धर्म के नाम पर जाम का दंश झेलता हमारा देश

किसी भी मनुष्य के दैनिक जीवन में आम लोगों की दिनचर्या का सुचारू संचालन काफी महत्वपूर्ण होता है। बावजूद इसके कि हमारे देश की लगभग 60 फीसदी आबादी देश के गांव में बसती है तथा शेष जनसंख्या शहरों व कस्बों का हिस्सा हैं। इसके बावजूद गांवों की तुलना में शहरी जीवन कहीं अधिक अस्त व्यस्त दिखाई देता है। माना जा सकता है कि  बढ़ती जनसंख्या के कारण शहरीकरण का विस्तार भी बढ़ती हुई अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार है। परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे ही देश के लोगों ने स्वयं ही अपने समाज में कुछ ऐसे ताने बाने रच डाले हैं जो अब स्वयं आम लोगों के लिए परेशानी व मुसीबत का कारण बनते जा रहे हैं। यहां तक कि साधारण उपायों के द्वारा तो संभवत: अब इन या ऐसे दुष्चक्रों से  निकल पाना ही आम लागों के लिए संभव नहीं प्रतीत होता। कस्बों, शहरों व महानगरों में आए दिन लगने वाला भारी  जाम भी ऐसी ही मानव निर्मित समस्याओं में एक प्रमुख कहा जा सकता है। बेशक शहरों में आए दिन लगने वाले जाम का कारण वाहनों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होना क्यों न हो या फिर इसके कारण ही हम इसे अनियंत्रित होती जा रही ट्रैफिक समस्या का नाम क्यों न दें परंतु हमारे समाज का ही एक वर्ग इस पक्ष को विकास पक्ष के रूप में भी देता है। हो सकता है यह एक अलग प्रकार की बहस का विषय भी हो। परंतु हमारे देश में लगने वाले कुछ जाम तो ऐसे हैं जो दशकों से लगते आ रहे हैं तथा ऐसे जाम का न तो किसी व्यक्ति के विकास से कोई लेना देना है न ही ऐसे जाम का कारण देश का विकास या बढ़ते वाहन अथवा ट्रैफिक समस्या आदि है। और वह जाम है पूरे देश में चारों ओर धर्म के नाम पर लगने वाला जाम। धर्म के नाम पर लगने वाला जाम किसी एक समुदाय के अनुयाईयों द्वारा नहीं लगाया जाता बल्कि हमारे आज़ाद देश के सभी आज़ाद नागरिक आज़ादी का पूरा लाभ उठाते हुए जब जहां और जिस अवसर पर भी चाहें वहीं चंद लोगों को साथ लेकर अपने धर्म संबंधी बैनर, झंडे, निशान या अन्य प्रतीकों को लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं। इन धर्मावलबियों को इस बात को सोचने की कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस होती कि किसी धार्मिक आयोजन के नाम पर उनके द्वारा लगाया जाने वाला जाम समाज के अन्य लोगों के लिए भले ही उनमें उनके अपने समुदाय के लोग भी क्यों न शामिल हों, के लिए कितनी परेशानी खड़ी कर सकता है तथा इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं। वैसे भी हमारा देश पर्वों व त्यौहारों का देश कहलाता है। यहां विभिन्न धर्मों व संप्रदायों के तमाम त्यौहार ऐसे हैं जिन्हें मनाने के लिए उन समुदायों से जुड़े लोग कभी जुलूस व जलसे की शक्ल में सड़कों पर निकलते हैं तो कभी शोभा यात्रा अथवा नगर कीर्तन के रूप में इन्हें सड़कों पर देखा जा सकता है। कभी मोहर्ररम के जुलूस के नाम पर तो कभी ईद-ए-मिलाद के अवसर पर, कभी जु मे व ईद-बकरीद की सामूहिक नमाज़ों के नाम पर मुख्य मार्गों पर कब्ज़ा तो कभी किसी महापुरुष की जन्मतिथि के अवसर पर निकलने वाला धार्मिक जुलूस,कभी गुरुपर्व,कभी रामनवमी,कभी परशुराम जयंती तो कभी अग्रसेन जयंती,कभी रविदास जयंती तो कभी बाल्मीकि जयंती। गोया हमारे देश के लगभग सभी समुदायों से जुड़े लोग अपने-अपने भगवानों,देवी-देवताओं,महापुरुषों अथवा अन्य धार्मिक आयोजनों को मनाने के लिए जब तक सड़कों पर नहीं उतरते अथवा जब तक अपने आयोजन को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं करते तब तक ऐसा लगता है गोया इन लोगों ने अपनी परंपरा का या तो सही ढंग से निर्वहन नहीं किया या फिर यह लोग अपने धार्मिक आयोजन को दिल खोलकर अंजाम नहीं दे सके। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने किसी भी धार्मिक आयोजन को सड़कों पर लाने के बाद उस कारण लगने वाले ट्रैफिक जाम के भुक्तभोगियों को होने वाली परेशानियों का जिम्मेदार कौन है? क्या किसी भी धर्म या समुदाय के किसी महापुरुष ने अपने अनुयाईयों को यह संदेश दिया है कि वे आम लोगों की परेशानियों, दु:ख तकलीफों, व उनकी ज़रूरतों व चिंताओं की परवाह किए बिना अपने धार्मिक आयोजनों को सड़कों पर लेकर अवश्य जाएं? जिस प्रकार धर्म के नाम पर होने वाले आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले लाऊडस्पीकर प्रात:काल अर्थात् ब्रह्ममुहुर्त से लेकर देर रात तक पूरे वातावरण में ध्वनि प्रदूषण फैलाते रहते हैं तथा इसके चलते स्कूल व कॉलेज के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है तथा बुजुर्गों व बीमार व्यक्तियों के आराम में बाधा पहुंचती है उसी प्रकार धार्मिक आयोजनों में लगने वाला जाम भी कभी किसी बीमार व्यक्ति के जाम में फंसने पर उसकी मृत्यु का कारण बन जाता है तो कभी किसी की बस या ट्रेन छूट जाती है, कभी कोई व्यक्ति अपनी परीक्षा या नौकरी संबंधी इंटरव्यू पर सही समय पर न पहुंच पाने के कारण उससे हाथ धो बैठता है। अब यदि इस प्रकार के आयोजन, जलसा-जुलूस,शोभा यात्रा या नगर कीर्तन आदि अन्य लोगों के लिए परेशानी का कारण बनें या किसी के जीवन के साथ ही इन आयोजनों के चलते खिलवाड़ हो जाए ऐसे में क्या ऐसे आयोजनों को धार्मिक आयोजन का नाम दिया जा सकता है? यहां उदाहरणस्वरूप पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका व ब्रिटेन आदि देशों में होने वाले कुछ ऐसे आयोजनों,जलसा-जुलूसों का जि़क्र करना ज़रूरी है। इन देशों में अधिकांशत: यह देखा जाता है कि अधिक से अधिक भीड़ वाले जुलूस रूपी कोई भी आयोजन प्राय: वहां नियमित रूप से चलने वाले यातायात को क़ तई प्रभावित नहीं करते। जुलूस में शिरकत करने वाले लोग या तो फुटपाथ अथवा पैदल मार्ग को अपने आयोजन का मार्ग बनाते हैं या फिर कुछ ऐसे विशेष स्थान ऐसे कार्यक्रमों के लिए निर्धारित किए गए हैं जो यातायात मुक्त हैं तथा इन स्थानों को विशेषकर ऐसे ही भीड़-भाड़ वाले या जलसा-जुलूस जैसे मकसदों के लिए निर्धारित किया गया है। इन देशों के लोग सामाज की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना कि अपनी धार्मिक अथवा राजनैतिक ज़रूरतों को। यही वजह है कि भले ही उक्त देशों में वाहनों की लंबी क़तारों के कारण यातायात समस्या क्यों न खड़ी होती हो परंतु धर्म व राजनीति के नाम पर इन देशों में ऐसे जाम लगते नहीं देखे जाते जैसे कि हमारे देश में प्राय: लगते ही रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कई धर्मगुरुओं के किसी शहर में जाने पर उनके अनुयाईयों द्वारा गुरु जी के सम्मान में कलश यात्रा के साथ साथ गुरु जी की शोभा यात्रा का आयोजन किया जाने लगा है। यह सिलसिला भी धीरे-धीरे अब एक नया व विशाल रूप धारण करता जा रहा है। अब एक के बाद एक कई शहरों में इस प्रकार के कलश शोभा यात्रा रूपी आयोजन होते देखे जा रहे हैं। ऐसे आयोजनों का तो बिल्कुल ही कोई धार्मिक महत्व नहीं है न ही इनका किसी धार्मिक या ऐतिहासिक तिथि या घटना तक से कोई वास्ता है। यह सब तो धर्माधिकारियों की व्यक्तिगत् प्रसिद्धि तथा उनके व्यक्तित्व के प्रचार व प्रसार का एक ज़रिया मात्र है। ज़ाहिर है इस प्रकार के नित नए शुरु होने वाले आयोजन भी यातायात बाधित करने का एक और नया कारण बनते जा रहे हैं। ऐसे में हमें अपनी धार्मिक व सांप्रदायिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का भी पूरा खयाल रखना चाहिए। यदि आज किसी भी समुदाय विशेष का व्यक्ति अपने समुदाय से जुड़े किसी आयोजन के साथ सड़कों पर उतरता है तथा दूसरों के लिए यातायात बाधित करता है ऐसे में वही व्यक्ति कल किसी दूसरे समुदाय द्वारा आयोजित ऐसे ही किसी आयोजन का स्वयं शिकार होता है। अत: ज़रूरत इस बात की है कि इस विषय पर हम पूरी पारदर्शिता व जिम्मेदारी के साथ चिंतन करें तथा परस्पर भाईचारे व मेल-मिलाप के साथ यातायात बाधित होने जैसी समस्याओं पर विचार करें। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि कोई भी धर्म अथवा किसी भी धर्म से जुड़े महापुरुष ने हमें किसी भी व्यक्ति को तकलीफ देने या संकट में डालने अथवा उसके समक्ष किसी प्रकार की समस्याएं खड़ी करने की सीख कतई नहीं दी है।

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