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अच्छे दिन : बिहार में शुरू हुआ तालिबानी न्याय

जब देश में सरकारें और संवैधानिक संस्थाएं (Constitutional institutions) कमजोर पड़ जाती हैं, अपने पथ से भटक जाती हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाती हैं। अपनी जिम्मेदारी न समझते हुए सुख-सुविधाओं और आराम तलबी पर संबंधित लोगों का ध्यान ज्यादा रहता है, तो देश में अराजकता फैलती है। लोग तालिबानी न्याय करने लगते हैं। जब मोदी सरकार के साथ ही राज्य की सरकारें भी जमीनी मुद्दों को अनदेखा कर जातिवाद और धर्मवाद में उलझ कर रही गई हैं तो ऐसा में बिहार में तालिबानी न्याय (Taliban justice in Bihar) शुरू हो गया है। ऐसा नहीं है कि कानून को हाथ में लेने के मामले बिहार में ही हुए हैं। पूरे देश की यही कहानी है। यदि शासन-प्रशासन और संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लिया तो देश में तालिबानी न्याय बिहार की तरह ही हर प्रदेश में होने लगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

यह कानून व्यवस्था से उठता विश्वास ही है बिहार में मवेशी चोरी के आरोप में तीन कथित चोरों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। इसे लोगों का कानून से कोई भय न होना और बेकाबू आक्रोश ही कहा जाएगा कि चोरी के आरोप में एक महिला को निर्वस्त्र कर पीटा गया। चोरी के आरोप में एक युवक की न केवल पिटाई की गई, बल्कि उसके गुप्तांग पर पेट्रोल डालकर भी यातना दी गई।

लोगों का इस हद तक क्रूर हो जाना न केवल किसी तरह के भय न डरना है बल्कि कानून व्यवस्था से उठ गया विश्वास भी है। इसे पुलिस पर से उठ गया विश्वास ही कहा जाएगा, कि एक युवती की हत्या कर भाग रहे युवक को पकड़कर लोगों ने पुलिस के हवाले न कर उसकी हत्या कर दी। एक महिला को डायन बताकर लाठी-डंडे से पीटकर मौत के घाट उतार दिया गया। इस महिला पर ये लोग एक बच्ची को मारने का आरोप लगा रहे थे।

अराजकता का आलम यह है कि सूबे की राजधानी में पीएमसीएच की अधीक्षक की कुर्सी पर एक महिला जाकर बैठ गई। जब उपाधीक्षक ने उनसे उनका परिचय पूछा तो महिला ने कहा कि उपाधीक्षक हो न तो अपना काम करो। मैं आज से पीएमसीएच की अधीक्षक हूं। दरअसल अधीक्षक का कार्यभार उपाधीक्षक ने संभाल रखा है। किसी तरह पीएमसीएच प्रशासन ने महिला को वहां से खदेड़ा।

ऐसा नहीं है कि मात्र बिहार में ही इस तरह की वारदातें हो रही हैं, ये सब पूरे देश में चलना शुरू हो गया है। हां इसके रूप अलग-अलग हैं, कहीं जय श्री राम के नारे के नाम पर तो कहीं पर जाति के नाम और कही पर धर्म के नाम पर। कहीं पर क्षेत्र के नाम पर तो कही पर भाषा के नाम पर। आदमी की जान की कोई कीमत ही नहीं रह गई है।

यह प्रश्न हर संवेदनशील इंसान के दिमाग में कौंध रहा है कि आखिरकार इंसान इतना क्रूर कैसे हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों पर संज्ञान तो लिया है। न्यायालय ने आठ राज्यों को नोटिस भी जारी किया है पर अब तक सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर गौर करें तो न कोई सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को गंभीरता से लेती है और न कहीं कोई पूंजीपति। सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे कितने आदेश हैं जिन्हें सरकारों ने ठेंगा दिखा दिया और न्यायालय कुछ नहीं कर पाया। इसे सर्वोच्च न्यायालय का गिरता स्तर ही माना जाएगा कि अब देश में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

बिहार में ऐसी कई घटनाओं ने कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस तरह की वारदातें क्यों बढ़ रही हैं? आखिर क्या है इसका निदान?

जगजाहिर है कि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme court) ने गत वर्ष इस तरह की वारदातों को रोकने के दिशानिर्देश जारी किए थे। क्या हुआ ढाक के तीन पात। लागू करता भी कौन ?

मोदी सरकार के साथ ही विभिन्न प्रदेशों में चल रही भाजपा की सरकारों को इस तरह की वारदातों को अनदेखा करने तथा आरोपियों को संरक्षण देने के आरोप लगातार रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को एक साल से ज्यादा बीत गया है। मॉब लिंचिंग के मामले (Mob lynching cases) घटने के बजाय बढ़े हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या किया ? फिर कौन लेगा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ?

अब जब मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के तथा 2018 के दिशानिर्देश प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग उठती तो सर्वोच्च न्यायालय को याद आया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर,आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखंड, असम दिल्ली को नोटिस भी भेजा है। पर क्या ये सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस को गंभीरता से लेंगी ? क्या मॉब लिंचिंग की वारदातों पर अंकुश लगेगा। क्या लोगों का कानून पर विश्वास जगेगा?

यदि बिहार में इस तरह की वारदातों की बात करें तो रोहतास के दावथ थाना क्षेत्र स्थित मलियाबाग में बच्चा चोरी के आरोप में दो महिलाओं को पकड़ कर सैकड़ों की बेकाबू भीड़ ने बुरी तरह से पीटा। लोग इतने निरंकुश और आक्रोशित थे कि सूचना पर पहुंची पुलिस ने जब दोनों को किसी तरह छुड़ाकर इलाज के लिए अस्पताल भेजा तो भीड़ का गुस्सा पुलिस पर भी टूट पड़ा। पुलिस को भी भीड़ ने नहीं बख्शा।

भोजपुर जिले के बिहियां थाना क्षेत्र अंतर्गत बगही गांव में चार युवकों को भीड़ ने बच्चा व किडनी चोर होने के संदेह में जमकर पीटा। यदि कुछ बुजुर्ग हस्तक्षेप न करते तो उसकी जान ही चली जाती।

नवादा में मंगलवार को डायन बताकर एक महिला की लाठी-डंडे से पीटकर हत्या कर दी गई। उसे चाकू से भी गोदा गया। ये मारने वाले कोई और नहीं बल्कि उसी गांव के लोग थे जिस गांव वह महिला लंबे समय से रह रही थी। वारदात को अंजाम देने वाले लोग महिला को ढ़ाई साल की एक बच्ची की मौत के लिए जिम्मेदार मान रहे थे। पटना के फुलवारीशरीफ में प्रेम-प्रसंग के मामले में इंटर के एक छात्र की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।

सुपौल में एक युवती की हत्या से उग्र ग्रामीणों ने हत्या कर भाग रहे युवक को पकड़कर उसकी भी पीट-पीटकर हत्या कर दी। पटना में एक युवक की हत्या के बाद आरोपित के घर पर भीड़ ने धावा बोल दिया। भभुआ में शनिवार को चोरी के आरोप में युवक की पिटाई की गई। दरिंदों ने उसे न केवल पीटा, बल्कि गुप्तांग पर पेट्रोल डाल यातना भी दी।

एक सप्ताह पहले ही छपरा में मवेशी चोरी के आरोप में तीन कथित चोरों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। उसी दिन वैशाली में भी ऐस तरह की दो वारदातें की गईं। वहां बैंक लूट के आरोप में एक युवक की पीट-पीट कर मार डाला गया। साथ ही मंदिर में चोरी के आरोप में एक महिला को निर्वस्त्र कर पीटा गया।

क्या है मॉब लिंचिंग

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या है भीड़ की यह उन्मादी हिंसा और क्या हैं इसके कारण? सामान्य भाषा में कहें तो जब भीड़ नियंत्रण से बाहर जाकर एक या अधिक व्यक्तियों पर किसी अपराध के संदेह में हमला करती है तो उसे मॉब लिंचिंग कहते हैं। ऐसे मामलों में भीड़ पीट-पीटकर हत्या भी कर देती है। सामान्यत: ये घटनाएं बिना परिणाम सोचे-समझे किसी अपराध के बाद या अफवाह के कारण होतीं हैं। लोग किसी को भी अपराधी समझ लेते हैं और फिर कानून हाथ में ले लेते हैं।

बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोग कानून अपने हाथों में क्यों लेते हैं? मामला कहीं न कहीं कानून व्यवस्था व पुलिस के प्रति अविश्वास से जुड़ा है। प्रख्यात पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि चोरी की घटना और पकड़े गए चोर की पीट-पीटकर हत्या के समय भीड़ के दिमाग में पुलिस की निष्क्रियता और घटना को लेकर आक्रोश हावी रहता है।

ऐसी घटनाओं के पीछे कानून का समाप्त होता डर भी है। अगर भीड़ की हिंसा में शामिल लोगों में यह भय व्याप्त हो जाए कि इस अपराध के कारण वे सजा से बच नहीं सकते तो ऐसा करने से पहले वे जरूर सोचेंगे।

आज की तारीख में सरकारों के मुद्दे से भटकने तथा संवैधानिक संस्थाओं के सरकारों के इशारे पर काम करने से लोगों के मन से कानून का भय लगातार कम हुआ है। समाज में पैदा हो रहे विघटन से समाज का भी लोगों में नही रहा है।

CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

यही सब कारण है कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के फैसले को लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय को नोटिस जारी किया। जब सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में भीड़ की हिंसा रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। तब न्यायालय ने राज्य सरकारों को जिम्मेदारी देते हुए कहा था कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखें। न्यायालय ने संसद से भी भीड़ की हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाने को कहा था। क्या हुआ ढाक के तीन पात ? होता भी कैसे ? अब तक की इस तरह की वारदातों को केंद्र व राज्य सरकारों ने अनदेखा किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मामलों की भर्त्सना कर देने की सीमित होकर रह गये।

मोदी ने अपने पहले कार्यकाल और इस कार्यकाल में एक भी मॉब लिंचिंग के मामले में किसी पर अपने स्तर से संज्ञान नहीं लिया। मोदी भर्त्सना करते रहे और इस तरह के मामले होते रहे। जय श्रीराम नारे पर भी हिंसा होती रही और मोदी चुप रहे। चुप रहते भी क्यों नहीं ? खुद भी तो विभिन्न मंचों से जय श्री राम का नारे का उद्घोष करते रहे हैं।  मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने का हर संभव हल ढूंढ रही है। जमीनी मुद्दों से भटकाने के लिए हर संभव हरकतें कर रही है पर युवाओं को रोजगार कैसे मिले। इस ओर कोई ध्यान नहीं है। यदि देश में इतने बड़े स्तर पर बेरेाजगारी रहेगी तो युवाओं का हिंसा की ओर बढ़ना स्वाभाविक है।

चरण सिंह राजपूत

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