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Supreme Court Chief Justice Ranjan Gogoi

अराजक ताकतवर लोगों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की हुंकार से आएगी नई क्रांति

नई दिल्ली। मुट्ठी भर लोगों ने देश की व्यवस्था (System of the country) को ऐसे कब्जा लिया है कि आम आदमी बस इसमें इस्तेमाल हो रहा है। ये लोग कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया (Legislature and Media) पर तो कब्जा जमा ही चुके हैं अब सर्वोच्च न्यायालय (Supreme court) को भी अपने कब्जे में लेने का दुस्साहस कर रहे हैं। यह बात अब सर्वोच्च न्यायालय को भी भलीभांति समझ में आने लगी है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह दर्द उस समय सामने आया जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न (Sexual harassment against Chief Justice Ranjan Gogoi) केस में अधिवक्ता उत्सव सिंह बैंस (Advocate Utsav Singh Bains) मामले की सुनवाई चल रही थी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति आरएफ नरिमन और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की विशेष पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि कुछ अमीर और ताकतवर लोग आग से खेल रहे हैं। न्यायपालिका को रिमोर्ट कंट्रोल की तरह चलाना चाहते हैं।

उनका कहना था कि गत तीन साल से न्यायपालिका को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है जो किसी भी हालत में सफल नहीं हो सकता है। उन्होंने चेतावनी देने के लहजे में कहा है कि अब इन लोगों को जवाब देने का समय आ गया है।

इसे देश की सर्वोच्च संस्था (Country’s highest organization) का देश के उन ताकतवर लोगों के खिलाफ ऐलान ए जंग माना जाना चाहिए जो लोग जनता को कीड़े मकौड़े समझ रहे हैं। हर तंत्र को बिकाऊ बनाने में लगे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की इस अपील पर जनता में सकारात्मक संदेश जाएगा और लोगों को हौंसला मिलेगा।

इस बात को लेकर समय-समय पर आवाज उठती रही है कि देश के गिने चुने ताकतवर लोग जनता पर राज कर रहे हैं। मोदी सरकार में मॉब लिंचिंग समेत कई ऐसे मामले हुए कि इन लोगों के खिलाफ आवाज उठाने से लोग डरने लगे। जिन लोगों ने आवाज उठाई उस आवाज को तरह-तरह से दबा दिया गया। यदि आवाज उठाने वाला इन सबके बावजूद नहीं माना तो उसके परिवार को परेशान किया गया। फिर भी बात नहीं बनी तो उसे मरवा तक दिया। जस्टिस लोया, पत्रकार गौरी लंकेश समेत कई सोशल एक्टिविस्ट इन लोगों के कहर की भेंट चढ़ गए।

इसमें दो राय नहीं कि कुछ पूंजीपतियों और ब्यूरोक्रेट के साथ मिलकर लोकतंत्र की रक्षा करने वाले तंत्रों को कब्जाने का प्रयास काफी समय से होता रहा है। मोदी सरकार में मामला पराकाष्ठा तक पहुंच गया।

मोदी सरकार ने काम करने में स्वतंत्रता के नाम पर ब्यूरोक्रेट को अपने साथ मिलाया। बाद में तरह-तरह के डर दिखाकर विधायिका को भी कंट्रोल किया। यही वजह रही कि तमाम अराजकता के बावजूद विपक्ष भी मोदी सरकार के खिलाफ मौन रहा। लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष सहमा हुआ प्रतीत हो रहा है।

लोकतंत्र में प्रहरी की भूमिका निभाने वाले मीडिया की हालत सबसे खराब है। गिने चुने पत्रकारों को छोड़ दें तो पूरा मीडिया मोदी सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है।

यह माना जाता है कि जब किसी सरकार की अराजकता बढ़ती है तो विपक्ष मीडिया के साथ मिलकर उसका सामना करता है। बुद्धिजीवी सरकार की खामियों को जनता तक ले जाते हैं। मोदी सरकार के सामने ये लोग नतमस्तक नजर आ रहे हैं।  इसमें दो राय नहीं कि भ्र्ष्टाचार ने सरकारों के खिलाफ लड़ने वाले तंत्रों को कमजोर बनाया है। इसी का फायदा मोदी सरकार उठा रही है।

स्थिति यह है कि लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections 2019) में जहां सत्ता पक्ष को विपक्ष को घेरना चाहिए वहीं विपक्ष खुद घिर जा रहा है। यही सब वजह है कि अब देश की व्यवस्था को कब्जाने वाले सर्वोच्च न्यायालय को भी अपने नियंत्रण में लेनी की फिराक में हैं। दलित एक्ट को प्रभावित करने का प्रयास भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

इसे देश की विडंबना ही कहा जायेगा कि न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को मुख्य न्यायाधीश के केस बांटने की नीतियों के खिलाफ प्रेस के बीच जाना पड़ा।

दरअसल जब से रंजन गोगई देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं तब से मोदी सरकार की अराजकता पर काफी हद तक शिकंजा कसा गया है। चाहे सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना का मामला हो या फिर राफेल सौदे का मामला सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है।

वैसे प्रभावशाली लोगों द्वारा यौन उत्पीड़न मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पर जिन परिस्थितियों में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है, ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक है। न्यायमूर्ति  रंजन गोगई देश के कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाले थे या अभी करनी ह,। जिसमें राफेल मामला भी है।

कुछ भी जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने इन गिने चुने ताकतवर लोगों के खिलाफ मोर्चा खोला है, उससे अब इन लोगों के खिलाफ माहौल बनने की उम्मीद जगी है। भले ही अपने पर आंच आने पर सर्वोच्च न्यायालय आक्रामक हुआ हो, पर असली मुद्दे पर आया है। इससे लोगों को हौसला मिलेगा।

देश में भले ही लोग डरे हों पर इस सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा तो है। सर्वोच्च न्यायालय का पूंजीपतियों के खिलाफ भरी गई हुंकार का जनता पर सकारात्मक असर पड़ने की पूरी उम्मीद है।

चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की इस हुंकार से कोर्ट की छवि भी निखर कर सामने आएगी। देखने में आता है कि पूंजीपतियों और राजनेताओं के दबाव में सर्वोच्च न्यायालय के मामले प्रभावित होने के आरोप लोग मौखिक रूप से लगाते रहते हैं। अब जब सर्वोच्च न्यायालय खुद इन लोगों को ललकार रहा है तो देश में इस व्यवस्था के खिलाफ एक आंदोलन की भूमिका बनेगी।

चरण सिंह राजपूत

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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