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अगले 5 साल मोदी-2, पूत के पाँव पालने में दिख रहे…

Narendra Modi An important message to the nation

जी हाँ, विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश (World’s largest democratic country) भारत के मतदाताओं ने 2019 के आम चुनावों में फैसला दिया है कि नरेंद्र मोदी ही अगले 5 सालों के लिए भारत के प्रधानमंत्री होंगे। पूर्ण बहुमत की सरकार को दोहराने का कारनामा इसके पूर्व सिर्फ देश के दो ही प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के नाम ही था। 50 वर्षों के बाद मतदाताओं ने यह मौका नरेंद्र मोदी को दिया है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर बढ़िया केंपेनर नरेंद्र मोदी की बम्पर जीत है। यदि भारतीय जनता पार्टी या उसकी गठबंधन की साथी पार्टी यह सोचतीं हैं कि यह जीत उनकी है तो यह खुशफहमी के अलावा कुछ और नहीं है।

नरेंद्र मोदी इस चुनाव के बाद न केवल देश के एक बड़े और शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे हैं बल्कि उनका कद, जिसके सामने पहले ही भाजपा और एनडीए के बड़े से बड़े नेता नतमस्तक रहते थे, अब इतना बड़ा हो गया है कि किसी भी भाजपाई या एनडीए के नेता की जुबान उनके सामने खुलना असंभव ही है।

यह सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी की जीत है, इसका प्रमाण प्रचार-अभियान के दौरान दिये गए उनके भाषण हैं जिनमें नरेंद्र मोदी खुद ‘एक बार फिर- मोदी सरकार’ का नारा उपस्थित जनता से लगवाते थे और कहते थे भी थे कि ‘आपका दिया हुआ एक-एक वोट मोदी के खाते में जाएगा’।

2019 के आम चुनाव के परिणामों में यदि मोदी समर्थकों के लिए खुश होने का मसाला मौजूद है तो बाकी लोगों के लिए चिंतित और भयभीत होने के कारण भी मौजूद हैं।

एक बात तय है कि 2013 में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिये चुने जाने के बाद से मोदी जी जिस चुनावी प्रचार के मोड में गए थे, अपने पूरे 5 साल के कार्यकाल के दौरान वे उससे कभी बाहर नहीं आये। कांग्रेस को कोसना, 60 सालों में देश में कोई विकास नहीं हुआ, इसका रोना रोना, कभी समाप्त नहीं हुआ। यहाँ तक कि अपने ही द्वारा लाई गई उज्जवला, आयुष्मान, प्रधानमंत्री आवास योजना, जैसी फ्लेगशिप योजनाओं का जिक्र उनके भाषणों में यदा-कदा ही रहता था और वह भी बस एक रिफरेंस के तौर पर। बेरोजगारी, नोटबंदी से फ़ैली अफरा-तफरी, जीएसटी से मची उथल पुथल, सीबीआई, रिजर्व बैंक, सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्ता,  जैसे विषयों पर बोलना उन्हें नहीं सुहाता था। मॉब लिंचिंग, दलितों पर अत्याचार, लव जिहाद को लेकर की गई लिंचिंग, जब 5सालों में उनके भाषण का हिस्सा नहीं बनी तो चुनाव प्रचार के दौरान तो उस पर बोलने का सवाल ही नहीं था। राष्ट्रीय सुरक्षा, उरी के बाद की सर्जिकल स्ट्राईक, पुलवामा का आतंकी हमला और बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राईक उनके प्रचार अभियान के प्रिय विषय थे। ।

बहुत से लोगों को, जिनमें बुद्धिजीवी भी शामिल हैं, ऐसा लगा रहा है कि मोदी जी ने जिस तरह हिंदुत्व का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप से किया, उसने चुनाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पर, क्या किसी भी समाज की मानसिकता में केवल पांच वर्षों के दौरान “हिंदुत्व” भरा जा सकता है जबकि उसी समाज को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के प्रयत्न भी किये जाते रहे हों।  मुझे लगता है कि ऐसा तब तक नहीं हो सकता है जब तक उस समाज के अंदर धर्मान्धता, रूढ़िवादिता और धर्म के आधार पर नफ़रत करने के बीज पहले से मौजूद न रहे हों। उस रूप में हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा। जितना धर्मनिरपेक्ष हमने उसे देखा और जाना वह अथक प्रयासों से आजादी की लड़ाई के दौरान बना था और वह भी कुल का बहुत थोड़ा हिस्सा था जो परिवर्तित हुआ था। यदि हम भारतीय समाज के उदारवादी तबके की उस धारणा से बाहर आकर देखें तो पायेंगे कि समाज के अंदर रोजमर्रा के जीवन की भी बातचीत और व्यवहार में धार्मिक विश्वास, जातीयता, के बिना पर भेदभाव करने की प्रवृति गहरे तक जड़ें जमाई हुई थी।

यह संवैधानिक रूप से राज्य की उदारवादी अवधारणा का परिणाम था कि विधिमान्य रूप से कुछ क्षेत्रों में यथा शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, और अन्य सामाजिक जगहों पर समाज के बहुसंख्यक हिस्से को उदारवादी चेहरा बनाए रखना पड़ता है और था। पर, वह कभी भी शाश्वत स्थिति नहीं हो सकती और मोदी राज्य की शह पाते ही बहुसंख्यक हिस्से से वह उदारवादी नकाब हट गया।

23 मई को यह सुनिश्चित होने के बाद कि अब मोदी अपने दम पर 2014 से ज्यादा सीट पाकर और एनडीए के साथ मिलकर बड़े बहुमत की सरकार बनाने जा रहे हैं, उन्होंने ट्वीट करके एक सूत्र दिया कि अब “सबका साथ+सबका विकास+सबका विश्वास=विजयी भारत”।

मोदी जी को यह सूत्र वाक्य देश के सामने परोसे ज्यादा समय नहीं गुजरा था कि 24 मई से एक वीडियो देशवासियों के सामने तैरने लगा जिसमें आधे दर्जन से ज्यादा लोग सिवनी में एक महिला समेत तीन लोगों को गौ-मांस ले जाने के शक में वीभत्स तरीके से पीट रहे हैं और उनके गले में गेरुआ दुपट्टा डालकर उनसे जय श्री राम कहलवा रहे हैं। बेगुसराय में एक मुस्लिम से नाम पूछा जाता है और फिर तुम्हें पाकिस्तान में होना चाहिये कहकर गोली मार दी जाती है। फिर, डाक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या सामने आती है जिसमें उसकी सीनियर मेडिकल की छात्राएं उसे इतना प्रताड़ित करती हैं कि वह आत्म ह्त्या करने के लिये मजबूर हो जाती है। यह भी केवल उसके आदिवासी कोटे से आने का मामला नहीं है। हमें ध्यान देना होगा कि वह धर्म के आधार पर मुस्लिम थी। उसके पति, माँ और पिता की शिकायत के बाद भी कालेज प्रबंधन कोई कार्रवाई नहीं करता है।

एक विदेशी साधू को, जो ध्यान लगाये बैठा था, बार बार जय श्री राम बोलने के लिये कहकर उकसाया जाता है और फिर उसके गले में चाक़ू मार दिया जाता है।

मुम्बई में एक मुस्लिम युवक की टोपी उतरवाकर उससे मारपीट की जाती है। अल्पकाल में घटी ये सारी घटनाएं मोदी जी के सूत्र वाक्य को तिलांजलि देने के लिये काफी हैं।

मोदी जी चाहें और उनके समर्थक चाहें तो आसानी के साथ कह सकते हैं कि 130 करोड़ लोगों के देश में केवल पांच-छै मामले, पर हम तो यही कहेंगे कि पूत के पाँव पालने में दिख रहे हैं।

अंत में, यदि 2014 के आम चुनावों में किये गए वायदों के लिये चुनाव संपन्न हो जाने के कई माह बाद यह कहा गया था कि ये जुमले थे तो 2019 के आम चुनाव के लिये इंतज़ार की जरूरत नहीं है। ये चुनाव भी मोदी-अमित की जोड़ी ने जुमलों की घोड़ी पर चढ़कर ही जीते हैं।

2014 यदि अन्ना ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार की घोड़ी मोदी जी को मुहैया कराई थी तो इस बार मोदी जी ने पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों की शहादात और उसके बाद की गई एयर स्ट्राईक को सवारी बनाया।

आज दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां राजनेता जनता की बुनियादी समस्याओं का हल ढूंढने के बजाय घूम-घूम कर नफ़रत भरे जुमले उछालते रहते हैं। ऐसा ही एक और जुमला हमने 23 मई की शाम को और फिर 25 की शाम को सुना जब मोदी जी ने क्रमश: भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं को फिर संसद भवन के केन्द्रीय हाल में एनडीए के सांसदों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मतदाताओं ने इस चुनाव में जाति की राजनीति को नकार दिया है। अब देश में दो ही जाति हैं एक गरीबी याने गरीब लोगों की और दूसरी जो गरीबी के खत्म करना चाहते हैं, उनकी। पर, दुर्भाग्य से उनके द्वारा दिए गए इस सूत्र के दूसरे हिस्से में याने गरीबी हटाने में मदद करने वालों में गरीबी के लिये जिम्मेदार अदानियों और अम्बानियों और सम्पत्तिवानों की भरमार है। हमने वालीवुड के अनेक अभिनेताओं को जुमलों की बदौलत सफल होते देखा है। अब हम यह राजनीति में देख रहे हैं।

दुःख की बात यह है कि बेरोजगार मेहनतकश लोग लगभग दिशाहीन होकर नस्लवाद और राष्ट्रवाद को ही हल मानकर ऐसे जुमलेबाज नेताओं के झांसे में आकर गुमराह हो रहे हैं। उन्हें यह नहीं पता कि उनके हक कौन मार रहा है। वे कौन लोग हैं जिन्होंने उनकी जिंदगियों को तबाह कर डाला है। जुमले बाज नेता इस मायने में उस्ताद हैं कि वे आम देशवासी को उसकी बदहाली के वास्तविक कारणों का पता नहीं चलने देते। वे ऐसे अनेक ढेर सारे मुद्दे खड़े करने में प्रवीण होते हैं, जिनमें उलझकर लोग सोच भी नहीं सकें कि आखिर उनकी बदहाली के कारण क्या हैं।

अरुण कान्त शुक्ला

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