सरकार बचाने के लिए समझौते कहना तक जायज़ हैं

एम जे अकबर हमारे दौर के बेहतरीन पत्रकार हैं. उन्होंने जब से एक बड़े ग्रुप को मुखिया के तौर पार ज्वाइन किया है ,उस मीडिया ग्रुप की विश्वसनीयता बढ़ गयी है .उनके पहले उस मीडिया संगठन को मूलरूप से राडियाबाज़ी के काम में लिप्त माना जाता था. उसके पुराने मुखिया का नाम दिल्ली के सत्ता के गलियारों में एक ऐसे महारथी के रूप में जाना जाता था जो सरकार से कोई भी काम करवा सकता था .सरकार चाहे जिस पार्टी की हो .उन्होंने सोनिया गाँधी और सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अभद्र और अमर्यादित टिप्पणी करके अपनी नौकरी बचाने में सफलता पायी थी. उन्हें अजेय माना जाता था . उनका बेटा देश का नामी वकील माना जाता था और उसकी आमदनी बहुत ज्यादा थी. बताते हैं कि वह जिसपर खुश हो जाता है उसे करोड़ों की कार आदि उपहार स्वरुप दे देता है . लेकिन उसके पिता की ख्याति पत्रकार के रूप में नहीं , सत्ता के प्रबंधक के रूप में ज्यादा हो गयी थी . लोगों की समझ में नहीं आता था कि इतने बड़े ग्रूप के मालिक के सामने क्या मजबूरी थी कि इस तरह के एक गैरपत्रकार को ढो रहे थे हालांकि अरुण पुरी की ख्याति एक खरे पत्रकार की है . जो भी हो,देर आयद दुरुस्त आयद. अब एम जे अकबर मैदान में हैं और इंडिया टुडे में वही पुरानी पत्रकारिता की हनक नज़र आने लगी है .अब लोगों की समझ में आने लगा है कि इस मीडिया ग्रुप में अभी भी बहुत धार बाकी है .मेरी समझ में तो यही नहीं आता था कि अंग्रेज़ी के जो तीन चैनल साथ साथ आये थे,उसमें इस ग्रुप का चैनल सबसे पीछे क्यों था . अब जब एक बार फिर इस ग्रुप के अंग्रेज़ी चैनल ने विश्वसनीयता हासिल करना शुरू किया है तो समझ में आता है कि वही मुख्य अधिकारी और उसकी ख्याति ही ज़िम्मेदार रहे होगें. अब उम्मीद की जानी चाहिए कि नए नए शब्द इंडिया टुडे के ज़खीरे से निकल कर आयेगें क्योंकि अकबर के दौर में सन्डे मैगजीन में बहुत सारे शब्द प्रयोग होते थे जिनका राजनीतिक अर्थ होता था और वे समकालीन राजनीतिक माहौल को काफी हद तक परिभाषित करते थे. इस बार इंडिया टुडे के नए अंक में वह काम हुआ है . radialougue शब्द अंग्रेज़ी राजनीतिक शब्दावली के हाथ लगा है जो आज के राजनीतिक आचरण के सन्दर्भ में बहुत सारी बातों को स्पष्ट करता है . अपने इसी सम्पादकीय में अकबर ने मनमोहन सिंह को मोबाइल फोन से लगी चोट का ज़िक्र किया है जिसने उनकी अच्छी प्रसिद्धि को बुरी तरह से प्रभावित किया है .इस सम्पादकीय में बहुत ही सफाई से कह दिया गया है कि अपनी सरकार बचाए रखने के चक्कर में डॉ मनमोहन सिंह ए राजा और उसके आकाओं , करूणानिधि परिवार द्वारा की जा रही सरकारी खजाने की लूट को नज़रंदाज़ करते रहे. जबकि प्रधानमंत्री इसे रोक सकते थे और उन्हें इस लूट को रोकना चाहिए था .लेकिन उन्होंने नहीं रोका . ज़ाहिर है इस गलती का खामियाजा डॉ मनमोहन सिंह को बहुत दिन तक भोगना पड़ेगा . हमें मालूम है कि जब कांगेस के कुछ बड़े नेताओं को नीरा राडिया और करूणानिधि परिवार की ए राजा की मार्फत चल रही लूट का जिक्र किया गया था तो उन लोगों ने बताया था कि गठबंधन सरकार चलाने के लिए कुछ समझौते करने पड़ते हैं . यही बात बीजेपी वाले कहते थे जब उनकी सरकार में शामिल लोगों की बे-ईमानी और भ्रष्टाचार के बारे में कहीं जाती थी . उस दौरान तो इसे एक नाम भी दे दिया गया था. बीजेपी के बड़े नेता इसे तब आपद्धर्म कहते थे. चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी , सत्ता में बने रहने के लिए जनहित और राष्ट्रहित से समझौता करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जाना चाहिये . दुर्भाग्य यह है कि सत्ता में बने रहने की लालच में बड़े नेता यह गलती करते रहते हैं . ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल का है जहां 33 वर्षों की कम्युनिस्ट सरकार अपनी अंतिम साँसे ले रही है . वहां उन लोगों की सत्ता आने वाली है जो इमरजेंसी के दौरान छात्र परिषद् के नेता हुआ

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