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शहरी बेरोजगारी के दौर में औपचारिक नौकरियों में उछाल !

नई दिल्ली, o5 जुलाई 2019। केंद्र सरकार द्वारा जारी नवीनतम नौकरियों के आंकड़ों (Latest job statistics released by the Central Government) ने देश भर में भारी विवाद और बहस को जन्म दिया है। सरकारी आंकड़े यह दर्शाते हैं कि पिछले 45 वर्षों में सामान्य बेरोजगारी चरम पर है, लेकिन इन आंकड़ों का एक अन्य पहलू भी है जो यह दिखाता है कि शहरी और गैर कृषि क्षेत्र में औपचारिक रोजगार में वृद्धि (Increase in formal employment in urban and non-agricultural sectors) भी हुई है – जो सभी नौकरियों का 35.8 प्रतिशत है।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षणPeriodical labor force survey (PLFS) के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह निष्कर्ष निकलता है, जो नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस- National Sample Survey Office (NSSO) द्वारा 31 मई, 2019 और 2004-05 के पंचवार्षिक रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से मिला है।

13 वर्ष पूर्व 2004-05 में जहां शहरी क्षेत्रों में “नियमित” श्रमिकों की हिस्सेदारी 35.6 फीसद था वहीं 2017-18 में यह बढ़कर 47 प्रतिशत हो गई।

“औपचारिक” गैर-कृषि क्षेत्र में श्रमिकों का हिस्सा-सरकारी संगठन, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम और पब्लिक/ प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों, ट्रस्ट / गैर-लाभकारी संस्थान और स्वायत्त निकायों में 2004-05 में जहां 27.8 प्रतिशत रोजगार था वहीं 2017-18 में यह बढ़कर 35.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

Contradictions on “Decent Employment” figures.

“डिसेंट रोजगार” के आंकड़ों पर एक विरोधाभास स्पष्ट है – लेकिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और भारत सरकार में भी रोजगार की स्थिति का विश्लेषण करने के लिए इस शब्द का उपयोग किया जाता है।

जिस दौर का अध्ययन किया गया उस समय गैर-कृषि, और शहरी नौकरियों में रोजगार दर में कमी आई। लेकिन सामाजिक सुरक्षा लाभ वाले रोजगार (Social Security benefits employment), जो रोजगार को देखने-समझने का सबसे महत्वपूर्ण माप है, उसके मुताबिक पिछले 13 वर्षों के दौरान ऐसे रोजगार बढ़े हैं।

नतीजतन, शहरी नौकरी बाजार में एक नया द्वंद्ववाद उभर रहा है: सुरक्षित औपचारिक रोजगार में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई है जिसमें दो तरह के श्रमिक हैं: पहला-बेहतर रोजगार की स्थिति या डिसेंट रोजगार और दूसरा, खराब रोजगार की स्थिति लगभग अनौपचारिक रोजगार के समान है।

यह भारत में रोजगार के परिस्थितियों का एक विस्तृत विश्लेषण (A detailed analysis of employment conditions in India) है, जिसमें विस्तृत जांच की आवश्यकता है। क्योंकि 2017-18 में पीएलएफएस (PLFS) और एनएसएसओ (NSSO ) के सर्वेक्षणों की तुलना की सीमाएं हैं। पीएलएफएस (PLFS) हर तीन महीने में शहरी क्षेत्रों में और साल में एक बार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के आंकड़ों को मापता है और शिक्षा के स्तर को वर्गीकरण के एक मापदंड के रूप में उपयोग करता है।

पीएलएफएस (PLFS) का 2017-18 का आंकड़ा जुलाई 2017 के बाद का है, जब माल और सेवा कर (जीएसटी) लागू किया गया था। डेटा बताता है कि तब से औपचारिक श्रमिकों का अनुपात बढ़ गया है। शहरी क्षेत्रों में “नियमित” श्रमिकों की हिस्सेदारी 2004-05 में 35.6 प्रतिशत की अपेक्षा 2017-18 में बढ़कर 47 प्रतिशत हो गया है।

इस अवधि में पुरुषों के लिए नियमित रोजगार 40.6 प्रतिशत से बढ़कर 45.7 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 35.6 प्रतिशत से बढ़कर 52.1 प्रतिशत हो गया। जबकि जीएसटी को जल्दबाजी में और अराजक तरीके से लागू करने लिए व्यापक रूप से आलोचना की गई थी,  (यहां जीएसटी के कार्यान्वयन के बाद नौकरी के नुकसान पर हमारी श्रृंखला पढ़ सकते हैं)।

पीएलएफएस रिपोर्ट से पता चला है कि भारत की बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी, जब गणना “सामान्य स्थिति” की गणना की गई थी (जो सर्वेक्षण की तारीख से पहले एक वर्ष की संदर्भ अवधि के आधार पर निर्धारित की जाती है), और “वर्तमान साप्ताहिक गणना” में यह 8.9 प्रतिशत पाया गया। (जो सर्वेक्षण की तारीख से पहले सात दिनों की संदर्भ अवधि के आधार पर निर्धारित की जाती है) – दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान।

रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि शहरी युवा महिलाओं में बेरोजगारी सबसे अधिक 27.2 प्रतिशत थी। शहरी शिक्षित पुरुष 9.2 प्रतिशत और महिलाएं 19.8 प्रतिशत बेरोजगार रहीं। सामान्य रूप से महिलाओं में 10.8 प्रतिशत बेरोजगार दर रही।

अन्य डेटा स्रोत इस बात को दर्शाते हैं कि औपचारिक, गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ गए हैं। इनमें कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) और पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) द्वारा जारी मासिक पेरोल डेटा शामिल हैं।

डिसेंट रोजगारक्यों महत्वपूर्ण है?

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजीएस) के अनुरूप, “डिसेंट रोजगार” एक प्रमुख सरकारी महत्वाकांक्षा है। लक्ष्य संख्या आठ कहता है: “निरंतर, समावेशी और सतत आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देकर सभी के लिए पूर्ण और उत्पादक रोजगार को बढ़ावा देना है। और सभी के लिए डिसेंट काम उपलब्ध कराना है।”

‘डिसेंट रोजगार’ के लिए तीन संकेतकों में से दो ( नौकरी का लिखित अनुबंध, अवकाश में भी भुगतान) के लिए शहरी, गैर-कृषि रोजगार में गिरावट आई है, डेटा में यह स्पष्ट दिखता है। लेकिन तीसरे संकेतक (सामाजिक सुरक्ष के तौर पर देखा जाए तो रोजगार में बढ़ोत्तरी दिखती है और जैसा कि हम समझाते हैं, यह संकेत अधिक महत्वपूर्ण है।

गैर-कृषि, शहरी क्षेत्रों में डिसें’ रोजगार के लिए पहला संकेतक नौकरी का लिखित अनुबंध या नौकरी की अवधि के बारे में नियोक्ता के साथ एक औपचारिक समझौता है। इस पैमाने पर पीएलएफएस (PLFS) की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में नियमित श्रमिकों (एक लिखित नौकरी अनुबंध के साथ) की हिस्सेदारी 2004-05 में 40.9 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 27.6 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 38.8 प्रतिशत से 28.6 प्रतिशत हो गया है।

पीएलएफएस रिपोर्ट से पता चलता है कि नियमित कर्मचारियों के लिए दूसरे संकेतक सवैतनिक अवकाश के रूप में शहरी क्षेत्रों में 2004-05 में उपलब्ध 54.5 प्रतिशत रोजगार 2017-18 में घटकर 47.2 प्रतिशत पर पुहंच गया। इसी तरह इसी अवधि में महिलाओं का 52.0 प्रतिशत से 48.2 प्रतिशत हो गया।

डिसेंट रोजगार का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण संकेतक सामाजिक सुरक्षा है -जिसमें भविष्य निधि, पेंशन, ग्रेच्युटी, स्वास्थ्य देखभाल, और मातृत्व लाभ में 6.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2004-05 में यह पुरुषों में 46.6 था जो 2017-18 में 52.3 प्रतिशत हो गया और महिलाओं के लिए 40.4 प्रतिशत से 49.9 प्रतिशत पर पहुंच गया है।

पीएलएफएस ( PLFS) 2017-18 की रिपोर्ट इस प्रकार पुष्टि करता है कि लिखित अनुबंध होने और सवैतनिक अवकाश पाने वाले नियमित श्रमिकों की संख्या में गिरावट आई है। फिर भी, पिछले 13 वर्षों से जारी सरकारी प्रयासों के परिणामस्वरूप सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त करने वाले शहरी क्षेत्रों में औपचारिक श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हुई है।

(अर्जुन कुमार और बलवंत सिंह मेहता क्रमशः अर्थशास्त्र और विकास अर्थशास्त्र में पीएचडी हैं, और इंपैक्ट एंड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएमपीआरआई) और इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली से जुड़े हुए हैं)

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