है उसके परिणाम आने वाले दिनों में बहुत ही घातक सिद्ध होंगे। यहां सवाल यह है कि सेना को यह विशेष अधिकार और तैनाती दोनों ही सरकार ने दिए हैं तो वायु सेना प्रमुख को परेशान होने की जरूरत क्यों है और अगर इस कानून के जरिए ही सेना सही से काम कर सकती है और इसका बेजा इस्तेमाल नहीं हुआ है तो कश्मीर में हालात बिगड़े क्यों हैं? दरअसल हमारे देश में सांप्रदायिक राजनीति के उभार के कारण यह सारी दिक्कतें आ रही हैं। 1989 में जनता दल की केन्द्र में सरकार बनने पर जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल बना कर भेजा गया था। चूंकि वी. पी. सिंह की सरकार को भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था इसके एवज में जगमोहन के हवाले कश्मीर किया गया था। उसके बाद जगमोहन ने जो सांप्रदायिक एजेण्डा लागू किया उसकी बदौलत कश्मीर आज तक जल रहा है। यह एएफएसपीए भी तभी लागू किया गया था जिसे आज केवल भारतीय जनता पार्टी बहाल रखने की मांग कर रही है। इसके बाद भी भाजपा सेना का राजनीतिकरण करने का प्रयास करती रही है। कर्नल पुराहित प्रकरण और उसका पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ इस का सुबूत है। एनडीए सरकार में भी नेवी चीफ एडमिरल विष्णु भागवत की बर्खास्तगी करके भी उसने सेना में राजनीति फैलाने का काम किया था जिसके नतीजे आज सामने आ रहे हैं। इसी तरह संसद् पर आतंकी हमले के समय जिस तरह से संसद् पर सेना भेजी गई वह इसी रणनीति का हिस्सा था। असल में सेना का राजनीतिकरण् करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि अगर एक बार सेना के मुंह शासन करने का खून लग गया तो देश में लोकतंत्र नहीं बचेगा और जो आज मन्दिर-मस्जिद की आड़ में सियासत करते हैं उनके लिए भी यह अवसर समाप्त हो जाएगा। वैसे भी चाहे कश्मीर का मसला हो या पूर्वोत्तर का यह राजनीतिक मसले हैं और राजनीतिक मसले राजनीति से ही तय होंगे बन्दूक से नहीं। बन्दूक से आप दमन चक्र चला कर इन मसलों की आग पर सियासत की रोटियां तो सेंक सकते हैं, इन्हें सुलझा नहीं सकते। आखिर एएफएसपीए लागू रखने का समर्थन करने वाले चाहते क्या हैं? क्या वह सारी दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि हम अपने नागरिकों को बन्दूक के दम पर अपने साथ रखते हैं? इससे तो पाकिस्तान के प्रोपेगण्डा को ही बल मिलता है कि भारत कश्मीरियों पर जबर्दस्ती करता है। वह चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कोई अन्य उसे यह समझना चाहिए कि हमारे आज के क्षुद्र स्वार्थों की कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी। हम केवल एक बात में इस काले कानून पर सवाल खड़े करना चाहते हैं। थोड़े दिन पहले ही कश्मीर में विधान सभा के चुनाव हुए और लोक सभा चुनाव भी हुए। जब सारे देश में मतदान का प्रतिशत कम हो रहा था उस समय कश्मीरियों ने बढ़ चढ़ कर मतदान किया और हमने सारी दुनिया से कहा कि देखो यह है हिन्दुस्तानियत जो कश्मीर में जिन्दा है। लेकिन आखिर वह कौन से कारण हैं कि जो हाथ अभी वोट देने के लिए उठे थे उन हाथों में आज पत्थर हैं? आप यह तर्क दे सकते हैं कि हुर्रियत अवाम को भड़का रही है। लेकिन हुर्रियत को यह अवसर कौन मुहैया करा रहा है। जब सेना तैनात है और उसके हाथ में एएफएसपीए है तब कश्मीर क्यों जल रहा है? केवल कश्मीर ही नहीं पूर्वोत्तर में भी यह कानून जुल्म ढा रहा है। जो लोग इस कानून का समर्थन कर रहे हैं वह भविष्य के लिए लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे हैं। सेना बैरकों में रहने और सीमा पर तैनाती के लिए होती है न कि नागरिकों के सिर कुचलने के लिए। और अगर ऐसे ही सेना का इस्तेमाल अपने ही अवाम के खिलाफ होता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि हम पाकिस्तान बन जाएं। हम अपने पड़ोसियों से भी सबक लेने को तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान में सेना का जबर्दस्त राजनीतिकरण हुआ नतीजतन वहां अधिकांश समय सैन्य शासन ही रहा और आज पाकिस्तान के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। बांग्ला देश में, म्यांमार में, श्रीलंका में जहां जहां सेना को अधिकार मिले वहां देश के हालात बद से बदतर हुए। अब इसके लिए यह तर्क नहीं चलेगा कि हमारे सैनिक तो वीर हैं वह दुश्मन से लड़ते हैं। सिर्फ इस बुनियाद पर तो सेना को नागरिकों की हत्या का अधिकार नहीं सौंपा जा सकता है। इस मसले पर सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के बाद सरकार की ओर से जारी बयान के अनुसार, जो कहा गया है कि ''नेता इस बात पर सहमत थे कि भारतीय संविधान इतना व्यापक है कि उसमें किसी भी जायज राजनीतिक मांग को वार्ता, शांतिपूर्ण विचार विमर्श और असैन्य तरीके से हल करने की क्षमता है।'' वह उचित ही है। वैसे भी हर युद्ध के बाद भी वार्ता ही होती है तो क्यों न अपने उस अवाम से बात ही की जाए जिसने कल वोट डाला था और आज उसके हाथ में पत्थर है?

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